भारत

महिला सुरक्षा: न तो निर्भया फंड की राशि ख़र्च हो रही, न योजनाएं लागू हो पा रही हैं

मोदी सरकार के दावे और उनकी ज़मीनी हक़ीक़त पर विशेष सीरीज: दिल्ली में ‘निर्भया’ मामले के बाद सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया फंड बनाया था, लेकिन इस फंड के उपयोग में बरती गई लापरवाही से महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के प्रति सरकार की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

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(प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: साल 2012 में नई दिल्ली में हुए निर्भया बलात्कार मामले ने महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे. इस घटना के बाद जिस स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन हुआ, उसने समस्त भारतीय जनमानस को झकझोर दिया.

तत्कालीन यूपीए सरकार के लिए इस जनाक्रोश को संभालना मुश्किल हो रहा था. आनन-फानन में यूपीए सरकार ने जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी बना दी. इस कमेटी ने कड़े कानूनों और उपायों की सिफारिश की.

साथ ही, सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक विशिष्ट कोष (फंड) बनाया. इस फंड का नाम रखा गया ‘निर्भया फंड’. समय-समय पर, केंद्र सरकार ने जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप, महिला सुरक्षा से जुड़े विभिन्न प्रोजेक्ट के लिए इस फंड से पैसे दिए.

हमने सूचना का अधिकार कानून के जरिये यह जानने की कोशिश की कि आखिर निर्भया फंड का इस्तेमाल सरकार ने कहां, कितना और कैसे किया है? यह जानना इसलिए जरूरी था क्योंकि मौजूदा सरकार (भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार) के सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ का नारा दिया था.

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ऐसे में निर्भया फंड का इस्तेमाल बेटियों को बचाने, उनकी सुरक्षा, उनके सशक्तिकरण में हुआ या नहीं हुआ, हुआ तो उस पैसे से क्या काम हुआ, आदि सवालों का सच जानना जरूरी था. इसलिए हमने इस मुद्दे पर कई आरटीआई आवेदन दायर किए.

सरकार के खुद के आंकड़े और आरटीआई से मिले जवाब ‘निर्भया फंड’ के इस्तेमाल की सच्चाई बयान करने के लिए काफी हैं.

तीन अगस्त 2018 को लोकसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के राज्य मंत्री वीरेंद्र कुमार के लिखित जवाब के मुताबिक, अभी तक निर्भया फंड से 979.70 करोड़ जारी किए गए हैं. इसमें से 825 करोड़ रुपये पांच प्रमुख कामों के लिए आवंटित किए गए. गौरतलब है कि ‘निर्भया फंड’ के लिए सरकार ने 3600 करोड़ रुपये दिए हैं.

कहां, कितना ख़र्च हुआ?

इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम (ईआरएसएस): 2016-17 के दौरान इस सिस्टम के लिए कुल अनुमानित राशि 321.69 करोड़ रुपये में से 273.36 करोड़ (85%) रुपये जारी किए गए. 2016-17 के दौरान राज्यों के बीच 217 करोड रुपये बांटे गए थे जबकि 2017-18 के बीच 55.39 करोड रुपये वितरित किया गया.

यह राशि ईआरएसएस के कार्यान्वयन के लिए जारी की गई थी. अब तक केवल दो राज्यों ने ईआरएसएस के तहत सिंगल इमरजेंसी नंबर 112 लॉन्च किया है. 28 नवंबर 2018 को हिमाचल प्रदेश ने 4.20 करोड़ रुपये की लागत पर और एक दिसंबर 2018 को नगालैंड ने 4.88 करोड़ रुपये की लागत पर यह सेवा शुरू की है.

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निर्भया फंड के तहत विभिन्न कार्यों के लिए जारी की गई राशि.

भाजपा शासित राज्यों, जैसे गुजरात या झारखंड सहित किसी अन्य राज्य ने अभी तक यह सेवा शुरू नहीं की है. ऐसे में आप स्वत: यह अंदाजा लगाइए कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की वास्तविकता क्या हो सकती है.

सेंट्रल विक्टिम कम्पन्सेशन फंड (सीवीसीएफ): केंद्र सरकार ने 2016 में 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों के बीच पीड़िताओं को एक बार मुआवजा देने के लिए 200 करोड़ रुपये जारी किए थे. सरकारी आदेश के अनुसार, उत्तर प्रदेश को अधिकतम 28.10 करोड़ रुपये मिले थे. इसके बाद मध्य प्रदेश को 21.80 करोड़ और महाराष्ट्र को 17.65 करोड़ रुपये मिले थे. 

अब, इंडियास्पेंड के 2016-17 के निम्नलिखित आंकड़े पर गौर करते है:

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2007 में जहां महिलाओं के खिलाफ हर घंटे अपराध की 21 घटनाएं रिकॉर्ड हुई थीं, वहीं 2016 में यह संख्या बढ़कर 39 हो गई.

2012 में महिलाओं के खिलाफ अपराध दर प्रति एक लाख महिला आबादी पर 41.7 प्रतिशत थी, वहीं 2016 में यह संख्या बढ़कर 55.2 प्रतिशत हो गई. ‘पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता’ की घटनाएं महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक दर्ज की गईं. 2016 में यह सभी अपराधों का 33 फीसदी था.

2016 में बलात्कार के 38,947 मामले दर्ज हुए थे. यानी, प्रत्येक घंटे चार महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध घटित हुए.

इस प्रकार, हम देखें तो पाते हैं कि यदि राज्य सरकारें कुल बलात्कार पीड़ितों के 25 फीसदी को भी मुआवजा देना चाहती हैं तो इसे प्रति पीड़िता को तीन लाख रुपये के हिसाब से 292 करोड़ रुपये चाहिए. गौरतलब है कि सेंट्रल विक्टिम कम्पन्सेशन फंड से ही दस और प्रकार के अपराध से पीड़ितों को कवर करना होता है.

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निर्भया फंड के तहत विभिन्न कार्यों के लिए जारी की गई राशि.

हालांकि, सरकार से वास्तविक लाभार्थियों का आंकड़ा सामने आना अभी भी बाकी है. फिर भी, मोटे तौर पर ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतने कम पैसे से कितने पीड़ितों को मुआवजा दिया जा सकता है और क्या वाकई इस फंड से अब तक पीड़िताओं को उचित मुआवजा मिला होगा?

भारतीय रेलवे द्वारा एकीकृत इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम (आईईआरएमएस): 27 जुलाई 2018 को महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री ने अपने लिखित उत्तर में बताया कि आईईआरएमएस कार्यान्वयन के लिए रेल मंत्रालय को 2016-17 के दौरान 50 करोड़ रुपये और वर्ष 2017-18 के दौरान 100 करोड़ रुपये जारी किया गया.

जबकि रेलवे मंत्रालय से मिले आरटीआई के जवाब के अनुसार, उसे अभी तक केवल 50 करोड़ रुपये ही मिले हैं. तो सवाल है कि क्या मंत्री ने संसद को गलत जानकारी दी? हमने रेल मंत्रालय से उस धन के उपयोग के बारे में पूछा.

आरटीआई के तहत मिले जवाब के अनुसार, इस प्रोजेक्ट को लागू करने के लिए यह राशि रेलटेल कॉरपोरेशन (रेलवे मंत्रालय के तहत एक पीएसयू) को दे दिया गया.

इस संदर्भ में एक ‘रेफरेंस फॉर प्रपोजल’ मंगाया गया, जो 28 सितंबर 2018 को आया था. अब यह रेफेरेंस फॉर प्रपोजल किसलिए था? यह रेफेरेंस फॉर प्रपोजल भारतीय रेलवे के 67 डिवीजनों में सीसीटीवी लगाने के लिए मंगाया गया था. यानी, पिछले 3 वर्षों के दौरान कुल प्रगति बस इतनी है कि इस दिशा में एक रेफेरेंस फॉर प्रपोजल भर ही सामने आ सका है.

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विभिन्न पीड़िताओं के लिए न्यूनतम सहायता राशि.

वन स्टॉप सेंटर: वन स्टॉप सेंटर योजना को 1 अप्रैल, 2015 से लागू करने के लिए मंजूरी दे दी गई थी. इस योजना का उद्देश्य हिंसा से प्रभावित महिलाओं को चिकित्सा सहायता, पुलिस सहायता, कानूनी सहायता/केस मैनेजमेंट सहित विभिन्न सहायताएं देना है.

इस योजना के तहत चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में वन स्टॉप सेंटर स्थापित किए जाएंगे. अगस्त 2018 तक 109 करोड़ रुपये इस योजना के लिए जारी कर दिए गए थे, जबकि इस योजना के लिए कुल अनुमानित बजट 867.74 करोड रुपये है.

ये पैसा राज्यों के बीच वितरित किया जाना था. देश के 718 जिलों में 232 वन स्टॉप सेंटर अभी काम कर रहे है और हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार अन्य 536 केंद्रों की अभी सिर्फ मंजूरी दी गई है.

इस रिपोर्ट के अनुसार, भोपाल में पहला ऐसा केंद्र 2017 में चालू हुआ. आज तक राज्य के अन्य प्रमुख शहरों, मसलन ग्वालियर या इंदौर में अभी भी ऐसा कोई केंद्र स्थापित नहीं हुआ है.

महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध की रोकथाम: इस चुनौती से निपटने की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की थी. इसके लिए 2017-18 के दौरान 94.5 करोड़ की राशि जारी की गई.

गृह मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, इसमें से छह करोड़ रुपये मार्च 2020 तक 45,000 पुलिस, अभियोजक और न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए अलग रखा गया था.

तो सवाल है कि अब तक इस तरह के कितने प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए? मेघालय के 23 पुलिस अधिकारियों के लिए केवल एक प्रशिक्षण सत्र दो से छह अप्रैल, 2018 के बीच आयोजित किया गया.

बाकी का 87.12 करोड़ रुपया राज्यों में साइबर फॉरेंसिक लैब स्थापित करने और उन लैबों को चलाने के लिए साइबर फॉरेंसिक कंसल्टेंट्स की नियुक्ति के लिए वितरित किया गया है. लेकिन आज तक इस तरह का एक भी लैब स्थापित नहीं किया जा सका है.

बहरहाल, यह स्थिति उस ‘निर्भया फंड’ की है, जिसने एक वक्त देश की राजनीतिक-सामाजिक स्थिति को हिला कर रख दिया था. निर्भया आंदोलन के बाद देश में ऐसा माहौल बना था, जिससे लगा कि अब शायद ही कोई राजनीतिक दल महिला सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करने की कोशिश करेगी.

साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा सामने आने के बाद भी ऐसा लगा था कि मौजूदा सरकार महिलाओं और लड़कियों के सम्मान और सुरक्षा को ले कर गंभीर है.

लेकिन, अकेले ‘निर्भया फंड’ के क्रियान्वयन की स्थिति देख कर देश में महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण के प्रति मौजूदा सरकार की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

(मोदी सरकार की प्रमुख योजनाओं का मूल्यांकन करती किताब वादा-फ़रामोशी का अंश विशेष अनुमति के साथ प्रकाशित. आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर यह किताब संजॉय बासु, नीरज कुमार और शशि शेखर ने लिखी है.)