पुलिस पर विकास दुबे के हमले की जड़ें अपराध की राजनीतिक जुगलबंदी से जुड़ी हैं

कुख्यात अपराधी विकास दुबे को पकड़ने गए पुलिसकर्मियों की बर्बर हत्या को एक अपराधी के दुस्साहस और पुलिस की रणनीति में कमी तक सीमित करना अपराध-राजनीति के गठजोड़ की अनदेखी करना है. बिना राजनीतिक संरक्षण के किसी अपराधी में इतनी हिम्मत नहीं आ सकती कि वह पुलिस टीम को घेरकर मार डाले और आराम से फ़रार हो जाए.

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जुलाई 2020 में कानपुर के बिकरू गांव में पुलिसकर्मियों पर हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के हमले के बाद वहां जांच के लिए पहुंचे पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

कुख्यात अपराधी विकास दुबे को पकड़ने गए पुलिसकर्मियों की बर्बर हत्या को एक अपराधी के दुस्साहस और पुलिस की रणनीति में कमी तक सीमित करना अपराध-राजनीति के गठजोड़ की अनदेखी करना है. बिना राजनीतिक संरक्षण के किसी अपराधी में इतनी हिम्मत नहीं आ सकती कि वह पुलिस टीम को घेरकर मार डाले और आराम से फ़रार हो जाए.

कानपुर के दिकरू गांव में पुलिसकर्मियों पर हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के हमले के बाद वहां जांच के लिए पहुंचे पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)
कानपुर के बिकरू गांव में पुलिसकर्मियों पर हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे के हमले के बाद वहां जांच के लिए पहुंचे पुलिसकर्मी. (फोटो: पीटीआई)

साल 1995 की बात है, मैं प्रशिक्षु पत्रकार के बतौर एक अखबार के ब्यूरो ऑफिस से जुड़ा था. एक रोज़ सुबह के समय एक बाइक एजेंसी से फोन आया कि उनके यहां दो युवक आए हैं और आधा दाम देकर जबरन बाइक लेकर जा रहे हैं.

एजेंसी मालिक चाहते थे कि अखबार अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए दोनों युवकों को रोके. एक वरिष्ठ पत्रकार ने फोन पर बातचीत कर दोनों युवकों को ऐसा न करने को कहा.

कुछ देर बाद दोनों युवक अखबार के दफ्तर में ही आ धमके. दोनों का कहना था कि वे छात्र नेता हैं. बाइक के कम पैसे देकर कोई कसूर नहीं कर रहे हैं. बड़े-बड़े लोगों के फोन आने पर ये सेठ लोग फ्री में ही बाइक दे देते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार के समझाने के बावजूद उन दोनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा. उल्टे वे यह धमकी देते हुए चले गए कि एजेंसी मालिक और अखबार को जो करना हो कर ले.

दोनों में से एक गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके थे. दूसरे बाद में कुख्यात माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ल के गिरोह के प्रमुख सदस्य के रूप में जाने गए.

फिर वे बिहार में एक विधानसभा क्षेत्र से ‘माननीय विधायक’ हो गए. वर्ष 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में उन्होंने पूर्वांचल में अपनी जमीन ढूंढने की कोशिश की. वे बसपा में शामिल हो गए.

लोकसभा चुनाव के वक्त वे बिहार में सांसद का टिकट मांग रहे थे. नहीं मिलने पर यूपी में भाजपा में शामिल हो गए. उनकी भाजपा में एंट्री एक कैबिनेट मंत्री की उपस्थिति में हुई.

भाजपा में शामिल होने पर उनकी काफी चर्चा हुई. यह खबरें भी मीडिया में आई कि उनके भाजपा में शामिल होने से मुख्यमंत्री नाराज हुए हैं.

कानपुर के बिकरू गांव में कुख्यात अपराधी विकास दुबे को पकड़ने गए आठ पुलिसकर्मियों की बर्बर हत्या को सिर्फ एक अपराधी के दुस्साहस, पुलिस में भेदिये की मौजूदगी और छापा डालने गई पुलिस टीम की रणनीति में कमी तक सीमित करना एक बार फिर से उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में लंबे समय से चली आ रही अपराध-राजनीति के गठजोड़ की जमीन की अनदेखी करना है.

बिना राजनीतिक संरक्षण के किसी भी अपराधी में इतनी हिम्मत नहीं आ सकती कि वह पुलिस टीम को घेरकर मार डाले और आराम से फरार हो जाए.

ज्यादा समय नहीं हुए उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने की सुपारी कुख्यात डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला ने ली थी.

माफिया डॉन श्रीप्रकाश के अपराधों और उसके अंत की कहानी एसटीएफ के तत्कालीन प्रमुख, दिल्ली के पुलिस कमिश्नर और सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रह चुके अजय राज शर्मा की किताब ‘ बाइटिंग द बुलेट्स-मेमाएर्स आफ अ पुलिस ऑफिसर ‘ में दर्ज है.

श्रीप्रकाश के मारे जाने की घोषणा विधानसभा में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने खुद की थी. श्रीप्रकाश पर एक फिल्म भी बन चुकी है और  पहले ‘रंगबाज’ नाम से एक वेब सीरीज भी आई है.

श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे दूसरे डॉन और गैंगस्टर आजकल वेब सीरीज के पसंदीदा किरदार बने हुए हैं. कुछ अतिरंजित ही सही, लेकिन ‘रक्तांचल,’ मिर्जापुर,’ ‘भौकाल’ आदि में माफियाओं और गैंगस्टर की कहानी के साथ उनके राजनीति-पुलिस से गहरे गठजोड़ को भी देखा जा सकता है.

बिकरू गांव में डिप्टी एसपी सहित आठ पुलिसकर्मियों को मार डालने की घटना के बाद विकास दुबे की क्राइम हिस्ट्री और उसकी राजनीतिक पहुंच के बूते पुलिस के शिकंजे से बार-बार बच जाने की खबरें अब विस्तार से मीडिया में आ रही हैं.

विकास दुबे के विवरणों से अखबार भरे पड़े हैं. इनमें बताया गया है कि उसके ऊपर 60 से अधिक मुकदमे दर्ज थे. उसने थाने में घुसकर दर्जा प्राप्त मंत्री संतोष शुक्ल की हत्या कर दी थी और इस मामले में उसके खिलाफ गवाही देने के लिए पुलिस वाले तक तैयार नहीं हुए.

एक तरफ वह अपराध पर अपराध करता रहा, तो दूसरी तरफ राजनीति की सीढ़ियांं भी चढ़ता रहा. गांव में वर्षों तक खुद या परिवार के लोग प्रधान चुने गए. पत्नी जिला पंचायत सदस्य बनीं.

इस दौरान उसके भाजपा, बसपा से लेकर हर दल में अच्छे संबंध बने रहे. बसपा राज में वह काफी फला-फूला. वह कानपुर जिले की राजनीति का अहम हिस्सा था. अब उसकी महत्वाकांक्षा विधायक बनने की थी.

ज्यादा संभावनाएं हैं कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस क्षेत्र में हो रही गोलबंदी का नतीजा मुठभेड़ के रूप में सामने आया और आठ पुलिसकर्मियों को जान गंवानी पड़ी.

पत्रकार प्रांशु मिश्रा ने ट्विटर पर विकास दुबे पर वर्ष 2001 में लिखी एक रिपोर्ट साझा की है, जिसमें विस्तार से बताया गया है कि कैसे उसे विधायकों, सांसदों, मंत्रियों की सरपरस्ती मिलती रही है.

उन्होंने लिखा है कि 1990 में अपराध की दुनिया में कदम रखने के बाद शुरू के दिनों में पिछड़ी जाति के नेताओं को दबाने के लिए उसका इस्तेमाल किया गया.

छोटे-मोटे अपराध से ‘बाहुबली’ और फिर ‘माननीय’ 

विकास दुबे जिस तरह अपराध के जरिये क्षेत्र में अपना दबदबा और दौलत बनाने के साथ-साथ राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने में लगा था, उसी रास्ते यूपी में तमाम मशहूर नाम आगे बढ़े हैं और प्रदेश-देश के जनता के सदन में पहुंचते रहे हैं.

इनमें से कई के अतीत के रिकॉर्ड पूरी तरह मिट चुके हैं और अब वे ‘बेहद सम्मानित’ जीवन जी रहे हैं. अगर पूर्वांचल के पिछले तीन दशक का राजनीतिक इतिहास लिखा जाएगा, तो उसका अधिकांश भाग बाहुबलियों और गैंगस्टरों की भूमिका पर होगा.

गोरखपुर से लेकर मऊ, गाजीपुर, जौनपुर, वाराणसी, इलाहाबाद से और आगे तक यह रास्ता होते हुए धनबाद और मुंबई तक पहुंच जाता है.

गोरखपुर से सटे बिहार के इलाकों सीवान, गोपालगंज में भी छोटे-मोटे अपराध से ‘बाहुबली’ और फिर ‘माननीय’ बनने की कहानियां अभी भी विस्तार पा रही हैं.

लगभग एक महीने पहले मई के आखिरी हफ्ते में बिहार के गोपालगंज जिले में हथुआ थाना क्षेत्र के रूपनचक गांव में एक ही घर के तीन सदस्यों को गोली मारकर हत्या कर दी गई. एक व्यक्ति घायल हुआ.

इस घटना में गोपालगंज जिले की राजनीति पर दशकों से दबदबा बनाए सतीश पांडेय परिवार पर आरोप लगे. जनता दल यूनाइटेड (जदयू) विधायक अमरेंद्र पांडेय, उनके भाई सतीश पांडेय, भतीजे जिला परिषद अध्यक्ष मुकेश पांडेय के खिलाफ एफआईआर हुई.

मुकेश और सतीश गिरफ्तार भी हुए. जदयू विधायक को गिरफ्तार किए जाने की मांग को लेकर पटना में राजद ने जोरदार प्रदर्शन कियाथा .

इससे पूर्व एक और घटना हुई जिसको पर्याप्त तवज्जो नहीं मिली. जौनपुर में नमामि गंगे परियोजना के प्रोजेक्ट मैनेजर ने 10 मई को बाहुबली नेता और पूर्व सांसद धनंजय सिंह पर अपहरण व रंगदारी की एफआईआर दर्ज कराई.

धनजंय सिंह को गिरफ्तार किया गया लेकिन अदालत में पहली पेशी के पहले ही प्रोजेक्ट मैनेजर ने अपना आरोप वापस ले लिया.

प्रोजेक्ट मैनेजर ने कहा कि उन्होंने मानसिक तनाव में यह कदम उठा लिया, ऐसी कोई घटना नहीं हुई. वह भविष्य में कोई भी केस धनजंय सिंह के खिलाफ नहीं लड़ना चाहते.

प्रोजेक्ट मैनेजर कैसे ‘मानसिक तनाव’ में आए होंगे, यह कोई भी समझ सकता है. धनंजय सिंह दो बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं.

जब वह जौनपुर के सांसद चुने गए थे तब उन पर हत्या सहित दो मामले दर्ज थे. यह संख्या बाद में बढ़ती ही गई है.

प्रेम प्रकाश उर्फ़ मुन्ना बजरंगी (फाइल फोटो साभार: ट्विटर)
प्रेम प्रकाश उर्फ़ मुन्ना बजरंगी (फाइल फोटो साभार: ट्विटर)

दो वर्ष पहले 9 जुलाई 2018 को कुख्यात गैंगस्टर मुन्ना बजरंगी की बागपत जेल में ही हत्या कर दी गई. मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह की याचिका पर हाईकोर्ट ने इसी वर्ष फरवरी में इस घटना की सीबीआई जांच का आदेश दिया.

सीबीआई जांच शुरू भी हो गई है. मुन्ना बजरंगी को बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी का करीबी माना जाता था. उसने गाजीपुर के भाजपा विधायक कृष्णानंद राय सहित छह लोगों की वर्ष 2005 में हत्या कर दी थी. इस घटना में एके 47 से सैकड़ों राउंड फायरिंग की गई थी.

मुन्ना बजरंगी दो दशक तक अपराध की दुनिया में रहा और उस पर हत्या के दर्जनों केस थे. वह अक्टूबर 2009 में गिरफ्तार हुआ था. गिरफ्तारी के बाद वह राजनीति में आने की जुगत कर रहा था, लेकिन उसका सपना अधूरा रह गया.

उसकी हत्या के मामले में खेकड़ा थाने में गैंगस्टर सुनील राठी के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था. हालांकि मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह ने जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह, रिटायर्ड डिप्टी एसपी जेएम सिंह, प्रदीप उर्फ पीके (बेटा जेएम सिंह), महराज सिंह व विकास उर्फ राजा पर अपने पति की हत्या की साजिश का आरोप लगाते हुए बागपत पुलिस से शिकायत की थी.

पुलिस ने सुनील राठी के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी और अन्य आरोपियों को क्लीन चिट दे दिया.

माफिया डॉन बृजेश सिंह जेल में रहते हुए एमएलसी हैं और उनके भतीजे सुशील सिंह चंदौली जिले के सैयद रजा सीट से भाजपा के विधायक हैं.

सिंह के ऊपर मुंबई और भुवनेश्वर तक मुकदमा दर्ज है. एमएलसी चुने जाने वक्त दिए गए हलफनामे के अनुसार बृजेश सिंह पर हत्या, हत्या के प्रयास, फिरौती वसूलने जैसे गंभीर मामलों के 11 केस चल रहे हैं.

भाजपा विधायक सुशील सिंह पर हत्या, फिरौती आदि के पांच केस हैं. बृजेश सिंह की मऊ के विधायक मुख्तार अंसारी के बीच गैंगवार का लंबा इतिहास है और दोनों समूहों की ओर से कई हत्याकांड अंजाम दिए गए हैं.

मुख्तार अंसारी के खिलाफ उनके द्वारा दिए गए हलफनामे के अनुसार 16 गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. मुख्तार अंसारी चार बार से मऊ से विधायक हैं.

उनके भाई अफजाल अंसारी पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में गाजीपुर से सांसद चुने गए. वह पहले भी एक बार सांसद रह चुके हैं. मुख्तार के बेटे भी अब राजनीति में आ चुके हैं.

राजनीति और अपराध के जोड़ की कहां से हुई थी शुरुआत

राजनीति के अपराधीकरण की प्रक्रिया 80 के दशक से शुरू हुई. पूर्वांचल में गोरखपुर इसका केंद्र बना. गोरखपुर में विश्वविद्यालय की स्थापना के समय ब्राह्मण और ठाकुर वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई.

इस लड़ाई में छात्र नेताओं को मोहरा बनाया गया और कुछ समय बाद ही वर्चस्व की यह लड़ाई खूनी संघर्ष में बदल गई. एक के बाद एक हत्याएं होने लगी.

जनता पार्टी के विधायक और गोरखपुर विश्वविद्यालय व लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके रवींद्र सिंह की गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर 30 अगस्त 1979 को गोली मारकर हत्या कर दी गई.

कुछ समय बाद इस हत्या के प्रतिशोध में छात्र नेता रंग नारायण पांडेय की हत्या हुई. यह सिलसिला काफी आगे बढ़ता गया.

इसके बाद गोरखपुर में दो ध्रुव बन गए. हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही. पुलिस की फाइलों में इनके खिलाफ गंभीर केस थे लेकिन मीडिया में इन्हें और रूप में जाना जाता था.

अखबारों में पंडित हरिशंकर तिवारी को ‘प्रख्यात नेता’ और वीरेंद्र प्रताप शाही को ‘शेरे पूर्वांचल’ लिखा जाता था. दोनों की विज्ञप्तियां स्केल से नापकर सेम साइज में छापी जातीं.

वीरेंद्र प्रताप शाही और हरिशंकर तिवारी का जब काफिला निकलता तो गाड़ियां गिनी जातीं कि किसके काफिले में अधिक गाड़ियां थीं.

200-300 वाहनों का काफिला आम बात थी. वाहनों में से बंदूकों का नाल झांकती दिखाई देतीं. दोनों के प्रति युवाओं में जबरदस्त क्रेज था. विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले युवा बंदूक के साथ इन दोनों के वाहनों के काफिलों में बैठने में गर्व महसूस करते.

यही दौर था जब गोरखपुर को ‘दूसरा शिकागो’ कहा गया. फिर वीरेंद्र प्रताप शाही और हरिशंकर तिवारी राजनीति में आए. तिवारी छह बार विधायक और कई बार मंत्री बने. वीरेंद्र प्रताप शाही दो बार महराजगंज के लक्ष्मीपुर (अब नौतनवां) से विधायक बने.

उन्होंने जेल में रहते हुए महराजगंज लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था. आज इस विधानसभा का प्रतिनिधित्व अमनमणि त्रिपाठी करते हैं, जिनके खिलाफ अपनी पत्नी की हत्या का केस चल रहा है.

उनके पिता अमरमणि त्रिपाठी इस विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और बसपा सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. इस समय वह जेल में हैं. उन्हें कवयित्री मधुमिता शुक्ल की हत्या में आजीवन कारवास की सजा हुई है.

‘बीमार’ होने के कारण उनका अधिकतर समय बीआरडी मेडिकल कॉलेज में गुजरता है. किसी की भी सत्ता रही हो, त्रिपाठी परिवार का रुतबा कम नहीं हुआ.

जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे तो एक दफा बीआरडी मेडिकल कॉलेज में उनका कार्यक्रम था. कार्यक्रम की समाप्ति के बाद अचानक उनका वाहन मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट वार्ड की तरफ मुड़ गया जहां अमरमणि त्रिपाठी भर्ती थे. उन्होंने उनसे ‘संक्षिप्त मुलाकात’ की.

विधायक बनने के बाद अमनमणि त्रिपाठी कई बार मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में नजर आए. उनका कितना प्रभाव है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपर मुख्य सचिव स्तर से लॉकडाउन में भी बद्रीनाथ जाने के लिए उन्हें तीन वाहनों का पास जारी हो गया.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 403 विधायकों में से 47 फीसदी यानी 189 विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज हैं. हर चुनाव में यह संख्या बढ़ती ही रही है.

इलाहाबाद के माफिया अतीक अहमद जेल में हैं. जेल में रहते हुए उन्होंने 2018 का लोकसभा उपचुनाव फूलपुर से लड़ा, उनके चुनाव लड़ने को लेकर काफी चर्चा थी कि उन्हें भाजपा प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव लड़वाया जा रहा है.

हालांकि वे चुनाव हार गए और भाजपा भी चुनाव हार गई. देवरिया जेल में रहते हुए उन्होंने लखनऊ के एक बिजनेसमैन को उठवाकर सीधे जेल में बुलवा लिया और पीटते हुए उसकी जमीन लिखवा ली. इस मामले में केस दर्ज हुआ.

अभी उनको देवरिया जेल से दूसरे जेल में शिफ्ट कर दिया गया है. कानपुर के बिकरू गांव की घटना के बाद उनके भाई पूर्व विधायक अशरफ को गिरफ्तार किया गया है.

उन पर एक लाख रुपये का इनाम रखा गया था. अशरफ पर विधायक राजू पाल की हत्या सहित कई संगीन अपराध दर्ज हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो : पीटीआई)
(प्रतीकात्मक फोटो : पीटीआई)

‘रंगबाजी’ से राजनीति तक का सफर

ऐसे तमाम नाम हैं जो वक्त-बेवक्त मीडिया की सुखियों में आते हैं. इनका अपने-अपने इलाके में समानांतर सत्ता है. किसी भी दल की सरकार हो, ये जेल में रहें या बाहर, उनका ‘धंधा’ बदस्तूर जारी रहता है.

पूर्वांचल हो या पश्चिम हर जिले-इलाके में ऐसे बाहुबलियों के दास्तान दर्ज हैं. अधिकतर का सफर वैसे ही शुरू हुआ था जैसे कि विकास दुबे का.

छोटे-मोटे अपराध से शुरू हुआ सफर ठेके-पट्टे, कोयला-रेत के कारोबार, प्रॉपर्टी डीलिंग से होता हुआ पंचायत, विधानसभा, विधानपरिषद और लोकसभा तक पहुंचता है.

अब तो कॉलेज-अस्पताल बनाने या उस पर कब्जा करने का भी दौर चल रहा है कि क्योंकि यहां मोटा पैसा बन रहा है.

एक खास प्रक्रिया है जो किसी गांव-मोहल्ले में रंगबाजी से शुरू होकर ‘माननीय’ तक जाती है. शुरुआती दौर में मारपीट, दबंगई, मर्डर से ‘बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा ‘ के तर्ज पर इलाके में शोहरत होती है.

यह शोहरत उन्हें पहले से जमे-जमाए नेता या बाहुबलियों के नजदीक ले जाती है. फिर उन्हें राजनीति, पुलिस का संरक्षण मिलने लगता है. फिर ठेके-पट्टे, जमीन कब्जा का दौर शुरू होता है.

इस दौरान वर्चस्व की जंग में कभी-कभी आपस में टकराव भी होता है और खून-खराबा भी. इस बीच में कुछ मुकाम तक पहुंचाने के पहले गैंगवार या पुलिस मुठभेड़ के शिकार हो जाते हैं.

इस प्रक्रिया के ‘सफल अभ्यर्थी’ विधानसभा और लोकसभा में पहुंचकर ‘माननीय ’ हो जाते हैं. इन ‘सफल अभ्यर्थियों’ के पास अपने उत्पीड़न और उसके खिलाफ हथियार उठाने की कहानियां होती हैं.

यही कहानियां फिल्मों व वेब सीरीज में दर्ज होती है जिसे देखते हुए लगता है कि ‘नायक’ के सामने इस रास्ते को चुनने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.

इस ‘नायकत्व’ को स्थापित करने का काम हमेशा होता रहता है. वीरेंद्र प्रताप शाही अपनी गाड़ी में ‘खलनायक’ फिल्म का गाना ‘नायक नहीं खलनायक हूं मैं’ अक्सर सुनते थे.

वह कहते थे कि मैं भी इसी तरह का नायक हूं जिसे खलनायक बना दिया गया है. उन्होंने अपनी छवि निर्माण के लिए एक फिल्म भी बनवाई. फिल्म का नाम था, ‘करिश्मा किस्मत का.’

उन्होंने इसमें खुद अभिनय भी किया. इसमें वह एक दयालु जमींदार बने थे जो गरीबों, कमजोरों की मदद करता है. फिल्म देखने ज्यादा लोग नहीं आए, लेकिन सिनेमा हॉल को तब तक फिल्म चलानी पड़ी जब तक वीरेंद्र प्रताप शाही का ‘आदेश’ रहा.

‘अपराध का राजनीतिकरण’ और ‘राजनीति का अपराधीकरण’

गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र संघ भवन पर पूर्व विधायक रवींद्र सिंह और छात्र नेता रंग नारायण पांडेय की मूर्ति लगी हुई है. दोनों की हत्या हुई थी.

एक की प्रतिमा लगी तो दूसरे को लगाने के लिए बाकायदा आंदोलन शुरू हो गया और विश्वविद्यालय ही नहीं शहर तक अशांत हो गया. आखिरकार दूसरी मूर्ति भी लगी.

अपराध की राजनीतिकरण के ये ‘ सफल अभ्यर्थी’ अपनी-अपनी जातियों के हीरो भी हैं. सबसे पहले उन्हें अपने जातीय समाज का ही समर्थन मिलता है.

यह समर्थन ही उनकी राजनीतिक ताकत बनती है. फिर वे अपने इलाके, जिले और प्रदेश की राजनीति के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हो जाते हैं.

राजनीतिक दल इनका इस्तेमाल करते हैं और वे राजनीति का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने में करते हैं. इस तरह ‘अपराध का राजनीतिकरण’ और ‘राजनीति का अपराधीकरण’ की प्रक्रिया एक साथ चलती रहती है.

याद करिए जब से राजनीति में लोकतांत्रिक आंदोलनों को सायास कमजोर करने की कोशिशें शुरू हुईं, राजनीति में इस तरह के तत्वों का उभार भी शुरू हुआ.

आज भी लोकतांत्रिक आंदोलनों, जन आंदोलनों की सत्ता द्वारा जिस तरह घोर उपेक्षा की जाती है, उसका कठोर दमन किया जाता है, उससे राजनीति के अपराधीकरण को ही बढ़ावा मिलता है.

जन समस्याओं और क्षेत्र की वास्तविक प्रगति के लेकर लोकतांत्रिक ढंग से संघर्ष करने वाले नेताओं, जन प्रतिनिधियों के प्रति राजनीतिक दलों का व्यवहार रूखा ही नहीं होता, बल्कि वे उसे कुचलने का भी प्रयास करते हैं.

सत्ता मिलने पर पुलिस के दम पर ऐसी आवाजों को कुचला जाता है, उत्पीड़ित किया जाता है. ऐसी आवाजों को अपराधी और गैंगस्टर भी दबाते हैं और उन्हें इसके लिए सत्ता का संरक्षण मिलता है.

एक तरफ सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक नेताओं के साथ अपराधियों की तरह व्यवहार होता है तो विकास दुबे जैसे अपराधियों के साथ अत्यधिक मृदुलता का व्यवहार होता है.

साल 2013 में सपा राज में प्रतापगढ़ में डिप्टी एसपी जिया उल हक की हत्या कर दी गई. वर्ष 2016 में मथुरा में जवाहरबाग में हुई हिंसा में अपर पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी और एसओ संतोष कुमार यादव को मार डाला गया.

योगी राज में अपराधियों के दूसरे प्रदेश में भगा दिए जाने के दावे के दौर में ही जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या हुई.

बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या हुई. और तो और इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या के आरोपियों का जेल से छूटने पर ‘सेलिब्रेशन’ हुआ.

आज हालात यह है कि हर दल के ‘अपने-अपने बाहुबली, दबंग व डॉन’ हैं. सब राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ बोलते हैं लेकिन इस पर अमल कोई नहीं करता.

प्रधानमंत्री बनने के पूर्व नरेंद्र मोदी ने जनसभाओं में कहा था कि ‘मैंने भारतीय राजनीति को साफ करने का फैसला कर लिया है. मैं इस बात को लेकर आशांवित हूं कि हमारे शासन के पांच सालों बाद पूरी व्यवस्था साफ-सुथरी हो जाएगी और सभी अपराधी जेल में होंगे. मैं वादा करता हूं कि इसमें कोई भेदभाव नहीं होगा और मैं अपनी पार्टी के दोषियों को भी सजा दिलाने से नहीं हिचकूंगा.’

छह वर्ष बाद आज इस वादे और घोषणा की क्या हकीकत है, दो जुलाई की रात बिकरू गांव में दिख गई.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)

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