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सीजेआई यौन उत्पीड़न मामला: शिकायतकर्ता ने कहा- ‘हम सब खो चुके हैं, अब कुछ नहीं बचा’

एक्सक्लूसिव: यौन उत्पीड़न के आरोपों पर सीजेआई रंजन गोगोई को सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति द्वारा क्लीनचिट मिलने के बाद शिकायतकर्ता महिला से विशेष बातचीत.

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई. (फोटो: पीटीआई)

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई. (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि सीजेआई जस्टिस रंजन गोगोई ने अक्टूबर 2018 में उनका यौन उत्पीड़न किया था. 35 वर्षीय यह महिला अदालत में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम कर रही थीं.

उनका कहना है कि चीफ जस्टिस द्वारा उनके साथ किए ‘आपत्तिजनक व्यवहार’ का विरोध करने के बाद से ही उन्हें, उनके पति और परिवार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. उनके आरोपों की जांच के लिए शीर्ष अदालत के तीन वरिष्ठ जजों की एक आंतरिक समिति बनाई गई थी.

6 मई को इस समिति ने सीजेआई को क्लीनचिट देते हुए कहा कि पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए आरोपों में कोई दम नहीं है. समिति ने इसकी रिपोर्ट शिकायतकर्ता को देने और इसे सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया. हालांकि रिपोर्ट की एक कॉपी सीजेआई गोगोई को दी गयी है.

समिति के इस निर्णय के बाद महिला ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि वे बेहद निराश और हताश हैं. देश की एक महिला के तौर पर उनके साथ घोर अन्याय हुआ है, साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत से न्याय की उनकी उम्मीदें पूरी तरह खत्म हो गई हैं.

यह पत्र जारी करने के बाद 7 मई को उन्होंने पहली बार मीडिया से बात की. द वायर, स्क्रॉल और द कारवां के पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि समिति के निर्णय के बाद वे हताश हैं. उन्हें आश्चर्य है कि समिति को उनके आरोपों में कोई तत्व नज़र क्यों नहीं आया, साथ ही वे नहीं  जानती कि ऐसा क्यों हुआ.

उन्होंने कहा कि मेरे द्वारा बहुत विस्तृत हलफनामा दिया गया था और इसके साथ ऐसे सबूत भी थे, जिन्हें प्रमाणित किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरी इंसाफ की मांग को ऐसे ठुकरा दिया जायेगा.

उन्होंने इस बात पर भी आश्चर्य जताया है कि तीन वरिष्ठ जजों- जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की समिति ने कार्यस्‍थल पर महिलाओं का यौन उत्‍पीड़न (निवारण, निषेध एवं निदान) अधिनियम, 2013 की गाइडलाइन्स का पालन क्यों नहीं किया.

मालूम हो कि समिति की तीन सुनवाइयों के बाद 30 अप्रैल को शिकायतकर्ता ने किसी भी अग्रिम सुनवाई में जाने से मना कर दिया था. उनका कहना था कि समिति का झुकाव सीजेआई की ओर था और समिति ने वकील को उनके साथ आने देने और कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग भी खारिज कर दी थीं.

उन्होंने बताया कि उन्हें मीडिया के हवाले से पता चला कि सीजेआई भी समिति के सामने पेश हुए थे, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं है कि अपने हलफनामे में उन्होंने जिन व्यक्तियों- जो उनके आरोपों की पुष्टि कर सकते हैं, का जिक्र किया था उनसे समिति ने पूछताछ की है या नहीं.

उनका कहना है कि उन्हें इंसाफ के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत तक जाना पड़ा क्योंकि कोई और विकल्प ही नहीं रह गया था. उन्हें लगा था कि उन्हें किसी झूठे मामले में जेल में डाल दिया जायेगा और फिर उनकी 8 साल की बेटी का क्या होगा.

उन्होंने कहा, ‘देखिए, हम सब कुछ खो चुके हैं, अब कुछ नहीं बचा है. ये ऐसा था कि आपकी बेटी है और आप बस उसके साथ रहना चाहते हो. मैं ही जानती हूं कि मैंने (पुलिस कस्टडी में) उसके बिना तीन दिन कैसे बिताए. तब जब भी वो मेरे बारे में पूछती थी, उसे कहते थे कि मम्मी अस्पताल में भर्ती हैं.’

यह पूछे जाने पर कि हलफनामा दायर करते समय उन्हें क्या लगा था कि इस पर कैसी प्रतिक्रिया होगी, उन्होंने जवाब दिया, ‘मुझे लगा था कि उनको सच्चाई तो दिखेगी क्योंकि जो भी मेरे हलफनामे को पढ़ेगा उसे समझ आ जाएगा कि मेरे और मेरे परिवार के साथ क्या हुआ. मुझे लगा था कि मुझे कुछ इंसाफ तो मिलेगा, लेकिन आज आप नतीजा देख सकते हैं. यह समिति कह रही है कि उन्हें मेरे हलफनामे में कोई दम नहीं दिखता, जबकि मैंने इसके साथ पर्याप्त सबूत भी दिए थे.’

यह पूछे जाने पर कि उनके आरोपों को सीजेआई ने षड्यंत्र बताया है और उनका नाम अनिल अंबानी मामले में दस्तावेजों से छेड़छाड़ के दो आरोपी सुप्रीम कोर्ट कर्मियों से जोड़ा जा रहा है, उन्होंने कहा, ‘मुझे पता है कि मैं किसी साजिश का हिस्सा नहीं हूं. मैंने अपने हलफनामे में जो भी कहा है, उसका सबूत भी दिया है. सीजेआई ने मेरे चरित्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि मैं आपराधिक पृष्ठभूमि से हूं, जबकि वह मामला 2016 में ही सुलझ चुका था. जब उन्हें लगा कि ऐसे मामलों में कुछ नहीं है, तब उन्होंने ऐसा जताया कि मेरा अनिल अंबानी से कोई जुड़ाव है. मुझे नहीं पता ये बातें कहां से आ रही हैं. मुझे अंदाजा नहीं था कि मेरे हलफनामा दायर करने से इस तरह की कहानियां निकलकर आएंगी.’

35 वर्षीय इन महिला का कहना है कि वे अनिल अंबानी मामले में दस्तावेजों से छेड़छाड़ के एक आरोपी तपन चक्रवर्ती को जानती हैं क्योंकि वे एक बार किसी मामले के सिलसिले में जस्टिस गोगोई की अदालत में आए थे, लेकिन चक्रवर्ती से उनकी कभी कोई बात नहीं हुई है. वहीं दूसरे आरोपी मानव शर्मा को वे नहीं जानती, उन्हें कभी देखा तक नहीं.

आरोपों की जांच के लिए जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में बनी शीर्ष अदालत की आंतरिक समिति के रवैये पर भी उन्होंने आपत्ति जताई थी. समिति के रवैये के बारे में उनका कहना था कि-

‘जबसे मुझे नोटिस मिला, तबसे मैं उनसे निवेदन कर रही थी कि सुनवाई के दौरान मुझे साथ में मेरे वकील को लाने की अनुमति दी जाए, सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग हो, साथ ही कार्यवाही में यौन उत्पीड़न के मामलों के दिशानिर्देश या विशाखा गाइडलाइन्स का पालन किया जाये. इनमें से कुछ नहीं हुआ. उन्होंने बस जस्टिस रमना से जुड़ी मेरी बात मानी. मैं ये बात जानती थी कि वे जस्टिस गोगोई के करीबी हैं. (जस्टिस एनवी रमना ने खुद को समिति से अलग कर लिया था. उनकी जगह जस्टिस इंदु मल्होत्रा को शामिल किया गया था.)

मैंने उन्हें बताया था कि मुझे दाएं कान से सुनाई नहीं देता है, कई बार मैं बाएं कान से भी नहीं सुन पाती हूं. सुनवाई के दौरान वे मुझसे पूछते- क्या आपको समझ आया? मैं कहती- लॉर्डशिप, क्या आप फिर से अपनी बात दोहरा सकते हैं? मुझे इससे डर लगता था. मैं उनसे कितनी बार दोहराने को कह सकती थी? यही वजह थी कि मैं किसी को अपने साथ लाने के लिए कह रही थी, लेकिन वे नहीं माने.

3-4 महिला पुलिसकर्मियों ने इस तरह मेरी तलाशी ली मानो मैं आतंकवादी हूं. आप जानते हैं जब आतंकवादियों की तलाशी लेते हैं, सब कुछ चेक करते हैं, बाल खुलवाते हैं, बुरी तरह से उनकी तलाशी लेते हैं. मैं वहां रोने-चिल्लाने लगी थी. तब वृंदा [ग्रोवर] मैम आईं फिर मुझे अंदर लिया गया. इसके बाद जब सुनवाई शुरू हुई तब पहले ही दिन मुझसे कहा गया कि यह सेक्सुअल हैरैसमेंट कमेटी नहीं है, यह कोई विभागीय कार्यवाही भी नहीं है और न ही कोई इन-हाउस कार्यवाही. हम यहां केवल आपकी शिकायत सुनने के लिए हैं.

आप समझ सकते हैं कि ये बहुत अनौपचारिक तरीके से कहा गया था. उन्होंने मुझसे कहा- हम आपको आश्वस्त करते हैं कि आपको भविष्य में कोई नुकसान नहीं होगा. जस्टिस बोबडे ने भी कहा- आपको पता है, आपको अपनी नौकरी दोबारा मिल सकती है. इस पर मैंने कहा- नहीं लॉर्डशिप, मुझे मेरी नौकरी वापस नहीं चाहिए. मुझे इंसाफ चाहिए. मैं ये सब नौकरी वापस पाने के लिए नहीं कर रही हूं, उस घटना के बाद शुरू हुई प्रताड़ना बंद होनी चाहिए.’

मैंने अपने वकील को भी सुनवाई में साथ लाने की अनुमति मांगी थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया. मैंने पहली सुनवाई में अपने साथ हुए घटनाक्रम को बताया. मैंने जस्टिस गोगोई के बारे में एक-एक बात बताई. मैंने सब बताया. इसके बाद मुझे 29 अप्रैल को बुलाया गया. तब ये कहा गया कि मुझे मीडिया से बात नहीं करनी चाहिए, वकीलों से बात नहीं करनी चाहिए. यह तक कहा गया कि मुझे वृंदा मैम से भी इस बारे में कोई बात नहीं करनी चाहिए.’

यह पूछे जाने पर कि ऐसा किसने और क्यों कहा, वे बताती हैं, ‘जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने. लेकिन मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा. उन्होंने कहा- वकील ऐसे ही होते हैं. पहले दिन सब कुछ बहुत अनौपचारिक था. ऐसा नहीं लग रहा था कि वे गंभीरता से इसे देखेंगे, वे बस इसे रफा-दफा करना चाहते थे.’

क्यों लगा कि यह सुनवाई अनौपचारिक है? वे कहती हैं, ‘क्योंकि वे इस तरह से कह रहे थे कि यह इन-हाउस सुनवाई नहीं है, विभागीय इन्क्वायरी नहीं है, सेक्सुअल हैरैसमेंट कमेटी नहीं है, मुझे लगा, तो फिर ये है क्या? जस्टिस बोबडे ने ऐसा कहा था. उन्होंने कहा कि वे मेरी शिकायत पर काम करने के लिए यहां हैं. इस दौरान एक और बात हुई थी. जब हम सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के गेस्ट हाउस से निकले तब मेरा और मेरे पति का पीछा किया गया. बाइक पर कुछ अज्ञात लोग थे. हर सुनवाई के बाद ऐसा हुआ. मैंने अज्ञात लोगों के खिलाफ तुगलक रोड थाने में शिकायत भी दर्ज करवाई थी. इस बारे में जब बताया तब जस्टिस बोबडे ने कहा- आपका बहुत बड़ा परिवार है और सब पुलिस में हैं. उन्हें पता होना चाहिए कि आपकी सुरक्षा कैसे करनी है.’

वे आगे बताती हैं, ‘इसके बाद 29 अप्रैल को जस्टिस मल्होत्रा ने मुझसे पूछा कि मैं घर देर से क्यों पहुंची थी. मैं तब आधी रात के करीब घर पहुंची थी, मैंने बताया कि मैं उन मोटरसाइकिल सवार लोगों के जाने का इंतज़ार कर रही थी. इसी बात पर जस्टिस बोबडे ने वो टिप्पणी की थी. इस पर मैंने कहा कि यह बात सही है कि मेरे परिजन पुलिस में हैं लेकिन फिर भी दिल्ली पुलिस के द्वारा ही मुझे और मेरे परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा है, वो भी किसी और के इशारे पर. इस पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.’

फोटो: पीटीआई

फोटो: पीटीआई

पहली सुनवाई के बाद इस महिला द्वारा समिति को एक पत्र लिखा गया था, जिसमें कहा गया था कि सुनवाई के दौरान माहौल डरावना था. इस पर वे कहती हैं, ‘पहले दिन तो उन्होंने कहा था कि यह सेक्सुअल हैरैसमेंट कमेटी नहीं है. लेकिन दूसरे दिन मेरा पत्र पढ़ने के बाद उनका व्यवहार पूरी तरह बदल गया. वे सवालों और मेरे हलफनामे को लेकर सख्ती से सवाल कर रहे थे.  उन्होंने पूछा कि वो सब कैसे हुआ था, समय क्या था. लेकिन एक सवाल पर वे ज़्यादा जोर दे रहे थे – मैंने शिकायत करने के लिए यही समय क्यों चुना, वो भी इतने महीनों बाद? मैंने जवाब दिया लेकिन उन्होंने नहीं माना. वे बोले- ऐसे नहीं होता, वैसे नहीं होता. इसके बाद मैंने फिर एक पत्र लिखा कि मुझे साथ में किसी व्यक्ति को लाने की अनुमति दी जाये क्योंकि मुझे नहीं पता था कि क्या रिकॉर्ड हो रहा है, क्या नहीं.’

तो क्या सुनवाई के दौरान कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद था जो सब रिकॉर्ड कर रहा था? उन्होंने बताया, ‘वहां एक व्यक्ति था तो और वो टाइप भी कर रहा था, लेकिन यह कोई स्टेनोग्राफर नहीं था. मैं सब कुछ बताती थी और उसके बाद जब मैं चुप हो जाती, तब जस्टिस बोबडे अपने शब्दों में उस व्यक्ति को बताते थे. वो व्यक्ति मेरी बात सीधे टाइप नहीं कर रहा था. जो जस्टिस बोबडे उसे कह रहे थे, वो टाइप कर रहा था. कई बार होता है न कि आप कानूनी भाषा नहीं समझते हैं. ये भी एक वजह थी कि मैं चाहती थी कि मेरे साथ वहां कोई और व्यक्ति भी हो.’

शिकायतकर्ता ने ये भी बताया कि जस्टिस बोबडे के अलावा बाकी दोनों जजों ने ज्यादा सवाल नहीं किए. जस्टिस इंदिरा बनर्जी उदासीन थीं, ज्यादा बोल नहीं रही थीं, वहीं जस्टिस इंदु मल्होत्रा कुछ सवाल पूछती थीं, जो जस्टिस बोबडे के सवालों से ही जुड़े होते थे.

जब उन्होंने समिति की सुनवाई से पीछे हटने की बात बताई तब जजों का क्या रवैया था? वे बताती हैं, ‘जब आखिरी सुनवाई पर मैंने कहा कि मैं अब किसी सुनवाई में नहीं आऊंगी, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कारण पूछा और कहा कि मैं अच्छा कर रही हूं. मैंने उन्हें बताया कि कई बार मुझे सवाल समझ में नहीं आता है, कई बार सुन नहीं पाती कि जज क्या कह रहे हैं, इस पर उनका कहना था- नहीं, आप सही तरीके से जवाब दे रही हैं. आपको सब बातें मालूम हैं, आप हलफनामे में लिखे तथ्यों को भी जानती हैं, आप अच्छा कर रही हैं, तो क्यों पीछे हट रही हैं? मैंने बस यही दोहराया कि मुझे अपने साथ किसी सपोर्ट पर्सन को लाने की इजाज़त चाहिए. इसके बाद जस्टिस बोबडे ने कहा कि आपको पांच मिनट देते हैं, सोच लीजिए वरना हम एक्स-पार्टे [Ex-parte] (एकतरफा) सुनवाई करेंगे. मैंने कहा ठीक है. क्योंकि मैं जानती थी कि जिस तरह सुनवाई हो रही है, जिस तरह वे मुझसे सवाल पूछ रहे थे, उससे मुझे कभी न्याय नहीं मिलेगा.’

उन्होंने आगे कहा, ‘वे सिर्फ एक सवाल पर अटके हुए थे- मैंने इतनी देर में शिकायत दर्ज क्यों करवाई. मैंने अपनी ओर से उन्हें संतोषजनक जवाब दिया था लेकिन वे बार-बार यही पूछते और कहते- ऐसे थोड़े न होता है.’

आपने उनकी एक्स-पार्टे सुनवाई की बात मान ली थी? वे कहती हैं, ‘उन्होंने कहा वे मुझे वकील नहीं लाने देंगे, मैंने अपने पत्र में जो मांगें रखी थीं, वे उसके लिए भी तैयार नहीं थे, तो मैंने कहा कि मैं पीछे हट रही हूं. इस पर उन्होंने कहा कि वे इसे एकतरफा करार दे देंगे मैंने कहा ठीक है. ये बात मैंने अपने पत्र में भी लिखी है.

यह पूछे जाने पर कि क्या समिति ने उनके अलावा भी किसी अन्य व्यक्ति से पूछताछ की, उनका कहना था कि उनके पास इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. उन्होंने सीजेआई को बुलाया था, यह बात भी मुझे अख़बारों से पता चली थी.

समिति ने 6 मई को अपना फैसला सुनाया था. समिति का कहना था कि उन्हें सीजेआई पर लगे इन आरोपों में कोई तत्व नहीं मिला. शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्हें मीडिया से इस बारे में जानकारी मिली थी. उन्होंने कहा, ‘मैं पूरी तरह निराश हो गयी थी. मैं हैरान थी. मेरी नौकरी चली गई, सब कुछ चला गया, मेरे घर वालों की नौकरी चली गयी. मुझे लगा यह मेरे और मेरे परिवार के साथ बहुत बड़ा अन्याय है. हम सभी इस बात पर हैरान थे कि उन्होंने कहा कि उन्हें कोई तत्व ही नहीं मिला. मैंने जो दस्तावेज दिए थे उनका क्या?’

वे आगे कहती हैं, ‘उन्होंने अपने जांच-परिणाम सामने नहीं रखे हैं. मुझे नहीं लगता कि मैंने अपने हलफनामे में जिनके बारे में बताया है, उन्होंने उनमें से उन एसएचओ या वीडियो या किसी भी व्यक्ति से कोई पूछताछ की है. मैं इस बारे में निश्चित नहीं हूं कि ऐसा हुआ होगा.’

अब आगे क्या? वे कहती हैं, ‘जब तक वे कोई कारण नहीं देते, मैं कैसे आगे बढ़ सकती हूं. मैंने अपना केस सबके सामने रखा, सुप्रीम कोर्ट के हर जज के सामने. अब उनकी बारी है. मुझे यह रिपोर्ट जानने का हक़ है. मैंने जांच समिति के सदस्यों को पत्र लिखा है कि मुझे फाइनल रिपोर्ट की कॉपी दी जानी चाहिए. इसके बाद ही मैं फैसला करूंगी कि मुझे क्या करना है. अगर मेरे आरोपों में तत्व नहीं हैं तो मुझे इसकी वजह बताई जाये क्योंकि मैंने सभी सबूत दिए थे. वे इस निर्णय पर पहुंची, इसकी कोई तो वजह होगी.’

महिला द्वारा अपने हलफनामे के साथ एक वीडियो रिकॉर्डिंग भी दी गयी थी, जो मार्च महीने की थी. बताया गया था कि यह तिलक मार्ग थाना है और इसमें हिरासत में लिए गए महिला और उनके परिजन थे. वीडियो में एसएचओ नरेश सोलंकी एक जगह पर कहते सुने जा सकते हैं कि तुम्हारी हैसियत है उतने पावरफुल इंसान से टक्कर लेने की, कोई तुम्हारी नहीं सुनेगा, बावजूद इसके महिला ने देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को अपने साथ हुए घटनाक्रम के बारे में लिखा, क्यों?

वे कहती हैं, ‘मैंने तब लिखा जब मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और मुझे जेल भेजा गया. मैं जानती हूं कि वो कुछ भी कर सकते हैं. क्योंकि मैंने उन्हें मेरा गलत फायदा नहीं लेने दिया, वे यह सब कर रहे हैं जिससे कि मैं कहीं जाकर यह न बता दूं कि मेरे साथ क्या हुआ.’

सीजेआई को क्लीनचिट मिलने पर महिलाओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया गया था. (फोटो: द वायर)

सीजेआई को क्लीनचिट मिलने पर महिलाओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया गया था. (फोटो: द वायर)

यह महिला शीर्ष अदालत में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद पर काम कर रही थीं और इसी क्षेत्र में भविष्य बनाने के लिए कानून की पढ़ाई भी कर रही थीं. इस सुनवाई और व्यवहार के बाद क्या अब भी न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा है?

वे कहती हैं, ‘नहीं. मैं क्या, जांच समिति की रिपोर्ट के बाद किसी को भी भरोसा नहीं होगा. आज मैं किसी पर भरोसा नहीं कर सकती. यह जानते हुए भी कि जो मैंने कहा वो सच है, सभी मेरे खिलाफ हैं. मेरे साथ सब कुछ गलत हुआ. पुलिस ने भी गलत किया है. जहां तक न्यायिक प्रक्रिया की बात है तो मुझे लगता है कि ऐसा सीजेआई की वजह से उन्होंने ऐसा किया.’

शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि जबसे उन्होंने चीफ जस्टिस के खिलाफ आरोपों को सार्वजनिक किया उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से डराया-धमकाया गया. उन्होंने बताया इस तनाव से उनकी सेहत और परिवार पर बुरा असर पड़ रहा है. जब उनसे पूछा गया कि हलफनामा दाखिल करने के बाद से अब तक का अनुभव कैसा रहा, वे कहती हैं, ‘बेहद डरावना.’

उन्होंने बताया कि कुछ अनजान लोग उनके रिश्तेदारों के घर पहुंचे. वे बताती हैं, ‘मेरी बहन उत्तर प्रदेश के एक बहुत छोटे शहर में रहती हैं. दो लोग उनके घर पहुंचे और खुद को वकील बताया. उन्होंने मेरे बहनोई से कहा कि मैं किन्हीं मामलों में जुड़ी हुई हूं और मेरी हत्या हो सकती है.  मेरे बहनोई ने मेरे भाई को फोन करके ये बताया. कुछ अनजान लोग राजस्थान में मेरी ससुराल में भी पहुंचे और हमारे बारे में पूछताछ की. वे सरपंच से के पास भी गए और हमारे बारे में पूछा.’

उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए चिंता होती है. वे कहती हैं, ‘घर से बाहर निकलो तो महसूस होता है कि पीछा किया जा रहा है. वैसे भी मुझे अब घर से बाहर निकलने की इजाज़त ही नहीं है. मेरी सास 70 साल की हैं और उन्हें दिल की बीमारी है. जैसे ये सब हुआ है, वो मुझे कहीं जाने नहीं देतीं. मैं अपने पति के साथ ही घर से बाहर निकलती हूं. हालांकि इस बीच पड़ोसियों का सहयोगी रवैया रहा. उन्होंने आकर कहा कि अगर कोई ज़रूरत हो तो उनसे कह सकते हैं.’

वे आगे बताती हैं, ‘अक्टूबर से अब तक सब कुछ बदल गया. मेरी नौकरी चली गयी, एक कान से सुन नहीं सकती, डिप्रेशन की भी शिकार हूं. अगर तबसे अब की तुलना करूं तो सब कुछ पूरी तरह बदल चुका है. (रोने लगती हैं) मैं सब खो चुकी हूं, रुपया-पैसा, मानसिक शांति… सब कुछ.’

उन्होंने अपने हलफनामे में पुलिस द्वारा परेशान किए जाने की बात भी कही थी. उन्होंने बताया था कि उन्हें और उनके परिजनों को देर रात हिरासत में लिया गया और थाने में बिठाए रखा गया. यहां उनके साथ गाली-गलौज और मारपीट भी हुई.

उन्होंने बताया कि उनके पैर बेंच से बांध दिए गए थे. आज वे जब वे पुलिस को देखती हैं, तो उन्हें डर महसूस होता है, ‘पहले जब कहीं पुलिस वालों को देखती थी, तब गर्व महसूस होता था, आज मुझे लगता है कि वे उतने ईमानदार नहीं होते, जितना मुझे लगता था.’

महिला के पति भी दिल्ली पुलिस के कर्मचारी हैं, जिन्हें सस्पेंड किया गया है, क्या आप चाहती हैं कि वे दोबारा नौकरी जॉइन करें? वे जवाब देती हैं, ‘यही रोजी-रोटी है हमारी. अब जब मेरे पास नौकरी नहीं है, तो हम और कर भी क्या सकते हैं.’

महिला ने अपने हलफनामे में बताया था कि मार्च महीने में दिल्ली पुलिस ने धोखाधड़ी के एक मामले में उन पर एफआईआर दर्ज की थी. उन पर नवीन कुमार नाम के एक व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि 2017 में शिकायतकर्ता ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नौकरी दिलाने के एवज में 50 हज़ार रुपये की रिश्वत ली थी, लेकिन नौकरी नहीं मिली. उन्होंने यह भी कहा था कि एक मनसा राम के साथ वे महिला से मिले थे.

महिला ऐसे किसी भी व्यक्ति को जानने से इनकार करती हैं. उन्होंने बताया, ‘मुझे मालूम तक नहीं है कि नवीन कुमार और मनसा राम कौन हैं. असल में जब तिलक मार्ग थाने की टीम राजस्थान में मेरे घर पहुंची थी, तब उन्होंने भी यही सवाल किया था. तब उन्होंने एफआईआर के बारे में नहीं बताया था. उन्होंने बस इतना पूछा था कि क्या इन्हें जानती हैं, मैंने कहा नहीं, मुझे नहीं पता वे कौन हैं, मैं उनसे कभी नहीं मिली.’

इसी मामले में उन्हें तीन दिन के लिए तिहाड़ जेल भी भेजा गया था, जिसके बाद उन्हें जमानत मिली. इसके बाद पुलिस द्वारा उनकी जमानत ख़ारिज करने की याचिका दायर की गई. उन्होंने हलफनामे में लिखा है कि यही वह समय था जब उन्होंने अपनी शिकायत सार्वजनिक करने की सोची. ऐसा क्यों?

वे बताती हैं, ‘देखिए, मैं एक बेटी की मां हूं और उन्होंने मुझे सलाखों के पीछे डालने की ठान ली थी. कौन उसकी देखभाल करेगा? मुझे पता है कि उन्हें (पुलिस) को निर्देश दिए गए थे, जिस तरह से मुझे गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया, मुझे ऐसा ही लगता है. कोई उन्हें नहीं रोक सकता. अगर उन्होंने मुझे फिर जेल में डाल दिया…  तो जो भी मेरे साथ हो रहा था, उसे देखते हुए मैंने उस दिन सोचा कि क्यों न अब सच बोला जाए. मैंने अपने पति से इस बारे में चर्चा की और सर (प्रशांत भूषण) से मिलने का निर्णय लिया.’

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प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर (फोटो: पीटीआई)

उन्होंने बताया, ‘मैं उन्हें जानती थी, उन्हें कोर्ट में देखा था. हम उनके पास गए, अपनी पूरी कहानी बताई. उन्होंने हमसे सवाल पूछे, सारे दस्तावेज देखे और सलाह दी कि वृंदा ग्रोवर से मिलें, उन्होंने ऐसे कई मामले देखे हैं. तब हम मैम से मिले. उन्होंने भी पूरी बात जानी, दस्तावेज देखे, वेरीफाई किए. इसके बाद उन्होंने कहा कि वे हमारे साथ हैं. तब तक कोई हमारे साथ नहीं था. जिस दिन उन्होंने (पुलिस ने) मेरी जमानत ख़ारिज करने की अर्जी डाली, मैं समझ गई थी कि वे मुझे जेल में डालना चाहते हैं. आप समझ सकते हैं हम पर क्या बीत रही थी.’

प्रशांत भूषण से मिलने के बाद आगे की कार्रवाई के बारे में हलफनामा दाखिल करने के बारे में कैसे सोचा? वे कहती हैं, ‘हमें कुछ नहीं पता था कि आगे कैसे बढ़ना है. हम बस ये जानते थे कि मुझे सच बताना है. ये कैसे होगा, क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, ये सब हमने सर (प्रशांत भूषण) और बाकियों की मदद से तय किया.’

सभी जजों के अलावा शिकायतकर्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और दिल्ली महिला आयोग समेत कई लोगों को भी पत्र भेजा था, क्या कोई प्रतिक्रिया मिली? वे बताती हैं, ‘ऐसा बताया गया है कि जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मुझे वकील ले जाने की अनुमति मिलनी चाहिए, उनके अलावा मुझे किसी और के बारे में कुछ नहीं पता. बाकी जिन्हें भी लिखा था, किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया है.’

यह महिला अनुसूचित जाति से आती हैं. उन्होंने आंतरिक समिति को बताया था कि जहां तक वे पहुंची है, उसके लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है. इस बारे में वे कहती हैं, ‘जब लोगों को आपकी जाति के बारे में पता चलता है तब वे आपसे दूरी बना लेते हैं, आपको तरजीह देना बंद कर देते हैं. अगर आप अपने काम में असाधारण रूप से अच्छे नहीं हैं तो आपके लिए जिंदगी में कुछ पाना इतना आसान नहीं होता. मैंने हमेशा अपनी जातिगत पहचान को अलग रखते हुए यही सोचा कि मैं एक सामान्य इंसान की तरह ही रहूंगी.’

वे आगे कहती हैं, ‘मुझे प्राइवेट स्कूल में नहीं पढ़ाया गया, इसलिए मैं सरकारी स्कूल में गयी- ये इस तरह है कि आपको वहीं जाना पड़ता है, जहां आपकी हैसियत होती है. कभी-कभी आपको अपनी जाति छिपानी भी पड़ती है. लोगों को जैसे ही पता चलता है कि आप फलां जाति से आते हैं, तो उनका व्यवहार बदल जाता है.’

‘लोग सामान्यतया आपको बराबरी से नहीं देखते. समाज ऐसा ही है. मैं बताती हूं कि 2016 में जो मामला हुआ था वो एससी/एसटी (अत्याचार) रोकथाम एक्ट के तहत दर्ज हुआ था, उसमें उस महिला ने मुझे जातिगत गालियां दी थी. उन्होंने कहा था कि मेरी जाति के लोग केवल सफाई का काम कर सकते हैं.’

क्या जस्टिस गोगोई आपकी जातिगत पृष्ठभूमि के बारे में जानते थे? ‘जी, वे मेरे परिवार के बारे में पूछते रहते हैं. एक दिन उन्होंने पूछा था कि मैं कानून की पढ़ाई क्यों कर रही हूं, मैं तब कानूनी इम्तिहान दे रही थी, तभी आयुसीमा के बारे में कुछ बात हुई, तो उन्होंने पूछा कि क्या कोई आरक्षण वगैरह है, तब मैंने उन्हें अपनी जाति के बारे में बताया था.’

शिकायतकर्ता ने अपने हलफनामे में बताया था कि उनकी नौकरी जाने के बाद उनके पति और पति के एक भाई जो दिल्ली पुलिस में थे, उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. पति के एक और भाई जो सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत थे, उन्हें भी नौकरी से निकाल दिया गया. उनका कहना है कि रिश्तेदारों को धमकियां भी मिल रही हैं, ऐसी स्थिति में परिवार  का सहयोग कैसा रहा?

वे कहती हैं, ‘मेरे परिवार की वजह से ही मैं ज़िंदा हूं वरना जो कुछ भी मेरे साथ हुआ, मैं मर गई होती. और शायद ये लड़ाई जारी रखने की प्रेरणा भी यही है. मेरे परिवार के साथ जो गलत हुआ, उसके चलते मैं अब और नहीं सह सकती. हमारे बारे में झूठे आरोप लगाए गए. क्यों ऐसी बातें, जो कथित तौर पर बीते सालों में हुईं, उन्हें अब क्यों खोदकर निकाला जा रहा है?’

सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति ने अपनी जांच ख़त्म कर दी है, उनका कहना है कि उन्हें इन आरोपों में दम नजर नहीं आया, ऐसे में अगला कदम क्या होगा? उनका कहना है कि वे रिट याचिका दायर करेंगी. उन्होंने कहा कि वे जानना चाहती हैं कि रिपोर्ट में क्या है और किस वजह से जजों को उनके आरोपों में तत्व नहीं दिखा. साथ ही इस बात को लेकर भी डरी हुई हैं कि आगे क्या होगा.

उनकी यही मांग है कि उन्हें न्याय मिले और जिन्होंने उन्हें पुलिस हिरासत में प्रताड़ित किया, उन्हें सज़ा मिले.

(पूरा साक्षात्कार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)