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पेगासस स्पायवेयर: सरकार ने कहा- एनएसओ नाम के किसी ग्रुप को प्रतिबंधित करने का कोई प्रस्ताव नहीं

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना व प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी भी दी कि सरकार को इस बात की जानकारी नहीं है कि अमेरिका ने एनएसओ ग्रुप को काली सूची में डाला है या नहीं. इज़रायल की एनएसओ ग्रुप कंपनी के पेगासस स्पायवेयर के ज़रिये नेता, पत्रकार, कार्यकर्ता, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों के फोन कथित तौर पर हैक कर उनकी निगरानी की गई या फिर वे संभावित निशाने पर थे.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने शुक्रवार को कहा कि एनएसओ नाम के किसी ग्रुप को प्रतिबंधित करने का उसके पास कोई प्रस्ताव नहीं है और न ही उसे इस बात की जानकारी है कि अमेरिका ने उसे काली सूची में डाला है या नहीं.

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना व प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी.

यह पूछे जाने पर कि क्या भारत में एनएसओ ग्रुप पर प्रतिबंध लगा दिया है, चंद्रशेखर ने कहा, ‘जी, नहीं. एनएसओ ग्रुप नाम के किसी ग्रुप को प्रतिबंधित करने का कोई प्रस्ताव नहीं है.’

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना व प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री समाजवादी पार्टी के दो राज्यसभा सांसदों- विशंभर प्रसाद निषाद और सुखराम सिंह यादव के इस सवाल का जवाब दे रहे थे कि क्या आईटी मंत्रालय ने भारत में एनएसओ समूह पर प्रतिबंध लगा दिया है.

उनसे जब यह पूछा गया कि क्या अमेरिका ने पेगासस स्पायवेयर प्रदान करने के लिए एनएसओ ग्रुप और कैंडिरू को काली सूची में डाल दिया है, जिसका उपयोग पत्रकारों, दूतावास के कार्यकर्ताओं और कार्यकर्ताओं को दुर्भावनापूर्ण रूप से निशाना बनाए जाने के लिए किया गया है, तो केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘मंत्रालय में इस तरह की कोई सूचना उपलब्ध नहीं है.’

गौरतलब है कि अमेरिकी सरकार द्वारा एनएसओ ग्रुप को ब्लैकलिस्ट करने के कुछ हफ्तों बाद तकनीकी कंपनी एप्पल ने उत्तरी कैलिफोर्निया अदालत में इज़रायल के एनएसओ ग्रुप के खिलाफ मुकदमा दायर कराया था. एप्पल ने एक बयान में कहा था कि एनएसओ ग्रुप ने अपने पेगासस स्पायवेयर के जरिये एप्पल यूज़र्स की डिवाइसों को निशाना बनाया है.

अब पेगासस स्पायवेयर के जरिये युगांडा स्थित या युगांडा से संबंधित मामले देख रहे अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों के आईफोन में सेंधमारी करने का मामला सामने आया है. इस घटना को एनएसओ के माध्यम से अमेरिकी अधिकारियों पर की गई सबसे बड़ी हैकिंग बताया जा रहा है.

ज्ञात हो कि इस साल जुलाई में भारत में पेगासस स्पायवेयर सुर्खियों में रहा. पेगासस को इजरायल की साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ ने तैयार किया है.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया कंसोर्टियम, जिसमें द वायर  भी शामिल था, ने पेगासस प्रोजेक्ट के तहत यह खुलासा किया था कि इजरायल की एनएसओ ग्रुप कंपनी के पेगासस स्पायवेयर के जरिये नेता, पत्रकार, कार्यकर्ता, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों के फोन कथित तौर पर हैक कर उनकी निगरानी की गई या फिर वे संभावित निशाने पर थे.

इस कड़ी में 18 जुलाई से द वायर  सहित विश्व के 17 मीडिया संगठनों ने 50,000 से ज्यादा लीक हुए मोबाइल नंबरों के डेटाबेस की जानकारियां प्रकाशित करनी शुरू की थी, जिनकी पेगासस स्पायवेयर के जरिये निगरानी की जा रही थी या वे संभावित सर्विलांस के दायरे में थे.

केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए यह बताने से इनकार कर दिया कि क्या उसने पेगासस को खरीदा है.

विवाद बढ़ने के बाद यह मामला उच्चतम न्यायालय में गया और उसने इस मामले की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित की थी.

अदालत ने कहा था कि सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देने मात्र से न्यायालय ‘मूक दर्शक’ बना नहीं रह सकता. उसने केंद्र का स्वयं विशेषज्ञ समिति गठित करने का अनुरोध यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि ऐसा करना पूर्वाग्रह के खिलाफ स्थापित न्यायिक सिद्धांत का उल्लंघन होगा.

बहरहाल, इस मामले को लेकर सुप्रीट कोर्ट ने जस्टिस रवींद्रन समिति को मुख्य रूप से सात बिंदुओं पर जांच करने का आदेश दिया है.

एक अन्य सवाल के जवाब में चंद्रशेखर ने कहा कि सरकार विभिन्न सोशल मीडिया मंचों के दुरुपयोग की बढ़ती घटनाओं और अपराधियों व राष्ट्र विरोधी तत्वों द्वारा प्रयोक्ताओं को पहंचाए जाने वाले नुकसान के परिणामस्वरूप उत्पन्न हए जोखिम और खतरे से भलीभांति परिचित है.

उन्होंने कहा, ‘सरकार ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग की चुनौतियों से निपटने के लिए उचित कदम उठाए हैं.’

पेगासस प्रोजेक्ट के तहत द वायर  ने अपने कई रिपोर्ट्स में बताया है कि किस तरह एमनेस्टी इंटरनेशनल के डिजिटल फॉरेंसिक जांच में इस बात की पुष्टि हुई थी कि इजरायल स्थित एनएसओ ग्रुप के पेगासस स्पायवेयर के जरिये कई फोन को निशाना बनाया गया था और उनकी हैकिंग हुई थी.

द वायर  ने ऐसे 161 नामों (जिसमें पत्रकार, मंत्री, नेता, कार्यकर्ता, वकील इत्यादि शामिल हैं) का खुलासा किया  था, जिनकी पेगासस के जरिये हैकिंग किए जाने की संभावना है.

इसमें से द वायर  के दो संस्थापक संपादकों- सिद्धार्थ वरदाजन और एमके वेणु, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, कई अन्य पत्रकार जैसे- सुशांत सिंह, परंजॉय गुहा ठाकुरता और एसएनएम अब्दी, मरहूम डीयू प्रोफेसर एसएआर गिलानी, कश्मीरी अलगाववादी नेता बिलाल लोन और वकील अल्जो पी. जोसेफ के फोन में पेगासस स्पायवेयर उपलब्ध होने की पुष्टि हुई थी.

भारत सरकार ने पेगासस की खरीद को लेकर न तो इनकार किया है और न ही स्वीकार किया है. हालांकि इजरायली कंपनी एनएसओ ग्रुप का कहना है कि उसके उत्पाद का इस्तेमाल विशेष रूप से सरकारी खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अपराध और आतंक से लड़ने के लिए किया जाता है.

इस साल अगस्त में केंद्र ने राज्यसभा में एक प्रश्न को अस्वीकार करने के लिए कहा था. केंद्र की मोदी सरकार से पूछा गया था कि क्या उसने इजरायल की साइबर सुरक्षा फर्म के साथ अनुबंध किया है या नहीं. इसके जवाब में केंद्र ने कहा था कि पेगासस स्पायवेयर का मुद्दा विचाराधीन है, क्योंकि इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कई जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सांसद बिनॉय विश्वम के द्वारा पूछ गए इस सवाल का जवाब देने से सरकार द्वारा इनकार किए जाने पर उन्होंने कहा था कि यह दर्शाता है कि इस मामले में कुछ छिपाया जा रहा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)