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अयोध्या का एक गांव जहां लोगों ने कभी वोट नहीं डाला

चुनावी बातें: उत्तर प्रदेश के अयोध्या ज़िले की फ़ैज़ाबाद लोकसभा सीट के मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित इस गांव का नाम पूरे बोध तिवारी है.

Bardhaman: A voter gets her finger marked with indelible ink before casting vote at a polling station, during the 4th phase of Lok Sabha elections, in Bardhaman, Monday, April 29, 2019. (PTI Photo)(PTI4_29_2019_000107B)

(फोटो: पीटीआई)

इस बात को आप शायद हाज़मोला खाकर भी हज़म न कर सकें कि 17वीं लोकसभा के चुनावों से जुड़ी गहमागहमी के उतार पर पहुंच जाने के बावजूद देश में 100 से ज़्यादा मतदाताओं वाला एक ऐसा भी गांव है, जिसके किसी भी मतदाता ने कभी किसी चुनाव में मतदान नहीं किया.

यहां आप यह अनुमान लगाएंगे कि इस गांव के मतदाता चुनावों का बहिष्कार करते रहे होंगे तो ग़लती करेंगे और यह जानेंगे तो आपको और ताज्जुब होगा कि यह रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के कारण प्राय: चर्चाओं में रहने वाले उत्तर प्रदेश के अयोध्या ज़िले की फ़ैज़ाबाद लोकसभा सीट के मिल्कीपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित है.

इस गांव का नाम है पूरे बोध तिवारी और यह गद्दोपुर नाम की ग्राम पंचायत का हिस्सा है. गांव में 110 मतदाता हैं और वे बताते हैं कि उनके लिए आज़ादी के बाद से अब तक हुए किसी भी चुनाव में मतदान के लिए पोलिंग बूथ तक जाना संभव नहीं हो पाया है.

यूं तो इसकी कोई बड़ी वजह नहीं है, लेकिन जो है, उसे दूर करने में न कभी ‘सकुशल’ चुनाव सम्पन्न कराने के लिए चुनावी मशीनरी ने दिलचस्पी ली और न ही प्राय: ‘हिंदू-मुसलमान’ व ‘अगड़ा-पिछड़ा’ करने और एक-एक वोट ‘खींचने’ के लिए जी-जान लगाए रखने वाले ‘सेकुलर’ या ‘सांप्रदायिक’ उम्मीदवारों ने इस ओर ध्यान दिया.

इस सिलसिले में ग्रामवासियों द्वारा बार-बार आवाज़ उठाया जाना भी उनकी मदद नहीं कर पाया और उनकी कई पीढ़ियां मतदान का सुख उठाए बिना ही संसार को अलविदा कह गईं.

ग्रामवासी रामपुजारी तिवारी, जयराम, धरमचंद, श्यामकली, विक्कू, अरुण व रामबहादुर आदि ने बताया कि उनकी इसके पीछे उन्हें विरासत में मिला आज़ादी से पूर्व का कृषि भूमि का विवाद है.

उनके अनुसार अंग्रेज़ों के समय उनके पूर्वजों की कोई 300 बीघे कृषि भूमि गद्दोपुर के अत्याचारी ज़मींदारों ने ज़ोर-ज़बरदस्ती करके हथिया ली थी. इस भूमि को उनके क़ब्ज़े से मुक्त कराने के लिए गांव वालों द्वारा की गई सारी अपीलें व दलीलें बेकार हो गईं तो उनके मुखिया ने सत्याग्रह का रास्ता अपनाकर अनशन शुरू किया और अनशन के 10वें दिन अन्न के साथ जल तक त्याग दिया.

अत्याचारी जमींदार फिर भी नहीं पसीजे. तब भी नहीं, जब मुखिया की जान पर बन आई. मुखिया को लगा कि वह अपने प्राण त्यागकर भी अपनी कृषि भूमि की रक्षा नहीं कर सकेगा तो उसने आख़िरी सांस लेने से पहले अपने वारिसों को सौगंध खिलाई कि भविष्य में न वे कभी गद्दोपुर की ओर मुंह करेंगे और न ही इन जमींदारों से कोई वास्ता रखेंगे.

तभी से गांववासी इस सौगंध को मुखिया की आज्ञा मानकर उस पर अमल करते आ रहे हैं. आज़ादी के बाद लोकसभाओं, विधानसभाओं व ग्राम पंचायतों के चुनावों की परंपरा शुरू हुई और गद्दोपुर को उनका मतदान केंद्र बनाया जाने लगा तो भी यह परंपरा उन्होंने नहीं तोड़ी.

अब तो समय के साथ उनमें परंपरा से चला आता यह अंधविश्वास भी घर कर गया है कि वे गद्दोपुर गए नहीं कि उनका सर्वनाश हो जाएगा.

फिलहाल, इस डर से वे गद्दोपुर स्थित अपनी राशन की दुकान से राशन वगैरह लेने भी नहीं जाते.

अलबत्ता, बढ़ती लोकतांत्रिक चेतना ने अब गांव के निवासियों, ख़ासकर युवा पीढ़ी में मतदान के प्रति ललक पैदा कर दी है. जब भी चुनाव आते हैं, उनकी युवा पीढ़ी अपना मतदान केंद्र बदलने की मांग उठाने लगती है, ताकि दूसरे देशवासियों की तरह वह भी मतदान का अपना लोकतांत्रिक कर्तव्य निभा सके. लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर उसकी कोई सुनवाई नहीं हो सकी है और उनकी आवाज़ नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ बनकर घुट जाती रही है.

इस लोकसभा चुनाव में भी गांव का मतदान केंद्र गद्दोपुर में ही बनाया गया है. गांव के युवाओं ने पिछले साल नवंबर में ही ज़िला निर्वाचन अधिकारी से लिखित शिकायत कर अपना मतदान केंद्र बदलने और अमावां सूफी नामक दूसरे बूथ पर मतदान की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग शुरू कर दी थी.

फिर भी उनके हाथ सहायक निर्वाचन अधिकारी का यह आश्वासन ही आया कि मामले की जांच करा ली जाएगी. अब चुनाव कार्य से जुड़े अधिकारियों ने यह कहकर हाथ खड़े कर लिए हैं कि इन गांववासियों की मतदान केंद्र बदलने की मांग अगले परिसीमन से पहले स्वीकार नहीं की जा सकती.

गांव के निवासी राम बहादुर ने अपनी तकलीफ बयान करते हुए कहा, ‘एक ओर मतदाता जागरूकता रैलियां निकाली जा रही हैं और मतदाताओं को कर्तव्य व ज़िम्मेदारी समझकर मतदान करने के हवाहवाई आह्वान किए जा रहे हैं और दूसरी ओर हमारे प्रति इस तरह सौतेलापन बरता जा रहा है, जैसे हमारे मत का कोई महत्व ही न हो.’

आप ही बताइए, राम बहादुर का सवाल इन दिनों देशभर में मनाए जा रहे में ‘लोकतंत्र के महापर्व’ की सर्वथा चाक चौबंद या कि फुलप्रूफ बताई जाने वाली व्यवस्थाओं पर किसी झन्नाटेदार तमाचे से कम है क्या?

कहते हैं कि चुनाव आयोग कई बार पहाड़ों पर और दूरदराज़ के गांवों के गिनती के मतदाताओं के लिए भी अलग मतदान केंद्र बना देता है. फिर वह इन मतदाताओं की सुनकर उनके गांव में मतदान केंद्र क्यों नहीं बना देता?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)