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सार्वजनिक बैंकों ने 38 क़र्ज़दारों के 516 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले

वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2017 तक कुल 1,762 डिफाल्टरों के ऊपर भारतीय स्टेट बैंक का 25,104 करोड़ रुपये बकाया है. वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों का 8,915 डिफाल्टरों पर 92,376 करोड़ रुपये बकाया है.

Commuters walk past a State Bank of India branch in the old quarters of Delhi November 13, 2013. State Bank of India (SBI) posted its steepest quarterly profit fall in more than two years as nonperforming loans increased, underlining the difficulties the bank's first chairwoman faces in keeping a lid on deteriorating assets. REUTERS/Mansi Thapliyal (INDIA - Tags: BUSINESS) - RTX15BLY

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: वित्त मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने चालू वित्त वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में जान-बूझकर क़र्ज़ नहीं लौटाने वालों पर बकाया 516 करोड़ रुपये के क़र्ज़ को बट्टे खाते (एनपीए- ग़ैर निष्पादित परिसंपत्तियां) में डाल दिया है.

इसके तहत 2017-18 की अप्रैल-सितंबर छमाही में ऐसे 38 ऋण खातों को बट्टे खाते में डाला गया है. इसका मतलब है कि बैंकों ने इन खातों के संदर्भ में अपनी कमाई में से 100 प्रतिशत का प्रावधान कर दिया है.

ऐसी इकाइयों को जानबूझकर क़र्ज़ नहीं लौटाने वाली इकाई कहा जाता है जिन्होंने लिए गए क़र्ज़ को उसके घोषित उद्देश्यों में प्रयोग नहीं किया हो या क्षमता होते हुए भी क़र्ज़ चुकाया न हो या धन का गबन कर दिया हो या फिर गिरवी रखी सम्पत्ति को बैंक की जानकारी के बगैर निस्तारित कर दिया हो.

वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, ऐसे क़र्ज़ों के मार्च 2017 तक के आंकड़ों में क़र्ज़ देने वाले सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत से अधिक है.

आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2017 तक भारतीय स्टेट बैंक का जान-बूझकर क़र्ज़ नहीं लौटाने वाले कुल 1,762 डिफाल्टरों के ऊपर 25,104 करोड़ रुपये बकाया है. दूसरे स्थान पर पंजाब नेशनल बैंक है जिसका 1,120 डिफाल्टरों पर 12,278 करोड़ रुपये बकाया है.

कुल मिलाकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का 8,915 डिफाल्टरों पर 92,376 करोड़ रुपये बकाया है.

इस साल जनवरी में केंद्र की मोदी सरकार ने लोकसभा में कहा था कि देश के वाणिज्यिक बैंकों ने पिछले पांच वर्षों की अवधि में 2,30,287 करोड़ रुपये के क़र्ज़ को बट्टे खाते में डाल दिया यानी बैंकों ने अब इस राशि को वापस पाने की उम्मीद छोड़ दी है.

लोकसभा में सीएन जयदेवन और के. मरगथम के प्रश्न के लिखित उत्तर में वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल ने यह जानकारी दी थी.

उन्होंने कहा था कि भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार, मार्च 2016 को समाप्त हुए पिछले पांच वर्ष की अवधि के दौरान अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के 2,30,287 करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया गया.

बीते फरवरी में देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक ने 2016-17 में 20,339 करोड़ रुपये के फंसे क़र्ज़ को बट्टे खाते (एनपीए) में डाल दिया था. यह सरकारी बैंकों में सबसे अधिक राशि है, जो बट्टे खाते में डाली गई है.

इस प्रकार 2016-17 में बैंकों के बट्टे खाते में कुल मिलाकर 81,683 करोड़ रुपये की राशि डाली गई.

यह आंकड़े तब के हैं जब भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहयोगी बैंकों का विलय नहीं किया गया था. सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि वित्त वर्ष 2012-13 में सरकारी बैंकों का कुल बट्टा खाता 27,231 करोड़ रुपये था.

इस प्रकार पांच साल की अवधि में यह राशि तीन गुना बढ़ गई है. वित्त वर्ष 2013-14 में सरकारी बैंकों ने 34,409 करोड़ रुपये के फंसे कर्ज को बट्टे खाते डाला था.

वित्त वर्ष 2014-15 में यह राशि 49,018 करोड़, 2015-16 में 57,585 करोड़ और मार्च 2017 में समाप्त हुए वित्त वर्ष में 81,683 करोड़ रुपये तक पहुंच गई.

स्टेट बैंक के अलावा पंजाब नेशनल बैंक ने भी 2016-17 में 9,205 करोड़ रुपये बट्टे खाते डाले हैं. इसके बाद बैंक ऑफ इंडिया ने 7,346 करोड़ रुपये, केनरा बैंक ने 5,545 करोड़ रुपये और बैंक ऑफ बड़ौदा ने 4,348 करोड़ रुपये बट्टे खाते डाले हैं.

चालू वित्त वर्ष में सितंबर छमाही तक सरकारी बैंकों ने 53,625 करोड़ रुपये के क़र्ज़ को बट्टे खाते डाला था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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