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‘संविधान ने आदिवासियों के संरक्षण का ज़िम्मा सरकार को सौंपा था, लेकिन वो उन्हें ख़त्म कर रही है’

आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम कर रहे जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा से बातचीत.

New Delhi: Tribal community people raise slogans during a protest over their various demands in New Delhi on Sunday. PTI Photo by Ravi Choudhary (PTI4_1_2018_000047B)

नई दिल्ली में बीते एक अप्रैल को आदिवासियों ने अपनी विभिन्न मांगों के लिए प्रदर्शन किया था. (फोटो: पीटीआई)

बीते एक अप्रैल को विभिन्न राज्यों के आदिवासियों ने अपनी मांगों के समर्थन में दिल्ली में संसद का घेराव किया था. इस घेराव का नेतृत्व मध्य प्रदेश के आदिवासियों के एक संगठन जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन (जयस) ने किया था.

इस संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा हैं, जो मध्य प्रदेश के धार ज़िले के रहने वाले हैं और मनावर तहसील में अपना एक निजी क्लीनिक चलाते हैं. वे 2016 में दिल्ली के एम्स में कार्यरत थे, जिसे छोड़कर वे आदिवासी समुदाय के लिए काम करने मनावर जाकर बस गए और जयस की स्थापना की.

ग़ौरतलब है कि जयस वही संगठन है जिसने बीते वर्ष मध्य प्रदेश में हुए छात्रसंघ चुनावों में धार, झाबुआ, बड़वानी और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल ज़िलों में मज़बूती से जमे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, साथ ही कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देते हुए अपने पहले ही चुनाव में 162 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

हीरालाल के मुताबिक जयस ऐसी सफलता इसलिए हासिल कर सका क्योंकि आज़ादी के बाद से ही हाशिये पर धकेल दिए गए आदिवासी समुदाय को एक ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत थी जो उसकी आवाज़ बन सके, इस काम में कांग्रेस, भाजपा और अन्य राजनीतिक दल असफल रहे थे.

अब जयस की आगे की नीति है कि वह छात्र राजनीति से उठकर आदिवासियों के हक़ के लिए बड़े पैमाने पर आवाज़ उठाए.

इसी कड़ी में बीते दिनों धार ज़िले के मनावर में आदिवासी महापंचायत का आयोजन किया गया था, उसके बाद संविधान की 5वीं अनुसूची का कड़ाई से अनुपालन करने और जनजातीय समुदाय संबंधित अन्य मांगों के समर्थन में संसद का घेराव भी किया गया.

आदिवासी समुदाय की समस्याओं, उसके विकास और उसकी मांगों के संबंध में डॉ. हीरालाल अलावा से बातचीत के अंश…

5वीं अनुसूची क्या है? जिसकी अनुपालना के लिए आप आंदोलन कर रहे हैं?

आदिवासियों के लिए संविधान में 5वीं अनुसूची बनाई गई क्योंकि आदिवासी इलाके आज़ादी के पहले भी स्वतंत्र थे. वहां, अंग्रेज़ों का शासन-प्रशासन नहीं था. तब इन इलाकों को बहिष्कृत और आंशिक बहिष्कृत की श्रेणी में रखा गया.

1947 में आज़ादी के बाद जब 1950 में संविधान लागू हुआ तो इन क्षेत्रों को 5वीं और छठी अनुसूची में वर्गीकृत किया गया.

जो पूर्णत: बहिष्कृत क्षेत्र थे उन्हें छठी अनुसूची में डाला गया. जिसमें पूर्वोत्तर के चार राज्य हैं- त्रिपुरा, मेघालय, असम और मिज़ोरम.

और जो आंशिक बहिष्कृत क्षेत्र थे, अंग्रेजों ने वहां भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया. उन्हीं क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में डाला गया. इसमें दस राज्य शामिल हैं, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश.

संविधान में 5वीं अनुसूची के निर्माण के समय तीन बातें स्पष्ट तौर पर कही गईं- सुरक्षा, संरक्षण और विकास.

मतलब कि आदिवासियों को सुरक्षा तो देंगे ही, उनकी क्षेत्रीय संस्कृति का संरक्षण और विकास भी किया जाएगा, जिसमें उनकी बोली, भाषा, रीति-रिवाज़ और परंपराएं शामिल हैं.

5वीं अनुसूची में शासन और प्रशासन पर नियंत्रण की बात भी कही गई है. ऐसी व्यवस्था है कि इन क्षेत्रों का शासन-प्रशासन आदिवासियों के साथ मिलकर चलेगा.

मतलब इन क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में एक तरह से विशेषाधिकार मिले, स्वशासन की व्यवस्था की गई. जिसके तहत इन क्षेत्र में सामान्य क्षेत्र के आम क़ानून लागू नहीं होते. स्वशासन के लिए संविधान में ग्रामसभा को मान्यता दी गई है.

जैसे कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग परंपराएं हैं. मध्य प्रदेश में पटेल, झारखंड में मुंडा, मानकीय और पहान, ये व्यवस्थाएं चली आ रही हैं.

इन प्राचीन कबीलाई व्यवस्थाओं में एक ढांचा था, कबीले का सरदार होता था, आपसी झगड़ों का निपटारा वे गांव में ही कर लेते थे. पुलिस थाना व्यवस्था तब नहीं होती थी.

5वीं अनुसूची में इसी व्यवस्था को ग्रामसभा के रूप में मान्यता दी और उसे ज़मीन बेचने और सरकारी अधिग्रहण संबंधी अधिकार दिए. अपनी भाषा, संस्कृति, पहनावा, रीति-रिवाज़ और बाज़ार की व्यवस्था तय करने का अधिकार मिला कि बाज़ार में क्या बिके, क्या न बिके? गांव चाहता है कि शराब न बिके तो नहीं बिकेगी.

फिर 1996 में 5वीं अनुसूची के परिदृश्य में पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) क़ानून बना. 5वीं अनुसूची में ग्रामसभा पारिभाषित नहीं थी, अब 9 बिंदुओं में पारिभाषित कर दिया गया.

दूसरा, ग्रामसभा के साथ-साथ पंचायती राज व्यवस्था को भी जोड़ा गया. दोनों को गांव के विकास की ज़िम्मेदारी मिली. ये गांव की प्रशासनिक व्यवस्था हुई. ज़िले की प्रशासनिक व्यवस्था करने के लिए ज़िला स्वशासी परिषद (डीएसी) को मान्यता दी.

समस्या यहीं से है कि डीएसी की बॉडी और नियमावली अब तक किसी राज्य ने नहीं बनाई कि उसमें कितने सदस्य हों, उनके काम क्या हों.

यह परिषद स्वायत्त है, मतलब कि इसके पास वित्त का भी प्रबंधन हो. संविधान के अनुच्छेद 275 में ट्राइबल सब-प्लान (टीएसपी) की व्यवस्था है, इसके तहत ऐसे क्षेत्रों के लिए अलग से बजटीय आवंटन होता है जिसका प्रयोग आदिवासियों के कल्याण और उनकी आर्थिक व सामाजिक बेहतरी के लिए होता है. ज़िला स्वशासी परिषद पैसा किस तहसील में, किस ब्लॉक में ख़र्च हो, यह तय करती है.

डॉ. हीरालाल अलावा. (फोटो साभार: फेसबुक)

डॉ. हीरालाल अलावा (दाएं). (फोटो साभार: फेसबुक)

पर जब परिषद ही नहीं बना तो स्वाभाविक है कि टीएसपी का पैसा कहीं न कहीं डायवर्ट किया जा रहा है. जैसे मध्य प्रदेश में टीएसपी का 100 करोड़ रुपया राज्य सरकार ने इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट में दे दिया.

दस्तावेज़ों के सहारे सामने आया ये महज़ एक छोटा सा उदाहरण है. पूरे प्रदेश में यह पैसा कहीं शहरों में विकास के नाम पर तो कहीं अस्पताल और यात्राओं में लगाया जा रहा है.

वहीं, स्वशासन की कल्पना करते हुए जिस ग्रामसभा की बात की गई, वर्तमान में उसके द्वारा लिए गए निर्णय को शासन स्वीकार ही नहीं करता है.

उदाहरण के लिए मनावर तहसील में 32 गांवों का विस्थापन करके ज़मीन अल्ट्राटेक सीमेंट को दे दी गई. 5वीं अनुसूची और वनाधिकार क़ानून के अनुसार, आदिवासी की ज़मीन ग़ैर आदिवासी को स्थानांतरित की ही नहीं जा सकती. फिर भी हज़ारों परिवार की ज़मीन सीमेंट फैक्ट्री को कैसे आवंटित हुई? उनकी सिंचित ज़मीन तक को नहीं छोड़ा गया.

क्या मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में क्षेत्र के आदिवासी जयस के नेतृत्व में प्रदेश सरकार का विरोध करने जा रहे हैं?

बीते 11 मार्च को हमने मनावर में आदिवासी महासम्मेलन करके सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि अगर आदिवासियों की ज़मीन वापस नहीं की जाती है तो वह किसी भी क़ीमत पर सरकार का समर्थन नहीं करेगा. विरोध की बात नहीं है, बस समर्थन नहीं किया जाएगा. मुख्यमंत्री बदला जाएगा.

47 विधानसभा सीटों पर आदिवासियों की पकड़ है, वे आरक्षित हैं. 20 सीटें ऐसी हैं जिन पर जीत-हार में आदिवासियों की भूमिका अहम है. 230 सीटों की विधानसभा में 70 सीटें मायने रखती हैं.

उन्हें ज्ञात है कि उसी बेल्ट में छात्रसंघ चुनावों में हमने 162 सीटें जीती हैं. कई कॉलेज में जयस के समर्थन वाले अध्यक्ष बने हैं. यह हमारा संदेश था, उन लोगों को.

वहीं, हम कांग्रेस और भाजपा किसी के साथ नहीं हैं. कांग्रेस भी लंबे समय तक केंद्र और राज्य में सरकार में रही लेकिन आदिवासी तब भी ठगा गया.

अगर हमारी मांगों पर ग़ौर नहीं होगा तो हम आगामी विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश में जयस समर्थित आदिवासी समुदाय के उम्मीदवार निर्दलीय उतारेंगे. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी हमारा यही प्रयास है.

आपकी मांगें क्या 5वीं अनुसूची के कड़े अनुपालन तक ही सीमित हैं?

ऐसा नहीं है, वनाधिकार क़ानून 2006 की भी हम बात कर रहे हैं. इस क़ानून में दर्ज है कि कई सालों से जिस ज़मीन पर आदिवासी रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं, उनको ज़मीन के स्थायी पट्टे दिए जाएं.

अभी तक सरकार ने पूरे देश में महज़ दो-ढाई लाख पट्टे दिए हैं, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार पूरे देश में दस से 12 करोड़ आदिवासी हैं. 90 प्रतिशत से अधिक किसान आदिवासी हैं.

हमारा कहना है उन्हें स्थायी पट्टे दीजिए. दो-ढाई लाख से काम नहीं चलेगा, करोड़ों की संख्या में दीजिए.

एक अन्य बात कि आज़ादी के बाद से अभी तक जो दस-बारह करोड़ आदिवासी हैं, उनमें से चार करोड़ आदिवासियों को इन्होंने अपने ही जंगल और ज़मीन से विस्थापित कर दिया है.

जैसे कभी टाइगर रिज़र्व के नाम पर, कभी सीमेंट फैक्ट्री के नाम पर. अल्ट्राटेक सीमेंट के नाम तो 32 गांव ही किए. खरगौन और बड़वानी में 244 गांव वाइल्ड लाइफ प्रोजेक्ट सेंचुरी के नाम पर विस्थापित करने की योजना है.

वहां ग्रामसभा बहुत पहले बैठ चुकी है. लगभग पांच-दस साल पहले. अब बस ग्रामीणों को भगाना ही बाकी रह गया है. वहीं, छत्तीसगढ़ के कवर्धा ज़िले में भी टाइगर रिज़र्व के नाम पर ऐसी ही योजना है.

Indian tribal people sit at a relief camp in Dharbaguda in Chhattisgarh. File Photo Reuters

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

बांध बनाने के नाम पर मध्य प्रदेश के डिंडोरी में भी कई गांव विस्थापित हो रहे हैं. रतलाम और सीधी ज़िले मतलब कि अभी पूरे राज्य में लगभग 1000 गांव विस्थापित होने की प्रक्रिया में हैं. देश में क्या हालात होंगे, आप अंदाजा लगा लीजिए.

हमने प्रश्न किया कि आप ये कैसा विकास करना चाह रहे हैं, जहां एक बांध सरदार सरोवर के नाम पर हज़ारों आदिवासी परिवार उजाड़ दिए. न उनको पुनर्वास मिला, न ढंग से मुआवज़ा. ज़मीन तो गई ही, जंगल भी गया. उनकी संस्कृति, जनजातीय इतिहास सब नष्ट हो गया.

आदिवासी को उठाकर शहरी क्षेत्र में छोटा-सा घर बनाकर दोगे तो क्या वो सर्वाइव कर पाएगा? आदिवासी का भी अपना एक भौगोलिक क्षेत्र होता है. उसे वहां से निकालकर पुनर्वास के नाम पर एक छोटी सी कोठरी थमा देते हैं. वो सर्वाइव कैसे करेगा, उनका सब-कुछ ख़त्म हो रहा है, संस्कृति, भाषा, सब-कुछ.

इसलिए हम कहते हैं कि आज़ादी के बाद से जो चार करोड़ आदिवासी विस्थापित किए, उनकी पहचान करके उनका उचित पुनर्वास हो. उनकी संस्कृति और भाषा का संरक्षण करते हुए उन्हें उचित मुआवज़ा मिले.

उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है. संविधान ने उनका संरक्षण करने के लिए उन्हें सरकार को सौंपा था. सरकार तो उलटा उनका ख़ात्मा कर रही है.

पचमढ़ी हिल स्टेशन बनाया, कई आदिवासी गांव उजाड़ दिए. पन्ना टाइगर रिज़र्व हो या बांधवगढ़ बनाया हो या अन्य जो भी रिज़र्व क्षेत्र घोषित किए जैसे वाइल्ड लाइफ प्रोजेक्शन सेंचुरी, सब उनकी ज़मीन लेकर.

वहीं, एक मांग ये भी हैं कि आदिवासी की ज़मीन के नीचे अपार खनिज संपदा छिपी है. आदिवासी क्षेत्रों में ज़मीन के नीचे से सोना निकल रहा है, पेट्रोलियम पदार्थ की खोज हो रही है. ज़मीन के वे मालिक हैं लेकिन उनकी मिल्कियत का हक़ उन्हें नहीं मिलता.

कायदे से उन्हें इन खनिजों का कुछ प्रतिशत हिस्सा मिलना चाहिए, पर उनको वहां मज़दूर तक नहीं बनाया जा रहा. बस उनको भगाना चाहते हैं कैसे भी करके.

एक सीमेंट फैक्ट्री का उदाहरण दूंगा कि वहां 99 प्रतिशत मज़दूर उत्तर प्रदेश और बिहार से लेकर आए. जिनकी ज़मीन गई, उनको नौकरी तक नहीं दी.

अब आदिवासी विरोध नहीं करेगा तो क्या करेगा? लेकिन विरोध करने पर वह नक्सली ठहरा दिया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट का ही फैसला है कि जिसकी ज़मीन, उसका मालिकाना हक़. जिसका खनिज है, उसका मालिकाना है. वो नहीं दे रहे तो नौकरी ही दे दो. लेकिन आदिवासी को कुछ नहीं मिलता, उसका वजूद पूरी तरह वहां से मिटा दिया जाता है.

हम चाहते हैं कि कम से कम 50 प्रतिशत रोज़गार स्थानीय लोगों को मिले. लेकिन निजी कंपनियां अपने अनुसार भर्ती करती हैं.

मांग का अगला बिंदु यह है कि 5वीं अनुसूची में आदिवासी को जनजाति बोला गया है, उसमें देश के राष्ट्रपति को यह अधिकार दे दिया है कि वे किसी भी जाति को जनजाति में शामिल कर सकते हैं और किसी भी जनजाति को बाहर भी कर सकते हैं.

ये बहुत ही कमज़ोर पक्ष है. पहले तो बस शामिल करना और हटाना राष्ट्रपति का अधिकार था लेकिन अब सरकारें यह काम कर रही हैं. वे वोट की राजनीति करती हैं, जो उनका समर्थक है, उसको जनजाति बना रहे हैं.

एक अप्रैल को राजधानी नई दिल्ली में आदिवासियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन किया. (फोटो साभार: फेसबुक)

एक अप्रैल को राजधानी नई दिल्ली में आदिवासियों ने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन किया. (फोटो साभार: फेसबुक)

भले ही वो सामान्य में ही क्यों न रहे हों, लेकिन उनका वोट चाहिए तो उन्हें जनजाति का उपहार दे रहे हैं. और जो सरकार को समर्थन नहीं कर रहा है, उसको जनजाति से बाहर कर रहे हैं. राष्ट्रपति का क्या है, शक्तियां तो हैं लेकिन चलता वो सरकार के इशारे पर है, बस थप्पा लगाने का काम होता है.

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने कहार, मांझी सहित छह जातियों को अनुसूचित जनजाति का लाभ दे दिया. कई सालों से वे फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट बनवाकर नौकरी कर रहे थे. ऐसे 50,000 फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट वाले लोग आज भी मध्य प्रदेश में नौकरी कर रहे हैं.

सरकार को इनके ऊपर एक्शन लेना चाहिए था. सर्टिफिकेट जारी करने वाले कार्रवाई होनी थी. लेकिन नौकरी करने वाले एकजुट हो गए तो सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी कि 2005 तक जिनके सर्टिफिकेट बने, उन्हें आगे भी नौकरी करने दी जाए. तो सरकारें उन्हें सज़ा देने के बजाय वोट बैंक खातिर रिवॉर्ड दे रही हैं.

इसी तरह झारखंड में कुर्मी और तेली को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर रहे हैं. झारखंड सरकार ने घोषणा कर दी है जबकि दोनों अब तक शायद ओबीसी और सामान्य में थे. मतलब कि जहां से वोट बैंक बढ़ता दिखता है, वहां ऐसा हो जाता है.

गुजरात की राठवा जनजाति आज़ादी के बाद से ही जनजातीय सूची में दर्ज थी. उनका प्राचीन इतिहास है. अब उनको बाहर कर रहे हैं.

हमारी मांग है कि संविधान में जो आदिवासी की स्थायी परिभाषा है जिसमें आदिकाल से, प्राचीन काल से जो जुड़े हैं, उसमें किसी को शामिल करने और बाहर करने का कोई सवाल ही नहीं है. सबको ये परिभाषा दे दीजिए ताकि अंदर-बाहर करने का खेल ख़त्म हो, अन्यथा आगे जाकर देश में असंतोष पैदा होगा.

वर्तमान में केंद्र सरकार के पास जनजाति घोषित करने की मांग के 1000 विचाराधीन मामले हैं. वे जनजाति में शामिल इसलिए होना चाहते हैं क्योंकि उनको ज़मीन हड़पनी है. क्योंकि अभी क़ानूनन आदिवासी की ज़मीन पर ग़ैर आदिवासी या दूसरा कोई क़ब्ज़ा नहीं कर सकता है.

वहीं, कुछ हैं जिन्हें आरक्षण का लाभ चाहिए. कुछ राजनीति में घुसना चाहते हैं. सबका अपना-अपना स्वार्थ है, वरना अनुसूचित जनजाति कौन बनना चाहेगा? आदिवासी आरक्षण के बाद भी उच्चस्तरीय नौकरी पाने से वंचित हैं, वहीं जो सामान्य वर्ग और ओबीसी में बिना आरक्षण पहले से ही संपन्न हैं, आरक्षण लेकर सारी नौकरी हड़प लेंगे.

आप जिस तरह आदिवासियों की समस्याएं गिना रहे हैं, उससे तो लगता है कि चुनौतियां अपार हैं लेकिन सरकारें तो विकास के बढ़-चढ़कर दावे करती हैं. एससी/एसटी समुदाय के लिए खूब योजनाएं ला रही हैं.

शहर से हमको सब नज़र नहीं आता है. राजधानी से सौ-दो सौ किलोमीटर अंदर के इलाकों जैसे- छत्तीसगढ़ के बस्तर या बस्तर से भी और अंदर चले जाएं, मध्य प्रदेश में धार, झाबुआ, बड़वानी अंदरूनी इलाकों में विकास की सही स्थिति ज्ञात होती है कि वास्तव में कितना विकास हुआ?

वहां पीने का पानी नहीं है. बरसात में कई बार लोग नालों से पानी भरकर लाते हैं, गड्ढे खोदकर लाते हैं, वो गंदा पानी होता है. फिल्टर पानी तो वहां कोई नहीं पीता, कहीं नहीं मिलता. टंकियां तो बनीं, लेकिन सरकार पानी नहीं भरती.

मध्य प्रदेश में झाबुआ, अलीराजपुर, बड़वानी फ्लोरोसिस जोन हैं. वहां फ्लोराइड युक्त पानी आता है जो हड्डियों को ख़राब कर देता है. हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं. जवानी में लड़के बूढ़े हो जाते हैं. मतलब हड्डियां ऐसे मुड़ जाती हैं, कूबड़ बन जाता है.

वहीं, पूरे जोन में सिकल सेल एनीमिया फैला हुआ है. इस बीमारी में शरीर में ख़ून तो बनता है, लेकिन कम समय के लिए. लाल रक्त कोशिकाएं (आरबीसी) कम समय ज़िंदा रहती हैं.

रोगी को बार-बार खून की ज़रूरत होती हैं. हड्डियों में खून नहीं पहुंचता है तो दिल के दौरे सा लगता है. रक्त संचरण रुकने से शरीर का वह हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाता है और इंसान दर्द से चीखता है. सिलिकोसिस तो है ही उधर.

कुपोषण भी समस्या है. बड़वानी, झाबुआ, धार में सरकारी आंकड़ें 77 हज़ार कुपोषित बच्चे बताते हैं, लेकिन वास्तव में संख्या 5-10 लाख है. इसमें टीएसपी का पैसा ख़र्च हो उस पर किसी का ध्यान नहीं. ज़मीनी स्तर की वास्तविकता सरकारी दस्तावेजों में नहीं दिखती. मलेरिया से 50 मरेंगे, तो दस्तावेज़ में 5 होंगे.

क्या ज़िला स्वशासी परिषद (डीएसी) सभी राज्यों में भंग हैं?

कह सकते हैं कि एक तरह से निष्क्रिय सी पड़ी हैं. कोई बॉडी, कोई नियामावली अभी तैयार ही नहीं हुई है. बनी भी होगी तो एक-दो सदस्य बना दिए होंगे. लेकिन उनके क्या कार्य हैं वो पता नहीं हैं.

परिषद बने, बजटीय पैसा इसके ज़रिये ही बंटे और यही फैसला करे कि कौन-से बेल्ट में कितना पैसा इस्तेमाल होगा, शिक्षा के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में. परिषद के सदस्य आदिवासी ही होंगे, लेकिन कितने सदस्य होंगे यह पता नहीं है क्योंकि नियमावली ही नहीं है. पेसा कानून के तहत ये नियमावली बननी चाहिए.

5वीं अनुसूची के तहत जनजतीय सलाहकार परिषद भी बनाई गई हैं. जनजातियों के उत्थान में उनका कैसा योगदान है?

जनजातीय सलाहकार परिषद् (टीएसी) को राज्य स्तर पर मान्यता दी गई है. इसमें 20 सदस्य होंगे, दो तिहाई विधायक होंगे. पांच सदस्य कोई भी हो सकते हैं, जैसे कि समाज या सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता.

इसका मुखिया भी आदिवासी हो. अनुसूची में यह दर्ज नहीं है पर हम मांग करते हैं कि जनजाति की परिषद है तो मुखिया जनजाति से ही हो.

वैसे, इस परिषद का काम है कि समय-समय पर आदिवासियों के विकास, सुरक्षा और संरक्षण के संबंध मे प्रदेश के राज्यपाल को रिपोर्ट करे. राज्यपाल का काम है कि वे इस रिपोर्ट को राष्ट्रपति को भेजें.

राष्ट्रपति को जनजातीय समुदायों का अभिभावक कहा गया है और उनकी निगरानी का ज़िम्मा सौंपा गया है. राष्ट्रपति जब चाहे, तब राज्यपाल को आदेश देंगे कि उन्हें जनजातीय क्षेत्रों की रिपोर्ट चाहिए.

Tribal women carry bundles of twigs and leaves near Shantiniketan, 150 km (95 miles) northwest of Calcutta on March 18, 2004. REUTERS/Jayanta Shaw/Files

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नियम में है कि 6 महीने या 3 महीने में वह रिपोर्ट मांगे, लेकिन ऐसा भी है कि अगर ज़रूरत हो तो, कभी भी रिपोर्ट मांगी जा सकती है.

अब स्थिति देखिए, राष्ट्रपति ने आख़िरी बार कब रिपोर्ट मांगी या जनजाति सलाहकार परिषद की बैठक कब-कब हुई, ये तक स्पष्ट नहीं है. किसी राज्य में बैठकें नहीं हो रही हैं. हुईं भी तो साल में एक बार.

इसको क्या कहा जाए फिर, सरकारी उदासीनता या इच्छाशक्ति का अभाव?

5वीं अनुसूची लागू तो है लेकिन उसके अनुपालन पर सवाल है. जैसे कि संबंधित किसी कलेक्टर से बात करते हैं तो जवाब होता है कि हमारे पास इससे संबंधित कोई सूचना नहीं है.

5वीं अनुसूची के अलग-अलग प्रावधान हैं जैसे कि पेसा क़ानून के लिए अधिसूचना चाहिए या ग्रामसभा के बारे में चाहिए तो राज्यपाल की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो जारी करे कि इस सूची के इस ज़ोन में ये अधिकार हैं.

जैसे कि अनुसूची में उल्लेखित है कि इन अनुसूचित क्षेत्र में सामान्य क़ानून लागू नहीं हो सकते या लागू हो भी सकते हैं. दोनों बाते हैं और परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं. परस्थितियां क्या होंगी. यह नोटिस राज्यपाल को जारी करना होता है.

ऐसे में सामान्य क्षेत्रों की ही तरह इन क्षेत्रों को चलाया जा रहा है. जो योजनाएं अन्य क्षेत्रों में चल रही हैं, वही यहां हैं. लेकिन वास्तव में यहां के लिए विशेष योजना हो, जिन पर अलग से विचार हो. बिना किसी अधिसूचना जारी किए कैसे सामान्य क्षेत्रों की तरह व्यवहार हो रहा है. टीएसी, ग्रामसभा, डीएसी से सलाह ली जाए जो संवैधानिक बॉडी हैं.

जंगल क्षेत्र में आदिवासी रह रहा है तो उनको जंगल क्षेत्र की जो भी वनोपज है जैसे ताड़ी, आम का पेड़ है, महुए का पेड़ या तेंदुपत्ता उस पर अधिकार मिले. सरकार क़ीमत तय करे और वे उन्हें बेचें, पर ऐसा अब तक होता नहीं है.

इन क्षेत्रों में घर लकड़ी के होते हैं. स्वाभाविक है कि लकड़ी काटकर ही बनेंगे, लेकिन जब ये जंगल में लकड़ी काटने जाते हैं तो गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं.

वन में हज़ारों सालों से जो रह रहा है, उनका अधिकार होना चाहिए, न कि वन विभाग का. घर बनाने के लिए भी लकड़ी नहीं दी जा रही तो कहां से लाई जाए. जल, जंगल और ज़मीन पर यह उसका अधिकार है, पर उसे मिलता नहीं.

जुलाई 2017 में कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग बिल (कैम्पा) लाया गया कि आज़ादी के बाद से जितने भी वनक्षेत्र काटे या कटवाए गए हैं किसी भी कंपनी या अन्य के द्वारा उसके एवज में हर्जाना देना होगा.

यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के 90 के दशक के आसपास आए एक फैसले को ध्यान में रखकर किया गया था. वो राशि तब से अब तक यानी 2016-17 तक 40 हज़ार करोड़ रुपये थी.

उसमें ये है कि उस राशि को 75 प्रतिशत वन विभाग इस्तेमाल करेगा, कुछ प्रतिशत राज्य और केंद्र सरकार. लेकिन ग्रामसभा के अधिकार को पारभाषित नहीं किया.

जितने भी वन क्षेत्र हैं जनजातीय क्षेत्र में ही हैं. ग्रामीण क्षेत्र के पेड़ कटे हैं तो उस पर पहला हक़ ग्रामसभा का हो. लेकिन ग्रामसभा को कोई अधिकार नहीं दिया.

सच यह है कि अशिक्षित आदिवासी को इन बिलों के बारे में पता ही नहीं और न ही उनके कथित नेता जानते है.

राज्य और केंद्र सरकार समाज के पिछड़े तबको के लिए कई योजनाएं बनाती हैं, घोषणाएं और वादे करती हैं, लेकिन ज़मीन पर असर होता नहीं दिख रहा.

योजनाएं आदिवासी के नाम पर बनती हैं, लेकिन उनका फायदा उसे नहीं मिलता. मध्य प्रदेश में रानी दुर्गावती योजना चलाई गई. उसमें बेरोज़गार युवाओं को 5 से 10 लाख गाड़ी खरीदने के लिए ऋण का प्रावधान था. लेकिन, आदिवासी के नाम पर दूसरों ने लाभ लिया.

आदिवासियों के नाम पर पेट्रोल पंप आवंटित हुए, लेकिन फायदा सामान्य वर्ग के लोग ले गए. 5वीं अनुसूची में जितनी भी खदानें हैं, वे आदिवासियों को ही आवंटित होनी हैं, लेकिन सब सामान्य वर्ग के पास हैं. लेकिन, कोई कानून ऐसा नहीं कि इन लोगों को स्पष्ट सज़ा का प्रावधान हो.

इसके लिए राज्य सरकार ज़िम्मेदार है. आदिवासी शिकायत करता नहीं है. उनको अपने अधिकार पता नहीं हैं.

योजनाएं बन रही हैं लेकिन फायदा नहीं पहुंच रहा और कहीं न कहीं सिस्टम ज़िम्मेदार है. समस्या ये भी है कि सरकार योजनाएं बनाती हैं लेकिन जिनके लिए बनाई, उनको ही जानकारी नहीं है.

संसद और विधानसभा में बैठे आदिवासी नेतृत्व पर क्या कहेंगे?

आदिवासी समुदाय से 47 सांसद और करीब 600 विधायक हैं. 5वीं अनुसूची से उन्हें कोई मतलब नहीं. आदिवासी राजनीति हाईजैक हो चुकी है, दूसरे लोग चला रहे हैं.

जनजागरूकता नहीं है. सरकार, राष्ट्रपति, राज्यपाल, शासन-प्रशासन को कतार में अंतिम व्यक्ति के प्रति ईमानदार होना चाहिए था. अगर भ्रष्टाचार भी है तो ज़िम्मेदार सरकार है.

क्या मौजूदा क़ानूनों को ही सख़्ती से लागू कर दिया जाए तो परिवर्तन आएगा?

बेशक आएगा. जैसे धरातल पर 5वीं अनुसूची पूरी तरह लागू होती है तो ज़िला कलेक्टर के पास हर तीन महीनों और छह महीनों में ताज़ा अधिसूचना रहेगी.

इसमें ऐसा प्रावधान भी है कि इन क्षेत्रों में लोगों को रोज़गार नहीं मिल रहा तो राज्यपाल अधिसूचना जारी करेगा कि फलां तहसील में 100 प्रतिशत आरक्षण लागू हो. जिससे कि वहां मौजूद हर नौकरी स्थानीय बेरोज़गारों को ही मिलेगी, भले ही वे पांचवीं पास हों या दसवीं, उससे मतलब नहीं. उसे उसके स्तर का रोजगार मिलेगा. इससे पलायन रुकेगा.

वर्तमान में ग्रामीण रोज़गार के लिए अन्य जिलों, तहसील यहां तक कि राज्यों में जाता है. जब 5वीं अनुसूची लागू होगी तो उसे गांव में ही रोज़गार मिलेगा. भले ही गिट्टी भरने या तालाब खोदने का रोज़गार मिले.

अभी ज़मीन छीनने पर आदिवासी विरोध करता है तो सबसे पहले उसे नक्सल से जोड़कर सीधे जेल में डाल दिया जाता है. आम जनता की सहानुभूति ख़त्म.

लेकिन 5वीं अनुसूची के बाद ज़िला परिषद और ग्रामसभा फ़ैसला करेगी कि हमारे लोगों पर कौन सी धारा लगे, इसकी पुलिस में शिकायत होनी चाहिए या नहीं. गांव में ही मामलों का निपटारा होने लगा तो स्वाभाविक है कि उनके ऊपर अत्याचार कम हो जाएंगे. जनजातीय क्षेत्रों की जेलों में बंद क़ैदियों में 90 प्रतिशत आदिवासी हैं.

जब संवैधानिक रूप से अधिकार है कि सभी फैसलों का निपटारा गांव में कर सकते हैं तो बाहर जाने की ज़रूरत ही नहीं है. थानों में तो सामान्य वर्ग के लोग हैं जहां उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं.

यह समस्या का दूसरा हल हुआ. झगड़े कोर्ट तक जाने पर वे आर्थिक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं. ज़मीन तक बेचनी पड़ती है. वो पैसा बचेगा, जिससे उसका विकास होगा.

फिर सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसले जैसे कि केरल हाईकोर्ट ने बोला है कि जिनकी ज़मीन उनका खनिज. आदिवासी की ज़मीन के नीचे जो भी तत्व या पदार्थ मिलेगा, उस पर उनका हक़ होगा तो आर्थिक रूप से वे मज़बूत होंगे. ऐसे कई प्रावधानों पर ऊपर भी बात की तो कुल मिलाकर आर्थिक विकास होगा तो सामाजिक स्तर भी उठेगा.

 

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