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कार्यकाल विस्तार पाने वाले ईडी निदेशक विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ कई मामलों की जांच कर रहे हैं

वित्त मंत्रालय ने एक अप्रत्याशित आदेश में ईडी निदेशक संजय कुमार मिश्रा को एक साल का कार्यकाल विस्तार दिया है. बीते समय में विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ बढ़े ईडी मामलों के चलते आलोचकों का कहना है चूंकि सीबीआई को लंबी जांच प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है, इसलिए राजनीतिक लाभ के लिए विपक्ष को प्रताड़ित करने का काम अब ईडी को सौंप दिया गया है.

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ईडी निदेशक संजय कुमार मिश्रा. (फोटो साभार: ट्विटर/IRS Association)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बीते हफ्ते प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशक संजय कुमार मिश्रा की नियुक्ति के लिए वर्ष 2018 में जारी आदेश में संशोधन करते हुए उनका कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया है.

वे विपक्ष के नेताओं के खिलाफ कई मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों को देख रहे हैं. 60 वर्षीय मिश्रा 1984 बैच के आयकर कैडर में भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी हैं और 19 नवंबर 2018 को उन्हें ईडी का निदेशक नियुक्त किया गया था.

ईडी निदेशक का निश्चित कार्यकाल दो साल होने की वजह से उनका कार्यकाल इस हफ्ते खत्म हो रहा था. लेकिन वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग ने बीते शुक्रवार को एक अप्रत्याशित आदेश जारी कर कहा कि कि मिश्रा की नियुक्ति के लिए वर्ष 2018 में जारी आदेश में संशोधन किया गया है और राष्ट्रपति ने इसकी मंजूरी दे दी है. इस तरह मिश्रा का कार्यकाल अब तीन सालों का होगा.

ईडी दो केंद्रीय कानूनों- मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम (पीएमएलए) और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) को लागू करता है.

यह एजेंसी सीबीआई द्वारा दर्ज कई हाई प्रोफाइल बैंक फ्रॉड और काला धन के मामलों की जांच कर रही है. इसके अलावा ईडी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा दर्ज टेरर फंडिंग जैसे मामलों को लेकर संपत्ति जब्त करने का भी काम करता है.

मिश्रा ने आईपीएस ऑफिसर करनाल सिंह के रिटायर होने के बाद इस पद का कार्यभार संभाला था. एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फरवरी 2017 में दो साल का निश्चित कार्यकाल पाने वाले सिंह पहले ईडी निदेशक थे.

वहीं ईडी निदेशक बनने से पहले मिश्रा दिल्ली में आयकर विभाग में मुख्य आयुक्त थे. इसके अलावा वे केंद्र में अपर सचिव भी रहे हैं, जिसके चलते वे ईडी प्रमुख बनने के पात्र हो सके.

संजय कुमार मिश्रा का कार्यकाल बढ़ाने का फैसला विवादों के घेरे में है क्योंकि ये आरोप लग रहे हैं कि विपक्ष के नेताओं को निशाना बनाने के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों जैसे कि सीबीआई, एनआईए और ईडी का इस्तेमाल किया जा रहा है.

इस समय विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी मामलों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है. आलोचकों का कहना है कि चूंकि सीबीआई को लंबी-चौड़ी जांच प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है, इसलिए राजनीतिक फायदा उठाने के लिए विपक्ष को प्रताड़ित करने का काम अब ईडी को सौंप दिया गया है.

यहां द वायर  उन मामलों की सूची पेश कर रहा है, जहां मिश्रा की अगुवाई में ईडी विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच कर रही है.

1. ईडी के अधीन सबसे हाई-प्रोफाइल मामलों में से एक महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (एमएससीबी) में 2,500 करोड़ रुपये का ऋण धोखाधड़ी का मामला है. इसे लेकर मुंबई पुलिस ने बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देश पर अगस्त 2019 में एफआईआर दर्ज की थी. पहले इस केस की जांच आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा किया जा रहा था.

एजेंसी ने बैंक के निदेशक अजीत पवार, जो राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री हैं, और बैंक के 70 पूर्व पदाधिकारियों के खिलाफ आरोपों के संबंध में शरद पवार को समन भेजा है.

एनसीपी प्रमुख ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार पिछले साल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक लाभ लेने के लिए उन्हें निशाना बना रही थी.

2. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी के स्वामित्व वाली एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड को पंचकुला में भूमि आवंटन में कथित अनियमितताओं के लिए ईडी हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा की भूमिका की जांच कर रही है.

यह मामला पिछले साल हरियाणा विधानसभा चुनावों से पहले ईडी द्वारा दर्ज किया गया था.

3. इसी तरह साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से लगभग तीन महीने पहले ईडी ने बहुजन समाज पार्टी से जुड़े एक बैंक खाते में 104 करोड़ रुपये और बसपा सुप्रीमो मायावती के भाई आनंद कुमार के खाते में लगभग 1.5 करोड़ रुपये आने को लेकर जांच शुरू की थी.

इसी प्रकार जनवरी 2019 में पिछले लोकसभा चुनावों से कुछ महीने पहले ईडी ने मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए 1,400 करोड़ रुपये के दलित स्मारक घोटाले के आरोप में यूपी में सात कार्यालयों पर छापा मारा था.

4. लगभग इसी समय ईडी ने एक अवैध खनन मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया.

5. ईडी का एक बेहद हाई प्रोफाइल केस आईएमएक्स मीडिया मामला है, जो फेमा के तहत विदेशी लेन-देन के उल्लंघन से जुड़ा हुआ है. सीबीआई ने इस मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को गिरफ्तार किया था. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम भी इस मामले में आरोपी हैं.

6. ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में कर्नाटक कांग्रेस प्रमुख डॉ. डीके शिवकुमार के भी पीछे लगी हुई है. सीबीआई द्वारा चिदंबरम को गिरफ्तार किए जाने के दो हफ्ते बाद ईडी ने सितंबर 2019 में शिवकुमार को भी गिरफ्तार किया था.

इसे लेकर आयकर विभाग ने उनके घर पर छापा भी मारा था और घर से कैश बरामद करने का दावा किया था. चिदंबरम और शिवकुमार को दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद किया गया था.

चिदंबरम की गिरफ्तारी को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बदला लेने के रूप में देखा गया क्योंकि जब चिदंबरम गृह मंत्री थे, तब जुलाई 2010 में सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में शाह को गिरफ्तार किया गया था.

हीं शिवकुमार ने कर्नाटक कांग्रेस को पुनर्जीवित करने प्रमुख भूमिका निभाई है और भविष्य में उन्हें मुख्यमंत्री का प्रबल दावेदार के रूप में देखा जा रहा है.

7. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा भी कई जमीन खरीद मामले में कथित अनियमितताओं के आरोप में ईडी की निगरानी में हैं. ईडी ने वाड्रा की स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी पर कम से कम आठ बार छापा मारा है और उनकी संपत्ति को अटैच किया है.

8. जहां एक तरफ 2जी घोटाले को लेकर ईडी डीएमके के नेताओं ए. राजा और कनिमोझी की जांच कर चुकी है, वहीं वर्तमान में एजेंसी एयरसेल-मैक्सिस समेत कई मामलों में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही है, जिसमें तमिलनाडु के विपक्षी दल के दयानिधि और कलानिधि मारन आरोपी हैं.

9. इसी तरह ईडी वाईएस चौधरी और नारायण राणे के खिलाफ भी जांच कर रही है. एक बैंक फ्रॉड मामले में एजेंसी ने अप्रैल 2019 में चौधरी के 316 करोड़ की संपत्ति जब्त की थी. दो महीने बाद टीडीपी के इन नेता ने भाजपा की सदस्यता ले ली.

10. कांग्रेस से महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री राणे को तब मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों का सामना करना पड़ा था जब उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और अपनी नई पार्टी महाराष्ट्र स्वाभिमान अभियान बनाया था.

हालांकि अक्टूबर 2019 में उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया, तब से उनके खिलाफ मामलों की प्रगति पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है.

11. साल 2019 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सोनिया गांधी के करीबी अहमद पटेल को भी ईडी की जांच का सामना करना पड़ा है. एजेंसी ने स्टर्लिंग बायोटेक मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पटेल के बेटे और दामाद की जांच की.

12. इसी तरह अगस्त 2019 में ईडी ने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के भतीजे रतुल पुरी को भी करोड़ों रुपये के बैंक ऋण धोखाधड़ी मामले में गिरफ्तार किया था. अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले में भी पुरी पर जांच चल रही है.

13. वाईएसआर कांग्रेस के नेता और आंध्र प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी भी मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों और कथित भूमि घोटाले में ईडी की जांच का सामना कर रहे हैं.

केंद्र के प्रति उनका हालिया दोस्ताना रवैया मोदी सरकार द्वारा इन मामलों को दबाने की कोशिश की रूप में देखा जा रहा है.

14. जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला से भी हाल ही में करोड़ों रुपये के जे एंड के क्रिकेट एसोसिएशन घोटाले में उनकी कथित भूमिका के कारण ईडी द्वारा पूछताछ की गई है.

15. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके पूर्व डिप्टी सचिन पायलट को भी ईडी ने एक राजस्थान एम्बुलेंस योजना के मामले में लगभग 24 करोड़ रुपये के नुकसान में नामित किया है.

16. राज ठाकरे, ओम प्रकाश चौटाला (जो वर्तमान में एक मामले में जेल में बंद हैं), नवीन जिंदल, लालू प्रसाद यादव, उनके बेटे तेजस्वी यादव और बेटी मीसा भारती तथा कई अन्य विपक्षी नेताओं की भी ईडी द्वारा विभिन्न मामलों में जांच की जा चुकी है.

विपक्ष के नेताओं ने आरोप लगाया है कि केंद्र के निर्देश पर ईडी चुनिंदा नेताओं को निशाना बना रही है और यह स्वायत्त होकर काम नहीं कर रहा है.

उन्होंने कहा कि जैसे ही कोई आरोपी विपक्ष का नेता भाजपा में शामिल होता, ईडी उनके खिलाफ मामलों पर कार्रवाई करना बंद कर दती है.

इसका एक प्रमुख उदाहरण मुकुल रॉय का है, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को छोड़कर भाजपा का दामन थामा. ऐसे ही असम के हिमंता बिस्वा शर्मा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे. ये दोनों करोड़ों के सारदा चिटफंड मामले में आरोपी थी लेकिन ईडी ने अपनी जांच में इन्हें नजरअंदाज कर दिया.

इसी तरह बेल्लारी के कुख्यात रेड्डी ब्रदर्स और खनन घोटालों में उनकी कथित भूमिका को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.

मिश्रा की अगुवाई में ईडी ने कई अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल के यहां भी छापा मारा है. ईडी ने फेमा कानून के कथित उल्लंघन के आरोप में एमनेस्टी इंडिया इंटरनेशनल के खिलाफ जांच की थी, लेकिन अंत में उन्हें कुछ नहीं मिला.

माना जाता है कि मिश्रा द्वारा निदेशक का पद संभालने के बाद से ही ईडी राष्ट्रीय स्तर पर लाइमलाइट में आया है.

द वीक ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में कहा, ‘ईडी के भीतर हुए अधिकतर बदलाव इसके निदेशक एसके मिश्रा के कार्यकाल में हुए हैं, जिन्होंने अक्टूबर 2018 में पद संभाला था. भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी मिश्रा खुद को मीडिया से दूर रखना पसंद करते हैं. ईडी की वेबसाइट के पर निदेशक का फोटो भी उपलब्ध नहीं है.’

रिपोर्ट में आगे कहा गया, ‘दिल्ली के खान मार्केट के नजदीक स्थित लोकनायक भवन में मिश्रा हफ्ते में छह दिन काम करते हैं. वे एक ऐसे संगठन की अगुवाई करते हैं, जिसमें 2,066 अधिकारियों की स्वीकृत पद हैं और इसमें 1,273 अधिकारियों की कार्यक्षमता है. उनमें से केवल 400 ही जांचकर्ता हैं.’

हालांकि इस एजेंसी की इस बात को लेकर भी आलोचना होती रहती है कि यह केस तो दर्ज कर लेती है लेकिन सजा दिलाने में इसका प्रदर्शन बहुत खराब है.

सितंबर 2019 की इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईडी ने 2005 से लेकर पीएमएलए के तहत करीब 2,400 केस दर्ज किए हैं, लेकिन इसमें से सिर्फ आठ मामलों में दोषसिद्धि हुई है.

द वायर  द्वारा भी ईडी की दोषसिद्धि दर पर एक विस्तृत आकलन प्रकाशित किया गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)