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रूपन देओल बजाज: जिन्होंने केपीएस गिल द्वारा यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और जीत हासिल की

साक्षात्कार: 1988 में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रूपन देओल बजाज ने पंजाब के तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. 17 साल चली लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद उन्हें जीत हासिल हुई.

पंजाब के पूर्व डीजीपी केपीइस गिल और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रूपन देओल बजाज (फाइल फोटो: एएनआई/विकिपीडिया)

पंजाब के पूर्व डीजीपी केपीइस गिल और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रूपन देओल बजाज (फाइल फोटो: एएनआई/विकिपीडिया)

#मीटू मुहिम की धमक देश भर में सुनाई दे रही और यह लोगों में गुस्से और क्षोभ को जन्म दे रहा है. यह भी पहली बार है कि बेखौफ तरीके से एक के बाद यौन उत्पीड़न करने वालों के दिलों में एक डर समा रहा है. इन सबके बीच एक महिला चंडीगढ़ के अपने आवास से इस घटनाक्रम को काफी संतुष्टि के साथ देख रही है.

रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रूपन देओल बजाज को इस बात की खुशी है कि 30 साल बाद उनका यौन उत्पीड़न करनेवाले एक ताकतवर पुरुष को सजा दिलाने के लिए उनके द्वारा किए गए साढ़े सत्रह साल लंबे संघर्ष की गूंज सोशल मीडिया में आ रही कहानियों में सुनाई दे रही है.

उनका उत्पीड़न करनेवाले शख्स थे सर्वशक्तिमान केपीएस गिल, जो कि 1988 में पंजाब के पुलिस महानिदेशक थे. जिन दिनों उनकी पुलिस आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थी, उन दिनों वे ‘निरंकुश शक्ति’ के बोध और घमंड से भरे हुए थे.

द वायर  को दिए गए एक साक्षात्कार में बजाज ने कहा, आज बोलनेवाले महिलाओं के पास संख्या का एक सुरक्षा कवच है. जब मैंने मिस्टर गिल के व्यवहार के बारे में शिकायत की, उस समय मैं अकेली थी और मेरे ऊपर जान से मारने, चरित्रहनन, सजा के तौर पर खराब पोस्टिंग दिए जाने और एक अभिशप्त करिअर का खतरा था.’

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की कहानियां कहने वाली महिलाओं को आपके मामले से क्या सीख मिल सकती है?

मैंने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की लगभग अप्रचलित और प्राचीन धारा 305 और 509 के तहत न्याय हासिल किया. ये 1860 के बाद इन धाराओं के तहत कोई भी मामला दायर नहीं किया गया था. इन धाराओं को अक्सर बलात्कार की धारा 376 या बलात्कार की कोशिश की धारा के साथ नत्थी कर दिया जाता है, लेकिन कभी भी इनका इस्तेमाल अकेले नहीं किया जाता है.

ऐसा इसलिए है, क्योंकि इन धाराओं के तहत आने वाले अपराध इतने मामूली माने जाते हैं कि उन्हें एक अदद एफआईआर के लायक भी माना ही नहीं जाता है. बहुत धक्के खाकर मुझे इस बात की जानकारी मिली. लेकिन वे स्त्री की गरिमा और सम्मान पर हमला हैं और उन्हें जीवनभर का आघात दे सकते हैं.

बलात्कार धारा 376 के तहत आता है, लेकिन सारी स्त्रियां इसका शिकार नहीं होतीं. मेरा मानना है कि आईपीसी की धाराओं 354 और 509 के तहत आनेवाली धाराएं अपने चरित्र में सर्वव्यापी हैं और हर स्त्री अपने जीवन में कम से कम पांच या छह बार इसका सामना करती है.

अनुच्छेद 509 का संबंध स्त्री के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले शब्दों, हावभाव या क्रियाकलाप से है और धारा 354 किसी स्त्री की पवित्रता को भंग करने के इरादे से किए गए हमले या आपराधिक बल प्रयोग से जुड़ा हुआ है.

ये प्रावधान शारीरिक हमले से मुख्तलिफ हैं, लेकिन ये सिर्फ स्त्रियों के खिलाफ होनेवाले अपराधों से जुड़े हुए हैं, क्योंकि इसमें पवित्रता/इज्जत का एक तत्व जुड़ा हुआ है. इसलिए ऐसे सारे पुरुष जिन्हें यह लगता है कि अवांछित कामुक इशारे या अश्लील बातें करना कोई अपराध नहीं है, उन्हें खबरदार हो जाना चाहिए.

सर्वोच्च न्यायालय ने 12 अक्टूबर, 1995 को इस श्रेणी में मेरे खिलाफ अपराध को स्वीकार किया और इसे आपराधिक कृत्य करार दिया.

ऐसा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसने आईपीसी की धारा 95 के तहत इस केस को खारिज कर दिया था, जिसके अनुसार यह मामला इतना तुच्छ था कि इसे अपराध की श्रेणी में रखकर इस पर विचार नहीं किया जा सकता था.

सर्वोच्च न्यायालय ने यह तजवीज दी कि आईपीसी की धारा 95 का इस्तेमाल स्त्री के शील भंग से संबंधित मामलों में आश्रय के तौर पर नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ये तुच्छ मामले नहीं हैं.

जुलाई, 1988 की उस शाम के बारे में बताइए, जब आपके साथ यह घटना पेश आई थी.

पंजाब के गृह सचिव के घर पर एक आधिकारिक पार्टी थी, जिसमें मिस्टर गिल अपनी वर्दी में मौजूद थे. पंजाब की शीर्ष नौकरशाही वहां मौजूद थी.

मिस्टर गिल ने मुझे बुलाया और मुझे अपनी बगल वाली कुर्सी पर बैठने के लिए कहा. मैं वहां गई और वहां बैठने ही वाली थी कि उन्होंने कुर्सी अपने पास खींच ली. मुझे लगा कि कुछ ठीक नहीं है है, तो मैं उस समूह में वापस चली गई, जहां मैं पहले बैठी हुई थी.

दस मिनट के बाद वे आए और मेरे इतने पास आकर खड़े हो गए कि उनके पैरे मेरे घुटनों से महज चार इंच की दूरी पर थे. उन्होंने अपनी उंगली से इशारा करते हुए मुझे कहा, ‘उठो और मेरे साथ आओ.’

मैंने पूरी दृढ़ता के साथ उनके व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए कहा, ‘मिस्टर गिल, आपकी हिम्मत कैसे हुई! आप आपत्तिजनक तरीके से व्यवहार कर रहे हैं. यहां से चले जाइए.’ इस पर उन्होंने अपनी बात आदेश देने के लहजे में दोहराई और कहा, ‘तुम उठो! तुरंत उठो और मेरे साथ आओ.’

मैंने दूसरी महिलाओं की तरफ देखा. वे सब हैरान और निशब्द थीं. मैं आशंकित और डरी हुई थी, क्योंकि उन्होंने मेरा रास्ता रोक रखा था और मैं उनके शरीर को छुए बिना अपनी कुर्सी पर से नहीं उठ सकती थी.

मैंने तब अपनी कुर्सी को तत्काल डेढ़ फीट पीछे धकेला और अपनी और दूसरी महिला की कुर्सी के बीच की जगह से बाहर निकलने के लिए मुड़ गई. इस पर उन्होंने मेरे नितंब पर हाथ मारा. यह वहां मौजूद औरतों और मेहमानों की आंखों के सामने किया गया.

यह बात मुझे बाद में पता चली कि जहां मैं बैठी थी, वहां से ज्यादातर महिलाएं इसलिए उठकर चली गई थीं क्योंकि उन्होंने उनके साथ भी बदसलूकी की थी.

ख़ासतौर पर इंग्लैंड से आई एक युवा डॉक्टर के साथ. उन्होंने (मिस्टर गिल ने) उसके साथ कहीं ज्यादा बुरा व्यवहार किया था और वह अंदर ही अंदर रो रही थी. लेकिन न तो उसने और न ही उसकी मां ने, जो वहां मौजूद थी, उस शाम उसके साथ जो हुआ था उसकी शिकायत की.

मुझे यह मालूम था कि जब वे अपने लिए ही नहीं खड़ी नहीं हो रही हैं, तो वे मेरे पक्ष में भी गवाही नहीं देंगी. किसी स्त्री के साथ ऐसी किसी घटना को शर्मनाक माना जाता है, जिसे छिपाना ही बेहतर समझा जाता है. ऐसा तब भी था, ऐसा आज भी है.

मैं सीधे गृह सचिव के पास गयी, जो इस पार्टी के मेजबान भी थे और मिस्टर गिल के बॉस भी थे. मैंने उनसे कहा, ‘आपने किस तरह के लोगों को दावत दे रखी है?’

जब मैं उनकी शिकायत कर रही थी, तब गिल वहीं खड़े थे. उनके चेहरे पर किसी तरह के पछतावे का कोई भाव नहीं था और  उस समय तक हर किसी को यह पता चल चुका था कि उन्होंने दूसरी महिलाओं को भी परेशान किया है इसलिए सबने मिलकर उन्हें घर भेजने के लिए कार में बैठा दिया.

मुझे याद है कि किस तरह से मैं यह देख कर हैरान रह गयी थी कि उस समय तक आम के पेड़ में छिपकर बैठे उनकी सुरक्षा में तैनात कमांडो अचानक पत्तों की झुरमुटों तेजी से निकले और उनकी गाड़ी के पीछे हो लिए.

सालों बाद तक गृह सचिव को उस शाम हुई घटनाओं की पुष्टि करने के लिए समन किया गया, तब उन्होंने कोर्ट को यह नहीं बताया कि मैंने उस घटना के चंद मिनटों के भीतर ही केपीएस गिल की उपस्थिति में ही अपनी शिकायत को दोहराया था. गिल उस वक्त लड़खड़ाते हुए मेरे कहे हुए हर शब्द को सुन रहे थे.

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रूपन देओल बजाज (फोटो साभार: यूट्यूब)

आप एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, पंजाब सरकार में विशेष सचिव और अपने आप में एक ताकतवर महिला थीं. लेकिन पूरी व्यवस्था आपके खिलाफ हो गई. लोगों ने आंखें फेर लीं.

आपको पता है, मैं वास्तव में पुलिस में और कोर्ट में इस मामले को लेकर जाना नहीं चाहती थी… मैं चाहती थी कि सरकार आचरण संहिता के तहत नैतिक भ्रष्टाचार के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई करे. लेकिन, उस समय के राज्यपाल एसएस रे से लेकर मुख्य सचिव आरएस ओझा तक ने मुझे कहा कि वे कुछ नहीं करेंगे.

मुख्य सचिव ने मुझे कहा, ‘रूपन, ऐसी चीजें होती रहती हैं. इससे तुम छोटी नहीं हो गयी. तुम अपने आप को खुशकिस्मत समझो, चीजें इससे भी खराब हो सकती थीं.’

राज्यपाल एसएस रे ने मुझे बहुत स्पष्ट तरीके से इसे भूल जाने और अपने घर जाने के लिए कहा. उन्होंने अपने हाथ खड़े कर दिए. यहां तक कि मैंने उस समय पीएमओ में सचिव सरला गरेवाल के पास भी गई. इन सारी चीजों ने मुझे पहले से भी ज्यादा गुस्से से भर दिया.

मैं इसे मीडिया से दूर रख रही थी, लेकिन जिस दिन मैं रे से मिली, उसके अगले दिन बंबई के एक अखबार इंडियन पोस्ट ने यह कहानी छाप दी.

जब सारी कोशिशें नाकाम हो गईं, तब मैं घटना के दस दिनों के बाद आखिरी रास्ते के तौर पर पुलिस के पास गई. इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस, जिन्होंने पार्टी में मौजूद होने के नाते सारी चीजें देखी थीं, ने मेरी शिकायत दर्ज की और मुझे केस दर्ज करने की रसीद दी.

इसके बाद उन्होंने इसे एक लिफाफे में बंद कर उसे सीलबंद कर दिया. जब मैंने उनसे पूछा कि आपने इसे सीलबंद क्यों कर दिया है, तो उन्होंने कहा, ‘आपकी शिकायत को दर्ज करना मेरा कर्तव्य है, जो कि मैंने किया है, लेकिन इसके बाद मैं इसके साथ क्या करूं, यह पूरी तरह से आपके ऊपर है. हम इसकी जांच तभी करेंगे, जब आप इसके लिए कोर्ट से आदेश ले आएंगी. और उन्होंने काफी दंभपूर्वक कहा कि उनकी कार्रवाई से एक तरह से मेरी प्रतिष्ठा की रक्षा होगी.

मैंने इंडियन एक्सप्रेस को एफआईआर की एक कॉपी दी, क्योंकि मैं चाहती थी कि पूरे घटनाक्रम पर मेरा पक्ष सामने आए, न कि इसको लेकर चारों ओर आधे सच बोले जाएं. मुझे गिल पर मुकदमा चलाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से निर्देश हासिल करने में सात साल लग गए.

इस घटना ने आपकी निजी और पेशेवर जिंदगी को किस तरह से प्रभावित किया?

जबकि मैं सरकार को कार्रवाई करने के लिए मनाने के लिए चारों तरफ चक्कर लगा रही थी, तब मेरे अंदर एक निरंतर डर बना हुआ था कि यह सब लोगों के सामने नहीं आना चाहिए. मैं मीडिया कवरेज नहीं चाहती थी.

यह एक तरह से वह सोशल कंडीशनिंग है, जिसके साथ हम बड़े होते हैं. असली खेल तब शुरू होता है, जब आप आखिरकार सब कुछ एक एफआईआर में लिख देती हैं. यहां तक कि मेरी बेहद शिक्षित मां ने भी एफआईआर दायर न करने की सलाह दी. मुझे अकेले में मनभर रो लेने और आगे बढ़ने की नसीहत दी गई.

एक बार जब मैंने एफआईआर लिख लिया और इसे पुलिस और मीडिया को दे दिया, तब मैंने खुद को दुनिया को इस घटना के बारे में पता लग जाने के डर से मुक्त और हल्का महसूस किया.

मैं एक सशक्त महिला थी लेकिन व्यवस्था और समाज मुझे कमज़ोर बनाने के लिए साजिश कर रहे थे. मुझे और मेरे परिवार को जान से मारने की धमकी मिली. लोग फोन करते और कहते कि तुम लापता हो जाएगी और किसी को फिर कभी तुम्हारे बारे में कोई सुराग तक नहीं मिलेगा.

याद कीजिए यह 80 के दशक का पंजाब था, रहस्मय तरीके से गायब हो जाना उन दिनों आम था.

आपके द्वारा रास्ता बनाने के 30 साल बाद आज भी औरतों के लिए यह आसान नहीं है…

कई औरतों को बाहर आते और उन्हें अपनी पीड़ाओं के बारे में बात करते देखना काफी संतुष्टिदायक है. इनमें से कई ऐसा अपने उत्पीड़न के कई वर्षों के बाद  कह रही हैं.

किसी भी तरह के भ्रम में मत रहिए, ऐसा करना किसी भी स्त्री के लिए सबसे कठिन और साहस से भरा काम है और जब वह आखिरकार बोलने का फैसला करती है, तो कोई भी उस पर शक नहीं कर सकता है.

डोनाल्ड ट्रंप कह रहे हैं, ‘यह पुरुषों के लिए सबसे डरावना समय है.’ मेरा कहना है कि यह सिर्फ उनके लिए डरावना समय है, जो सालों से ऐसा बेखौफ होकर कर रहे थे.

आबादी के 50 प्रतिशत का निर्माण करनेवाली औरतें #मीटू कहानियों पर इसलिए यकीन कर रही हैं क्योंकि समय के किसी न किसी पड़ाव पर उनमें से ज्यादातर औरतों के साथ इससे मिलते-जुलते अनुभव हुए हैं. यह उनके अपने अनुभवों से मिलता-जुलता है.

समाज के ज्यादातर पुरुष अच्छे हैं, लेकिन हमें मालूम है कि एक सच यह भी है.

#मीटू की लड़ाई लड़ रही महिलाओं को क्या कहना चाहेंगीं?

मेरे मामले ने एक मिसाल कायम की, जो उन सबकी मदद करेगा. एक बदलाव यह आया है कि औरतों पर यकीन किया जा रहा है. उन्हें पीछे नहीं हटना चाहिए और अगर एमजे अकबर और अन्य उन्हें कोर्ट लेकर जाने की धमकी देते हैं, तो उन्हें मिलकर यह लड़ाई लड़नी चाहिए; लेकिन उन्हें किसी भी सूरत में समझौता नहीं करना चाहिए.

पहली बात, अदालत ने पहली बार मेरे मामले में ‘पवित्रता/इज्जत’ को परिभाषित किया, जिस तरह यह आईपीसी की इन दो धाराओं पर लागू होता है.

दूसरी बात अदालत ने यह तजवीज दी है कि ऐसे मामलों को साबित करने के लिए एक गवाह भी काफी है, बशर्ते वह सच बोल रहा हो.

तीसरी बात, हर अपराध में अभियोजन पक्ष को आरोपी के मकसद को साबित करना होता है. लेकिन यहां यह व्यवस्था दी गई कि मकसद को साबित करना जरूरी नहीं है. सिर्फ अभद्र तरीके से व्यवहार करने की जानकारी किसी व्यक्ति पर मुकदमा चलाने के लिए काफी है.

चौथी बात, अदालत ने सुनवाई पूरा करने के लिए छह महीने की समय सीमा निर्धारित की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पीड़ित को लंबे चलनेवालों मुकदमे से पस्त न किया जा सके.

अब यह अंतर है कि इनमें से किसी भी महिला को पुरुषों को अदालत में लेकर जाने की जरूरत नहीं है. उनके द्वारा सोशल मीडिया पर अपनी बात कहने का साहस ही इस बात के लिए काफी है कि हर कोई उन पर यकीन करे.

यह सच्चाई का इकलौता सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है. अगर आरोपित पुरुष अदालत जाता है, तो मेरे मामले की मिसाल से उन्हें वहां अपनी लड़ाई लड़ने के लिए पर्याप्त मदद मिलेगी.

(चंदर सुता डोगरा पत्रकार व लेखक हैं.)

इस साक्षात्कार को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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