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‘कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच खींचतान लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है’

सरकार का तर्क-अदालतें कार्यपालिका का काम नहीं कर सकतीं. मुख्य न्यायाधीश ने कहा- कोई भी संस्था सर्वोच्चता का दावा नहीं कर सकती, नागरिक अधिकार सर्वोच्च.

फोटो: पीटीआई

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नई दिल्ली: कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका के बीच लंबे समय से चली आ रही खींचतान ने हाल के दिनों में फिर जोर पकड़ा है. आजकल यह फिर से सुर्खियों में है. संविधान दिवस के मौके पर रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम में विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद और मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के बीच यह बातचीत देखने को मिली, जब दोनों ने शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर अपनी बातें रखीं.

दूसरी ओर, विधि विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सार्वजनिक बहस लोकतंत्र के लिए हानिकारक हो सकती है. न्यायिक शक्तियों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी में प्रधान न्यायाधीश और विधि मंत्री के खुलेआम एक-दूसरे से असहमति जताने के एक दिन बाद विधि विशेषज्ञों ने यह राय व्यक्त की है.

रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम में विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आश्चर्य जताया था कि क्यों निष्पक्ष न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए न्यायपालिका उनपर और प्रधानमंत्री पर विश्वास नहीं करती है.

प्रसाद का यह बयान राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के संदर्भ में आया. इस फैसले के जरिये शीर्ष अदालत ने एनजेएसी को असंवैधानिक ठहराते हुए उच्चतम न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया था.

इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा था, एक-दूसरे के लिए सम्मान होना चाहिए और कोई भी शाखा सर्वोच्चता का दावा नहीं कर सकती है.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही कहा कि न्यायपालिका और कार्यपालिका एक ही परिवार का हिस्सा हैं और उन्हें एक-दूसरे को मजबूत बनाने के लिए काम करना चाहिए, लेकिन विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद और प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के रविवार के भाषणों में यह टकराव एकबार फिर से सामने आ गया.

कुछ विधि विशेषज्ञों ने सोमवार को कहा कि ऐसे गंभीर मुद्दे पर सार्वजनिक बहस से बचा जाना चाहिए और लोकतंत्र के हित में न तो न्यायपालिका को और न ही कार्यपालिका को एक-दूसरे के क्षेत्र में दखल देना चाहिए.

संविधान दिवस के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में रविवार को विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने न्यायपालिका को विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत की याद दिलाई थी. उन्होंने कहा था कि शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत न्यायपालिका के लिए भी उतना ही बाध्यकारी है, जितना कार्यपालिका के लिए.

रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि शासन का काम उनके पास रहना चाहिए जो शासन करने के लिए निर्वाचित किए गए हों. जनहित याचिका शासन का विकल्प नहीं बन सकती है.

इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा था, एक-दूसरे के लिए परस्पर सम्मान होना चाहिए और लोकतंत्र की कोई भी संस्था सर्वोच्चता का दावा नहीं कर सकती है.

इसके जवाब में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय संवैधानिक संप्रभुता में विश्वास करता है और उसका पालन करता है. उन्होंने कहा, मौलिक अधिकार संविधान के मूल मूल्यों में हैं और वे संविधान का मूल सिद्धांत हैं. एक स्वतंत्र न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा की शक्ति के साथ संतुलन स्थापित करने के लिए संविधान के अंतिम संरक्षक की शक्ति दी गई है ताकि इस बात को सुनिश्चित किया जा सके कि संबंधित सरकारें कानून के प्रावधान के अनुसार अपने दायरे के भीतर काम करें.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि नागरिकों के मौलिक अधिकार के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता. नागरिकों का अधिकार सर्वोच्च होना चाहिए. न्यायमूर्ति मिश्रा ने यह भी कहा था, हमारी किसी भी तरह की नीति लाने में दिलचस्पी नहीं है, लेकिन जिस क्षण नीति बन गई, हमें इसकी व्याख्या करने और इसे लागू किया जाए यह देखने की अनुमति है.

एक दिन पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक अन्य कार्यक्रम में कहा था कि अदालतें कार्यपालिका का काम नहीं कर सकती हैं और दोनों की स्वतंत्रता को सख्ती से कायम करना होगा.

इस चर्चा पर सवालों का जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि अगर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सार्वजनिक बहस नहीं होती है तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा क्योंकि दोनों के अपने-अपने अधिकार हैं.

दवे ने कहा, सरकार को अवश्य समझना चाहिए कि न्यायपालिका की एक भूमिका है और वे कार्यपालिका से निश्चित तौर पर सवाल पूछ सकते हैं और उसे जवाब देने से नहीं बचना चाहिए. न्यायपालिका को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है और कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.

वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने कहा कि राज्य की हर शाखा की संविधान के तहत सुपरिभाषित भूमिका है और अदालतों की भूमिका विधि का शासन सुनिश्चित करने की है.

लेखी ने कहा, मैं इसे टकराव नहीं कहूंगा. न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों अपना काम कर रही है. अदालतों की भूमिका बिल्कुल अलग है और उनकी भूमिका कानून लागू कराने की है. कोई भी सरकार जांच से छूट का दावा नहीं कर सकती है. परिस्थिति की मांग पर अदालतों को हस्तक्षेप करना होता है.

एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता राज पंजवानी ने खींचतान के परिदृश्य को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि दोनों शाखाओं को उचित सावधानी बरतनी चाहिए.

पंजवानी ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कानून के बुनियादी सिद्धांत विवाद का विषय बन गए हैं. हालांकि, न्यायपालिका को कार्यपालिका के क्षेत्र में दखल देने से बचना चाहिए. कार्यपालिका सार्वजनिक तौर पर छाती पीटने की बजाय अदालत के समक्ष उचित आवेदन दायर करने के तरीके का इस्तेमाल कर सकती है.

इससे पहले भी कई मौकों पर कार्यपालिका और न्यायपालिका ने एक-दूसरे से असहमति जताई है. कुछ महीने पहले तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा था कि न्यायपालिका तभी हस्तक्षेप करती है जब कार्यपालिका अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने में विफल रहती है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)