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डॉलर के मुक़ाबले रुपया साढ़े छह माह के निचले स्तर पर

डॉलर की भारी मांग के चलते रुपये को झटका, 14 मार्च के बाद रुपये में सबसे बड़ी गिरावट.

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(फोटो: पीटीआई)

मुंबई: विदेशी पूंजी की बाजार से निकासी की चिंताओं के बीच रुपये को भारी डॉलर मांग के झटके का सामना करना पड़ा और यह 27 पैसे की भारी गिरावट के साथ साढ़े छह माह के निम्नतम स्तर 65.72 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ.

यह रुपये में 14 मार्च के बाद की सबसे बड़ी गिरावट है. उस दिन यह डॉलर के मुकाबले 65.82 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ था. आठ सितंबर को रुपया एक माह के उच्च स्तर 63.78 रुपये प्रति डॉलर की ऊंचाई को छूने के बाद पिछले 14 कारोबारी सत्रों में 3.04 प्रतिशत अथवा 194 पैसे नीचे आ चुका है.

वैश्विक उतार चढ़ाव बढ़ने के बीच स्थानीय शेयर बाजार में भारी गिरावट आने से भी रुपये पर दबाव बढ़ा. निर्यातकों की मामूली डॉलर की बिकवाली से अंतर बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 65.35 रुपये पर मजबूत खुला.

स्थानीय शेयर बाजार की गिरावट के अनुरूप रुपया 65.7550 रुपये के दिन के निम्नतम स्तर को छू गया. कारोबार के अंत में यह 27 पैसे अथवा 0.41 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्शाता 65.72 रुपया प्रति डॉलर पर बंद हुआ.

इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने अमेरिकी मुद्रा के लिए संदर्भ दर 65.6947 रुपये प्रति डॉलर और 77.3686 रुपये प्रति यूरो निर्धारित की थी.

अंतरमुद्रा कारोबार में रुपये में पौंड के मुकाबले गिरावट आई जबकि जापानी येन और यूरो के मुकाबले इसमें तेजी आई.

गौरतलब है कि भारत सरकार इस वक्त अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट को लेकर जबरदस्त आलोचना झेल रही है. पूर्व वित्त मंत्री व भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने एक दिन पहले एक अंग्रेजी दैनिक में लेख लिखकर भाजपा सरकार की तीखी आलोचना करते हुए कहा था कि केंद्र सरकार की गलत नीतियों ने अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क कर दिया है.

यशवंत सिन्हा की इस आलोचना के बाद विपक्षी दलों ने भाजपा पर चौतरफा हमला बोला है. अर्थव्यवस्था में इस गिरावट के लिए नोटबंदी और जीएसटी को जिम्मेदार माना जा रहा है.

पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा लिखते हैं, ‘प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने गरीबी को बहुत नज़दीक से देखा है. उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि देशवासियों को भी इसे उतने ही पास से देखने का मौका मिले… आज भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर क्या है? निजी निवेश इतना कम हो चुका है, जितना पिछले 20 सालों में नहीं हुआ. औद्योगिक उत्पादन ढह चुका है, खेती संकट में है. निर्माण उद्योग जो एक बड़े कार्यबल को नौकरी देता है, मंदी की चपेट में है. बाकी सेवा क्षेत्रों में भी धीमी प्रगति है. निर्यात घट गया है. अर्थव्यवस्था के एक क्षेत्र के बाद दूसरा क्षेत्र मंदी की चपेट में है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)