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जम्मू कश्मीर के उलट लद्दाख में सभी नॉन-गजेटेड नौकरियां स्थानीयों के लिए आरक्षित

केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में ऐसे बाहरी लोग सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं जो वहां एक निश्चित समय तक रह चुके हैं जबकि लद्दाख में केवल 5 अगस्त, 2019 से पहले के स्थायी निवासियों और लेह व कारगिल ज़िलों में रहने वाले ही अब नॉन-गजेटेड नौकरी के पात्र रहेंगे.

लेह का एक दृश्य. (पिक्साबे/अवेंजर डोव)

श्रीनगर: पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य से बने दो केंद्र शासित राज्यों में दो अलग-अलग कानून लागू होंगे. केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में ऐसे बाहरी लोग सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं जो वहां एक निश्चित समय तक रह चुके हैं, जबकि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में केवल 5 अगस्त, 2019 से पहले के स्थायी निवासी और लेह व कारगिल जिले में रहने वाले ही अब अराजपत्रित (नॉन-गजेटेड) नौकरी के लिए पात्र रहेंगे.

बाहरियों के लिए कोई नौकरी नहीं

लद्दाख प्रशासन ने शनिवार को सभी अराजपत्रित पदों पर नियुक्ति के उद्देश्य से ‘केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के निवासी’ को अस्थायी रूप से परिभाषित करने और सरकारी सेवा में प्रवेश के लिए उम्र सीमा में दो साल की छूट देने का आदेश जारी किया.

लद्दाख निवासी प्रमाणपत्र आदेश 2021 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जिसके पास लेह और कारगिल जिलों में सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया स्थायी निवासी प्रमाण पत्र (पीआरसी) है या ऐसे व्यक्तियों की श्रेणी से संबंधित है, वे सक्षम प्राधिकारी द्वारा निवासी प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए के लिए पात्र होंगे.

प्रशासन के एक आधिकारिक प्रवक्ता ने बताया, ‘केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के प्रशासन ने किसी भी विभाग में सभी अराजपत्रित पदों पर नियुक्ति के उद्देश्य से ‘केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के निवासी’ को अस्थायी रूप से परिभाषित करने का आदेश जारी किया है.’

आदेश में कहा गया है कि पीआरसी रखने वाले व्यक्तियों के बच्चे या व्यक्तियों की श्रेणी से संबंधित व्यक्तियों के बच्चे, जो लेह और कारगिल जिलों में सक्षम प्राधिकारी द्वारा पीआरसी जारी करने के पात्र होंगे, वे भी निवासी प्रमाण पत्र प्राप्त करने के हकदार होंगे.

प्रशासन ने राजपत्रित अधिकारियों से संबंधित पदों के अलावा सीधी भर्ती के संबंध में सभी पदों के लिए सरकारी सेवाओं में प्रवेश को लेकर ऊपरी आयु सीमा भी बढ़ा दी है.

प्रशासन के एक प्रवक्ता ने बताया कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए अधिकतम आयु सीमा 43 वर्ष से बढ़ाकर 45 वर्ष, सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए 40 से 42 वर्ष और विशेष रूप से सक्षम उम्मीदवारों के लिए 42 वर्ष से बढ़ाकर 44 वर्ष कर दी गई है.

रोजगार में बाहरी लोगों के लिए दरवाजे बंद करते हुए आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी राज्य या किसी अन्य केंद्र शासित प्रदेश द्वारा किसी भी नाम से डोमिसाइल प्रमाण पत्र या निवासी प्रमाण पत्र रखने वाले लोग लद्दाख के निवासी होने के पात्र नहीं होंगे.

पहले के जम्मू कश्मीर राज्य में मूल निवासियों को जारी किया गया स्थायी निवासी प्रमाणपत्र (पीआरसी) ही केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के निवासियों को परिभाषित करने का एकमात्र आधार बन गया.

पीआरसी दस्तावेज जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासियों के लिए जारी किया गया था, हालांकि इस मानदंड को 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 के साथ भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा खत्म कर दिया गया था.

बता दें कि यह आदेश ऐसे समय में जारी किया गया है जब मुस्लिम बहुल कारगिल और बौद्ध-बहुल लेह जिलों ने लद्दाख के लिए राज्य का दर्जा और नौकरियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों और मूल निवासियों के लिए जमीन की लड़ाई के लिए हाथ मिलाया है.

दो संगठनों- लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए), लद्दाख में राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों के लिए आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं.

यह आदेश लद्दाख के प्रशासन द्वारा ही जारी किया गया है, क्योंकि भारत सरकार ने जनवरी 2020 में लद्दाख के उपराज्यपाल को केंद्र शासित प्रदेश में ग्रुप ‘बी’ (अराजपत्रित) और ग्रुप ‘सी’ पदों पर भर्ती को नियंत्रित करने वाली शर्तों को परिभाषित करने का अधिकार दिया था.

वहीं, लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद, कारगिल के मुख्य कार्यकारी पार्षद फिरोज अहमद खान ने इस कदम का स्वागत किया है. उन्होंने कहा, ‘प्रशासन द्वारा यह एक अच्छी शुरुआत है. इसने कुछ हद तक हमारे अधिकारों की रक्षा की है.’

नुबरा से पूर्व विधायक डेल्डान नामग्याल ने लद्दाख क्षेत्र के लिए राजपत्रित पदों के लिए समान सुरक्षा उपायों की मांग की.

उन्होंने कहा, ‘उन्होंने लद्दाख के मूल निवासियों के लिए राजपत्रित पद आरक्षित क्यों नहीं किए? उन्हें राजपत्रित पदों, जमीन और राजनीतिक प्रक्रिया के लिए समान सुरक्षा उपायों का विस्तार करना चाहिए.’

जम्मू कश्मीर में विशेष अधिकारों को बहाल करने की मांग

इस आदेश ने केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में विशेष अधिकारों को बहाल करने की मांग को भी एक बार फिर हवा दे दी है.

दक्षिणी कश्मीर से सांसद जस्टिस (सेवानिवृत्त) हसनैन मसूदी ने कहा, ‘लद्दाखियों को वह दिया गया जिस पर उनका अधिकार था लेकिन उसी तरह के अधिकार जम्मू कश्मीर के लोगों को देने से इनकार क्यों किया जा रहा है?’

उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर के लिए अधिनियमित डोमिसाइल कानून गैर-स्थानीय लोगों को केंद्र शासित प्रदेश में नौकरियों के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है.

जम्मू कश्मीर का निवासी बनने का मानदंड बहुत अस्पष्ट और खुला हुआ बताते हुए उन्होंने कहा, ‘जम्मू और कश्मीर में रोजगार की स्थिति डोमिसाइल कानून द्वारा शासित होती है. यह बाहरी लोगों को कानून में निर्धारित शर्तों को पूरा करने के बाद नौकरियों के लिए आवेदन करने की अनुमति देता है.’

पूर्व नौकरशाह लतीफ-उल-जमां देवा ने कहा कि यह भारत सरकार के दोहरे मापदंड को दर्शाता है. उन्होंने कहा, ‘हमारे मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को शीर्ष अदालत भारत सरकार के 5 अगस्त, 2019 के  निर्णयों के खिलाफ लंबित मामलों में अपने पूर्वाग्रह के छोड़कर अनुच्छेद 371 के आधार पर अंतरिम समाधान की मांग करते हुए जम्मू कश्मीर के लिए समान व्यवस्था के लिए दबाव बनाना चाहिए.’

इस आधार पर कि यह गैर-निवासियों को जम्मू कश्मीर के निवासियों के साथ नौकरी साझा करने की अनुमति देता है, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस सहित सभी दलों ने जम्मू कश्मीर के डोमिसाइल कानून की आलोचना की थी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)