आईएमए ने स्वास्थ्य मंत्री से पूछा, आपके कितने सहयोगियों ने कोविड का इलाज आयुर्वेद से करवाया

केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इस हफ़्ते कोविड-19 रोगियों के इलाज के लिए योग और आयुर्वेद पर आधारित नियम जारी किए थे. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इनके वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाए हैं.

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन. (फोटो साभार: फेसबुक/@drharshvardhanofficial)

केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इस हफ़्ते कोविड-19 रोगियों के इलाज के लिए योग और आयुर्वेद पर आधारित नियम जारी किए थे. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इनके वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाए हैं.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन. (फोटो साभार: फेसबुक/@drharshvardhanofficial)
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन. (फोटो साभार: फेसबुक/@drharshvardhanofficial)

नई दिल्ली: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने बिना लक्षण और हल्के लक्षणों वाले कोविड-19 रोगियों के इलाज के लिए आयुर्वेद और योग पर आधारित हाल ही में जारी सरकारी नियमों के वैज्ञानिक आधारों पर सवाल उठाए हैं.

केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन ने मंगलवार को कोविड-19 रोगियों के नैदानिक प्रबंधन (Clinical management) को लेकर नियम जारी किए थे, जिसमें कोरोना वायरस संक्रमण से बचने और हल्के तथा बिना लक्षण वाले रोगियों इलाज के लिए आहार, योग और अश्वगंधा और आयुष -64 जैसी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की सूची दी गई है.

आईएमए ने स्वास्थ्य मंत्री से सवाल किया, ‘क्या इस दावे का समर्थन करने वालों और उनका मंत्रालय कोविड से बचाव और इलाज पर शोध के लिए खुद को वालंटियर के तौर पर पेश करने के लिए तैयार हैं. मंत्रिमंडल के उनके कितने साथियों ने इन नियमों के तहत इलाज करवाया है?’

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, आईएमए ने हर्षवर्धन से पूछा कि उन्हें कोविड देखभाल और नियंत्रण की जिम्मेदारी आयुष मंत्रालय को सौंपने से क्या रोक रहा है?

आईएमए ने अपने बयान में कहा, ‘क्या उपरोक्त मानदंडों के आधार पर कोविड-19 रोगियों पर किए गए अध्ययनों से किए गए दावों के बारे में संतोषजनक सबूत हैं? यदि हां, तो क्या सबूत कमजोर या मध्यम या मजबूत हैं? सबूत सार्वजनिक जानकारी में होना चाहिए और वैज्ञानिक जांच के लिए उपलब्ध होना चाहिए.’

आईएमए ने पूछा कि क्या कोविड-19 की गंभीर स्थिति एक हाइपरइम्यून स्थिति है या प्रतिरक्षा की कमी की स्थिति है?

आईएमए ने केंद्रीय मंत्री से अपने सवाल पर जवाब मांगा और कहा कि यदि उन्हें पास इन सवालों के जवाब नहीं है तो वह इन गोलियों (प्लेसबो) को दवा कहकर देश और भोली-भाली जनता के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं.

इन प्रोटोकॉल के वैज्ञानिक आधार पर सवाल उठाते हुए आईएमए ने स्वास्थ्य मंत्री से दावों को कहीं गैर-विरोधाभासी स्थितियों या डबल ब्लाइंड कंट्रोल स्टडीज में दावों को साबित करने के लिए कहा.

एक डबल ब्लाइंड स्टडी एक रैंडम तरह से किया जाने वाला क्लीनिकल ट्रायल है, जिसमें व्यक्ति को यह नहीं पता होता है कि क्या वे प्रायोगिक उपचार, एक मानक उपचार या एक प्लेसबो प्राप्त कर रहे हैं. प्लेसबो एक ऐसा पदार्थ या उपचार है जिसका कोई चिकित्सीय मूल्य नहीं है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, आईएमए की आपत्तियों पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि आयुर्वेद और योग पर आधारित सलाह अनुभवजन्य साक्ष्य और जैविक व्यवहार्यता (biological plausibility) के साथ-साथ चल रहे क्लीनिकल ट्रायल्स में सामने आ रही प्रवृत्तियों पर आधारित थी.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा, ‘जिस प्रोटोकॉल की सिफारिश की गई, वह सरकार द्वारा कोविड-19 के संदर्भ में जारी मानक इलाज प्रोटोकॉल पर आधारित है और स्वास्थ्य मंत्री ने यह सुझाव नहीं दिया कि रोग के क्लीनिकल दृष्टिकोण को नजरअंदाज किया जाना चाहिए.’

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘प्रोटोकॉल इस बात को रेखांकित करता है कि अनुशंसित फॉर्मूले देखभाल और रोकथाम के मानक दृष्टिकोणों के अतिरिक्त हैं. यह स्वास्थ्य मंत्रालय की अनुशंसा वाले एलोपैथिक उपचार प्रोटोकॉल की जगह पर नहीं सुझाए गए हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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