भारत

जम्मू कश्मीर: जांच को दरकिनार करने वाले क़ानून के तहत छह सरकारी कर्मचारी बर्ख़ास्त

जम्मू कश्मीर प्रशासन ने इन लोगों पर आतंकवादियों के साथ संबंध रखने का आरोप लगाया है. इनकी बर्ख़ास्तगी उस कमेटी द्वारा की गई है, जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 311 (2)(सी) के तहत किया गया है. इस कमेटी के पास बिना जांच के ही संबंधित अधिकारी को बर्ख़ास्त करने का अधिकार होता है.

जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर में दो पुलिसकर्मियों सहित छह सरकारी कर्मचारियों को आतंकवादियों के साथ कथित संबंधों को लेकर बीते बुधवार (22 सितंबर) को बर्खास्त कर दिया गया.

इन कर्मचारियों की बर्खास्तगी उस कमेटी द्वारा किया गया, जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 311 (2)(सी) के तहत किया गया है और इसके पास बिना जांच के ही संबंधित अधिकारी को बर्खास्त करने का अधिकार होता है.

जम्मू और कश्मीर सरकार ने ‘राज्य की सुरक्षा के हित’ के नाम पर औपचारिक जांच की जरूरत को दरकिनार के लिए इस विशेष टास्क फोर्स का गठन किया था.

भारत के संविधान का अनुच्छेद 311 ‘संघ या राज्य के अधीन सिविल क्षमताओं में कार्यरत व्यक्तियों को उनके खिलाफ जांच के बाद पद से बर्खास्त करने, हटाने या पद घटा देने से संबंधित है.’

समाचार वेबसाइट स्क्रोल डॉट इन द्वारा प्राप्त किए गए बर्खास्तगी आदेश में कहा गया है कि कर्मचारियों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत बर्खास्त किया गया है. हालांकि इसमें बर्खास्त कर्मचारियों की किसी चूक या कदाचार का जिक्र नहीं है.

द वायर ने अप्रैल, 2021 में रिपोर्ट कर बताया था कि यह कानून संदिग्ध कर्मचारियों को ‘उन आरोपों के संबंध में सुने जाने का उचित अवसर’ देता है, लेकिन खंड 2 (सी), जिसे जम्मू कश्मीर प्रशासन द्वारा लागू किया गया है, जांच की इस शर्त को दरकिनार कर देता है कि यदि ‘राष्ट्रपति या राज्यपाल इस बात से संतुष्ट हैं कि राज्य की सुरक्षा के हित में इस तरह की जांच करना उचित नहीं है.’

संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत तत्कालीन राज्य को विशेष दर्जा मिला होने के चलते जम्मू और कश्मीर पर अनुच्छेद 311 लागू नहीं हुआ करता था.

अधिकारियों ने बताया कि 22 सितंबर को सरकार द्वारा बर्खास्त किए गए छह कर्मचारियों में बडगाम के रहने वाले कॉन्स्टेबल शौकत अहमद खान शामिल हैं. वे श्रीनगर में विधान परिषद के एक सदस्य के घर से सरकारी हथियारों की लूट में शामिल थे.

अधिकारियों के अनुसार, शौकत 2018 में उनके (विधान परिषद सदस्य) निजी सुरक्षा अधिकारी के रूप में तैनात थे. इसके बाद पुलिसकर्मी को गिरफ्तार किया गया था और बाद में उन्हें पिछले साल आठ अगस्त को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया था.

अधिकारियों ने कहा कि किश्तवाड़ के निवासी पुलिस कॉन्स्टेबल जफर हुसैन बट को पुलिस ने गिरफ्तार किया था और वह राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच के दायरे में है. बट अभी जमानत पर हैं और जांच में दावा किया गया है कि उन्होंने हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों को अपनी कार दी थी और उनकी सुरक्षित आवाजाही में मदद की थी.

बर्खास्त कर्मचारियों में अनंतनाग के बिजबेहरा के अब्दुल हामिद वानी भी शामिल हैं, जो शिक्षक के तौर पर कार्यरत थे. अधिकारियों के अनुसार, सरकारी सेवा में आने से पहले वानी आतंकवादी समूह अल्लाह टाइगर्स के जिला कमांडर थे और उन्होंने अलगाववादी विचारधारा का प्रचार किया था.

आरोप है कि वानी ने प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव का फायदा उठाकर बिना किसी चयन प्रक्रिया के रोजगार हासिल कर लिया और वह प्रतिबंधित आतंकवादी समूह हिजबुल मुजाहिदीन के चेहरे बुरहान वानी की मौत के बाद साल 2016 में हुए आंदोलन के दौरान प्रमुख वक्ताओं और आयोजकों में से एक थे.

अधिकारियों के अनुसार, किश्तवाड़ के रहने वाले और सड़क एवं भवन विभाग में कनिष्ठ सहायक मोहम्मद रफी बट पर किश्तवाड़ में हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों को साजो-सामान मुहैया कराने तथा आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने में मदद करने का आरोप है. उनका नाम भी एनआईए द्वारा दर्ज प्राथमिकी में है. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था और वह फिलहाल जमानत पर हैं.

अधिकारियों ने बताया कि बारामूला निवासी लियाकत अली ककरू को साल 2001 में गिरफ्तार किया गया था. जांच में दावा किया गया था कि वह स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित आतंकवादी थे. वह 1983 से शिक्षक के तौर पर कार्यरत थे. उनके कब्जे से हथियार मिले थे और उन पर 2002 में सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था. हालांकि बाद में उन्हें अदालत ने बरी कर दिया.

प्रशासन का कहना है कि साल 2021 में एक बार फिर उनके पास से दो हथगोले बरामद किए गए हैं.

पुंछ निवासी और वन विभाग में रेंज अधिकारी के रूप में कार्यरत तारिक महमूद कोहली को पाकिस्तान से नकली भारतीय नोट, अवैध हथियारों व मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल होने के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया. उन पर सक्रिय आतंकवादियों के संपर्क में रहने का भी आरोप है.

सामान्य प्रशासन विभाग ने इन छह कर्मचारियों की बर्खास्तगी के संबंध में एक आदेश में कहा कि उपराज्यपाल तथ्यों और मामलों की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद संतुष्ट हैं तथा उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन कर्मचारियों की गतिविधियां ऐसी थीं कि उन्हें सेवा से बर्खास्त किया जा सकता है.

इससे पहले हिजबुल मुजाहिदीन प्रमुख के दो बेटों सहित 11 कर्मचारियों को 11 जुलाई को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था.

इस सूची में रजिया अख्तर भी थीं, जिनके पिता मोहम्मद सुल्तान, जमात-ए-इस्लामी के सदस्य थे. सुल्तान कथित तौर पर खूंखार मिलिशिया इखवानिस द्वारा मारे गए थे. इखवानिस आतंकवाद के दिनों में स्थानीय लोगों के खिलाफ बर्बरता के लिए जाना जाता है.

इसके अलावा इस सूची में में पाकिस्तान स्थित हिजबुल मुजाहिदीन सुप्रीमो सैयद सलाहुद्दीन के बेटे सैयद अहमद शकील और शाहिद यूसुफ भी शामिल थे.

उससे पहले अप्रैल-मई में प्रशासन ने दविंदर सिंह समेत सात कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया था. सिंह को एक वांछित आतंकवादी और दो अन्य के साथ पकड़ा गया था.

इस साल मई में कुपवाड़ा जिले के शिक्षक इदरीस जान को राज्य की सुरक्षा के हित में बर्खास्त कर दिया था. यह राज्य में इस तरह का पहला मामला था.

ये सभी बर्खास्तगी जम्मू कश्मीर प्रशासन द्वारा लागू किए गए उस नियम के बाद हुआ है, जो यह कहता है कि यदि कोई कर्मचारी या उनके परिवार का कोई सदस्य यूएपीए और सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत आरोपित लोगों के प्रति सहानभूति रखता है तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि जम्मू कश्मीर में प्रतिरोध की आवाजों एवं बोलने की आजादी का दमन करने के लिए इन कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)