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मोदी सरकार ने फिर जता दिया है कि असहमतियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा

बीते एक महीने में ही बहुमत से दोबारा सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार ने जता दिया है कि अपनी आलोचना के प्रति सहिष्णुता दिखाने का उसका कोई इरादा नहीं है.

Indian Prime Minister Narendra Modi gestures towards his supporters after the election results at Bharatiya Janata Party (BJP) headquarter in New Delhi, India, May 23, 2019. REUTERS/Adnan Abidi

23 मई 2019 को लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद भाजपा मुख्यालय में नरेंद्र मोदी (फोटो: रॉयटर्स)

पिछले करीब एक महीने में, यानी इस सरकार के शपथग्रहण के बाद से चंद घटनाएं हुई:

– प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पत्रकार राघव बहल के खिलाफ कथित मनी लॉन्ड्रिंग का एक मुकदमा दायर किया है;

– भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एनडीटीवी के प्रमोटर्स राधिका रॉय और प्रणव रॉय के खिलाफ एक आदेश निकाल कर उन्हें दो साल तक वित्तीय बाजार में कोई लेन-देन करने से प्रतिबंधित कर दिया और उन्हें उनके टेलीविजन चैनल के डायरेक्टर की कुर्सी से हटा दिया;

– सीबीआई ने जानेमाने वकील आनंद ग्रोवर और उनके द्वारा चलाए जानेवाले एनजीओ द लॉयर्स कलेक्टिव के खिलाफ विदेशी फंड स्वीकार करने के नियमों का उल्लंघन करने के लिए एक एफआईआर दायर किया.

– और पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट को एक 30 साल पुराने मामले में आजीवन कैद की सजा सुनाई गई.

उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ सरकार ने रैपर हार्ड कौर के खिलाफ मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने के आरोप में राजद्रोह का मामला दर्ज किया.

इससे पहले पत्रकार प्रशांत कनौजिया को यूपी के मुख्यमंत्री के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था, जो अब फिलहाल जमानत पर हैं.

कौर यूनाइटेड किंगडम में हैं, इसलिए पुलिस उन हाथ नहीं डाल सकी है. लेकिन अगर वे भारत में होतीं, तो जेल की सलाखों के पीछे होतीं.

पहले तीन मामलों में कार्रवाई स्वतंत्र प्राधिकरणों और संस्थाओं द्वारा की गई और इनमें सरकार की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है.

ईडी, सेबी और सबसे बढ़कर न्यायपालिका को सरकार के सीधे नियंत्रण से आजाद माना जाता है. इसलिए यह निहितार्थ निकालना गलत होगा कि उन्हें एक खास तरह की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था. न ही यह कहना उचित होगा कि उन्हें किसी कथित अपराध या अनियमितता के लिए आरोपों का सामना नहीं करना चाहिए.

लेकिन इसके साथ ही सच यह भी है कि बहल, रॉय दंपति और भट्ट, अलग-अलग तरीकों से नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के आलोचक रहे हैं. जहां तक बहल का सवाल है, तो शुरू में वे मोदी सरकार के समर्थक हुआ करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना शुरू कर दी.

एनडीटीवी एक निष्पक्ष और संतुलित चैनल है और कुछ मौकों पर यह दक्षिणपंथ के प्रति थोड़ी नरमी बरतते भी दिखा है, लेकिन इसे पर्याप्त दोस्ताना और ढोल-ताशे बजाने वाले की तरह नहीं देखा जाता है.

और जहां तक भट्ट का सवाल है, तो वे 2002 में गुजरात में मोदी की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं.

रॉय और बहल पर कार्रवाई करने में सेबी और ईडी ने उल्लेखनीय फुर्ती का परिचय दिया है और भट्ट के मामले में गुजरात की न्यायिक प्रणाली ने 2001 से 2016 तक हुए 180 अन्य मामलों में से किसी एक में भी ऐसी कार्यकुशलता का प्रदर्शन नहीं किया है- इन मामलों में एक भी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया गया है.

हार्ड कौर की बात करें, तो उनके पोस्ट्स जरूरत से ज्यादा आलोचनात्मक और यहां तक कि आपत्तिजनक और मानहानिकारक कहे जा सकते हैं, लेकिन वे किसी भी तरह से राजद्रोही नहीं हैं.

भारत के संविधान के अनुसार राजद्रोह की परिभाषा काफी व्यापक है, लेकिन इसमें अपवाद भी हैं- सिर्फ सरकार की आलोचना करना किसी की गिरफ्तारी का आधार नहीं हो सकता है.

अगर ऐसा हुआ तो पत्रकार और कई अन्य लोग सलाखों के पीछे होंगे. (हालांकि, यह देखते हुए कि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के आगे नतमस्तक है, यह बहुत बड़ी बात नहीं कि आलोचना को भी एक दिन राष्ट्रविरोधी और राजद्रोही करार दिया जाए).

ऐसे कई प्रावधान हैं जिसके तहत यूपी सरकार या खुद योगी आदित्यनाथ कौर पर मुकदमा कर सकते थे, लेकिन उनकी पुलिस ने राजद्रोह का आरोप जड़ देने को ही ज्यादा उपयुक्त समझा, जो कि आजकल सरकारी एजेंसियों का प्रिय हथियार बन गया है.

विनियामक एजेंसियों, सरकारों और यहां तक कि न्यायालयों द्वारा अपराधों या गलतियों पर इतनी फुर्ती के साथ उठाया गया सख्त कदम यह संकेत देता है कि अब व्यवस्था से किसी मुरव्वत की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

यह अलग बात है कि सेबी के पास कॉरपोरेट अनियमितताओं के सैकड़ों मामले हैं- हमारे अखबार प्रमोटरों कंपनियों और म्यूचल फंडों द्वारा सार्वजनिक संपत्ति के साथ धोखाधड़ी की ख़बरों से भरे रहते हैं- लेकिन उनके खिलाफ शायद ही कभी कोई कार्रवाई होती दिखती है.

ईडी ने बहल पर आरोप लगाया है कि उन्होंने 2 करोड़ से कुछ ज्यादा पैसे में लंदन में एक अपार्टमेंट खरीदा (इतने पैसे में मुंबई में एक बहुत छोटा फ्लैट ही खरीदा जा सकता है).

बहल की पत्नी का कहना है कि टैक्स रिटर्न में इसकी घोषणा की गई थी. यह टैक्स-पूछताछ के एक सामान्य मामले जैसा है और इसमें शायद ही ऐसा कुछ है कि इस पर ईडी के कान खड़े हो जाएं.

लेकिन यह सिर्फ एजेंसियों के दोहरे मापदंडों का मामला नहीं है- बड़ी मछलियों का सस्ते में छूट जाना भारत के सार्वजनिक जीवन का एक उतना ही दुखद तथ्य है, जितना कि स्वतंत्र समझी जानेवाली एजेंसियों में सरकार का हस्तक्षेप- सर्वोच्च न्यायालय सीबीआई को पिंजड़े में बंद तोता कह चुका है और हर विचारधारा की सरकारों ने अतीत में इसका इस्तेमाल किया है.

लेकिन नागरिकों के लिए चिंतित होनेवाली बात ये है कि अब सरकार के आलोचको पर चुन-चुनकर कार्रवाई की जा सकती है. हमारे राजनेता सोशल मीडिया पर आलोचना को लेकर काफी संवेदनशील हो गए हैं और इस मामले में भाजपा अकेली नहीं है.

लेकिन भाजपा सरकारें जितने उत्साह के साथ ऐसे मामलों में जो अधिक से अधिक निंदा करनेवाली या अपमानजक कही जा सकती हैं, राजद्रोह के कानून का इस्तेमाल करती हैं, वह डरानेवाला है.

जनवरी में असम में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने प्रतिष्ठित लेखक हिरेन गोहेन के अलावा दो और लोगों पर विवादित नागरिकता विधेयक के खिलाफ टिप्पणी करने के लिए राजद्रोह का आरोप जड़ दिया.

क्या इसका मतलब यह है कि अब नीतियों की आलोचना को भी बगावत के तौर पर देखा जाएगा? क्या सरकार के खिलाफ लिखने और बोलनेवाले शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को हिरासत, कैद और इससे भी बढ़कर अपराधसिद्धि का सामना करना पड़ेगा?

यह एक डरानेवाला ख्याल है. इन कदमों से एक डर का माहौल बनना लाजिमी है. बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाने के लिए कोई कानून पारित कराने की जरूरत नहीं है- मीडिया पहले ही सत्ता के सामने बिछ चुका है और सहलाए जाने का इंतजार करता रहता है. शक्तिशाली सार्वजनिक शख्सियत वैसे भी कोई विरोधी प्रकट करने से काफी हिचकते हैं.

जमीनी स्तर पर आस्था, भोजन या बस किसी खास धर्म का होने के कारण लोगों की पीट-पीट कर हत्या की जा रही है. और जो भी अपनी आवाज बंद रखने से इनकार कर देता है, उसे कानून के डंडे का सामना करना पड़ता है. किसी को भी फेसबुक पोस्ट या किसी ट्वीट के कारण पुलिस द्वारा धर लिया जा सकता है.

वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान ने यह जता दिया है कि अपनी आलोचना के प्रति सहिष्णुता दिखाने का उसका कोई इरादा नहीं है.

एक ऐसी स्थिति में जब भाजपा केंद्र में दूसरी बार बहुमत के साथ वापस आ गई है, कई राज्य सरकारों पर इसका नियंत्रण है, विपक्ष सदमे में है और अपनी ही दरक रही जमीन बचाने की जद्दोजहद कर रहा है, भाजपा असहमति रखनेवालों और असंतुष्टों पर कार्रवाई करने में कोई समय नहीं गंवाने वाली है.

राजनाथ सिंह ने यह चेतावनी दी थी कि राजद्रोह पर एक नया कानून बनाया जाएगा जो और भी कठोर होगा- यह कोई चुनाव के समय का कोरा भाषण नहीं था. बहस करनेवाले भारतीयों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी जाएगी- हर किसी को निज़ाम के आगे सर झुकाना होगा.

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