‘पश्चिम बंगाल में यह क्या हुआ भला?’ समझने की एक राह इधर गांव से भी…

पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में जो हुआ, उसे लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. कई प्रेक्षक इस सवाल पर देश के 'बंट' जाने की बात करते हुए इसे लोकंतत्र और प्रभुत्व की लड़ाई बता रहे हैं, तो वहीं कुछ इसे सत्ता विरोधी लहर कह रहे हैं. साम, दाम दंड, भेद के इर्द-गिर्द तमाम तर्क दिए जा रहे हैं. ऐसे में यूपी के एक गांव के लोगों ने इस पर क्या कहा इस लेख में पढ़ें...

पश्चिम बंगाल में ‘खिले’ कमल की उत्तर प्रदेश के चुनाव पर कैसी छाया पड़ेगी?

पश्चिम बंगाल में विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने केंद्र की अपनी सत्ता और चुनाव आयोग की शक्तियों के अभूतपूर्व दुरुपयोग की मार्फत जिस तरह 293 सीटों का विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता है, निस्संदेह, उससे अखिलेश यादव की चिंताएं कई गुनी हो जानी चाहिए. इसलिए और कि उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों में सत्तारूढ़ होने के कारण इस प्रदेश में भाजपा के सामने ऐसा करने में कोई समस्या ही नहीं है.

‘क्षणिक आक्रोश’ अब क्षण-क्षण के ‘पागलपन’ की ओर क्यों बढ़ चला है?

आजकल हमारे समाज में क्षणिक पागलपन- किसी मामूली बात पर चाकू घोंप देना, गोली चला देने जैसी अभागी घटनाओं की बारंबारता इतनी बढ़ गई है कि अख़बारों में इन्हें सरसरी तौर पर पढ़कर परे सरका दिया जाता है. दूसरा सवाल यह कि अगर यह पागलपन है तो हमेशा कमज़ोरों के विरुद्ध ही क्यों अभिव्यक्त होता है?

मई दिवस: हाशियाकरण झेलते मज़दूर कैसे करें नई चुनौतियों का सामना?

मज़दूरों के पास निश्चित काम के घंटे, छुट्टियां, या सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन, बीमा) की कमी है. अधिकांश असंगठित मज़दूरों की आय बहुत कम है. नौकरी की असुरक्षा और जोखिम भरे माहौल में काम करने को मजबूर मज़दूर अक्सर भुखमरी या गरीबी के कगार पर रहते हैं. विकास कार्यों में अहम भूमिका निभाने के बावजूद, उन्हें उन सुख-सुविधाओं से दूर रखा जाता है, जो वे ख़ुद बनाते हैं.

जनता को अपना समझने की सरदार पटेल की अपेक्षा कब पूरी करेंगे देश के सिविल सेवक?

हम जितनी चर्चा नेताओं के भ्रष्टाचार की करते हैं, सिविल सेवकों के भ्रष्टाचार की नहीं करते, जबकि जहां तक सरकारी योजनाओं में आर्थिक भ्रष्टाचार की बात है, नेता उसे तब तक अंजाम नहीं दे सकते, जब तक उसमें किसी सिविल सेवक को न शामिल करें. सिविल सेवकों के काम की जगहें अभी भी उनके रौब-दाब और अधिकारों के दुरुपयोग की जगहें ही बनी हुई हैं.

चंद्रशेखर: वह छाप है, जो वक़्त के साथ मिटने को तैयार नहीं

देश के नवें प्रधानमंत्री स्मृतिशेष चंद्रशेखर का जन्मशती वर्ष आज यानी 17 अप्रैल 2026 से आरंभ हो रहा है. इस अवसर पर उन्हें याद करते हुए हम पाते हैं कि आज न उनके द्वारा गठित समाजवादी जनता पार्टी का हाल अच्छा रह गया है, न ही सामाजिक कार्य और चिंतन के लिए बनाए गए भारत यात्रा केंद्रों का.

चतुरानन मिश्र: किसानों, ग़रीबों के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले नेता की स्मृति

देश के पहले और अब तक के एकमात्र वामपंथी कृषि मंत्री चतुरानन मिश्र राजनीतिक रूप से बेहद अस्थिर समय में मंत्री बने थे. लेकिन इसकी परवाह किए बगैर कि वे कब तक मंत्री रहेंगे, उन्होंने छोटे व सीमांत किसानों की हितसाधक नई कृषि नीति लागू करने के लिए उसका मसौदा तो तैयार कराया ही, किसानों के कल्याण, कृषि के आधुनिकीकरण, फसलों के समर्थन मूल्य में वृद्धि जैसी कई परियोजनाओं को सरकार के एजेंडे पर ले आए.

क्या आज का ‘लोकतंत्र’ नवाबों के ज़माने से भी गया-गुज़रा हो चला है?

आज लोकतंत्र में हाल यह हो गया है कि असहमतियों की बरबस अवहेलना कर उन्हें ख़ामोश कराने की सरकारी 'परंपरा' इतनी सुदृढ़ हो चली है कि अब गंभीर आलोचनाओं की कौन कहे, हंसी-मज़ाक के स्तर पर भी उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जा रहा. कार्टून और एनीमेटेड वीडियो तक सेंसर किए जा रहे हैं. ऐसी टिप्पणियां, जिन्हें हंसकर टाला जा सकता है, उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है.

युद्धों को उत्सव मत बनाइए!

समाचार माध्यमों में हमले कर 'दुश्मन' के संसाधनों को तहस-नहस किए जाने की ख़बरें तो भरपूर आ रही हैं, लेकिन निर्दोष नागरिकों के जान माल को पैदा हुए संकटों की बाबत खबरों का अकाल पड़ा हुआ है. न्यूज चैनलों पर युद्धों को नाटकीय संगीत और ग्राफिक्स के साथ कुछ इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जो उसे जानकारीपरक बनाने के बजाय 'मनोरंजक' बनाए दे रहा है.

लोहिया जयंती: जब ‘दुश्मन’ बना दिए गए लोहिया और आंबेडकर

कोई तीन दशक पहले अपनी बढ़त के दिनों में सपा और बसपा ने आपसी प्रतिस्पर्धा में डाॅ. लोहिया और बाबासाहेब को भी ‘एक दूजे का कट्टर दुश्मन’ बना डाला था और अब, बदले राजनीतिक प्रवाहों के बीच में भी वे आगे बढ़कर बहुजनों या समाजवादियों की व्यापक एकता का मार्ग प्रशस्त करने की समझदारी नहीं दिखा पा रही हैं.

सत्तापक्ष द्वारा लोकसभा में विपक्ष के नेता की बढ़ती बेकद्री कई सवाल खड़े करती है

नरेंद्र मोदी सरकार अपनी तीसरी पारी में भी विपक्ष को लेकर न सहज हो पाई है, न उससे लोकतांत्रिक ढंग से बरतना सीख पाई है. सीख पाती तो उसके उठाए सवालों का समुचित जवाब देती, न कि उन्हें उठाने का बुरा मानकर उसके नेता तक पर हमलावर हो जाती.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: जिन्होंने महिलाओं के हक़ों के लिए जद्दोजहद शुरू की…

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का हासिल क्या है? इस सवाल का जवाब यह है कि भले ही इस बीच महिलाओं के हक़ में बहुत कुछ न हो पाया हो और इस दिवस के आयोजन भी कर्मकांड में बदलते गए हों, लेकिन इतना तो हुआ है कि महिलाओं ने अनेक ऐसे क्षेत्रों में भी, जो पहले उनके लिए सर्वथा निषिद्ध थे, अपनी उपलब्धियों से अपने द्वेषियों को क़रारा जवाब दिया है.

होली: बुराई आज न ऐसे रहे न वैसे रहे…

सुनने में बात बहुत अच्छी लगती है कि होली है तो जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो, लेकिन क्या ऐसा करना तब तक संभव है जब तक उन कारणों की पड़ताल न की जाए, जिनके चलते वह बिराना हुआ या कि रह गया.

बलात्कार के मामलों में अदालतें स्त्रियों को इंसाफ़ से अधिक पीड़ा दे रही हैं

बलात्कार जैसे क्रूरतम अपराध का शिकार बनाई गई महिलाओं के लिए इंसाफ़ की राह इसलिए भी छोटी होने को नहीं आ रही कि अदालती फैसलों में उनके प्रति जो संवेदनहीनता कभी-कभी दिखती है, वह हमारे सामंती मूल्यों वाले पितृसत्तात्मक समाज में सदाबहार बनी हुई है.

कभी विपक्ष को कुछ न समझने वाली मोदी सरकार अब उससे कैसे पार पाएगी

बजट सत्र में विपक्ष के लगातार सवालों के बाद मोदी सरकार अपनी भरपूर तल्ख़ी के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रही: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधा, जो टूट गया, क्योंकि सरकार को अचानक याद आया कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?

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