विपक्षी दलों द्वारा संसद की कार्रवाई रोकना संसद की कार्रवाई का हिस्सा ही है और यह सुनिश्चित करना सत्ता पक्ष का काम है कि संसद में हंगामे की नौबत न आए और वह सुचारु रूप से चलती रहे. विपक्ष का काम ही सरकार से सवाल पूछना है, अपने सवालों के जवाब न पाकर विरोध प्रदर्शन के अलावा वह और क्या करता? हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से सवाल पूछने और जवाब पाने की संसद के अलावा कोई और जगह है
'हर घर तिरंगा' अभियान को संघ द्वारा नियंत्रित सरकारों और उसके परिवार की मजबूरी या अपने लोकतंत्र का चमत्कार मानते हुए भी याद रखना चाहिए कि उसके नेता तिरंगे को विद्वेष भड़काने के लिए भी इस्तेमाल करते रहे हैं.
पुस्तक समीक्षा: जौनपुर शहर के पर्याय बन गए कवि, गद्यकार, चित्रकार और मूर्तिकार स्मृतिशेष अजय कुमार की 'राग जौनपुरी' से गुज़रना जौनपुर के राग से ही नहीं, विराग और वास्तु तक से गुजरने और इतिहास व संस्कृति की सुगंध से सराबोर होने का पर्याय लगता है.
बीते दिनों अयोध्या में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पहुंचने पर सपा के नेता सभा-समारोहों में उत्साह से भाग लेते दिखे, उससे पहले पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में शंकराचार्य से मिलने के बाद एक्स पर 'जो सनातन है, वही समाजवाद है' लिखा था. ये सब घटनाक्रम मिलकर इस धारणा को बल दे रहे हैं कि आगामी चुनाव से पहले अखिलेश भाजपा द्वारा बनाई पार्टी की 'हिंदूविरोधी' छवि बदल देना चाहते हैं.
एक अध्ययन के अनुसार नरेंद्र मोदी के बारह साल के सत्ताकाल में तक़रीबन दो सौ सांसदों और विधायकों ने दूसरी पार्टियों को छोड़कर भाजपा में दलबदल किया. हर चार दलबदलू सांसदों-विधायकों में से तीन से ज़्यादा को भाजपा ने अपनी गोद में बिठाया और आधे-पौने ही उसके बजाय कहीं और गए. भाजपा में शामिल हुए 68 प्रतिशत सांसद-विधायक पहले कांग्रेसी हुआ करते थे.
नरेंद्र मोदी सरकार का अब तक का रिकॉर्ड गवाह है कि वह किसी भी असहमति या आंदोलन से संवाद में तब तक यक़ीन नहीं करती, जब तक पानी सिर से ऊपर न जाने लगे. तब तक अड़ियल व अहंकारी रवैया अपनाए रखकर वह स्थितियों को और जटिल बनाती रहती है. सोमवार को भाजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा की कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जो बातचीत हुई है, उसे इसी रूप में देखा जा सकता है.
राम मंदिर में जिस तरह का भ्रष्टाचार हुआ है, उसको कोई भी नाम क्यों न दिया जाए, वह अपराध की श्रेणी में ही आएगा,और चूंकि भ्रष्टाचार समेत सारे अपराध, वे किसी भी स्थान या किसी भी प्रकृति वाले संस्थान में क्यों न किए गए हों, राज्य के विरुद्ध किए गए माने जाते हैं, इसलिए ऐसा नहीं हो सकते कि उनके विरुद्ध सिर्फ वहीं आवाज़ उठाए, जिसने कभी कोई अपराध न किया हो.
चढ़ावा चोरी के प्रसंग में उपज आए ज्ञानीजन बताते हैं कि उनके शास्त्र में चोरी को चोरी की तरह न कर पाने और हेराफेरी या सीनाज़ोरी पर उतर आने वाले चोरों को कतई ‘कलाकार’ नहीं माना जाता. तब माना जाता है, जब वे देखते-देखते अपने शिकार की आंखों से काजल निकाल लें और आंखवाले को भनक तक न लगे. कहते हैं कि चढ़ावा चोरों ने भी कुछ ऐसा ही चमत्कार करने की सोची थी, मगर विफल रह गए.
संघ परिवार न हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है तो उसे वह सर्वाधिक दरकिनार करता है. इसीलिए ख़ुद को समस्त हिंदुओं का रहनुमा और संरक्षक बताने के बावजूद वह 'उसके' भव्य और दिव्य राम मंदिर की दानराशि की ईमानदारी से रखवाली नहीं कर पाया.
अंतरराष्ट्रीय इतिहासकार, संवैधानिक विशेषज्ञ और वैश्विक संस्थाएं नेहरू को 15 अगस्त, 1947 से ही भारत का पूर्ण रूप से वैध प्रधानमंत्री मानती हैं. इसी दौरान नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया, कई वैश्विक संधियां कीं और 1952 से पहले ही दुनिया में भारत की विदेश नीति की मजबूत नींव रखी. काश, इन सबके आलोक में ये भक्त समझ पाते कि नेहरू के 1947 से 1952 तक के कार्यकाल को नकारना या उसकी हेठी करना देश के बुनियादी
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा प्रतिद्वंद्वी सपा को अभी से मनोवैज्ञानिक युद्ध में उलझाने में लग गई है. वहीं, पश्चिम बंगाल में केंद्रीय चुनाव आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये के मद्देनज़र अनेक प्रेक्षक (जिनमें सपा के शुभचिंतक नहीं भी हैं) प्रतिद्वंद्वियों की जीत-हार की संभावनाओं से ज़्यादा इस सवाल से दो चार हैं कि विधानसभा चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे भी या नहीं?
अयोध्या के चढ़ावे के गबन मामले में कई प्रतिप्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं. यह कि अगर कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई तो ट्रस्ट ने प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से जांच के लिए एसआईटी क्यों गठित करवाई? ऐसी एसआईटी, जिसके सदस्यों की ही निष्पक्षता पर गंभीर संदेह हैं. विरोधी तो कह रहे हैं कि इस एसआईटी जांच के पीछे ट्रस्ट की मंशा सच सामने लाने की नहीं, सीबीआई या ईडी की जांच से बचने की है.
राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर अयोध्या में आम तौर पर लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं - यह कि जो कुछ कहा-सुना या किया जा रहा है, उसमें नया क्या है? उसकी शुरुआत तो 22-23 दिसंबर, 1949 को बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखे जाने के बाद तभी हो गई थी, जब वहां चढ़ावे के तौर पर अकूत धन आना शुरू हुआ था.
मालवीय नगर में लगी आग के बाद नियमों की अनदेखी पर होटल के मालिक ने कहा कि 'दिल्ली में सब चलता है!' गौर करें कि ऐसा सिर्फ दिल्ली नहीं, दूसरी जगहों पर भी चल रहा है, इसीलिए लापरवाहियों का सिलसिला अनंत है. 'चलता है' के कारण स्थिति यह है कि किसी को पता नहीं होता कि अचानक कोई आवासीय क्षेत्र व्यावसायिक क्षेत्र में कैसे बदल गया? कैसे किसी नामी अस्पताल के खुलने के बाद हर घर में होटल, रेस्तरां या
एक समय कहा जाता था कि मीडिया प्रायः ऊंचा सुनने वाली दिल्ली को जनता की आवाज़ सुनने के लिए मजबूर कर देती है, लेकिन अब इसने इस प्रवाह को पूरी तरह पलट दिया है. अब यह सत्ताओं को आम लोगों की तकलीफ़े बताने के 'जोखिम' तो नहीं ही उठाती, उलटे सरकारों के हुक्म व फरमान उन तक इस रूप में ले आती है कि 'बुलडोजर जस्टिस' जैसा शब्द 'लोकतांत्रिक' हो जाता है.