राम मंदिर में जिस तरह का भ्रष्टाचार हुआ है, उसको कोई भी नाम क्यों न दिया जाए, वह अपराध की श्रेणी में ही आएगा,और चूंकि भ्रष्टाचार समेत सारे अपराध, वे किसी भी स्थान या किसी भी प्रकृति वाले संस्थान में क्यों न किए गए हों, राज्य के विरुद्ध किए गए माने जाते हैं, इसलिए ऐसा नहीं हो सकते कि उनके विरुद्ध सिर्फ वहीं आवाज़ उठाए, जिसने कभी कोई अपराध न किया हो.
चढ़ावा चोरी के प्रसंग में उपज आए ज्ञानीजन बताते हैं कि उनके शास्त्र में चोरी को चोरी की तरह न कर पाने और हेराफेरी या सीनाज़ोरी पर उतर आने वाले चोरों को कतई ‘कलाकार’ नहीं माना जाता. तब माना जाता है, जब वे देखते-देखते अपने शिकार की आंखों से काजल निकाल लें और आंखवाले को भनक तक न लगे. कहते हैं कि चढ़ावा चोरों ने भी कुछ ऐसा ही चमत्कार करने की सोची थी, मगर विफल रह गए.
संघ परिवार न हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है तो उसे वह सर्वाधिक दरकिनार करता है. इसीलिए ख़ुद को समस्त हिंदुओं का रहनुमा और संरक्षक बताने के बावजूद वह 'उसके' भव्य और दिव्य राम मंदिर की दानराशि की ईमानदारी से रखवाली नहीं कर पाया.
अंतरराष्ट्रीय इतिहासकार, संवैधानिक विशेषज्ञ और वैश्विक संस्थाएं नेहरू को 15 अगस्त, 1947 से ही भारत का पूर्ण रूप से वैध प्रधानमंत्री मानती हैं. इसी दौरान नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया, कई वैश्विक संधियां कीं और 1952 से पहले ही दुनिया में भारत की विदेश नीति की मजबूत नींव रखी. काश, इन सबके आलोक में ये भक्त समझ पाते कि नेहरू के 1947 से 1952 तक के कार्यकाल को नकारना या उसकी हेठी करना देश के बुनियादी
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा प्रतिद्वंद्वी सपा को अभी से मनोवैज्ञानिक युद्ध में उलझाने में लग गई है. वहीं, पश्चिम बंगाल में केंद्रीय चुनाव आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये के मद्देनज़र अनेक प्रेक्षक (जिनमें सपा के शुभचिंतक नहीं भी हैं) प्रतिद्वंद्वियों की जीत-हार की संभावनाओं से ज़्यादा इस सवाल से दो चार हैं कि विधानसभा चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे भी या नहीं?
अयोध्या के चढ़ावे के गबन मामले में कई प्रतिप्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं. यह कि अगर कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई तो ट्रस्ट ने प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से जांच के लिए एसआईटी क्यों गठित करवाई? ऐसी एसआईटी, जिसके सदस्यों की ही निष्पक्षता पर गंभीर संदेह हैं. विरोधी तो कह रहे हैं कि इस एसआईटी जांच के पीछे ट्रस्ट की मंशा सच सामने लाने की नहीं, सीबीआई या ईडी की जांच से बचने की है.
राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर अयोध्या में आम तौर पर लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं - यह कि जो कुछ कहा-सुना या किया जा रहा है, उसमें नया क्या है? उसकी शुरुआत तो 22-23 दिसंबर, 1949 को बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखे जाने के बाद तभी हो गई थी, जब वहां चढ़ावे के तौर पर अकूत धन आना शुरू हुआ था.
मालवीय नगर में लगी आग के बाद नियमों की अनदेखी पर होटल के मालिक ने कहा कि 'दिल्ली में सब चलता है!' गौर करें कि ऐसा सिर्फ दिल्ली नहीं, दूसरी जगहों पर भी चल रहा है, इसीलिए लापरवाहियों का सिलसिला अनंत है. 'चलता है' के कारण स्थिति यह है कि किसी को पता नहीं होता कि अचानक कोई आवासीय क्षेत्र व्यावसायिक क्षेत्र में कैसे बदल गया? कैसे किसी नामी अस्पताल के खुलने के बाद हर घर में होटल, रेस्तरां या
एक समय कहा जाता था कि मीडिया प्रायः ऊंचा सुनने वाली दिल्ली को जनता की आवाज़ सुनने के लिए मजबूर कर देती है, लेकिन अब इसने इस प्रवाह को पूरी तरह पलट दिया है. अब यह सत्ताओं को आम लोगों की तकलीफ़े बताने के 'जोखिम' तो नहीं ही उठाती, उलटे सरकारों के हुक्म व फरमान उन तक इस रूप में ले आती है कि 'बुलडोजर जस्टिस' जैसा शब्द 'लोकतांत्रिक' हो जाता है.
अगले साल देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या और लोकसभा व विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं. भले ही तब भाजपा का उत्तर प्रदेश में पहली बार कमल खिलाने की पश्चिम बंगाल जैसी चुनौती से सामना नहीं होगा, पर चूंकि वह नरेंद्र मोदी सरकार और 18वीं लोकसभा के कार्यकाल के लगभग मध्य का समय होगा, इसलिए प्रेक्षक चुनाव नतीजों को अगले लोकसभा चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देखेंगे.
बशीर बद्र के गुज़रने के बाद उनके जन्मस्थान के तौर पर कहीं अयोध्या तो कहीं कानपुर का नाम दर्ज हो रहा है, मगर उनके पैतृक गांव बुकिया (ज़िला अंबेडकर नगर) से दुनिया अनजान ही है. बात यह भी है कि देश-दुनिया में बशीर बद्र और उनकी शायरी को कितनी भी शोहरत हासिल क्यों न हुई हो, अपने गांव के लिए वे कई मायनों में जीवन भर अजनबी से ही बने रहे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया भर में भारत का डंका बजाते-बजाते अब अचानक यह रोना भी रोने लगना पड़ेगा कि प्रेस व धार्मिक स्वतंत्रता के सूचकांक व रपटें तैयार करने वाली कई संस्थाओं व आयोगों का रवैया भारत-विरोधी और दुराग्रही है. फिर तो यह बताने की ज़रूरत भी पड़ेगी कि आपके लगातार डंका बजने के बावजूद ऐसा क्यों है?
संविधान के अनुच्छेद 326 में सार्वभौम वयस्क मताधिकार का प्रावधान अब सर्वोच्च न्यायालय की निगाह में संवैधानिक अधिकार न होकर वैधानिक अधिकार भर रह गया है. बिहार से लेकर बंगाल तक हुए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण गवाह हैं कि संविधान का व्याख्याता व संरक्षक होने के बावजूद यह न्यायालय इस अधिकार को, किसी और की तो क्या, चुनाव आयोग की टेढ़ी नज़र से भी नहीं बचा पा रहा है.
पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में जो हुआ, उसे लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. कई प्रेक्षक इस सवाल पर देश के 'बंट' जाने की बात करते हुए इसे लोकंतत्र और प्रभुत्व की लड़ाई बता रहे हैं, तो वहीं कुछ इसे सत्ता विरोधी लहर कह रहे हैं. साम, दाम दंड, भेद के इर्द-गिर्द तमाम तर्क दिए जा रहे हैं. ऐसे में यूपी के एक गांव के लोगों ने इस पर क्या कहा इस लेख में पढ़ें...
पश्चिम बंगाल में विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने केंद्र की अपनी सत्ता और चुनाव आयोग की शक्तियों के अभूतपूर्व दुरुपयोग की मार्फत जिस तरह 293 सीटों का विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता है, निस्संदेह, उससे अखिलेश यादव की चिंताएं कई गुनी हो जानी चाहिए. इसलिए और कि उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों में सत्तारूढ़ होने के कारण इस प्रदेश में भाजपा के सामने ऐसा करने में कोई समस्या ही नहीं है.