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बिहार में शराबबंदी: बूढ़ों के साथ विधवाएं भी जेल में बंद, तस्करी में बच्चों का हो रहा इस्तेमाल

अधिकारियों ने बताया कि शराब तस्करी में शामिल ज़्यादातर बच्चे अनुसूचित जाति और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदाय से हैं.

Patna: Bihar chief minister Nitish Kumar looking poster during the Non Alcohol Prohibition Day function in Patna on Thursday. PTI Photo(PTI11_26_2015_000211A)

नीतीश कुमार. (फाइल फोटो: पीटीआई)

 

पटना: बिहार के मुंगेर की रहने वाली 35 साल की माया देवी जो अत्यंत पिछड़ी बिंद जाति से आती हैं, बिहार के शराबबंदी क़ानून के तहत दोषी ठहराई जाने वाली पहली महिला थीं. उनसे लेकर मोतिहारी जिले के दलित खेतिहर मजदूर 65 वर्षीय हरि दास तक, बिहार में शराबबंदी से जुड़ी कई हताशा और निराशा भरी कहानियां हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, माया देवी का मुंगेर के छोटी मुरेधी गांव स्थित टीन की छत वाला एक कमरे का घर नवंबर में उनके जेल जाने के बाद से बंद पड़ा है. दिसंबर 2016 में पुलिस ने 25 लीटर अवैध देशी शराब उनसे जब्त की थी. उन पर एक लाख रुपये जुर्माना और 10 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी.

उनके बेटे जितेंद्र जो कभी-कभी ऑटो चलाकर अपना गुजारा करते हैं, बताते हैं, ‘कुछ साल पहले मेरे अपाहिज पिता की मौत हो गई थी. जिसके बाद 2015 में मेरी मां पंजाब काम के सिलसिले में गईं. लौटने के बाद उन्होंने महुआ बनाना शुरू कर दिया. इसके अगले साल जब शराबबंदी लागू की गई, तो हमने उन्हें चेताया, लेकिन उन्होंने कहा कि आजीविका कमाने का उनके पास और कोई रास्ता नहीं है.’

वे आगे बताते हैं, ‘जो लोग अवैध शराब बना रहे हैं, उनमें ज्यादातर विधवा औरतें हैं, जो अन्य कोई और काम करने के लिए शिक्षित नहीं हैं.’

मोतिहारी के एक छोटे से गांव में रहने वाले हरि दास जो टटवा (टांटी या बुनकर) अनुसूचित जाति से आते हैं, वे कहते हैं कि उन्हें अभी भी नहीं मालूम कि क्यों उन्हें पिछले साल कई दिन जेल में बिताने पड़े?

दास को अप्रैल 2017 में आबकारी विभाग की एक टीम द्वारा तीन लोगों के साथ गांव से गिरफ्तार कर लिया गया था.

उन्होंने बताया, ‘जब हमें उठाया गया, तब मैं खेत के पास कुछ साथी ग्रामीणों के साथ बैठा था. हम शराब पी रहे थे. हमारा किसी भी तरह का मेडिकल टेस्ट नहीं कराया गया जिससे यह साबित होता कि हमने शराब पी थी.’

दास ने बताया कि जेल में सभी प्रकार के कैदियों को एक साथ रखा गया था. उन्होंने बताया, ‘हमें बलात्कार और हत्या के आरोपों का सामना कर रहे कैदियों के साथ एक ही कोठरी में रखा गया. मेरी तरह ही और भी लोग थे जिन्हें शराब पीने के आरोपों के चलते जेल में रखा गया था. भाग्यवश, मुझे एक सप्ताह बाद जमानत मिल गई और जुलाई में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया.’

अधिकारी बताते हैं कि चिंता का एक अन्य विषय है कि अवैध शराब के व्यापार में युवाओं की बढ़ती हुई संख्या.

सीआईडी के एडीजीपी ने कहा, ‘हमारा आकलन बताता है कि 18 से 40 वर्ष की आयु के आरोपियों की संख्या बहुत अधिक है. युवा आसानी से पैसा कमाने के लालच में आ जाते हैं.’

नाम न छापने की शर्त पर बाल कल्याण समिति के एक सदस्य बताते हैं, ‘राज्य के 11 रिमांड घरों में रह रहे बच्चों में कम से कम 20-25 प्रतिशत ऐसे हैं जो शराब पीते हुए पकड़े गए थे.’

अधिकारियों ने बताया, ‘ज्यादातर बच्चे अनुसूचित जाति और आर्थिक रूप से पिछड़े समूह से आते हैं. कई बच्चों ने कहा है कि उन्होंने इसलिए अपराध किया क्योंकि वे स्मार्टफोन खरीदना चाहते थे. अधिकांश बच्चे 15 से 18 साल की उम्र के हैं. इन्हें फुटकर व्यापारियों के लिए उत्तर प्रदेश के बलिया एवं गोरखपुर और झारखंड के गोड्डा एवं साहेबगंज जैसे अंतर्राज्यीय सीमा नगरों से स्कूल बैग में शराब की बोतलें ले जाने के एवज में 300 से 500 रुपये दिए जाते थे.’

पुलिस और आबकारी विभाग के अधिकारी कहते हैं बिहार में आने वाली ज्यादातर शराब अवैध रूप से मोतिहारी के जरिए भारत-नेपाल सीमा, कटिहार के ज़रिये पश्चिम बंगाल, गोपालगंज के रास्ते उत्तर प्रदेश और गया के ज़रिये झारखंड के आस-पास से आती है.

मुजफ्फरपुर के पूर्व आबकारी अधीक्षक कुमार अमित ने कहा, ‘हम केवल देशी शराब बनाने वालों और छोटे व्यापारियों को ही गिरफ्तार कर पाते हैं, बड़ी मछलियां कभी-कभी ही पकड़ी जाती हैं. जब भी बड़ी मात्रा में शराब जब्त की जाती है, ड्रायवर ओर सहायक स्टाफ गिरफ्तार कर लिए जाते हैं. जो लोग मुख्य तौर पर यह धंधा चला रहे हैं, वे बचकर निकल जाते हैं क्योंकि वे प्रतिनिधियों के द्वारा चालाकी से अपना व्यवसाय चला रहे हैं.’

मोतिहारी के आबकारी अधीक्षक केशव कुमार झा ने बताया, ‘हमारे दस्तावेज दिखाते हैं कि गिरफ्तार लोगों में से 58 प्रतिशत उपभोक्ता थे.’

समाज विज्ञानी प्रो. डीएम दिवाकर के अनुसार, ‘सामाजिक सुधार केवल जागरूकता बढ़ाने के माध्यम से ही शुरू किए जा सकते हैं, न कि नियमों को जबरन लागू करके.’

प्रो. दिवाकर जो पटना के एएन सिन्हा सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक रह चुके हैं, कहते हैं कि शराबबंदी लागू करते हुए सरकार पुनर्वास जैसे संबंधित पहलुओं पर पर्याप्त विचार करने में नाकाम रही थी.

उन्होंने कहा, ‘जब एक सरकार बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था और पुनर्वास के समाज सुधारक बनने की कोशिश करती है, तो यह खराब आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं के लिए सामान्य है कि वे पैसा कमाने के आसान रास्ते के रूप में शराब व्यापार की ओर मुड़ जाएं. सरकार एक समाज सुधारक के रूप में नाकाम रही है. इसने पुनर्वास, रोजगार और शासन पर ध्यान नहीं दिया.’

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