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एलगार परिषदः बॉम्बे हाईकोर्ट ने नवलखा की डिफॉल्ट ज़मानत याचिका ख़ारिज की

एनआईए अदालत ने जुलाई 2020 में एलगार परिषद मामले में आरोपी गौतम नवलखा की डिफॉल्ट ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी थी, जिसे चुनौती देते हुए उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी.

गौतम नवलखा (फोटो: यूट्यूब)

गौतम नवलखा (फोटो: यूट्यूब)

मुंबईः बॉम्बे हाईकोर्ट ने एलगार परिषद मामले में आरोपियों में से एक गौतम नवलखा की आपराधिक अपील सोमवार को खारिज कर दी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दरअसल 12 जुलाई 2020 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अदालत ने नवलखा की डिफॉल्ट जमानत याचिका खारिज की थी, जिसे चुनौती देते हुए नवलखा ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी.

अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘हमने एनआईए अदालत का फैसला पढ़ लिया है. हमें इसमें दखल देने का कोई कारण नजर नहीं आता.’

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 दिसंबर 2020 को दलीलें सुनने के बाद नवलखा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था.

जांचकर्ता एजेंसी एनआईए द्वारा 90 दिनों की निर्धारित अवधि में चार्जशीट दायर करने में असफल रहने पर नवलखा ने डिफॉल्ट जमानत मांगी थी.

एनआईए ने हालांकि दावा किया कि नवलखा के 29 अगस्त से एक अक्टूबर 2018 तक के नजरबंदी के 34 दिनों को दिल्ली हाईकोर्ट ने अवैध करार दिया था इसलिए इस अवधि को हिरासत में शामिल नहीं किया जा सकता.

नवलखा की याचिका पर सुनवाई कर रहे जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एमएस कार्णिक की पीठ को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने बताया कि 2018 में नजरबंदी में नवलखा पर प्रतिबंध लगाए गए थे इसलिए डिफॉल्ट जमानत के लिए सीआरपीसी की धारा 167 के तहत उनकी याचिका वैध है.

सिब्बल ने कहा, ‘नवलखा जब नजरबंदी थे तब भी वह हिरासत में थे. उनकी आजादी और आवागमन इसके तहत प्रतिबंधित और सीमित था. हिरासत की प्रकृति बदल दी गई थी लेकिन वह गिरफ्तारी ही थी.’

उन्होंने बताया, ‘हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से जमानत याचिकाएं खारिज होने के बाद गौतम नवलखा ने पिछले साल 14 अप्रैल को दिल्ली में एनआईए के समक्ष आत्मसमर्पण किया था. एनआईए ने समयसीमा बढ़ाने के लिए 29 जून 2020 को आवेदन दायर किया था.’

सिब्बल ने कहा, ‘अगर 34 दिनों की नजरबंदी को गिना जाए तो एनआईए का आवेदन 90 दिनों के बाद था और इसे नहीं माना जा सकता इसलिए नवलखा को डिफॉल्ट जमानत मिलनी चाहिए. उन्होंने (नवलखा) लगातार 93 दिन हिरासत में गुजारे हैं.’

हालांकि, एनआईए की तरफ से पैरवी कर रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि नजरबंदी की अवधि नहीं गिनी जा सकती क्योंकि आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की तारीख 90 दिनों की गणना के लिए प्रासंगिक थी न कि गिरफ्तारी की तारीख के लिए.

उन्होंने तर्क दिया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने नवलखा की 29 अगस्त से एक अक्टूबर 2018 तक हिरासत को अवैध करार दिया था और इसलिए इस अवधि को गिना नहीं जा सकता.

मालूम हो कि 28 अगस्त 2018 को महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर पांच कार्यकर्ताओं- कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंसाल्विस को गिरफ़्तार किया था. महाराष्ट्र पुलिस का आरोप है कि इस सम्मेलन के कुछ समर्थकों के माओवादियोंसे संबंध हैं.