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‘श्रम क़ानून में बदलाव मज़दूरों के अधिकारों से खिलवाड़, उन्हें मालिकों के रहम पर जीना पड़ेगा’

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश समेत देश के कई राज्य कोरोना महामारी के नाम पर गोपनीय तरीके से कुछ सालों के लिये कई श्रम क़ानूनों को हल्का कर रहे हैं या रोक लगा रहे हैं. राज्यों की दलील है कि इससे निवेश बढ़ेगा, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि निवेश श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने से नहीं बल्कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और स्किल्ड लेबर से होता है.

Navi Mumbai: Migrants from Madhya Pradesh walk along a road towards their native places during the nationwide lockdown, imposed in wake of the coronavirus pandemic, in Navi Mumbai, Wednesday, May 6, 2020. (PTI Photo)(PTI06-05-2020_000182B)

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: कोरोना वायरस महामारी के चलते एक तरफ जहां बहुत बड़ी संख्या में देश के मजदूरों को बेरोजगार होना पड़ा है और वे दो वक्त के राशन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कई राज्य सरकारें गोपनीय तरीके से श्रम कानूनों में परिवर्तन कर सिर्फ उद्योगों को फायदा पहुंचाना चाह रही हैं.

श्रमिकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण इन कानूनों को हल्का करने या कुछ वर्षों के लिए इन पर रोक लगाने की वजह से न सिर्फ मजदूरों को अपनी बात रखने की इजाजत नहीं मिलेगी, काम के घंटे बढ़ा दिए जाएंगे, नौकरी से निकालना आसान हो जाएगा बल्कि उन्हें आधारभूत सुविधाओं जैसे कि साफ-सफाई, वेंटिलेशन, पानी की व्यवस्था, कैंटीन और आराम कक्ष जैसी चीजों से भी वंचित रहना पड़ सकता है.

इस चलन की शुरुआत मध्य प्रदेश सरकार से हुई जब राज्य ने एक प्रशासनिक आदेश के जरिये कामगार अधिनियम, 1948 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के कई प्रावधानों को 1000 दिनों के लागू करने पर रोक लगा दी. इसके अलावा उद्योगों के नियमित निरीक्षण को बदल दिया गया और उद्योगों को लाइसेंस देने की शर्तों को हल्का कर दिया गया.

इसके एक दिन बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इन तकनीकि बाधाओं को ही समाप्त करते हुए एक अध्यादेश पारित किया जिसमें सभी पूर्ववर्ती और नए उद्योगों को 38 श्रम कानूनों में से लगभग सभी कानूनों से तीन साल के लिए छूट दे दी गई.

राज्य सरकार ने सिर्फ मजदूरों की सुरक्षा, महिला कल्याण और वेतन के प्रावधानों को छोड़कर बाकी सभी कानूनों पर तीन साल के लिए रोक लगा दी.

ऐसा करते हुए राज्य सरकार ने दलील दी है कि वे चीन से निकल रहीं कंपनियों को अपने यहां बुलाना चाहते हैं, जिससे औद्योगिकरण को बढ़ावा मिलेगा और नई नौकरियों का सृजन होगा.

इनके अलावा गुजरात और महाराष्ट्र की सरकारों ने भी श्रम कानूनों में परिवर्तन की बात की है, जिससे नए उद्योगों को तथाकथित रूप से विकास करने में मदद मिलेगी.

मजदूर संगठनों और श्रम विशेषज्ञों का कहना है कि देश को श्रम कानूनों में परिवर्तन की जरूरत तो है लेकिन कोई ये नहीं चाहता है कि ऐसी स्थिति पैदा की जाए जहां मजदूरों को कंपनी मालिकों के रहमों-करम पर जीना पड़े. ऐसा मनमाना कानून नहीं होना चाहिए, जहां नियोक्ता (एम्प्लॉयर) ही सर्वेसर्वा हो और वो जो चाहे करे. इसे रिफॉर्म नहीं कहा जाता है.

ये भी आशंका है कि श्रमिक विरोधी कानूनों को चलते जगह-जगह मजदूर आंदोलन खड़े हो जाएंगे और चारों तरफ अव्यवस्थता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. कई लोगों ने ये भी कहा है कि इसके चलते बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा मिलेगा. इन संशोधनों को खिलाफ आठ दलों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र भी लिखा है.

श्रम अर्थशास्त्री और जेवियर्स स्कूल कानून ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर डॉ. श्याम सुंदर कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार की ये धारणा या कल्पना बिल्कुल गलत है कि श्रम कानूनों में छूट देने से राज्य में ज्यादा निवेश होगा और नौकरियां बढ़ेंगी.

उन्होंने कहा कि अगर राज्य सरकार के अध्यादेश को देखा जाए तो नए नियम सिर्फ फैक्ट्री सेक्टर पर लागू होते हैं, जबकि निवेश सर्विस सेक्टर में अधिक रहा है.

प्रोफेसर सुंदर ने कहा, ‘पता नहीं राज्य सरकार किस आधार पर आकलन कर रही है कि ऐसा करने से उनके यहां निवेश आएगा. खास बात ये है कि निवेश में बाधा श्रम कानून नहीं होते हैं, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण वजहों जैसे कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर न होने, उचित स्किल्ड मजदूरों की उपलब्धता में कमी की वजह से निवेश में गिरावट आती है.’

श्याम सुंदर कहते हैं कि ज्यादातर निवेश तमिलनाडु, गुजरात, एनसीआर और महाराष्ट्र में हुए क्योंकि यहां बेहतर इन्फास्ट्रक्चर और बेहतर मजदूर हैं. उत्तर प्रदेश के पास ये सब नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकार गुमराह हो रही है, उसे श्रम कानूनों में परिवर्तन के बजाय अपने स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम को सुधारना चाहिए ताकि बेहतर स्किल्ड मजदूर निकल सकें.’

जाने-माने ट्रेड यूनियनिस्ट और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के पूर्व रजिस्ट्रार एवं फैकल्टी बाबू मैथ्यू कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ये सोचना की श्रम कानूनों से छूट देने से राज्य में उद्योग आएंगे, ये औद्योगिकरण के इतिहास की बिल्कुल गलत समझ है. वे कहते हैं कि यह पूंजीवादी औद्योगीकरण की एक सामंती धारणा है.

उन्होंने कहा, ‘भारत की आजादी के तुरंत बाद सरकार ने मजदूरों से कहा कि आप धरना न करें और उद्योगों से कहा कि वे मजदूरों को बेहतर कार्य स्थिति और बेहतर सुविधाएं दें. ऐसा इसलिए किया गया ताकि मजदूरों को न्यूनतम सुविधाएं और बेहतर वातावरण देकर औद्योगिकरण किया जा सके. यूपी सरकार इसके बिल्कुल उलट कर रही है. मुझे नहीं लगता कि सरकार जो फायदा सोच रही है वो उसे मिल पाएगा.’

काम के घंटे बढ़ाने से मजदूरों में कोरोना संक्रमण का खतरा

विभिन्न राज्य सरकारों ने ये घोषणा की है कि उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए वे काम के घंटे बढ़ाकर आठ से 12 घंटे करेंगे. राज्य ने इसके लिए ये दलील दी है कि अतिरिक्त काम के लिये मजदूरों को अतिरिक्त भुगतान किया जाएगा.

हालांकि इस संबंध में उत्तर प्रदेश का अध्यादेश इसलिए भयावह है क्योंकि उन्होंने पूरे फैक्ट्रीज एक्ट को ही तीन साल के लिये स्थगित कर दिया, जिसमें आठ घंटे से अतिरिक्त काम (ओवरटाइम) करने पर अतिरिक्त भुगतान करने की बात कही गई है. इसे स्थगित किये जाने से राज्य में काम कराने की कोई समयसीमा नहीं रह जाएगी और अभी तक यूपी ने ये भी स्पष्ट नहीं किया है कि अतिरिक्त काम देने पर अतिरिक्त भुगतान किया जाएगा या नहीं.

इसे लेकर बाबू मैथ्यू कहते हैं कि मजदूरों के स्वास्थ्य का काम के घंटे से सीधा संबंध है. यदि हम काम के घंटे को कम नहीं करते हैं तो ज्यादा काम करने से मजदूर के स्वास्थ्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) घटेगी, उसका स्वास्थ्य खराब होगा और इसके चलते कोरोना संक्रमण बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है.

उन्होंने कहा, ‘ऐसे समय में मजदूरों को और ज्यादा छूट दी जानी चाहिए. काम के घंटे को कम करना चाहिए था, ताकि उन पर कम दबाव रहता और इससे उनकी इम्यूनिटी और बेहतर होती. अगर रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होगी तो संक्रमण बढ़ेगा ही.’

वहीं ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की महासचिव अमरजीत सिंह कहती हैं कि राज्य सरकारें कोरोना वायरस के दौर में मौके का फायदा उठाकर पिछले 134 सालों में श्रमिकों ने जो कुछ अधिकार प्राप्त किए थे, उन पर हमला कर रही हैं.

उन्होंने कहा, ‘इस समय स्थिति ये है कि उद्योग कह रहे हैं कि वे एक तिहाई से ज्यादा मजदूरों को काम पर नहीं रख पाएंगे. ऐसे में श्रम कानून कहां बाधा है. जब इंडस्ट्री खुद एक तिहाई से ज्यादा रखना ही नहीं चाहती है तो मजदूर को उल्टा काम ही नहीं मिल रहा है. आप आठ से 12 घंटे काम करने की बात कर रहे हैं. इसका तो कोई तुक नहीं बनता है. जो मजदूर पहले से ही उपलब्ध हैं और उन्हें ही सरकार काम नहीं दे पा रही है तो आप 12 घंटे काम करने की शुरुआत क्यों करना चाहते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इस समय सबको रोजगार देने की जरूरत है. इसलिए यहां दो या तीन शिफ्ट लगाना चाहिए था. काम के घंटे बढ़ाने का क्या मतलब है. यदि ऐसे में मजदूर के साथ कुछ हो जाता है, उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है और विवाद की स्थिति पैदा होगी तो उसका समाधान तो हो नहीं पाएगा क्योंकि आपने औद्योगिक विवाद अधिनियम को ही खत्म कर दिया है, तो मजदूर को न्याय कैसे मिलेगा.’

कौर कहती हैं कि ये सर्वमान्य है कि किसी उद्योग में जितना खर्च आता है उसमें सिर्फ 10 फीसदी ही श्रम मूल्य का हिस्सा होता है.

उन्होंने कहा, ‘इतना कम खर्च के बाद भी आप उसे सताना चाहते हैं. आप उस मजदूर को पीसना चाह रहे हैं जो भूखा है, जिसके पेट में अनाज नहीं है, जिसको राशन नहीं मिला है, जो हताश है.’

हालांकि उद्योग जगत से जुड़े लोगों की राय इससे थोड़ी इतर है.

वे कहते हैं कि जब भी कभी बिजनेस के पक्ष में कोई बात की जाती है तो लोगों को लगता है कि मजदूरों के अधिकारों को छीना जा रहा है.

औद्योगिक संबंधों पर सीआईआई की राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष रह चुके प्रदीप भार्गव कहते हैं कि जहां तक उत्तर प्रदेश में श्रम कानूनों में बदलाव का सवाल है, उस पर राज्य सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. हालांकि उनका मानना है कि मध्य प्रदेश सरकार ने जो बदलाव किया है वो उद्योगों को तत्काल शुरू होने में मदद मिलेगी.

उन्होंने कहा, ‘मध्य प्रदेश सरकार ने डिटेल में खांका पेश किया है और इसको पढ़ने से यह लगता है कि सरकार ये कह रही है कि वे उद्योग के कार्यप्रणाली में बेवजह हस्तक्षेप नहीं करेंगे और उन्हें शांति से कुछ दिन तक काम करने देंगे. सरकार कह रही है कि अगर विवाद की कोई स्थिति उत्पन्न होती है तो उद्योग और मजदूर आपस में ही हल करके आगे बढ़ें.’

उन्होंने कहा, ‘न्यूनतम मजदूरी में कोई परिवर्तन नहीं है, ओवरटाइम दिया जा रहा है, सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित की गई है, हकीकत में ये मजदूरों के खिलाफ नहीं है. ये ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के लिए किया जा रहा. हालांकि सुरक्षा, सफाई और वेंटिलेशन के कई प्रावधानों को हल्का कर दिया गया है.’

प्रोफेसर श्याम सुंदर कहते हैं कि मजदूर को मालिक के रहमों पर जीना होना. इन बदलावों में मजदूरों की दलील सुनने के प्रावधान को ही हटा दिया गया है. यूनियन भी नहीं बना सकते हैं, तो श्रमिक अपनी बात कहां रख पाएगा.

जॉर्ज मैथ्यू ने कहा ने कहा, ‘उद्योग इसलिए नहीं आते हैं कि किसी राज्य में श्रम कानून खत्म कर दिया गया है या वहां श्रम कानून कमजोर है. उद्योग वहां पर आते हैं जहां निवेश का माहौल बेहतर होता है.’