राजनीति

लेखक ने आपातकाल में जेल में रहने को लेकर महाराष्ट्र सरकार से पेंशन लेने से किया इनकार

मराठी लेखक विनय हार्दिकर ने सवाल उठाया कि आपातकाल के दौरान जेल में डाल दिए गए लोगों की तुलना में आरएसएस के कार्यकर्ता अधिक थे. क्या सरकार उन्हें नकद पुरस्कार देना चाहती है.

मराठी लेखक विनय हार्दिकर. (फोटो साभार: फेसबुक/ Rajeev Basargekar)

मराठी लेखक विनय हार्दिकर. (फोटो साभार: फेसबुक/Rajeev Basargekar)

मुंबई: मराठी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता विनय हार्दिकर ने आपातकाल के दौरान जेल में गए लोगों के लिए भाजपा की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार की पेंशन देने पेशकश को नहीं लेने का फैसला किया है.

हार्दिकर की 1978 की पुस्तक ‘जनाचा प्रवाहो चालिला’ आपातकाल पर प्रामाणिक टिप्पणी समझी जाती है. उन्होंने कहा कि सरकार का (पेंशन का) फैसला विभिन्न कारणों से अनैतिक है.

उन्होंने जनवरी, 1976 में सत्याग्रह में हिस्सा लिया था और गिरफ्तारी दी थी. उन्हें पुणे के समीप यरवदा जेल में डाल दिया गया था.

उन्होंने कहा, ‘मैंने पेंशन नहीं लेने का फैसला किया है. मैं मानता हूं कि इस फैसले का राजनीतिक पक्ष है जो भाजपा अध्यक्ष के संपर्क फोर समर्थन अभियान का हिस्सा जान पड़ता है. मैं उसमें फंसना नहीं चाहता.’

लेखक ने कहा कि आपातकाल लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन करने वाली शिवसेना अब राज्य सरकार में घटक है अतएव पेंशन की यह पेशकश अनैतिक है.

हार्दिकर ने कहा, ‘सरकार को कुछ मुद्दों पर सफाई देनी चाहिए. पहला, जेल में गुज़ारे गए समय के अनुसार लोगों के बीच भेदभाव क्यों?’

उन्होंने कहा, ‘जो जेल में डाले गए थे, वे दो प्रकार के लोग थे. ऐसे लोग, जिन्होंने सत्याग्रह किया (और जिन्होंने गिरफ्तारी दी थी) तथा ऐसे लोग जिन्हें किसी विरोध प्रदर्शन से पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था. इसमें मुस्लिम लीग और आनंद मार्ग जैसे सांप्रदायिक संगठनों के कार्यकर्ता भी थे. कुछ नक्सली भी हिरासत में लिए गए थे. क्या वे भी इस उदार पेंशन के हकदार हैं?’

उन्होंने सवाल किया, ‘आपातकाल में जेल में डाल दिए गए अन्य लोगों की तुलना में आरएसएस के कार्यकर्ता अधिक थे. क्या सरकार उन्हें नकद पुरस्कार देना चाहती है. क्या यह नैतिक है क्योंकि आरएसएस को ग़ैर-राजनीतिक संगठन होने का दावा करता है.’

हार्दिकर ने कहा, ‘मैं आपातकाल ख़त्म और लोकतंत्र की बहाली चाहता था. मैं चाहता था कि इंदिरा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र के साथ जो ज़्यादती की, उसके लिए उन्हें दंडित किया जाए. मेरे दोनों ही लक्ष्य मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव के साथ हासिल हो गए.’

पूर्व पत्रकार और शरद जोशी के शेतकारी संगठन से जुड़े रहे मराठी लेखक विनय हार्दिकर ने आगे कहा, ‘मैं अभी भी बहुत सक्रिय हूं और मुझे पेंशन की ज़रूरत नहीं है.’

इमरजेंसी और उसके बाद के अनुभवों और अवलोकन पर आधारित विनय हार्दिकर की किताब को राज्य पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए चुना गया था. लेकिन कुछ विवाद होने के बाद उन्हें सम्मान देने का फैसला राज्य सरकार ने टाल दिया.

इस हफ्ते की शुरुआत में भाजपा नीत महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़णवीस सरकार ने आपातकाल के दौरान एक महीने से ज़्यादा समय तक जेल में बंद रहे लोगों के लिए 10 हज़ार रुपये महीने की पेंशन योजना शुरू करने की घोषणा की है. योजना के तहत जो लोग एक महीने से कम वक़्त तक जेल में रहे उन्हें पांच हज़ार रुपये का पेंशन दिया जाएगा.

योजना के तहत पेंशन पाने की योग्यता की घोषणा राज्य सरकार ने अभी निर्धारित नहीं की है.

मालूम हो कि इस साल की शुरुआत में महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने आपातकाल के दौरान जेल गए लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देने के साथ पेंशन देने का विचार प्रकट किया था.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने कहा था, ‘सरकार उन सभी लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देने पर विचार कर रही है, जिन्होंने आपातकाल के दौरान कारावास की सज़ा काटी थी. उन सभी के लिए पेंशन की भी व्यवस्था की जाएगी.’

मुख्यमंत्री फड़णवीस ने कहा था कि मौजूदा वक्त में लगभग 7-8 राज्यों में आपातकाल के दौरान जेल गए लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा है, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्य भी शामिल हैं. महाराष्ट्र सरकार राज्य के 36 जिलों और 355 तालुका से उन सभी लोगों के नाम जुटा रही है, जो आपातकाल के दौरान जेल में रहे थे.

हालांकि महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले के पहले ही इस पर विवाद शुरू हो गया. इस फैसले का विरोध कर रहे लोग का कहना है कि इसके ज़रिये आपातकाल के दौरान जेल गए आरएसएस के लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देने का विचार किया जा रहा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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