Freedom Of Press

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यह अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए निराशाजनक दौर है

यह एक कठोर हक़ीक़त है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को बचाए रखने वाले हर क़ानून के अपनी जगह पर होने के बावजूद समाचारपत्रों और टेलीविज़न चैनलों ने बिना प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया है और ऊपर से आदेश लेना शुरू कर दिया है.

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एक्सक्लूसिव: एबीपी न्यूज़ से पत्रकारों के इस्तीफ़े के पहले पतंजलि ने चैनल से हटाए थे विज्ञापन

पतंजलि के प्रवक्ता ने एबीपी समाचार चैनल से विज्ञापन हटाने की बात स्वीकारते हुए वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी और मिलिंद खांडेकर के इस्तीफ़े में हाथ होने से इनकार किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह. (फोटो: पीटीआई)

अब मीडिया सरकार की नहीं बल्कि सरकार मीडिया की निगरानी करती है: पुण्य प्रसून बाजपेयी

विशेष: वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी बता रहे हैं कि न्यूज़ चैनलों पर नकेल कसने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के भीतर बनाई गई 200 लोगों की ‘गुप्त फ़ौज’ क्या और कैसे काम करती है.

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मुझे कहा गया कि न मोदी का नाम लूं, न ही उनकी तस्वीर दिखाऊं: पुण्य प्रसून बाजपेयी

अपने इस लेख में मास्टरस्ट्रोक कार्यक्रम के एंकर रहे पुण्य प्रसून बायपेयी उन घटनाक्रमों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं जिनके चलते एबीपी न्यूज़ चैनल के प्रबंधन ने मोदी सरकार के आगे घुटने टेक दिए और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

एबीपी न्यूज़ के एडिटर-इन-चीफ मिलिंद खांडेकर (बाएं) और पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी (फोटो साभार: ट्विटर)

क्या एबीपी न्यूज़ के पत्रकारों ने मोदी सरकार की आलोचना की कीमत चुकाई है?

सूत्रों के अनुसार चैनल में हुए इन बदलावों के बीच भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को पिछले हफ्ते संसद भवन में कुछ पत्रकारों से कहते सुना गया था कि वे ‘एबीपी को सबक सिखाएंगे.’

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘आपातकाल’ इतना प्रिय क्यों है?

राजनीतिक विमर्श में आपातकाल नरेंद्र मोदी का प्रिय विषय रहता है. यह और बात है कि मोदी आपातकाल के दौरान एक दिन के लिए भी जेल तो दूर, पुलिस थाने तक भी नहीं ले जाए गए थे. भूमिगत रहकर उन्होंने आपातकाल विरोधी संघर्ष में कोई हिस्सेदारी की हो, इसकी भी कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं मिलती.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi visiting the Terracota Warriors Museum, in Xi'an, Shaanxi, China on May 14, 2015.

क्या आपातकाल को दोहराने का ख़तरा अब भी बना हुआ है?

आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी. आज फिर वैसा ही नज़ारा दिख रहा है. सारे अहम फ़ैसले संसदीय दल तो क्या, केंद्रीय मंत्रिपरिषद की भी आम राय से नहीं किए जाते, सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री की चलती है.

फोटो साभार: cobrapost.com

कोबरापोस्ट के स्टिंग में पत्रकारिता का सौदा करने को तैयार दिखे तमाम मीडिया संस्थान

कोबरापोस्ट के स्टिंग ‘ऑपरेशन 136’ की दूसरी कड़ी में देश के कई नामचीन मीडिया संस्थान सत्ताधारी दल के लिए चुनावी हवा तैयार करने के लिए आध्यात्मिकता और धार्मिक प्रवचन के ज़रिये हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए सहमत होते नज़र आए.

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पेड न्यूज़ को लेकर कोबरापोस्ट के खुलासे से पहले दैनिक भास्कर पहुंचा हाईकोर्ट, मिली राहत

दिल्ली हाईकोर्ट ने वेब पोर्टल कोबरापोस्ट के उस खुलासे पर रोक लगा दी है, जिसमें वह पेड न्यूज़ से जुड़ी अपनी खोजी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने वाला था.

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प्रेस की आज़ादी के असली दुश्मन बाहर नहीं, बल्कि अंदर ही हैं

मोदी के चुनाव जीतने के बाद या फिर उससे कुछ पहले ही मीडिया ने अपनी निष्पक्षता ताक पर रखनी शुरू कर दी थी. ऐसा तब है जब सरकार और प्रधानमंत्री ने मीडिया को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया है. मीडियाकर्मियों की जितनी ज़्यादा अवहेलना की गई है, वे उतना ही ज़्यादा अपनी वफ़ादारी दिखाने के लिए आतुर नज़र आ रहे हैं.

(फोटो :पीटीआई)

लोगों की सहानुभूति के लिए बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर करना ठीक नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

कठुआ रेप पीड़िता के नाम का खुलासा करने पर अदालत में चल रही सुनवाई में एक मीडिया घराने ने बचाव में कहा कि उसने जनभावनाएं जगाने, सहानुभूति बटोरने तथा न्याय सुनिश्चित करने के लिए बच्ची का नाम और तस्वीर प्रकाशित की.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

बलात्कार पीड़िता की पहचान के खुलासे पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मृतक की भी गरिमा होती है

उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘मीडिया रिपोर्टिंग पीड़ित का नाम लिए बगैर भी की जा सकती है. भले ही पीड़ित नाबालिग या विक्षिप्त हो तो भी उसकी पहचान का खुलासा नहीं करना चाहिए.’

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

भारत में सरकार की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थानों को परेशान किया गया: अमेरिकी विदेश मंत्रालय

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को दबाने की ऐसी कोशिश हाल के वर्षों में पहले अनुभव नहीं की गई.

Episode 44 Featured

मीडिया बोल, एपिसोड 44: ऑनलाइन मीडिया पर अंकुश की तैयारी

मीडिया बोल की 44वीं कड़ी में उर्मिलेश सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा न्यूज पोर्टल और मीडिया वेबसाइट्स को रेग्युलेट करने के लिए कमेटी बनाए जाने पर चर्चा कर रहे हैं.

साभार: cobrapost.com

कोबरापोस्ट का ख़ुलासा, पैसे के एवज़ में ख़बरें छापने को राज़ी दिखे देश के कई मीडिया हाउस

ख़ुफ़िया कैमरे की मदद से किए गए कोबरापोस्ट के ‘ऑपरेशन 136’ में देश के कई नामचीन मीडिया संस्थान सत्ताधारी दल के लिए चुनावी हवा तैयार करने को राज़ी होते नज़र आ रहे हैं.

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मीडिया को नियंत्रित करने के लिए दक्षिण-वाम सब साथ हैं

साल दर साल भारत में मीडिया पर नियंत्रण और सेंसरशिप ख़त्म होने के बजाय बढ़ रही है. इस मामले में सभी राजनीतिक दल एक जैसे हैं. वे आज़ाद मीडिया की जगह नियंत्रित मीडिया को प्यार करते हैं.

The Wire Editorial

संपादकीय: मुंबई के पत्रकारों ने जो किया वो देश के पत्रकारों के लिए नज़ीर है

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग पर लगी पाबंदी को नौ पत्रकारों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने यह पाबंदी हटा दी. उनकी जीत पत्रकारिता की जीत है.

​​(फोटो: पीटीआई)

‘प्रेस को पूरी आज़ादी होनी चाहिए, ग़लत रिपोर्टिंग पर मानहानि के शिकंजे में न घेरें’

मानहानि के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घोटाले की रिपोर्टिंग के समय उत्साह में ग़लती हो सकती है.

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जन गण मन की बात, एपिसोड 152: मूडीज की रेटिंग और प्रेस की आज़ादी

जन गण मन की बात की 152वीं कड़ी में विनोद दुआ मूडीज़ द्वारा भारत की रेटिंग में सुधार और प्रेस की आज़ादी पर चर्चा कर रहे हैं.

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मीडिया बोल, एपिसोड 22: वर्ष 2022 का ‘पैराडाइज़’ और मीडिया

मीडिया बोल की 22वीं कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश 2022 के आम चुनाव और मीडिया की भूमिका पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव और इतिहासकार मृदुला मुखर्जी से चर्चा कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा को उनके गाजियाबाद स्थित आवास से 27 अक्टूबर को गिरफ़्तार किया था. (फोटो: पीटीआई)

पत्रकार विनोद वर्मा 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में

मंत्री की अश्लील सीडी मामले में गिरफ़्तार पत्रकार की तीन दिन की पुलिस हिरासत ख़त्म होने पर पुलिस ने न्यायित हिरासत की मांग की थी.

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मीडिया बोल, एपिसोड 21: पत्रकारिता और पत्रकारों पर बढ़ते हमले

मीडिया बोल की 21वीं कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश पत्रकारों पर बढ़ते हमले पर अधिवक्ता व मानवाधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा से चर्चा कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा को उनके गाजियाबाद स्थित आवास से 27 अक्टूबर को गिरफ़्तार किया था. (फोटो: पीटीआई)

पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ़्तारी पर भाजपा-कांग्रेस में छिड़ा सियासी घमासान

सीडी मामले को मंत्री ने बताया चरित्रहनन का प्रयास, एफआईआर में नहीं है विनोद वर्मा का नाम, अदालत में नहीं पेश हुई कोई सीडी, पत्रकारों ने पुलिस के दावों पर उठाए सवाल.

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राजस्थान के बाद अब छत्तीसगढ़, मीडिया पर टंगा फंदा

राजस्थान ने पत्रकारों पर क़ानून के दस्ताने पहनकर हाथ डाला. छत्तीसगढ़ और यूपी की पुलिस ने एक प्रतिष्ठित पत्रकार के घर में मुंह-अंधेरे घुसकर बेशर्मी का परिचय दिया.

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पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ़्तारी इमरजेंसी की याद दिला रही है

छत्तीसगढ़ पुलिस ने बीबीसी और अमर उजाला में वरिष्ठ पदों पर रह चुके पत्रकार विनोद वर्मा को उगाही के आरोप में शुक्रवार को सुबह साढ़े तीन बजे उनके ग़ाज़ियाबाद स्थित आवास से गिरफ़्तार कर लिया.

( फोटो: एएनआई)

राजस्थान सरकार ने विवादित विधेयक प्रवर समिति को भेजा

राजस्थान सरकार एक नया विधेयक लाई है, जिसके मुताबिक किसी भी लोकसेवक के ख़िलाफ़ मुक़दमे के लिए सरकार की मंज़ूरी लेना आवश्यक होगा.

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राजस्थान सरकार की सफाई, लोकसेवकों को झूठे मुक़दमे से बचाने के लिए लाया गया विधेयक

राजस्थान सरकार की वेबसाइट पर कहा गया, नये अध्यादेश में भ्रष्ट लोकसेवकों को कोई संरक्षण नहीं, यह संशोधन झूठे मुक़दमों पर अंकुश लगाने के लिए हैं.

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राजस्थान में लोकतंत्र का गला घोंटने वाले बिल का विरोध करूंगा: भाजपा विधायक

एडिटर्स गिल्ड ने कहा, यह विधेयक मीडिया को परेशान करने का एक घातक साधन है, जो सरकारी कर्मियों के ग़लत कृत्यों को छुपाता है और प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाता है.

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‘भारत में हिंदुत्ववादी कट्टरपंथियों के कारण मीडिया में सेल्फ सेंसरशिप की प्रवृत्ति बढ़ी’

अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि 2015 से अब तक सरकार की आलोचना करने वाले नौ पत्रकारों की हत्या कर दी गई.

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सरकार मीडिया उद्योग को मदद करे, पत्रकारों के लिए वेजबोर्ड का कोई तुक नहीं है: आईएनएस

मीडिया मालिकों के संगठन इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी ने कहा, नोटबंदी के कारण विज्ञापनों में कमी आने से अख़बार प्रभावित हुए हैं.

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प्रेस को किसी की भी आलोचना करने का विशेषाधिकार नहीं: अदालत

अदालत ने कहा कि प्रेस को टिप्पणी करने, आलोचना करने या किसी मामले में तथ्यों की जांच करने के कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हैं. प्रेस के लोगों के अधिकार आम आदमी के अधिकारों से ऊंचे नहीं.

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मीडिया बोल, एपिसोड 04: हिंदी मीडिया आज इतना बेदम और ग़ैर-पेशेवर क्यों?

मीडिया बोल की चौथी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, एनडीटीवी के सीनियर एंकर रवीश कुमार और वरिष्ठ पत्रकार विद्या सुब्रह्मण्यम के साथ हिंदी मीडिया के ग़ैर-पेशेवर रवैये पर चर्चा कर रहे हैं.

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‘जब भी कोई दल बहुमत से सत्ता में होता है, तब प्रेस की आज़ादी पर हमले होते हैं’

वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन ने प्रेस की आज़ादी और लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा समर्थित प्रेस और मीडिया को ही एकमात्र उपाय बताया.

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मीडिया बोल, एपिसोड 03: भारतीय मीडिया में दलित पत्रकार कहां हैं?

मीडिया बोल की तीसरी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, जेएनयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर विवेक कुमार और वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह के साथ मीडिया में दलित पत्रकारों की स्थिति पर चर्चा कर रहे हैं.

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आपातकाल: नसबंदी से मौत की ख़बरें न छापी जाएं

आपातकाल के 43 साल बाद इन सेंसर-आदेशों को पढ़ने पर उस डरावने माहौल का अंदाज़ा लगता है जिसमें पत्रकारों को काम करना पड़ा था, अख़बारों पर कैसा अंकुश था और कैसी-कैसी ख़बरें रोकी जाती थीं.

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मीडिया बोल, एपिसोड 02: किसको चाहिए आज़ाद मीडिया?

मीडिया बोल की दूसरी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा और नेपाल वन टीवी की मैनेजिंग एडीटर व वरिष्ठ पत्रकार नलिनी सिंह के साथ मीडिया की आज़ादी पर चर्चा कर रहे हैं.

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वो मीडिया को उस कुत्ते में बदल रहे हैं जिसके मुंह में विज्ञापन की हड्डी है, ताकि वह उन पर न भौंके

शुक्रवार, 9 जून को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने मीडिया के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार रखे. पढ़ें उनका पूरा भाषण…

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मीडिया बोल, एपिसोड 01: एनडीटीवी और प्रेस की स्वतंत्रता

मीडिया बोल की पहली कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, द वायर के संस्थापक संपादक एमके वेणु और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वायपेयी के मीडिया सलाहकार रहे अशोक टंडन के साथ प्रेस की स्वतंत्रता पर चर्चा कर रहे हैं.