दिल्ली दंगा: दोहरे मानदंडों और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की कहानी

दिल्ली हिंसा से जुड़े मामलों में दिल्ली पुलिस के पक्षपाती रवैये को लेकर लगातार उंगलियां उठीं. इस धारणा को इसलिए भी बल मिला क्योंकि पुलिस ने गिरफ़्तार किए गए लोगों के बारे में अधिक जानकारी सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया.

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(फोटो: रॉयटर्स)

दिल्ली हिंसा से जुड़े मामलों में दिल्ली पुलिस के पक्षपाती रवैये को लेकर लगातार उंगलियां उठीं. इस धारणा को इसलिए भी बल मिला क्योंकि पुलिस ने गिरफ़्तार किए गए लोगों के बारे में अधिक जानकारी सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया.

(फोटो: रॉयटर्स)
(फोटो: रॉयटर्स)

(यह लेख फरवरी, 2020 में हुई दिल्ली हिंसा पर लिखी गई पांच लेखों की एक श्रृंखला का चौथा भाग है. पहला और दूसरा और तीसरा भाग यहां पढ़ सकते हैं.) 

पिछले कुछ महीनों के दौरान पुलिस ने कई सीएए-विरोधी कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया है.

जिन प्राथमिकियों के आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया है, उनमें इस बात का कोई सबूत तो क्या कोई ठोस वक्तव्य भी नहीं है कि उनमें से किसी ने एक भी हिंसक कार्य किया है.

इसलिए यह शक पैदा होना लाजिमी है कि सिर्फ एक भिन्न नजरिया रखने और उसकी अभिव्यक्ति करने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है और उन पर आरोप मढ़े जा रहे हैं.

निस्संदेह, जैसा कि पीटीआई की खबर में कहा गया, दिल्ली पुलिस का दावा है कि उन्हें ‘फरवरी में कथित तौर पर सांप्रदायिक दंगे भड़काने की साजिश रचने के कारण गिरफ्तार किया गया है.’

इन आरोपों को मजबूती देने के लिए, ‘इन विद्यार्थियों पर राष्ट्रद्रोह, हत्या, हत्या की कोशिश, मजहब के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच रंजिश को बढ़ावा देने के अपराध के लिए भी मामला दर्ज किया गया है.’

गिरफ्तार किए जाने वालों में दिल्ली के केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया की 27 वर्षीय रिसर्च स्कॉलर सफूरा ज़रगर भी थीं. जैसा पुरस्कार प्राप्त फिल्म निर्देशक बेदब्रतो पैन ने कहा था,

‘सफूरा को इसलिए गिरफ्तार नहीं किया गया कि वह हिंसा के किसी कृत्य में शामिल थी या उसके पास से कोई हथियार या गोला-बारूद बरामद हुआ है, या उसका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड है. नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है.

उसे दमनकारी यूएपीए के तहत गिरफ्तार करके जेल की सलाखों के पीछे सिर्फ इसलिए डाल दिया गया क्योंकि वह सीएए की मुखर आलोचक थीं और उन्होंने इस कानून का शांतिपूर्वक विरोध करने के लिए- जो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है- औरों के भी एकजुट किया था.

दूसरे शब्दों में सफूरा को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उसने असहमति जाहिर करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया.

दिल्ली पुलिस द्वारा गढ़ी गई कहानी के मुताबिक भी, उनके खिलाफ एकमात्र ठोस आरोप यह है कि धरने के दौरान कथित तौर पर उन्होंने सड़क को बंद करने में मदद की. बस इतना ही.

लेकिन चूंकि पुलिस ने धरनों को- जिनमें कोई हिंसा नहीं हुई- स्थान और समय में मुख्तलिफ़ घटनाओं से, जिनमें उसकी (सफूरा की) की कोई भूमिका नहीं थी, से जोड़ दिया है और यह दावा किया है कि ये सब दिल्ली में दंगे कराने की बड़ी साजिश का हिस्सा थे….’

इस संबंध में ट्रायल कोर्ट द्वारा सफूरा की जमानत याचिका खारिज किए जाने पर कानूनविद् गौतम भाटिया द्वारा सफूरा के मामले में की गई टिप्पणियां काफी प्रासंगिक हैं.

कोर्ट ने इन काव्यात्मक शब्दों के साथ सफूरा की जमानत याचिका को खारिज कर दिया था, ‘जब आप अंगारे से खेलने का चुनाव करते हैं, तो आप हवाओं को चिंगारी उड़ाकर दूर ले जाने और आग भड़काने का कसूरवार नहीं ठहरा सकते.’

हालांकि पुलिस ने ज़रगर द्वारा ऐसा कोई कृत्य करने या हिंसा को भड़काने वाला कोई भाषण देने का कोई सबूत नहीं पेश किया था, फिर भी जज ने यह फैसला दिया कि सह-साजिशकर्ताओं के कृत्य और भड़काऊ भाषण आरोपी के खिलाफ भी स्वीकार्य हैं, क्योंकि एक साजिश रची गई थी.

लेकिन जैसा कि भाटिया लिखते हैं, ‘यह अस्पष्ट है कि ये ‘कृत्य’ क्या हैं, क्योंकि फैसले मे कहीं भी इसका जिक्र नहीं है; यह भी साफ नहीं है कि ‘भड़काऊ भाषण’ कौन से थे, क्योंकि फैसले मे इस बारे में भी कोई जिक्र नहीं है.

संक्षेप में कहें तो, ‘कानून को एक तरफ से ताना गया है और तथ्यों को दूसरी तरफ से और उन्हें बीच में मिलाकर यूएपीए का एक पहली नजर का मामला बना दिया गया है. इस पहली नजर के मामले का इस्तेमाल राष्ट्रव्यापी महामारी के दौर में एक गर्भवती स्त्री को एक भीड़-भरे जेल में रखने के लिए किया गया. यह भारत के न्यायतंत्र के बारे में क्या बताता है, इसका फैसला पाठकों पर छोड़ देना ही बेहतर है.’

यह सीएए विरोधी आंदोलनकारियों के खिलाफ मामले बनाने की बस एक मिसाल है. शुक्र है कि दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस राजीव शंकघर ने 23 जून को सफूरा को जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया.

जिस मनमाने तरीके से सामाजिक कार्यकर्ताओं- हर्ष मंदर, डीएस बिंद्रा और डॉ. एमए अनवर का नाम दंगों में कथित तौर पर मदद करने और उन्हें भड़काने वाली चार्जशीट में आ गया है, वह इसका दूसरा उदाहरण है.

हिरासत में लिए गए अन्य लोगों का भविष्य

हिंसा के बाद चर्चित मामलों के अलावा भी कई लोगों को, जिनमें से ज्यादातर लोगों को बगैर किसी आरोप के ही, हिरासत में लिया गया.

इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, ‘पिछले महीने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के सिलसिले में शनिवार [14 मार्च, 2020] को अधिकारियों ने बताया कि पुलिस ने 600 से ज्यादा मामले दर्ज किए हैं और 3,400 लोगों को गिरफ्तार किया है या हिरासत में लिया है.’

लेकिन आज तक गिरफ्तार किए गए या हिरासत में लिए गए लोगों के नामों को सार्वजनिक नहीं किया गया है. हालांकि गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए लोगों के ब्यौरे सार्वजनिक करना संबंधित परिवारों के लिए जरूरी है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा पिछले तीन महीने से इस मसले को लगातार उठाया जा रहा है. वास्तव में, 01 मार्च,2020 को ही उन्होंने इस मसले को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के संज्ञान में लाया था.

‘मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने रविवार को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर राष्ट्रीय राजधानी में हुई हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए लोगों के नाम और पते कानून के तहत प्रकाशित करने की मांग की.’

नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट फॉर इंफॉर्मेशन की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज, एडवोकेट प्रशांत भूषण, सीपीआई नेता एनी राजा और अमृता जौहरी जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा अन्यों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया कि सीआरपीसी की धारा 41 सी के अनुसार सभी जिलों में पुलिस कंट्रोल रूम की स्थापना करना अनिवार्य है और धारा 41-सी(2) में गिरफ्तार किए गए सभी लोगों के नाम और पते को कंट्रोल रूम के बाहर नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया है.’

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे को 150 दिनों से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन पुलिस द्वारा गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 3,400 लोगों के नाम जिला कंट्रोल रूमों के बाहर नहीं लगाए गए हैं, जो सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता),1973 की संबंधित धाराओं के पूरी तरह से खिलाफ है.

वास्तव में सीआरपीसी की धारा 41-सी(3) के अनुसारः

‘पुलिस मुख्यालयों में स्थित कंट्रोल रूम समय-समय पर गिरफ्तार किए गए लोगों के ब्यौरे, उनके अपराध की प्रकृति, जिसके तहत उन पर आरोप लगाया गया है, को इकट्ठा करना होगा और वे आम लोगों की सूचना के लिए एक डेटाबेस का रखरखाव करेंगे.’

दिल्ली पुलिस लोगों से बेहद जरूरी जानकारी छिपा रही है और इसने द वायर  की आरटीआई अर्जियों को खारिज कर दिया है, जो कि महकमे में आरटीआई याचिका प्रक्रिया के प्रमुख एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के फैसले के पूरी तरह से खिलाफ है.

आम लोगों को यह जानने का अधिकार है कि गिरफ्तार किए गए या हिरासत में लिए गए लोग कौन हैं? परिवारों को यह पता कैसे चलेगा कि उनके गुमशुदा सदस्य मर गए हैं या जिंदा हैं?

हिरासत में लिए गए लोगों को कानूनी बचाव का अधिकार है और जब उनके परिवारों को इस बात की जानकारी ही नहीं होगी कि उनके परिवार का कोई व्यक्ति हिरासत में है या नहीं है, तब तक वे कानूनी बचाव का इंतजाम कैसे करेंगे?

उस स्थिति में क्या होगा जब हिरासत में लिए गए कई लोग वास्तव में पीड़ित और/या चश्मदीद गवाह हों और असली अपराधी खुला घूम रहा हो.

इसके साथ ही मुकदमे/हिरासत के दौरान जेल में बंद लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए सार्वजनिक जवाबदेही होनी चाहिए.

दिल्ली पुलिस का दावा

इस संबंध में दिल्ली पुलिस द्वारा द हिंदू अखबार में प्रकाशित पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) की रिपोर्ट के जवाब में 6 मई, 2020 को अख़बार को लिखे गए संपादक के नाम पत्र का हवाला दिया जा सकता है.

दिल्ली पुलिस पीयूडीआर द्वारा अपनी रिपोर्ट में उठाए गए कुछ मसलों की आलोचना करने में सही थी. लेकिन पीयूडीआर ने कुछ वैध सवाल उठाए हैं, जिनका संतोषजनक जवाब देने में दिल्ली पुलिस नाकाम रही है.

पुलिस के मुताबिक,

‘खुद रिपोर्ट में ही इस बात को माना गया है कि पीयूडीआर ने दंगों के दौरान दर्ज की गई प्राथमिकियों में से सिर्फ ‘कुछ’ प्राथमिकियों, वास्तव में सिर्फ 6 प्रतिशत, को ही देखा है. इन प्राथमिकियों चयन करने का पैमाना क्या है यह स्पष्ट नहीं है. यह जानबूझकर किया गया है. हम निष्कर्ष निकालने का काम पाठकों के हवाले छोड़ सकते हैं.’

निश्चित तौर पर यह अच्छी सलाह है- ‘निष्कर्ष निकालने का काम पाठकों पर छोड़ना’- कि आखिर पीयूडीआर और दिल्ली पुलिस में से कौन सही तथ्य रख रहा है.

लेकिन यह काम सुविचारित तरीके से करने के लिए पाठकों को यह जानने की जरूरत होगी कि 750से ज्यादा प्राथमिकियों (जैसा दिल्ली पुलिस ने अपने पत्र में लिखा है) में से कितनी को दिल्ली पुलिस ने सार्वजनिक किया है ताकि उनकी जांच प्रामाणिक स्रोतों से की जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्या पीयूडीआर द्वारा लोगों को जानबूझकर गुमराह किया जा रहा है.

अगर पुलिस ऐसा करती है, तो लोगों को एफआईआर की विषय वस्तु को लेकर पक्के तथ्यों तक पहुंचने का मौका मिलेगा- कि क्या यह किसी एक या दूसरे समुदाय के खिलाफ पूर्वाग्रह को दिखाता है.

लेकिन, पुलिस ने जिस तरह से पीयूडीआर द्वारा उठाए गए मसले को खारिज कर दिया वह निराशाजनक है. दिल्ली पुलिस ने पाठकों का ध्यान एक दूसरे मसले की तरफ भी दिलाया है:

‘इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है कि पीयूडीआर गिरफ्तारियों की संख्या और प्रकृति का अनुमान लगाने में बुरी तरह से नाकाम रहा है. रिकॉर्डों के मुताबिक दंगों से संबंधित 750 से ज्यादा मामलों में 1,300 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. पीयूडीआर और इन जैसे तत्वों को इस बात से काफी दिक्कत होगी कि गिरफ्तार किए गए लोगों के अनुपात की बात करें तो दो समुदायों की संख्या लगभग एक-दूसरे के बराबर है.’

दिल्ली पुलिस का यह बयान एक अहम सवाल उठाता है. 14 मार्च की पीटीआई की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पुलिस ने ‘उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा के सिलसिले में 3,400 लोगों को गिरफ्तार किया है या हिरासत में लिया है.

द हिंदू को दिल्ली पुलिस के पत्र में गिरफ्तार किए गए लोगों की संख्या सिर्फ 1,300 बताई गई है.

दिल्ली पुलिस ने दंगे से जुड़ी हिंसा के लिए हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या को सार्वजनिक नहीं किया है; यानी उन लोगों की संख्या के बारे में नहीं बताया है, जिन्हें पुलिस हिरासत में तो लिया गया, लेकिन आखिरकार किसी अपराध के लिए गिरफ्तार नहीं किया गया.

पुलिस सभी प्रासंगिक तथ्यों को सार्वजनिक क्यों नहीं कर देती है और यह निर्णय लेने का जिम्मा पाठकों पर क्यों नहीं छोड़ देती है कि आखिर उन्हें कौन गुमराह कर रहा है- दिल्ली पुलिस या ‘पीयूडीआर और इसके जैसे तत्व’.

फिलहाल, पुलिस के उत्साहपूर्ण खंडन के बावजूद पाठकों के पास सच जानने का कोई साधन नहीं है. [द वायर ने भी आरटीआई के तहत इस संबंध में कई सवाल उठाए हैं, लेकिन आज की तारीख तक इन सवालों का कोई जवाब नहीं मिला है.]

इसी चिट्ठी में दिल्ली पुलिस ने यह दावा किया था कि वह दिल्ली दंगों से संबंधित सभी मामलों की तफ्तीश निष्पक्ष तरीके से कर रही है और यह कहा था कि,

‘दुर्भावनापूर्ण गिरफ्तारियों के आरोप मुंह के बल गिर जाते हैं, क्योंकि माननीय उच्च न्यायालय में ‘सामाजिक कार्यकर्ताओं’ द्वारा कई रिट याचिकाएं ऐसे ही आरोपों के साथ दायर की गई हैं, जिन पर दिल्ली पुलिस ने समुचित जवाब दिया है. किसी भी मामले में माननीय उच्च न्यायालय ने कोई विपरीत टिप्पणी नहीं की है.’

मुमकिन है कि न्यायालयों ने 16 मई तक कोई आलोचनात्मक टिप्पणी न की हो, लेकिन 27 मई, 2020 को पटियाला हाउस कोर्ट में एडिशन सेशन जज धर्मेंद्र राणा ने दंगों के मामलों में पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्रवाई करने के लिए दिल्ली पुलिस को लताड़ लगाई थी.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, ‘जामिया के गिरफ्तार छात्र आसिफ इक़बाल तन्हा को न्यायिक हिरासत में भेजते हुए दिल्ली की एक अदालत की यह टिप्पणी थी, ‘ऐसा लगता है कि जांच सिर्फ एक दिशा में की जा रही है.

कोर्ट ने कहा,

‘केस डायरी को देखने से एक परेशान करनेवाला तथ्य उजागर होता है. ऐसा लगता है कि जांच सिर्फ एक दिशा में की जा रही है. पूछताछ में इंस्पेक्टर लोकेश और अनिल यह बताने में नाकाम रहे कि प्रतिद्वंद्वी पक्ष की सहभागिता को लेकर अब तक क्या जांच की गई है.

इस आलोक में, संबंधित डीसीपी को यह निर्देश दिया जाता है कि वे वे जांच की निगरानी करें और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें.’

पीयूडीआर द्वारा उठाए गए एक वैध बिंदु को फिर से दोहराते हुए यह कहा जा सकता है कि अपनी जांच में निष्पक्षता का प्रदर्शन करना दिल्ली पुलिस के लिए एक चुनौतीपूर्ण काम है.

दोहरे मानदंड

हालांकि, उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए 3400 संदिग्धों में हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता और आरएसएस के सदस्य भी हैं, लेकिन इनकी जांच करने की कोई कोशिश नहीं हुई है.

सत्ताधारी भाजपा के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की बात तो जाने ही दीजिए, जिन्होंने हिंसा शुरू होने से पहले भड़काऊ भाषण दिए थे.

इस तरह से दंगा भड़काने में कथित तौर पर मुख्य भूमिका निभाने वालों में से एक भाजपा नेता कपिल मिश्रा के साथ ही केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर, जिन्होंने 27 जनवरी, 2020 को एक भड़काऊ भाषण दिया था, प्रवेश वर्मा, जिन्होंने 28 जनवरी, 2020 को एक भड़काऊ भाषण दिया था और अभय वर्मा जिन्होंने सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के निए 25 फरवरी को एक भड़काऊ बयान दिया था, अब तक आजाद घूम रहे हैं.

यह इस तथ्य के बावजूद है कि जस्टिस एस. मुरलीधर और तलवंत सिंह की दिल्ली हाईकोर्ट की एक पीठ ने 26 फरवरी को इनमें से कुछ भाषणों का संज्ञान लिया था और दिल्ली पुलिस को मिश्रा, ठाकुर, प्रवेश और अभय वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के संबंध में फैसला लेने के लिए 27 फरवरी तक का समय दिया.

जस्टिर मुरलीधर ने टिप्पणी की, ‘जब आपने संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए एफआईआर दर्ज किया है, तो आप इन भाषणों के लिए एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या एक अपराध की उपस्थिति तक को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. एफआईआर दर्ज करने में हर दिन की देरी अहम है. आप जितनी देरी कर रहे हैं उतनी ज्यादा समस्याएं पैदा हो रही हैं.’

इसके फौरन बाद 27 फरवरी को ही, जस्टिस मुरलीधर का तबादला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया गया और पिछले पांच महीनों से दिल्ली पुलिस ने उपरोक्त आरोपियों के खिलाफ के खिलाफ कोई कार्रवाई करने को लेकर चुप्पी साध ली है.

कार्रवाई करने बात तो छोड़ ही दीजिए, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, कपिल मिश्रा और अभय वर्मा के नाम का जिक्र तक दिल्ली के दंगों से पहले के घटनाक्रम में भी कहीं नहीं मिलता है.

यह दिल्ली पुलिस द्वारा ‘पक्षपातरहित’ तरीके से इस मामले में कार्रवाई करने एक सटीक उदाहरण है.

वास्तव में, दिल्ली पुलिस ने पीड़ितों द्वारा पुलिस में की गई शिकायतों के खिलाफ एफआईआर दायर करने से इनकार कर दिया है. पिछले दिनों कारवां ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी:

‘द कारवां के पास फरवरी और मार्च के महीने में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के निवासियों द्वारा दायर की कई शिकायतों की प्रतियां हैं, जिनमें उन्होंने लिखा कि वे भाजपा नेताओं द्वारा या उनकी शह पर करवाई गई हिंसा के चश्मदीद गवाह हैं.

कई शिकायतों की प्रतियां प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यालय और कई पुलिस थानों को भी भेजी गईं. इनमें से कई पर उन दफ्तरों और कार्यालयों की मुहर थी, जिन्हें शिकायत मिली थी.

कुछ मामलों में इन पर एक से ज्यादा पावती की मुहरें थीं. इन शिकायतों में शामिल अन्य भाजपा नेताओं में उत्तर प्रदेश के बागपत निर्वाचन क्षेत्र से संसद सदस्य सत्यपाल सिंह, जिन्होंने इससे पहले मुंबई पुलिस के कमिश्नर के तौर पर काम किया था, उत्तर प्रदेश के लोनी के विधायक नंदकिशोर गुज्जर, दिल्ली करावल नगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक मोहन सिंह बिष्ट और दिल्ली के मुस्तफाबाद निर्वाचन क्षेत्र के पूर्व विधायक जगदीश प्रधान, जिन्हें हिंसा शुरू होने से कुछ हफ्ते पहले हुए विधानसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा था, के नाम शामिल हैं.’

ताकतवर लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से पुलिस का इनकार करना ही जैसे काफी न हो, कारवां की रिपोर्ट में शिकायतकर्ताओं को डराए-धमकाए जाने का भी आरोप लगाया गया है:

‘एक तरफ भाजपा नेता बड़े मजे से किसी कार्रवाई से बचे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उन्हें और उनके परिवारों को शिकायत पर कायम रहने की सूरत में जान से मारने की धमकी मिल रही है.

शिकायत करने में निवासियों की मदद करने वाले एडवोकेट महमूद प्राचा ने कहा कि ‘अब मुख्य चिंता शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर है. ‘पुलिस खुलेआम उनके दरवाजों को खटखटा रही है और उन्हें अपनी शिकायत को आगे न बढ़ाने की धमकी दे रही है.’

परेशान करने वाले तथ्य

कुछ दंगाइयों के साथ पुलिस की सांठगांठ की स्तब्धकारी खबरें भी आई हैं. डेक्कन हेराल्ड के मुताबिक,

‘जबकि शहर में हुई हिंसा के दौरान दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्सटेबल रतन लाल की हत्या पर श्रद्धांजलियों का तांता लग गया और इसने सोशल मीडिया पर गुस्से और आक्रोश को जन्म दिया, मंगलवार (25 फरवरी) को ऐसे कई वीडियोज के सोशल मीडिया पर प्रकट होने के बाद, जिससे राष्ट्रीय राजधानी के कुछ हिंसाग्रस्त इलाकों में पुलिस की संलिप्तता का संकेत मिल रहा था, पुलिसकर्मियों की भूमिका भी शक के घेरे में आ गई है…

‘एक दूसरे वीडियो में, एक व्यक्ति को दिल्ली पुलिस की तारीफ करते और उसी वक्त उसके साथियों द्वारा जय श्रीराम के नारे के साथ दूसरी तरफ के लोगों पर पत्थरबाजी करते हुए देखा जा सकता है.’

सीएए समर्थक दंगाइयों को पुलिस द्वारा संरक्षण दिए जाने का वीडियो सबूत वीडियो फुटेज में देखा जा सकता है, जिसकी प्रामाणिकता पर ऑल्ट न्यूज (अहमदाबाद, 12 मार्च, 2020) ने मुहर लगाई है. ऑल्ट न्यूज के मुताबिक,

‘यह वीडियो इलाके (विजय पार्क, बाबरपुर) में पुलिस की भारी मौजूदगी को प्रकट करता है. पुलिस वैनों को बाईं तरफ देखा जा सकता है- यानी उसी दिशा में जिस तरफ गोली चलाने वाले गली में गोली चलाने के बाद दौड़ते हैं. पुलिसकर्मियों को गली के बाहर खड़ी गिरोहबंद भीड़ के साथ देखा जा सकता है…

टाइम्स नाउ ने 25 फरवरी को बाबरपुर के विजय पार्क में 25 फरवरी की हिंसा का एक काट-छांट किया हुआ वीडियो चलाया. चैनल ने दावा किया कि वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति पुलिसवालों को निशाना बना रहा था. लेकिन, हिंसा के ज्यादा समय के वीडियो से यह उजागर होता है कि चैनल का यह कहना पूरी तरह से भ्रामक था.

उस व्यक्ति को एक रिहायशी कॉलोनी में गोली चलाने के बाद पुलिस की दिशा में दौड़ता हुआ देखा जा सकता है. हिंसाग्रस्त इलाके से रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों और इलाकों के निवासियों ने इस बात की पुष्टि की कि गोली चलाने वाला सीएए-समर्थक गिरोहबंद भीड़ का हिस्सा था.’

जबकि कुछ पुलिसकर्मियों के प्रकट तौर पर सीएए समर्थकों का साथ देने में कोई हिचक नहीं होने की खबरें थीं, वहीं सीएए विरोधी प्रदर्शनकारी समझकर पुलिस के एक वर्ग ने कुछ लोगों के साथ जैसा बर्ताव किया वह आंखें खोल देने वाला है. न्यूजलॉन्ड्री के मुताबिक,

‘दिल्ली की सांप्रदायिक हिंसा के दौरान जो सबसे ज्यादा परेशान करने वाले वीडियो आए, उनमें से एक वीडियो कथित तौर पर कुछ पुलिसकर्मियों द्वारा खून से लथपथ 5 लोगों को सड़क पर लिटाकर पीटते हुए और राष्ट्रगान गाने पर मजबूर करते हुए दिखाता है.

कुछ पीड़ितों और चश्मदीद गवाहों के मुताबिक यह घटना 24 फरवरी के दोपहर में कर्दमपुरी में हुई. इनमें एक पीड़ित कर्दमपुरी की गली नंबर, 5 का 23 वर्षीय फैजान था. वह काफी जख्मी था और दो दिनों के बाद उसने दम तोड़ दिया.

ऐसा मालूम पड़ता है कि पुलिस ने उसका मेडिकल उपचार कराने से इनकार कर दिया था.

हालांकि इस वीडियो की प्रामाणिकता पर किसी ने सवाल नहीं उठाया है, [वास्तव में ऑल्ट न्यूज ने इसकी प्रामाणिकता की पुष्टि की है] लेकिन दिल्ली पुलिस अब तक वर्दीधारी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू नहीं कर पाई है.

हकीकत में, फैजान की मृत्यु के बाद दायर एफआईआर में पिटाई की घटना या किसी संदिग्ध के नाम का जिक्र तक नहीं है. पुलिस द्वारा जिस तरह से सीसीटीवी कैमरों को नष्ट करके, सबूतों को मिटाने की कोशिश की गई वह भी परेशान करने वाला है.

ऐसा एक वीडियो 26 फरवरी, 2020 को द लॉजिकल इंडियन द्वारा यू-ट्यूब पर अपलोड किया गया. इंडिया टुडे ने भी 27 फरवरी, 2020 को यू-ट्यूब पर एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें (01.09 मिनट पर) पुलिसकर्मियों को पत्थरबाजी कर रहे और सीसीटीवी को नष्ट करने की कोशिश कर रहे दंगाइयों के साथ देखा जा सकता है.

लेकिन अभी तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि संबंधित पुलिसकर्मियों पर कोई कार्रवाई की गई या कि नहीं.

(एनडी जयप्रकाश दिल्ली साइंस फोरम से जुड़े हैं.)

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