केदारनाथ सिंह: दुनिया से मिलने को निकला एक कवि

कविता का पूरा अर्थ हासिल कर पाना और संप्रेषणीयता का प्रश्न, हर कवि को इन दो कसौटियों पर अनिवार्यतः कसा जाता था. केदारनाथ सिंह की कविता, हर खरी कविता की तरह इन दोनों के प्रलोभन से बचती थी.

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केदारनाथ सिंह. (फोटो साभार: दूरदर्शन/यू ट्यूब)

कविता का पूरा अर्थ हासिल कर पाना और संप्रेषणीयता का प्रश्न, हर कवि को इन दो कसौटियों पर अनिवार्यतः कसा जाता था. केदारनाथ सिंह की कविता, हर खरी कविता की तरह इन दोनों के प्रलोभन से बचती थी.

केदारनाथ सिंह. (फोटो साभार: दूरदर्शन/यू ट्यूब)
केदारनाथ सिंह. (फोटो साभार: दूरदर्शन/यू ट्यूब)

गद्य अगर चीज़ों को उनके सही नाम से पुकारने की कला है तो फिर कविता क्या है? कविता संभवतः मनुष्य को भाषा की तरफ से दी गई चुनौती है, उसकी उस आदत को और उस अहंकार को कि हर चीज़ का ठीक-ठीक अर्थ किया जा सकता है.

अर्थ करने का अर्थ ही है उस चीज़ को पकड़ लेना या उसकी व्याख्या करने बैठ जाना. कविता व्याख्या के इस प्रलोभन का संवरण करने का अनुरोध है.

कविता देखने, सुनने और महसूस करने के लिए धैर्य का सृजन करने का अवसर है. मनुष्य की भूल इस समझ में है कि सोचना उसके लिए स्वाभाविक है और महसूस करना भी.

कविता, अच्छी कविता यह बतलाती है कि जैसे सोचना सरल नहीं है, वैसे ही महसूस करने के नए तरीके हो सकते हैं. कविता संवेदनाओं की परिपाटीबद्धता को तोड़ते हुए उनकी नवीन संरचनाएं गढ़ती है. सोचने का अभ्यास करना होता है, वैसे ही संवेदनाओं का भी.

परिवार के मुताबिक केदारनाथ सिंह की वास्तविक जन्मतिथि 19 नवंबर ही है, सो उनके जन्मदिन की आहट मिलने पर उस मुश्किल का ध्यान हो आया, जो हर सच्ची कविता एक पाठक के सामने खड़ी करती है.

अर्थ करने, व्याख्या करने, उससे अधिक ज़रूरी है देखना, सुनना, उस रूप को ग्रहण करना जोकि कविता है और जीवन भी.


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40 साल हुए जब केदारनाथ सिंह से, उनकी कविताओं से पहला परिचय हुआ था. वह अशोक वाजपेयी के मुताबिक़ कविता की वापसी का समय था.

‘ज़मीन पक रही है’ संग्रह लंबे अंतराल के बाद छपकर आया उनका दूसरा संग्रह था. पाठकों में उन्हें लेकर बहस छिड़ गई थी.

केदारजी को चाहने वालों की कमी न थी और ऐसे पाठकों की भी जो उन्हें चाहते थे लेकिन तय नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें अपना पहला कवि कहें या नहीं. उन पर रूपवादी होने का आरोप जो था.

याद नहीं है कि केदारजी ने इस आरोप का कोई उत्तर दिया हो या वाद-विवाद में उतरे हों. वह उनका स्वभाव न था. बाद में समझ में आया कि दिक्कत इस बात से थी कि केदारजी की कविता का पूरा-पूरा अर्थ कर पाना संभव न था.

कविता में काफी कुछ था जो समझ की पकड़ से फिसल जाता था. यह समझने में वक्त था कि रूप की रक्षा का संघर्ष ही तो वास्तविक संघर्ष है. विरूपता, विद्रूप से ही तो संघर्ष था.

‘धूप में घोड़े पर बहस’ में घोड़े पर बहस के बीच सवाल यह है

मगर घोड़ा कहां है?

क्या घोड़े के नहीं होने से उस पर बहस में कुछ फर्क पड़ेगा?

तो क्या हुआ
घोड़े पर बहस तो हो सकती है

हो सकती है मगर मुझे दुख है
मैंने बरसों से घोड़ा नहीं देखा—
तीसरे की आवाज़ में एक अजीब-सा दर्द था

घोड़े नहीं है लेकिन उनके आंकड़े हैं:

तीसरा जोकि अब तक चुप था
एकदम चीखा- दोस्तो
एक दिन आंकड़े उठेंगे
और घोड़ों को रौंद डालेंगे

आंकड़े जैसे घोड़ों को रौंद डालेंगे उसी तरह बाज़ार जनता को खत्म कर देगा.

‘आओ बाज़ार चलें’
उसने कहा
‘बाज़ार में क्या है’?
मैंने पूछा
‘बाज़ार में धूल है’
उसने हंसते हुए कहा.
….. 

मैंने पूछा—‘धूल!
‘धूल में क्या है’?
‘जनता’- उसने बेहद सादगी से कहा.
मैं कुछ देर स्तब्ध खड़ा रहा
फिर हम दोनों चल पड़े
धूल और जनता की तलाश में
वहां पहुंचकर
हमें आश्चर्य हुआ
बाज़ार में न धूल थी
न जनता
दोनों को साफ़ कर दिया गया था.

खोज इस जनता की है और एक साबूत पूरे इंसान की, एक खरी आवाज़ की:

तमतमाए हुए चेहरे,खुले खाली हाथ
देख लो वे जा रहे हैं उठे जर्जर माथ
शब्द सारे धूल हैं, व्याकरण सारे ढोंग
किस कदर खामोश हैं चलते हुए वे लोग
………..
पूछता है एक चेहरा दूसरे से मौन
बचा हो साबूत- ऐसा कहां है वह- कौन?

साबूत बचे चेहरे की खोज, कहीं यही तो केदारजी की कविता नहीं है? लेकिन एक अकेला चेहरा साबूत बचे या बचा रहे, यह मुमकिन नहीं.

उसके पूरे शेष रहने के लिए उन रिश्तों को भी बचा रहना होगा जो दो या दो से ज़्यादा चेहरों के बीच होता है या इस जो पूरे ब्रह्मांड को एक तनावपूर्ण संतुलन में रखता है. इसीलिए एक से ज्यादा हमेशा दो लोगों की तरफ कवि ध्यान दिलाता है:

तुमने एक अकेले आदमी को पहाड़ से उतारते हुए देखा है?
मैं कहूंगा- कविता
एक शानदार कविता
मगर उन्हें तुम क्या कहोगे
वे दो लोग जो उस पेड़ के नीचे बैठे हैं
महज दो लोग?

एक से दो बनने की प्रक्रिया क्या एक जादू है?

मगर क्यों दो लोग
और हमेशा दो लोग?

क्या एक को तोड़ने से बन जाते हैं दो लोग?

दो लोग तुम्हारी भाषा में ले आते हैं
कितने शहरों की धूल और उच्चारण
क्या तुम जानते हो?
दो लोग
सड़क के किनारे महज चुपचाप चलते हुए दो लोग
तुम्हारे शहर को कितना अनंत बना देते हैं
तुमने कभी सोचा है?

पिछली सदी के अस्सी के दशक में कविता के प्रामाणिक होने का एक अनिवार्य संदर्भ मार्क्सवाद था. मुक्तिबोध हों या शमशेर, बहस इस पर थी कि वे पर्याप्त मार्क्सवादी हैं या व्यक्तिवाद ने उन्हें ‘ग्रस’ लिया है?

केदारजी की कविताएं भी इसकी चपेट में आईं. पूरा अर्थ हासिल कर पाना और संप्रेषणीयता का प्रश्न: हर कवि को इन दो कसौटियों पर अनिवार्यतः कसा जाता था.


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केदारजी की कविता, हर खरी कविता की तरह इन दोनों के प्रलोभन से बचती थी. केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन की कविताओं को हमेशा मानक के तौर पर सामने पेश कर दिया जाता था.

यह बात दीगर है कि खुद इन कवियों के साथ यह अन्याय था. केदारजी कविता पढ़ने के इस तरीके को अपने खामोश अंदाज में चुनौती दे रहे थे;

जहां गोली
चिड़िया के डैने में घुसती है
जहां रोटी पानी में गल जाती है
मैं ठीक वहीं से बोल रहा हूं
……
जहां भूख शर्म से अलग होती है
जहां काले चीते
भूनते हुए आलू की खुशबू में बदल जाते हैं
मैं ठीक वहीं से बोल रहा हूं

कवि के बोलने की इस जगह की क्या ठीक-ठीक निशानदेही की जा सकती है? क्या कवि की यात्रा को, उसके यात्रा पथ को ठीक-ठीक पकड़ा जा सकता है?

मैं एक खोते से निकलता हूं
और शहर में घुस जाता हूं
मैं शहर से निकलता हूं
और एक बड़ी मांद मुझे दिखलाई पड़ती है

कुछ है जो जुड़ना चाहता है, कुछ है जो अभिव्यक्त होना चाहता है. यह दावा कि जो सामने दिख रहा है, वह पूरी तरह देख लिया गया है,अगर अहंकार नहीं है तो भोलापन ज़रूर है:

इस समय
मेरे ललाट पर जो पसीना है
उसमें मेरी मिहनत के अलावा
कुछ और भी ज़रूर है
जो चमक रहा है

हो सकता है वह मेरी थकान हो
हो सकता है कुछ और
यह मैं तुम पर छोड़ता हूं
क्योंकि पसीना
मेरा निजी मामला नहीं है

निजता, सार्वजनिकता; व्यक्ति और समाज; विलक्षणता और सामान्यता, उपस्थिति और अनुपस्थिति, चुप्पी और खामोशी; नश्वरता और अमरता ये सब परस्पर विरोधी हैं या एक के होने से ही दूसरे का होना मुमकिन है?

इस प्रश्न का उत्तर क्या कोई एक दर्शन दे चुका है या हर किसी को इससे अपने तरीके से जूझना है? उसमें भरोसा किस पर किया जाए?

कभी अंधेरे में
अगर भूल जाना रास्ता
तो ध्रुवतारा पर नहीं
सिर्फ दूर से आने वाली
कुत्तों के भूंकने की आवाज़ पर
भरोसा करना

इस विनम्रता का अर्थ क्षुद्रता के आगे समर्पण नहीं है. मनुष्य होने का अभिमान तो कुछ और ही है, वह सृष्टि के साथ संबंध की चेतना से ज्यादा उसे अपने भीतर वहन करने के दायित्व की संवेदना है:

मुझे विश्वास है
यह पृथ्वी
यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में
यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में
रहते हैं दीमक

जैसे दाने में रह लेता है घुन
यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अंदर
यदि और कहीं नहीं तो मेरी ज़बान
और मेरी नश्वरता में
यह रहेगी

और एक सुबह मैं उठूंगा
मैं उठूंगा पृथ्वी समेत
जल और कच्छप-समेत मैं उठूंगा
मैं उठूंगा और चल दूंगा उससे मिलने
जिससे वादा है
कि मिलूंगा

केदारनाथ सिंह की कविता इस वादे की याददिहानी है: असल बात है याद रखना इस वादे को जो किसी के मिलने का है और उस यात्रा की तैयारी करना और उसकी लियाकत हासिल करना.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)