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सुप्रीम कोर्ट गोपनीय चुनावी बॉन्ड मामले पर सुनवाई क्यों नहीं कर रहा है

वित्त मंत्रालय के निर्देश पर चुनावी बॉन्ड के 18वें चरण की बिक्री शुरू हो गई है और यह 10 अक्टूबर तक चलेगी. हालांकि कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने गोपनीय चुनावी बॉन्ड को जारी रखने को लेकर चिंता ज़ाहिर की है और सर्वोच्च न्यायालय से इसमें तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: वित्त मंत्रालय ने चुनावी बॉन्ड के 18वें चरण की बिक्री की घोषणा की है. इसे लेकर एक बार फिर से विवाद खड़ा हो गया है, जहां कई कार्यकर्ताओं और नेताओं ने चुनावी बॉन्ड की गोपनीयता पर गंभीर चिंता जाहिर की है.

उन्होंने कहा है कि इस तरह के गोपनीय चंदे के चलते देश की चुनावी प्रक्रिया पर काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से भी गुजारिश की है कि वे इस मामले पर तत्काल सुनवाई कर अपना अंतिम निर्णय दें.

मंत्रालय ने बीते बुधवार को कहा कि चुनावी बॉन्ड भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की 29 विशेष शाखाओं में बेचे जाएंगे और यह 1,000 रुपये, एक लाख रुपये, 10 लाख रुपये और एक करोड़ रुपये की राशि में उपलब्ध होंगे. ये बॉन्ड एक अक्टूबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक बेचे जाएंगे.

इसे लेकर माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि चुनाव आयोग ने साल 2017 में चुनावी बॉन्ड पर कई चिंताएं जाहिर की थीं और इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी.

उन्होंने कहा, ‘हम उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर जल्द सुनवाई करेगा क्योंकि राज्य विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इसके 18वें चरण की बिक्री की घोषणा कर दी गई है.’

इसी साल जुलाई में माकपा ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर चुनावी बॉन्ड योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई करने की मांग की थी.

इस मसले को लेकर साल 2018 से ही कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं. शीर्ष अदालत ने दो बार इस पर रोक लगाने की मांग को ठुकरा दिया है.

इसी साल मार्च महीने में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनावी बॉन्ड की आगे और बिक्री पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा था कि ‘चूंकि बिना हस्तक्षेप किए साल 2018 और 2019 में चुनावी बॉन्ड के बिक्री की इजाजत दी गई थी और इस संबंध में पहले से ही पर्याप्त सुरक्षा मौजूद है, इसलिए फिलहाल चुनावी बॉन्ड पर रोक लगाने की कोई तुक नहीं बनती है.’

इससे पहले पिछले लोकसभा चुनाव के समय 12 अप्रैल 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और संजीव खन्ना की पीठ ने एक अंतरिम फैसले में सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया था कि वे 30 मई 2019 तक में एक सीलबंद लिफाफे में चुनावी बॉन्ड से जुड़ी सभी जानकारी चुनाव आयोग को दें.

हालांकि पीठ ने इस योजना पर रोक नहीं लगाई, जिसके चलते राजनीतिक दलों को कई हजार करोड़ रुपये का चंदा गोपीनीय तरीके से प्राप्त हुआ. रंजन गोगोई के मुख्य न्यायाधीश रहते फिर कभी इस मामले की सुनवाई नहीं हुई थी और ये अभी भी लंबित ही है.

खास बात ये है कि गोपनीय एवं विवादित चुनावी बॉन्ड के जरिये सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को हो रहा है.

साल 2019-20 में बेचे गुए चुनावी बॉन्ड की कुल राशि का 75 फीसदी हिस्सा भाजपा को प्राप्त हुआ है. वहीं, प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस को इसमें से महज नौ फीसदी ही राशि प्राप्त हो सकी है. इस दौरान कुल 3,435 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड बेचे गए थे.

साल 2019-20 में भाजपा को कुल 3,427 करोड़ रुपये का चंदा मिला था, जिसमें से 2,555 करोड़ रुपये सिर्फ चुनावी बॉन्ड से प्राप्त हुए हैं.

वहीं, इस बीच कांग्रेस को कुल 469 करोड़ रुपये का चंदा मिला, जिसमें से 318 करोड़ रुपये चुनावी बॉन्ड से मिले हैं. साल 2018-19 में कांग्रेस को चुनावी बॉन्ड से 383 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे.

बता दें कि साल 2018 से लेकर जुलाई 2021 तक कुल 17 चरणों में 7,380.63 करोड़ रुपये के गोपनीय चुनावी बॉन्ड बेचे जा चुके हैं, जिनका मुख्य मकसद राजनीतिक दलों को चंदा देना है.

अब तक बेचे गए कुल चुनावी बॉन्ड की राशि में से 92.30 फीसदी हिस्सा (6,812 करोड़ रुपये) एक करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड का है. दूसरे नंबर पर दस लाख रुपये वाला बॉन्ड है, जिसकी कुल राशि में हिस्सेदारी महज 7.36 फीसदी (549.40 करोड़ रुपये) है.

जाहिर है कि इतने महंगे राशि वाले चुनावी बॉन्ड बड़े उद्योगपतियों, कॉरपोरेट जगत के लोगों एवं अन्य धनकुबेरों द्वारा खरीदा जाता है.

चुनाव सुधार की दिशा में काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने इस साल अगस्त में जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि राजनीतिक दलों को 70 फीसदी चंदा अज्ञात माध्यमों से प्राप्त हुई है, जिसमें चुनावी बॉन्ड भी शामिल है.

उन्होंने कहा कि पार्टियों को इन माध्यमों से 3,377.41 करोड़ रुपये की आय हुई, जो उनकी कुल आय की तुलना में 70.98 फीसदी है.

संस्था ने कहा कि ‘अज्ञात माध्यमों’ से प्राप्त हुई इस राशि में से 2,993.82 करोड़ रुपये (88.64 फीसदी) चुनावी बॉन्ड से प्राप्त हुई थी.

खास बात ये है कि इन ‘अज्ञात चंदों’ में करीब 78 फीसदी की हिस्सेदारी अकेले भाजपा की है. रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए घोषित किया था कि उन्हें 2,642.63 करोड़ रुपये की ‘अज्ञात’ आय हुई है, जो इस दौरान हुई कुल अज्ञात आय (3,377.41 करोड़ रुपये) का 78.24 फीसदी है.

वहीं कांग्रेस ने 526 करोड़ रुपये की ‘अज्ञात आय’ की घोषणा की थी, जो उनकी कुल अज्ञात आय का 15.57 फीसदी है.

इतना ही नहीं, एडीआर ने यह भी बताया कि साल 2004-05 से 2019-20 के बीच यानी 15 सालों में राजनीतिक दलों को 14,651.53 करोड़ रुपये का अज्ञात चंदा मिला है.

इस स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए एडीआर ने मांग की है कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) और चुनाव आयोग द्वारा स्वीकृत संस्था के जरिये राजनीतिक दलों के वित्तीय दस्तावेजों की ऑडिट करवाया जाना चाहिए.

चुनावी बॉन्ड को लेकर क्यों है विवाद

चुनाव नियमों के मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति या संस्थान 2,000 रुपये या इससे अधिक का चंदा किसी पार्टी को देता है तो राजनीतिक दल को दानकर्ता के बारे में पूरी जानकारी देनी पड़ती है. हालांकि चुनावी बॉन्ड ने इस बाधा को समाप्त कर दिया है. अब कोई भी एक हजार से लेकर एक करोड़ रुपये तक के चुनावी बॉन्ड के जरिये पार्टियों को चंदा दे सकता है और उसकी पहचान बिल्कुल गोपनीय रहेगी.

इस माध्यम से चंदा लेने पर राजनीतिक दलों को सिर्फ ये बताना होता है कि चुनावी बॉन्ड के जरिये उन्हें कितना चंदा प्राप्त हुआ.

इसलिए चुनावी बॉन्ड को पारदर्शिता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना जा रहा है. इस योजना के आने के बाद से बड़े राजनीतिक दलों को अन्य माध्यमों (जैसे चेक इत्यादि) से मिलने वाले चंदे में गिरावट आई है और चुनावी बॉन्ड के जरिये मिल रहे चंदे में बढ़ोतरी हो रही है.

साल 2018-19 में भाजपा को कुल चंदे का 60 फीसदी हिस्सा चुनावी बॉन्ड से प्राप्त हुआ था. इससे भाजपा को कुल 1,450 करोड़ रुपये की आय हुई थी. वहीं वित्त वर्ष 2017-18 में भाजपा ने चुनावी बॉन्ड से 210 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त होने का ऐलान किया था.

चुनावी बॉन्ड योजना को लागू करने के लिए मोदी सरकार ने साल 2017 में विभिन्न कानूनों में संशोधन किया था.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने इन्हीं संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. हालांकि कई बार से इस सुनवाई को लगातार टाला जाता रहा है.

याचिका में कहा गया है कि इन संशोधनों की वजह से विदेशी कंपनियों से असीमित राजनीतिक चंदे के दरवाजे खुल गए हैं और बड़े पैमाने पर चुनावी भ्रष्टाचार को वैधता प्राप्त हो गई है. साथ ही इस तरह के राजनीतिक चंदे में पूरी तरह अपारदर्शिता है.

साल 2019 में चुनावी बॉन्ड के संबंध में कई सारे खुलासे हुए थे, जिसमें ये पता चला कि आरबीआई, चुनाव आयोग, कानून मंत्रालय, आरबीआई गवर्नर, मुख्य चुनाव आयुक्त और कई राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस योजना पर आपत्ति जताई थी.

हालांकि वित्त मंत्रालय ने इन सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए चुनावी बॉन्ड योजना को पारित किया था.

(इसे अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)