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दिल्ली की 19 अदालतों में पॉक्सो के 7,277 मामले लंबित

सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए 25 जुलाई को देश के प्रत्येक जिलों में पॉक्सो के तहत मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का निर्देश दिया था.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने 25 जुलाई को देश के प्रत्येक जिलों में विशेष अदालतों के गठन के निर्देश दिए थे. ये विशेष अदालतें ऐसे जिलों में स्थापित करने को कहा गया था, जहां बाल शोषण और यौन उत्पीड़न के 100 से अधिक लंबित मामले हों.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह राजधानी दिल्ली के लिए एक चुनौती बना हुआ है, जहां यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) एक्ट के तहत 7,277 मामले दर्ज हैं, जिनकी 10 विशेष अदालतों में सुनवाई होनी है.  राज्य की 19 अदालतों में 7,277 मामले लंबित हैं.

सूत्रों के मुताबिक, देश के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के समक्ष जुलाई में यह जानकारी संज्ञान में लाई गई थी, जिसमें कहा गया था कि मार्च 2013 से 30 जून 2019 तक दिल्ली में पॉक्सो एक्ट के तहत 7,277 मामले लंबित हैं.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 60 दिनों के भीतर वित्त पोषित विशेष अदालतों के गठन का आदेश दिया था, जो पीठासीन अधिकारियों, कर्मचारियों के भुगतान का ध्यान रखेंगे और चाइल्ड फ्रेंडली इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए लोगों का समर्थन करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने सभी जिलों में बाल यौन शोषण के मुकदमों के लिए केंद्र से वित्तपोषित विशेष अदालतें गठित करने का 22 जुलाई को आदेश दिया. ये अदालतें उन जिलों में गठित की जाएंगी जहां यौन अपराधों से बच्चों को संरक्षण कानून (पॉक्सो) के तहत 100 या इससे अधिक मुकदमे लंबित हैं.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरूद्ध बोस की पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि पॉक्सो के तहत मुकदमों की सुनवाई के लिए इन अदालतों का गठन 60 दिन के भीतर किया जाए. इन अदालतों में सिर्फ पॉक्सो कानून के तहत दर्ज मामलों की ही सुनवाई होगी.

पीठ ने कहा कि केंद्र पॉक्सो कानून से संबंधित मामलों को देखने के लिए अभियोजकों और सहायक कार्मिकों को संवेदनशील बनाए तथा उन्हें प्रशिक्षित करे. न्यायालय ने राज्यों के मुख्य सचिवों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि ऐसे सभी मामलों में समय से फॉरेंसिक रिपोर्ट पेश की जाए.

पीठ ने केंद्र को इस आदेश पर अमल की प्रगति के बारे में 30 दिन के भीतर रिपोर्ट पेश करने और पॉक्सो अदालतों के गठन और अभियोजकों की नियुक्ति के लिए धन उपलब्ध कराने को कहा.

देश में बच्चों के साथ हो रही यौन हिंसा की घटनाओं में तेजी से वृद्धि पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण को जनहित याचिका में तब्दील कर दिया था.

अदालत ने इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि को न्याय मित्र नियुक्त करने के साथ ही शुरू में ऐसे मामलों का विवरण भी तलब किया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों के बलात्कार के मामलों के और अधिक राष्ट्रव्यापी आंकड़े एकत्र करने से पॉक्सो कानून के अमल में विलंब होगा.

पॉक्सो से संबंधित मामलों की जांच तेजी से करने के लिए प्रत्येक जिले में फॉरेंसिक प्रयोगशाला स्थापित करने संबंधी न्याय मित्र वी. गिरि के सुझाव पर पीठ ने कहा कि इसे लेकर इंतजार किया जा सकता है और इस बीच, राज्य सरकारें यह सुनिश्चत करेंगी कि ऐसी रिपोर्ट समय के भीतर पेश हो ताकि इन मुकदमे की सुनवाई तेजी से पूरी हो सके.