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भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में 69 प्रतिशत मौतों की वजह कुपोषण: यूनिसेफ

यूनिसेफ ने ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन 2019’ नाम की अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत में पांच वर्ष से कम आयु के हर पांचवें बच्चे में विटामिन ए की कमी है, हर तीसरे बच्चे में से एक को विटामिन बी 12 की कमी है और हर पांच में से दो बच्चे खून की कमी से ग्रस्त हैं.

A child of a slum dweller eats food outside her house at a slum area in Jammu July 19, 2007. REUTERS/Amit Gupta

प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स

नई दिल्ली: भारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में 69 प्रतिशत मौतों का कारण कुपोषण है. यूनिसेफ की बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है.

बच्चों के पोषण पर यूनिसेफ ने 20 साल पहले इस तरह की रिपोर्ट जारी की थी. अपनी रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन 2019 में यूनिसेफ ने कहा कि इस आयु वर्ग में हर दूसरा बच्चा किसी न किसी रूप में कुपोषण से प्रभावित है.

इसमें बच्चों का विकास बाधित होने के 35 प्रतिशत मामले, दुर्बलता के 17 प्रतिशत और वजन अधिक होने के दो प्रतिशत मामले हैं. केवल 42 प्रतिशत बच्चों (छह से 23 महीने के आयु वर्ग में) को पर्याप्त अंतराल पर भोजन दिया जाता है और 21 प्रतिशत बच्चों को पर्याप्त रूप से विविध आहार मिलते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि 6-8 महीने की आयु के केवल 53 प्रतिशत शिशुओं के लिए समय पर पूरक आहार देना शुरू किया जाता है.

हर दूसरी महिला एनेमिक

रिपोर्ट में भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य के बारे में कहा गया है कि हर दूसरी महिला में खून की कमी है. यह भी कहा गया है कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में खून की कमी सबसे अधिक व्याप्त है. किशोर लड़कियों में यह किशोर लड़कों से दोगुनी है.

भारतीय बच्चों के बीच उच्च रक्तचाप, किडनी रोग और मधुमेह जैसे वयस्क रोगों भी देखे जा रहे हैं. रिपोर्ट में दिये गये आंकड़ों में कहा गया है कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से प्रभावित हैं.

पांच वर्ष से कम आयु के हर पांचवें बच्चे में विटामिन ए की कमी है, हर तीसरे बच्चे में से एक को विटामिन बी 12 की कमी है और हर पांच में से दो बच्चे खून की कमी से ग्रस्त हैं.

रिपोर्ट में कहा गया कि पोषण अभियान या राष्ट्रीय पोषण मिशन पूरे भारत में पोषण सुरक्षा संकेतकों को बेहतर बनाने में एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है.

रक्तहीनता से लड़ने के लिए ‘एनीमिया मुक्त भारत’ कार्यक्रम को कुपोषण को दूर करने के लिए दुनिया भर की सरकारों द्वारा लागू किए गए सबसे अच्छे कार्यक्रमों में से एक माना गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूली बच्चों और किशोरों में मधुमेह (10 प्रतिशत) जैसे गैर-संचारी रोगों के बढ़ते खतरे के साथ बचपन में अधिक वजन और मोटापा शुरू होता है.

शहरों में आए बदलाव

भारत के शहरों ने सेहत के लिए नुकसानदायक स्नैक्स खाने का माहौल बढ़ रहा है, जिससे बच्चों की भोजन की पसंद प्रभावित हो रही है और यह ग्रामीण क्षेत्रों में भी फैल रहा है.

देश में भोजन की खपत के पैटर्न से पता चलता है कि बच्चों के आहार में बड़े पैमाने पर प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं हैं और यह घर के बड़ों के भोजन की पसंद से प्रभावित है.

दशकों में, बढ़ती आमदनी के बावजूद, प्रोटीन-आधारित कैलोरी कम और अपरिवर्तित रहती हैं, और फलों तथा सब्जियों की कैलोरी के हिस्से में गिरावट आई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर प्रसंस्कृत खाद्य बिक्री का 77 प्रतिशत सिर्फ 100 बड़ी फर्मों द्वारा नियंत्रित किया जाता है. शहरी इलाकों में ढेरों गरीब बच्चे अस्वास्थ्यकर खाना खा रहे हैं.

वैश्विक स्तर पर इस समस्या के बारे में इस रिपोर्ट में कहा गया है कि औसतन पांच साल से कम उम्र के तीन बच्चों में से एक- या 20 करोड़ बच्चे या तो कुपोषण का शिकार हैं या फिर अधिक वजन का.

रिपोर्ट में कहा गया है कि छह महीने और दो वर्ष के आयु वर्ग के बीच तीन बच्चों में से लगभग दो बच्चों को वो भोजन नहीं दिया जाता, जिससे उनके शरीर और दिमाग की वृद्धि होती हो.

इससे बच्चों में मस्तिष्क का पूरा विकास नहीं होने का खतरा, कमजोर प्रतिरक्षण प्रणाली तथा संक्रमण में वृद्धि और कुछ मामलों में मृत्यु होने की आशंका हो जाती है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)