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जब राजनाथ सिंह ने 84 दंगों को ‘नरसंहार’ बताया था तो फिर कनाडा के ऐसा कहने पर आपत्ति क्यों?

भारत सरकार ने पिछले दिनों कनाडा की एक विधानसभा में 1984 के सिख दंगों को ‘नरसंहार’ कहने वाले एक प्रस्ताव को नकार दिया लेकिन प्रस्ताव के पक्ष में कनाडा के नेता भारतीय गृहमंत्री के एक बयान का हवाला दे रहे हैं.

1984 नरसंहार मेमोरियल पर राजनाथ सिंह और सुखबीर बादल (फोटो : Sikhsiyasat.net)

भारत सरकार ने 7 अप्रैल को कनाडा के ओंटारियो प्रांत की विधानसभा में 1984 में सिखों के हत्याकांड को ‘नरसंहार’ बताने वाले एक प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है. लेकिन इस प्रस्ताव के समर्थक इसके पक्ष में गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा दिए गए एक बयान का हवाला दे रहे हैं.

गौरतलब है कि 6 अप्रैल को प्रोविंशियल लेजिस्लेटिव असेंबली में सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी की हरिंदर कौर मलही ने ‘भारत सहित पूरे विश्व में किसी भी तरह की सांप्रदायिक हिंसा, नफ़रत, दुश्मनी, पूर्वाग्रह, नस्लवाद या किसी भी प्रकार की असहिष्णुता, जिसमें 1984 में सिखों के साथ हुआ नरसंहार भी शामिल था’ की निंदा करता हुआ एक प्रस्ताव पेश किया था. इसमें सभी पक्षों को सच स्वीकार करने और सुलह करने की बात भी कही गई थी. इसके पक्ष में 34 मत मिले और विरोध में 5, जिसमें तीन प्रांतीय दलों ने इसका समर्थन किया है.

7 अप्रैल को इस प्रस्ताव को नकारते हुए गृह मंत्रालय के प्रवक्ता गोपाल बागले ने कहा, ‘हम इस गुमराह करने वाले प्रस्ताव को ख़ारिज करते हैं. यह प्रस्ताव भारत और यहां के संविधान, समाज, लोकाचार, क़ानून और न्यायिक व्यवस्था के बारे में सीमित समझ को दिखाता है.’

उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने इस प्रस्ताव के बारे में अपनी यह राय कनाडा सरकार और राजनीतिक नेतृत्व तक पहुंचा दी है.

जहां एक ओर भारत सरकार ने इस प्रस्ताव को ‘गुमराह’ करने वाला बताया है, वहीं इसकी पैरवी कर रहे नेताओं ने लगातार भारतीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान को दोहराया जहां उन्होंने 1984 के दंगो को ‘नरसंहार’ बताया था.

यह प्रस्ताव पेश करते हुए हरिंदर ने कहा था, ‘यह प्रस्ताव न केवल याद रखने के लिए है बल्कि सम्मान के लिए भी है. इस बात को जानने और समझने के लिए भी कि 1984 की घटना नरसंहार थीं. भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दिसंबर 2014 में यह बात मानी थी और 1984 की घटनाओं को नरसंहार बताया था, लेकिन जिन लोगों की इसमें भूमिका थी, उन्हें अब तक सज़ा नहीं मिली है.’

इसके बाद सेंटर-राईट प्रोग्रेसिव कंज़र्वेटिव पार्टी के सदस्य टॉड स्मिथ ने भी अपने भाषण में गृहमंत्री का ज़िक्र किया, ‘जहां तक 1984 में भारत में हुई घटनाओं का सवाल है मैं इस पर भारत के वर्तमान गृहमंत्री की बात को ही सही मानूंगा. मुझे जितनी उम्मीद थी मलही ने उससे बेहतर तरीके से उनकी कही बात का ज़िक्र किया.’ मलही ने कहा था, ‘यह दंगा नहीं था बल्कि नरसंहार था, जिसमें सैकड़ों मासूम लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी. जिन्होंने अपने रिश्तेदारों को खोया है, उनके दर्द को करोड़ों रुपये का मुआवज़ा देकर भी कम नहीं किया जा सकता.’

इसी तरह इस प्रस्ताव के पक्ष में बोलते हुए प्रोविंशियल पार्लियामेंट के लिबरल सदस्य विक ढिल्लों ने भी राजनाथ सिंह को देश का वरिष्ठतम कैबिनेट मंत्री बताते हुए उनके बयान के बारे में कहा है कि उनके कद के नेता द्वारा ऐसा कहना बहुत बड़ी बात है.

राजनाथ सिंह ने दिसंबर 2014 में हुए एक कार्यक्रम में 1984 के सिख-विरोधी दंगों को नरसंहार कहा था. 26 दिसंबर 2014 को दिल्ली के तिलक विहार में हुए एक कार्यक्रम में गृहमंत्री 1984 के दंगा पीड़ितों के परिजनों को मुआवज़े के चेक बांट रहे थे. तिलक विहार में अब भी कई दंगा पीड़ितों के परिवार रहते हैं.

संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली के ‘जेनोसाइड कन्वेंशन 1948’, जिसमें भारत वादी की भूमिका में था, के अनुसार नरसंहार को परिभाषित किया गया है.

  • यदि कोई किसी भी राष्ट्रीय, जातीय या धार्मिक समूह को, संपूर्ण या आंशिक रूप से  नुकसान पहुंचाने करने के इरादे के साथ निम्नलिखित कृत्य करता है:
  • समूह के लोगों को मार डालना
  • समूह के सदस्यों को गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना
  • जानबूझकर समूह को ऐसी परिस्थितियों में डालना, जो अंततः उन्हें आंशिक या पूरी तरह ख़त्म कर सकती हैं
  • समूह में बच्चे जन्म न ले सकें, ऐसे तरीके थोपना
  • समूह के बच्चों को ज़बर्दस्ती किसी और समूह में भेजना

गौरतलब है कि सिखों के ख़िलाफ़ यह हिंसा नवंबर 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़की थी. इस हिंसा का असर दिल्ली, कानपुर, बोकारो समेत उत्तर भारत के कई शहरों में देखा गया था. सबसे अधिक मौतें दिल्ली में ही हुई थीं. पूरे देश में लगभग 5,000 सिख मारे गए थे. हिंसा के पीछे सत्तारूढ़ कांग्रेस के कई नेताओं के नाम आए और पुलिस की चूक और छूट के चलते कई जानें गईं.

भाजपा ने भी अन्य सभी ग़ैर-कांग्रेसी दलों की तरह इस हिंसा को ‘नरसंहार’ कहा था. जनवरी 2014 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक टीवी इंटरव्यू में यह दावा किया था कि 1984 में हुई मौतें 2002 के गुजरात दंगों से अलग थीं और कम आपराधिक थीं. हालांकि उनके इस दावे को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चुनौती दी थी.

भाजपा नेताओं में भी इस बयान पर राहुल गांधी की यह कहकर आलोचना की थी कि राहुल इस सिख-विरोधी कत्लेआम की गंभीरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं. 28 जनवरी 2014 को दिए गए एक बयान में तब भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, ‘गुजरात दंगे दुर्भाग्यपूर्ण थे पर 1984 तो पूर्व नियोजित नरसंहार था, जो सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा करवाया गया था.’ जावड़ेकर अब मानव संसाधन और विकास मंत्री हैं.

मेमोरियल पर सुषमा स्वराज, सुखबीर बादल और हरसिमरत कौर बादल (फोटो : yespunjab.com)

इससे एक साल पहले 2013 में सुषमा स्वराज, जो अब विदेश मंत्री हैं और राजनाथ सिंह ने दिल्ली के गुरुद्वारा रकाबगंज में ‘नवंबर 1984 के सिख नरसंहार मेमोरियल’ की नींव रखे जाने के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था.