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बॉम्बे हाईकोर्ट ने वरवरा राव की तत्काल मेडिकल जांच करने का आदेश दिया

मेडिकल जांच के आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ये फैसला लेगा कि तेलुगू कवि एवं कार्यकर्ता वरवरा राव को जेल से अस्पताल में शिफ्ट किया जाएगा या नहीं. 81 वर्षीय राव को एल्गार परिषद मामले में 28 अगस्त 2018 को गिरफ़्तार किया गया था.

वरवरा राव. (फोटो: पीटीआई )

वरवरा राव. (फोटो: पीटीआई )

नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को निर्देश दिया कि भीमा-कोरेगांव मामले में तलोजा जेल में बंद 81 वर्षीय कवि एवं कार्यकर्ता वरवरा राव की मेडिकल जांच की जाए, ताकि उन्हें नानावती अस्पताल शिफ्ट करने के संबंध में उचित फैसला लिया जा सके.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि नानावती अस्पताल के डॉक्टरों का एक पैनल वीडियो कॉल के माध्यम से आज ही या फिर कम से कम कल (शुक्रवार) सुबह तक उनकी जांच करे. यदि डॉक्टरों को लगता है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये जांच पर्याप्त नहीं है तो तत्काल जेल में जाकर मेडिकल जांच की जानी चाहिए.

न्यायालय ने कहा कि ये मेडिकल जांच उन्हीं डॉक्टरों के द्वारा किया जाना चाहिए, जिन्होंने पिछली 30 जुलाई की रिपोर्ट के लिए जांच की थी.

इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी. इस दिन कोर्ट वरवरा राव के मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करेगा. न्यायालय याचिकाकर्ता की इस मांग पर भी विचार करेगा कि राव को तत्काल अस्पताल में शिफ्ट किया जाए.

परिवार का दावा है कि वरवरा राव डिमेंशिया (एक तरह की भूलने की बीमारी) और अन्य कई बीमारियों से पीड़ित हैं तथा उन्हें जेल में रखना खतरे से खाली नहीं है.

मालूम हो कि 29 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट से भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार तेलुगू कवि और लेखक वरवरा राव की पत्नी की याचिका पर जल्द से जल्द विचार करने को कहा था.

इस तथ्य पर ध्यान देते हुए कि हाईकोर्ट ने 17 सितंबर के बाद से राव की जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं की है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राव की चिकित्सा स्थिति को देखते हुए समय पर उनकी याचिका पर ध्यान देने की जरूरत है.

जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस एस. रविंद्र भट की पीठ ने कहा कि यह मामला कैदी के मानवाधिकारों पर सवाल उठाता है.

जिसके बाद हाईकोर्ट के जस्टिस एके मेनन और जस्टिस एसपी तवड़े की अवकाशकालीन पीठ ने गुरुवार को तीन बजे शाम को मामले की सुनवाई शुरू की.

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने भी अपने हलफनामे में वरवरा राव की बिगड़ती हालत पर कोई सवाल नहीं उठाया है.

उन्होंने कहा कि आने-जाने के अधिकार के अलावा आरोपी व्यक्ति कोई भी मौलिक अधिकार नहीं खोता है. एक कैदी के सभी मूल अधिकार बने रहते हैं.

इंदिरा जयसिंह ने राव की स्वास्थ्य स्थिति का हवाला देते हुए उन्हें तत्काल तलोजा जेल से नानावती अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की. उन्होंने कहा, ‘इस बात की बिल्कुल अंदेशा है कि यदि वरवरा राव को इसी स्थिति में रखा जाता है तो उनकी जान जा सकती है. पहले उन्हें नानावती अस्पताल से उठाकर तलोजा जेल में डाल दिया गया, जबकि कोर्ट के सामने मामला लंबित था.’

उन्होंने आगे कहा, ‘उन्हें डिमेंशिया है, वे बेड पर पड़े हुए हैं. उन्हें पेशाब संबंधी संक्रमण भी हो गया है. मैं कहती हूं कि यदि उनकी जेल में मौत होती है तो यह हिरासत में मौत का मामला होगा.’

बीते जुलाई महीने में वरवरा राव के कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई थी. तब उन्हें सेंट जॉर्ज अस्पताल शिफ्ट किया गया है. हालांकि उनमें कोई लक्षण नहीं थे.

साल 2018 में एल्गार परिषद मामले में पुणे पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए कई कार्यकर्ताओं और वकीलों में राव भी शामिल हैं. इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को स्थानांतरित कर दिया गया है, जिसने बाद में और अधिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को गिरफ्तार किया गया.

यह मामला 1 जनवरी, 2018 को पुणे के निकट भीमा-कोरेगांव की जंग की 200वीं वर्षगांठ के जश्न के बाद हिंसा भड़कने से संबंधित है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे.

उसके एक दिन पहले 31 दिसंबर 2017 को पुणे के ऐतिहासिक शनिवारवाड़ा में एल्गार परिषद का सम्मेलन आयोजित किया गया था. आरोप है कि सम्मेलन में एल्गार परिषद समूह के सदस्यों ने भड़काऊ भाषण दिए थे, जिसके अगले दिन हिंसा भड़क गई थी.