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क्या आप भी इस सवाल से परेशान हैं कि यूपी में कौन जीत रहा है?

यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब हर कोई जानना चाह रहा है. अब तक यह सवाल आपसे इतनी बार पूछा जा चुका होगा कि आपको जवाब रट गया होगा. फिलहाल अगले कुछ घंटे आप इन समीकरणों पर भी विचार कीजिए.

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का परिणाम 11 मार्च को आ रहा है, लेकिन विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा होने के बाद से ही एक सवाल जो आपसे बार-बार पूछा जा रहा है कि यूपी में कौन जीत रहा है. यह ऐसा सवाल है जिसे पूछे जाते समय आपको पत्रकार या चुनाव विश्लेषक होने की जरूरत नहीं है.

अगर आप उत्तर प्रदेश से बाहर किसी दूसरे राज्य में हैं तो बस आपका ‘यूपीवाला’ होना ही काफी है. जैसे अगर आप किसी से दिल्ली में मिले और आपने बताया कि आप यूपी के रहने वाले हैं तो उसका पहला सवाल यही होता है कि कौन जीत रहा है?

अगर आप पूर्वी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश या बुंदेलखंड में घूम रहे हैं तो आपसे पहला सवाल होगा कि आपकी तरफ किसकी हवा चल रही है?

अगर आप अपने ही इलाके में घूम रहे हैं तो अनायास ही लोग आपसे सवाल पूछ लेंगे या बता देंगे. भाई! इस मेरे ख्याल से इस पार्टी की लहर है तुम्हें क्या लगता है?

फिलहाल शनिवार से आपको इस सवाल का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि चुनाव परिणाम आ जाएगा और सारी स्थितियां साफ हो जाएंगी, लेकिन उससे पहले हम आपको उन संभावित अनुमानों के बारे में बताते हैं जो ऐसे ही सवाल-जवाब के जरिये जुटायी गई हैं.

  • पहला अनुमान भाजपा प्रचंड बहुमत से सरकार बना रही है जैसाकि ज्यादातर एक्ज़िट पोल दावा कर रहे हैं. आपको यह अनुमान बताने वाले बहुत सारे यूपी वाले देश भर में सड़कों पर मिल जाएंगें. भाजपा ने बहुत ही आक्रामक तरीके से चुनाव प्रचार करके इस बार मुकाबले को त्रिकोणीय भी बना दिया है.
  • दूसरा अनुमान सपा और कांग्रेस गठबंधन को जीत मिलेगी. सपा और कांग्रेस के साथ आने से मुस्लिम वोट बैंक के बिखरने का खतरा खत्म हो गया है. मुसलमान, यादव , कांग्रेस समर्थक और अखिलेश द्वारा किए गए विकास कार्य से मिले जनसमर्थन से यह गठबंधन सरकार बनाने लायक सीटें जीतने में सफल हो जाएगा.
  • तीसरा अनुमान बसपा के सरकार बनाने का है. इसके पहले भी जब 2007 में बसपा की सरकार बनी थी तब भी ज्यादातर लोग उसे बहुमत नहीं दे रहे थे. इस बार भी ऐसा है. दरअसल बसपा का ज्यादातर वोटर आपको सड़कों पर घूमता हुआ नहीं मिलेगा. अगर मिल भी जाएगा तो वह आपको यह नहीं बताएगा कि वह बहिनजी को वोट देने जा रहा है. ऐसे में बसपा इस चुनाव में डार्क हॉर्स हो सकती है.
  • चौथा अनुमान जिसकी संभावना ज्यादातर लोगों को है. मुकाबला त्रिकोणीय हो रहा है और किसी को बहुमत नहीं मिलने वाला है. हालांकि इसमें पेंच ये है कि कौन सी पार्टी को ज्यादा सीटें मिलने वाली है. अब इसमें भी कई अनुमान हैं. किसी के अनुसार भाजपा सबसे बड़ी पार्टी तो कोई बसपा तो कोई सपा-कांग्रेस गठबंधन को बड़ी पार्टी बता रहा है.

बहस अब इतने पर ही नहीं हो रही है. पहले तीन अनुमान सही हुए तो सब ठीक है, लेकिन अगर चौथा अनुमान सही हुआ तो सबके अपने-अपने समीकरण हैं.

  • पहला समीकरण है कि सपा-कांग्रेस और बसपा मिलकर सरकार बनाएंगे. इसकी कवायद मतदान की शुरुआत के पहले से हो रही थी कि यूपी में भी बिहार की तरह महागठबंधन बनाया जाए, लेकिन यह हो ना सका. अब इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं कि भाजपा को सरकार बनाने से रोकने के लिए दोनों दल साथ आ सकते हैं.
  • दूसरा समीकरण है कि अगर भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरती है तो जरूरी सीटों की कमी के लिए बसपा में तोड़-फोड़ कर दी जाएगी. हालांकि यह स्थिति तभी बनेगी जब भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरे और बसपा सबसे छोटे दल के रूप में. फिलहाल इस बात की चर्चा खूब चल रही है.
  • तीसरा समीकरण है कि अगर समाजवादी पार्टी कुछ सीटों से बहुमत पाने से दूर होती है तो शिवपाल किंगमेकर की भूमिका निभाएंगे. निर्दलीयों और दूसरे दलों में तोड़-फोड़ करने की जिम्मेदारी उनके मजबूत कंधों पर होगी. उनके कई समर्थक रालोद समेत दूसरे क्षेत्रीय दलों के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. ऐसे समय में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
  • चौथा समीकरण है कि अगर बसपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरती है तो भाजपा समर्थन कर सरकार में शामिल हो जाएगी. बसपा और भाजपा गठबंधन करके प्रदेश में पहले भी सरकार बना चुके हैं. ऐसे में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह एक बार फिर से न हो जाए.
  • पांचवा समीकरण कुछ सीटों पर चुनाव लड़ने वाले क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों का है. इन क्षेत्रीय दलों के नेता पूरे चुनाव के दौरान त्रिशंकु नतीजे आने के भविष्यवाणी करते रहे हैं. इनका मानना है कि जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा तो ये अपनी मांग को लेकर सरकार बनाने वाले दल से मोल-भाव कर सकेंगे और सरकार में शामिल हो जाएंगे.
  • छठवां समीकरण है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाए और कुछ दिन केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार रिमोट कंट्रोल के जरिये प्रदेश में अपनी सरकार चलाए. इसके छह महीने बाद यूपी में फिर से विधानसभा चुनाव हों. हालांकि इसकी संभावना कम ही है.