पर्यावरण प्रभाव आकलन पर आपत्ति लेने के लिए समय बढ़ाने की मांग, कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा

याचिकाकर्ता ने कहा है कि चूंकि कोविड-19 महामारी के चलते अभी भी बड़े शहरों में लॉकडाउन है, जिसके कारण यहां कि जनता अधिसूचना पर राय नहीं भेज पा रही है. इसके अलावा पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना को सिर्फ़ अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित किया गया है, जिससे एक बड़ी आबादी वैसे ही राय देने के दायरे से बाहर हो जाती है.

(फोटो: पीटीआई)

याचिकाकर्ता ने कहा है कि चूंकि कोविड-19 महामारी के चलते अभी भी बड़े शहरों में लॉकडाउन है, जिसके कारण यहां कि जनता अधिसूचना पर राय नहीं भेज पा रही है. इसके अलावा पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना को सिर्फ़ अंग्रेज़ी भाषा में प्रकाशित किया गया है, जिससे एक बड़ी आबादी वैसे ही राय देने के दायरे से बाहर हो जाती है.

(फोटो: पीटीआई)
(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र से उस याचिका पर जवाब देने के लिए कहा जिसमें विवादित पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2020 के संबंध में जनता से आपत्ति या सुझाव प्राप्त करने की अवधि को बढ़ाने की मांग की गई है.

याचिका में कहा गया है कि कोविड-19 लॉकडाउन के कारण उत्पन्न हुईं विषम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट सरकार को ये निर्देश दे.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस प्रतीक जालान की पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय को नोटिस जारी किया और इस बारे में सरकार से 29 जून तक जवाब देने के लिए कहते हुए पूछा है कि क्या ईआईए 2020 के संबंध में आपत्ति और सलाह मांगने के लिए अवधि 30 जून तक बढ़ाने की उसकी आठ मई की अधिसूचना में कोई अस्पष्टता है.

यह याचिका पर्यावरण कार्यकर्ता विक्रांत तोंगड़ ने दायर की है, जिसमें दावा किया गया है कि आठ मई की अधिसूचना कहती है कि आपत्ति मांगने की अवधि 60 दिन के लिए और बढ़ा दी गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि किस तारीख से 60 दिन तक की गणना की जा रही है.

आठ मई को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने कोविड-19 लॉकडाउन को ध्यान में रखते हुए जनता द्वारा सुझाव और आपत्तियां प्राप्त करने की समयसीमा बढ़ाकर 30 जून किया गया था. हालांकि याचिकाकर्ता ने कहा है कि इस तरह की बढ़ोतरी नाममात्र है और चूंकि कोरोना के मामले हर दिन बढ़ रहे हैं, इसलिए बड़े शहरों में अभी भी लॉकडाउन लागू है.

याचिकाकर्ता ने उदाहरण देते हुए कहा कि अभी भी दिल्ली और मुंबई में पोस्टल सेवाएं बंद हैं. इसके कारण कई लोग मंत्रालय को अपना जवाब नहीं भेज पा रहे हैं.


ये भी पढ़ें: ज़्यादातर लोगों ने सरकार से नए पर्यावरण क़ानून को वापस लेने की मांग की है: दस्तावेज़


याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिसूचना में विस्तारित अवधि की समापन तिथि 30 जून, 2020 बताए जाने से एक विरोधाभास भी उत्पन्न होता है, क्योंकि इस तारीख के हिसाब से आठ मई को संबंधित अधिसूचना जारी किए जाने के बाद यह अवधि 60 दिन से कम की बैठती है.

इसमें दावा किया गया, ‘इस तरह अवधि विस्तार संबंधी अधिसूचना अस्पष्ट और विरोधाभासी है.’

लाइव लॉ के मुताबिक याचिकाकर्ता ने कहा है कि सार्वजनिक नीति पर जनता को अपनी राय व्यक्त करने का मौलिक अधिकार है, लेकिन ईआईए अधिसूचना का ड्राफ्ट सिर्फ अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध हैं, जिसके कारण एक बड़ी आबादी वैसे ही राय देने के दायरे से बाहर हो जाती है.

उन्होंने यह भी कहा कि इस अधिसूचना को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रमुखता से नहीं डाला गया है, जिसके कारण लोगों को इसे खोजने में भी दिक्कत होती है. इसके अलावा इसे किसी भी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या राज्य के पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रकाशित नहीं किया गया है.

याचिका में मांग की गई है कि इन बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट संबंधित मंत्रालय को ये निर्देश दे कि वह पारदर्शी और उचित विचार-विमर्श कराए और अधिसूचना का आठवीं अनुसूची में दी गईं सभी भाषाओं में अनुवाद कराए. इसके अलावा इसे केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य के पर्यावरण मंत्रालय के वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाए.

इस पर पीठ ने शुक्रवार को केंद्र से कहा कि वह सुनवाई की अगली तारीख को स्पष्ट करे कि आपत्ति या सलाह देने की अंतिम तिथि क्या होगी?

याचिका में आग्रह किया गया है कि मसौदा अधिसूचना के बारे में जनता की राय जानने की अवधि 30 सितंबर या कोविड-19 लॉकडाउन जारी रहने तक बढ़ाई जानी चाहिए. इसमें दावा गया है कि ईआईए अधिसूचना 2020 ने मौजूदा पर्यावरण नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है.

याचिका में कहा गया है, ‘मसौदा अधिसूचना में कुछ मामलों में जनता की राय को पूरी तरह नजरअंदाज करने, जनता की राय मांगने की अवधि 45 दिन से घटाकर 40 दिन करने और परियोजनाओं के लिए काम शुरू होने के बाद मंजूरी देने सहित मौजूदा नियमों में बदलाव करने जैसे कदम प्रस्तावित हैं.’

द वायर  ने अपनी पिछली रिपोर्ट में बताया था कि कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने इस अधिसूचना पर लोगों की आपत्तियां या सुझाव प्राप्त करने के लिए 10 अगस्त, 2020 की तारीख निर्धारित करने की मांग की थी.

इसके बावजूद केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एकतरफा फैसला लेते हुए इसे घटाकर 30 जून, 2020 कर दिया. केंद्रीय मंत्री ने इसके लिए कोई कारण नहीं बताया कि वे किस आधार पर ऐसा फैसला ले रहे हैं.


ये भी पढ़ें: नए पर्यावरण क़ानून पर जनता से राय लेने की समयसीमा बढ़ाने के मांग जावड़ेकर ने ख़ारिज कर दी थी


आरटीआई के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि मंत्रालय को सैकड़ों की संख्या में ऐसे पत्र प्राप्त हुए थे जिसमें ये मांग की गई थी कि कोरोना महामारी के दौरान लोगों की मुश्किलों और इस अधिसूचना से व्यापक स्तर पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जनता द्वारा जवाब सौंपने की समयसीमा बढ़ाई जाए.

इसके अलावा ईआईए अधिसूचना के संबंध में सौंपी गईं ज्यादातर टिप्पणियों में लोगों ने मांग की है कि पर्यावरण की बेहतरी के लिए सरकार जल्द से जल्द इस अधिसूचना को वापस ले.

उन्होंने कहा है कि यह पर्यावरण को व्यापक स्तर पर नुकसान पहुंचाने वाली अधिसूचना है और सरकार को कोविड-19 महामारी का फायदा उठाकर इस तरह के नियम नहीं बनाने चाहिए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)