उच्च शिक्षण संस्थानों में उपजे वैचारिक मतभेद का हल हिंसा नहीं है

शिक्षण संस्थानों का जब-जब राजनीतिकरण होगा, उसकी परिणति अक्सर हिंसा के रूप में ही होती है. जेएनयू को लेकर हुए विवाद में आज देश दो धड़े में विभाजित है और यह विभाजन धार्मिक या जातीय नहीं बल्कि वैचारिक है.

/
05 जनवरी 2020 की रात जेएनयू के गेट पर तैनात पुलिस. (फोटो: रॉयटर्स)

शिक्षण संस्थानों का जब-जब राजनीतिकरण होगा, उसकी परिणति अक्सर हिंसा के रूप में ही होती है. जेएनयू को लेकर हुए विवाद में आज देश दो धड़े में विभाजित है और यह विभाजन धार्मिक या जातीय नहीं बल्कि वैचारिक है.

Police in riot gear stand guard outside the Jawaharlal Nehru University (JNU) after clashes between students in New Delhi, India, January 5, 2020. REUTERS/Adnan Abidi
5 जनवरी को जेएनयू में हुई हिंसा के बाद वहां तैनात पुलिस. (फोटो: रॉयटर्स)

पिछले कुछ सालों से मैं अपनी मातृ संस्था इलाहाबाद विश्वविद्यालय को लेकर ज़ाती तौर पर काफी सोच में थी. खासतौर पर जब पिछले साल यूनिवर्सिटी कैंपस में लगातार कई हिंसक घटनाओं के बारे में पढ़ा तो मेरे ज़ेहन में कई सवाल थे कि एक ज़माने का पूरब का ऑक्सफोर्ड कही जाने वाली ऐसे नामी यूनिवर्सिटी, जिसने देश को एक राष्ट्रपति, दो उपराष्ट्रपति, दो प्रधानमंत्री और न जाने कितने केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रशासनिक सेवा अधिकारी, कवि, दार्शनिक और विद्वान दिए, की ऐसी हालत क्यों हुई.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का बहुत बड़ा योगदान न सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम में रहा है बल्कि असहयोग आंदोलन से लेकर आज़ादी तक इलाहाबाद क्रांति का केंद्र रहा है और अपनी इस परंपरा को काफी हद तक आज़ादी के तीन-चार दशक तक बनाए रखा.

देश में शायद ही ऐसा कोई विश्वविद्यालय रहा हो, जिसकी प्रशासनिक स्थिति में इतना परिवर्तन हुआ हो जितना इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुआ है. वह विश्वविद्यालय, जिसका उद्भव एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के अधीन 1870 के दशक में एक सेंट्रल कॉलेज के रूप में हुआ और 1887 में जिसे एक अलग केंद्रीय विश्वविद्यालय देश की चौथा विश्वविद्यालय का दर्जा मिला.

आज़ादी के बाद धीरे-धीरे इस विश्वविद्यालय पर राज्य की क्षेत्रीय राजनीति का इतना प्रभाव हुआ कि यह विश्वविद्यालय केंद्र से राज्य विश्वविद्यालय में बदल गया. 1992 में इसे राज्य का प्रीमीयर संस्थान घोषित किया गया.

ये भी दिलचस्प है कि प्रीमियर संस्थान घोषित होने के साथ ही इस विश्वविद्यालय का पतन शुरू हो गया, विश्वविद्यालय के क्षेत्रीयकरण और जातीयकरण ने बहुत से दूरगामी परिणाम उत्पन्न किए, जिसका जवाब काबिल से काबिल वीसी भी नहीं दे पाए. लेट सेशन से शुरू हुई समस्याओं ने कितनी सारी समस्याओं को जन्म दिया.

गौर करने की बात यह है कि यह सब घटनाएं मंडल कमीशन आने के बाद हो रही थीं. यह तब हुआ जब बाबरी ध्वंस के मुद्दे पर देशव्यापी दंगे हुए. इसके परिणामस्वरूप भारतीय राजनीति में एक अलग तरह के प्रयोगों का दौर शुरू हो गया जिसमें क्षेत्रीय दलों की महत्ता यकायक बढ़ गई थी.

और ऐसे में गंगा-जमुनी तहज़ीब का केंद्र माना जाने वाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय में सांप्रदायिक विभाजन बहुत स्पष्ट हो गया था. हालांकि इस विभाजन की आहात 1980 के दशक से ही मिल रही थी और अक्सर जिसकी परिणति छोटे-छोटे मुद्दों पर कर्फ्यू लगने की शक्ल में हुआ करती थी.

एक ज़माने में यह परिसर वैचारिक आदान-प्रदान की सर्वश्रेष्ठ संस्था माना जाता था. यहां की काव्य गोष्ठियों और अकादमिक सेमीनार में देश-विदेश से वक्ता आया करते थे. बड़े अफ़सोस के साथ कहूंगी कि यह सब मैंने अपने छात्र जीवन में नहीं देखा, इसके बारे में बस अपने सीनियर और बड़ों से सुना कि यहां ऐसा हुआ करता था.

फिर भी खुद खुशकिस्मत मानती हूं कि 1995 से 1999 के बीच जब मैंने यहां पढ़ाई की, तब विश्वविद्यालय के उन अध्यापकों ने पढ़ाया, जो इलाहाबाद स्कूल ऑफ थॉट की आखिरी पीढ़ी कहे जा सकते हैं. उसके बाद तो वहां विचारों की मतभेदता वाद-विवाद से नहीं बल्कि या तो खामोशी से सामने आई और कई बार तो हिंसक रूप में भी परिणत हुई.

आज जेएनयू में जो कुछ हो रहा है वह उसी वैचारिक मतभेद का परिणाम है जो गत कुछ वर्षों से बहुत स्पष्ट नजर आ रही है. मुझे डर है कि जेएनयू भी कहीं उसी रास्ते पर न चला जाए.

दरअसल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की महत्ता में कमी के साथ जेएनयू का उदय भी हुआ और इसने अपनी श्रेष्ठता को बनाए रखा. यहां से शिक्षा प्राप्त लोगों ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई, जो आज कई बड़े पदों पर हैं और यहां की चुनौतियों को समझते हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के साथ उल्टा रहा. उसकी उच्चता के पैमाने इतिहास के पन्नों में खो गए. आज भी लोग वहां के कैंपस की वास्तुकला, उसकी बुलंद इमारतों और गौरवशाली इतिहास में खोए हुए हैं.

इलाहाबाद में वैचारिक बदलाव अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे हुए जिसका न किसी को एहसास हुआ न आज भी कोई मानने को तैयार है.  2005 में केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा वापस मिलने के बावजूद यूजीसी द्वारा इसको  बी प्लस की श्रेणी में रखा जाना चिंता का विषय है.

जेएनयू के साथ मसला इसलिए अलग है क्योंकि यहां का गौरव अभी ज़िंदा है और लोगों ने इस वैचारिक लड़ाई में आवाज़ उठानी शुरू कर दी है.

यह भी एक सच है कि शिक्षण संस्थानों का जब-जब राजनीतिकरण होगा उसकी परिणति अक्सर हिंसा के रूप में ही होती है. जेएनयू को लेकर हुए विवाद में आज देश दो धड़े में विभाजित है और यह विभाजन धार्मिक या जातीय नहीं बल्कि वैचारिक है.

इस विवाद का जिसका उद्भव भी अचानक नहीं, बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे हुआ, लेकिन जेएनयू के साथ अच्छी बात यह रही कि उसने वक्त रहते आवाज़ बुलंद कर दी.

विश्व स्तर पर सभ्यताओं के द्वंद्व ने जहां विश्वयुद्धों को जन्म दिया, तो वहीं देश की सर्वोच्च संस्थाओं में यह वैचारिक द्वंद्व के रूप में सामने आ रहे हैं. ऐसे द्वंद्व इस तरह की स्तरीय संस्थाओं की सोचने-समझने की शक्ति या तो खत्म कर देंगे या छात्र राजनीति को हमेशा के लिए विषाक्त कर देंगे.

ऐसी में यहां छात्र डिग्री तो हासिल कर लेंगे, पर बहुत मानसिकता संकुचित ही रह जाएगी. यह भावना कहीं न कहीं रह जाएगी कि केवल हमारी सभ्यता और संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है और सबसे सबसे बड़ा ज्ञानी मैं ही हूं. ऐसी भावना सिर्फ शिक्षा का तालिबानीकरण ही होगा और कुछ नहीं.

(फिरदौस अज़मत सिद्दीक़ी जामिया मिलिया इस्लामिया में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)

pkv games bandarqq dominoqq pkv games parlay judi bola bandarqq pkv games slot77 poker qq dominoqq slot depo 5k slot depo 10k bonus new member judi bola euro ayahqq bandarqq poker qq pkv games poker qq dominoqq bandarqq bandarqq dominoqq pkv games poker qq slot77 sakong pkv games bandarqq gaple dominoqq slot77 slot depo 5k pkv games bandarqq dominoqq depo 25 bonus 25 bandarqq dominoqq pkv games slot depo 10k depo 50 bonus 50 pkv games bandarqq dominoqq slot77 pkv games bandarqq dominoqq slot bonus 100 slot depo 5k