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उत्तराखंड ग्लेशियर आपदा: मृतक संख्या 31 पर पहुंची, बचाव कार्य जारी

उत्तराखंड राज्य आपदा परिचालन केंद्र के अनुसार, ग्लेशियर टूटने से आई आपदा में 171 लोगों के लापता होने की सूचना है. लापता लोगों में पनबिजली परियोजनाओं में कार्यरत लोगों के अलावा आसपास के गांवों के स्थानीय लोग भी हैं जिनके घर बाढ़ के पानी में बह गए.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

देहरादून: उत्तराखंड के चमोली जिले की ऋषिगंगा घाटी में ग्लेशियर टूटने से रविवार को अचानक आई विकराल बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र में बचाव और राहत अभियान में तेजी आ गई. वहीं इस आपदा में मरने वालों की संख्या 31 हो गई और कई लापता हैं.

राज्य आपात नियंत्रण केंद्र ने मंगलवार को बताया कि उत्तराखंड में ग्लेशियर आपदा में मरने वालों की संख्या पांच और शव बरामद होने के बाद बढ़कर 31 हुई.

ऋषिगंगा घाटी के रैंणी क्षेत्र में ऋषिगंगा और धौली गंगा नदियों में आई बाढ़ से क्षतिग्रस्त 13.2 मेगावाट ऋषिगंगा और 480 मेगावाट की निर्माणाधीन तपोवन विष्णुगाड पनबिजली परियोजनाओं में लापता लोगों की तलाश के लिए सेना, भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) के जवानों के बचाव और राहत अभियान में जुट जाने से उसमें तेजी आ गई है.

उत्तराखंड राज्य आपदा परिचालन केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार, सोमवार को आपदा में 171 लोगों के लापता होने की सूचना थी जबकि 26 शव बरामद हुए थे.

अधिकारियों ने बताया कि लापता लोगों में पनबिजली परियोजनाओं में कार्यरत लोगों के अलावा आसपास के गांवों के स्थानीय लोग भी है जिनके घर बाढ़ के पानी में बह गए.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मंगलवार को जोशीमठ के रैंणी गांव में ऋषिगंगा बिजली परियोजना स्थल से तीन और शव बरामद किए गए.

अधिकारियों के अनुसार, कुंदन समूह, जो साइट पर परियोजना चलाता है, ने उन्हें 44 लोगों की सूची प्रदान की है, जो आपदा के समय प्लांट में ड्यूटी पर थे. रविवार सुबह जब यह घटना हुई थी, उस समय दो पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर मौजूद थे.

ग्रामीणों का कहना है कि 70 से अधिक लोग मलबे में दबे हुए हैं. रैंणी के सरपंच भवानी राणा ने कहा, ‘आसपास के गांवों के लगभग आठ लोग लापता हैं. पानी और कीचड़ की बाढ़ अचानक इतना जोर से आया है कि हमें कुछ समझ में ही नहीं आया, बचने के लिए क्या करना चाहिए’

एनडीआरएफ के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि सड़कों को साफ करने और लापता लोगों की तलाश में कम से कम एक सप्ताह का समय लगेगा.

केंद्रीय उर्जा मंत्री आरके सिंह ने भी प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया और बताया कि एनटीपीसी की निर्माणाधीन 480 मेगावाट तपोवन विष्णुगाड परियोजना को अनुमानित 1,500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.

उन्होंने बताया कि एनटीपीसी को परियोजना में मरने वालों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये मुआवजा देने को भी कहा गया है ताकि वह इस त्रासदी से उबर सकें.

आपदा प्रभावित क्षेत्र तपोवन क्षेत्र में बिजली परियोजना की छोटी सुरंग से 12 लोगों को रविवार को ही बाहर निकाल लिया गया था जबकि 250 मीटर लंबी दूसरी सुरंग में फंसे 35 लोगों को बाहर निकालने के लिए अभियान जारी है.

बचाव और राहत अभियान में बुलडोजर, जेसीबी आदि भारी मशीनों के अलावा रस्सियों और स्निफर कुत्तों का भी उपयोग किया जा रहा है. हालांकि, सुरंग के घुमावदार होने के कारण उसमें से मलबा निकालने तथा अंदर तक पहुंचने में मुश्किलें आ रही हैं.

रविवार को मुख्यमंत्री रावत ने आपदा प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया था और सोमवार को वह फिर बचाव और राहत कार्यों का जायजा लेने के लिए तपोवन पहुंचे.

तपोवन के लिए रवाना होने से पहले सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री रावत ने कहा, ‘मैं प्रभावित क्षेत्रों में जा रहा हूं और रात्रि प्रवास वहीं करूंगा.’

उन्होंने कहा कि क्षेत्र में राहत और बचाव कार्य तेजी से चल रहे हैं और सरकार इसमें कोई भी कसर नहीं छोड़ रही है. उन्होंने इस हादसे को विकास के खिलाफ दुष्प्रचार का कारण नहीं बनाने का भी लोगों से अनुरोध किया.

रावत ने कहा कि पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार कल से ही इस क्षेत्र में कैंप किए हुए हैं जबकि गढ़वाल आयुक्त और पुलिस उपमहानिरीक्षक गढ़वाल को भी सोमवार से वहीं कैंप करने के निर्देश दिए गए हैं.

इसी बीच, केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, गढवाल सांसद तीरथ सिंह रावत आदि ने भी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया.

संपर्क से कट गए 13 गांवों में हैलीकॉटर की मदद से राशन, दवाइयां तथा अन्य राहत सामग्री पहुंचाई जा रही हैं. राहत और बचाव कार्यों के लिए राज्य आपदा प्रतिवादन बल मद से 20 करोड़ रुपये तत्काल जारी कर दिए गए हैं.

मुख्य सचिव ओम प्रकाश ने बताया कि सरकार की मंशा लापता लोगों के परिजनों को भी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की है जिसकी जल्द ही प्रक्रिया तय की जाएगी.

लापता लोगों में श्रीनगर के एक इंजीनियर भी

उत्तराखंड में ग्लेशियर के एक हिस्से के टूट जाने की घटना के बाद से लापता लोगों में कश्मीर का एक इंजीनियर भी शामिल है.

अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि बशरत अहमद जरगर श्रीनगर के सौरा इलाके के रहने वाले हैं और वे एक निजी कंपनी के सिविल इंजीनियर के तौर पर उत्तराखंड के ऋषि गंगा बिजली परियोजना में काम कर रहे थे. वह रविवार की सुबह इस त्रासदी के बाद से लापता हैं.

उन्होंने बताया कि जरगर का अब भी पता नहीं चला है. जम्मू कश्मीर आपदा प्रबंधन निदेशक आमिर अली ने बताया, ‘हमने इस मुद्दे को उत्तराखंड सरकार के समक्ष उठाया है. हम वहां के आपदा प्रबंधन प्राधिकारियों के संपर्क में हैं. बचाव अभियान जारी है.’

एनटीपीसी परियोजना के मृतकों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये मदद की घोषणा

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने सोमवार को कहा कि उत्तराखंड के चमोली जिले के रेंणी क्षेत्र में आई विकराल बाढ़ में क्षतिग्रस्त एनटीपीसी की परियोजना में काम करने वाले मृतकों के आश्रितों को 20-20 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी.

आपदाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करने के बाद जौलीग्रांट हवाईअड्डे पर मीडिया से बातचीत करते हुए केंद्रीय मंत्री सिंह ने कहा कि इस आपदा में 13.2 मेगावाट ऋषिगंगा पनबिजली परियोजना पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई है जबकि एनटीपीसी की 480 मेगावाट तपोवन-विष्णुगाड परियोजना को भी काफी क्षति पंहुची है.

उन्होंने कहा कि नुकसान के कारणों का पता लगाने के लिए इसरो की तस्वीरों के आधार पर एनटीपीसी, टीएचडीसी और एसजेवीएनएल के पदाधिकारियों की एक टीम मौके का निरीक्षण करेगी.

इसके अलावा, सिंह ने कहा कि पर्वतीय राज्यों में सतर्कता प्रणाली उपलब्ध कराई जाएगाी ताकि हिमस्खलन आदि घटनाओं की पूर्व में जानकारी मिल सके.

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मृतक आश्रितों को राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएगी जबकि एनटीपीसी को भी मृतकों के परिजनों को 20-20 लाख रुपये देने को कहा गया है ताकि उनके परिवार आपदा से उबर सकें.

इससे पहले, तपोवन में परियोजनाओं का निरीक्षण करने के बाद सिंह ने कहा कि आपदा से तपोवन-विष्णुगाड परियोजना को लगभग 1500 करोड़ रू का नुकसान हुआ है.

उन्होंने कहा कि पहले इस परियोजना के पूरे होने की समय सीमा वर्ष 2028 तय की गई थी लेकिन अब यह कब होगा यह आंकलन करने के बाद ही तय हो पाएगा.

बता दें कि भाजपा नेता उमा भारती ने कहा है कि वह मंत्री रहते हुए गंगा और उसकी मुख्य सहायक नदियों पर पनबिजली परियोजना के ख़िलाफ़ थी.

उन्होंने उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने के कारण हुई त्रासदी चिंता का विषय होने के साथ-साथ चेतावनी भी है. उन्होंने कहा कि मंत्री रहने के दौरान उन्होंने आग्रह किया था कि हिमालय एक बहुत संवेदनशील स्थान है, इसलिए गंगा और उसकी मुख्य सहायक नदियों पर पनबिजली परियोजनाएं नहीं बननी चाहिए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)