भारत

भारत की जेलों में महिला क़ैदियों की ज़िंदगी केवल शोक के लिए अभिशप्त है…

जेलें क़ैदियों को उनके अपराध के आधार पर वर्गीकृत कर सकती हैं, लेकिन जेलों, ख़ासतौर पर महिला जेलों में वर्गीकरण सिर्फ अपराधों से तय नहीं होता है. यह सदियों की परंपराओं और अक्सर धर्म द्वारा स्थापित नैतिक लक्ष्मण रेखा लांघने से जुड़ा है. ऐसे में भारतीय महिलाएं जब जेल जाती हैं, तब वे अक्सर जेल के भीतर एक और जेल में दाख़िल होती हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

यह आलेख ‘बार्ड- द प्रिजन प्रोजेक्ट’ सीरीज के हिस्से के तौर पर पुलित्जर सेंटर ऑन क्राइसिस रिपोर्टिंग के साथ साझेदारी में प्रस्तुत किया गया है. 

Pulitzer Center

नई दिल्ली/नागपुर: सिर्फ एक पंखे और एक बल्ब की जरूरत वाले एक छोटे से कमरे में 45 औरतों को रखने के लिए प्रेसिडेंसी सुधार गृह (करेक्शनल होम) के अधिकारियों ने एक तरकीब निकाली: औरतों की शरीर का नाप लेकर उन्हें उनके आकार के ठीक बराबर की सोने की जगह आवंटित करने की. यह वाकया अपराजिता बोस ने सुनाया.

जेलों में समय बिताने वाले लोगों के साथ ज्यादातार चर्चाओं जो एक शिकायत आमतौर पर सुनने को मिली, वह थी: निजता (प्राइवेसी) नाम की किसी चीज की गैरहाजिरी.

मीना कहती हैं, ‘वहां कभी भी शांति नहीं थी. मैं शांति के लिए प्रार्थना करती थी, या एक ऐसे पल के लिए जब कोई मेरी तरफ न देख रहा हो.’

मीना* ने दहेज संबंधित एक मामले में, चार साल शाहजहांपुर जिला कारागार में बिताए. बाद में यह मामला वापस ले लिया गया.

‘आपको कान में मच्छर के भनभनाने की आवाज पता है? उस आवाज की कल्पना कीजिए, मगर शोक की आवाज के साथ. रोते हुए या शिकायत करते लोग, या कैदियों को डांटते-फटकारते जेल के स्टाफ… ज्यादातर समय ये आवाजें ही कानों में पड़ा करती थीं.’

मीना ने बताया कि 2003 में जेल में एक बार पानी की काफी किल्लत रही. ‘वह भीषण गर्मी का समय था, लेकिन हम चार-पांच दिनों में एक बार से ज्यादा नहा नहीं पाते थे. इस पर भी तीन लोगों पर नहाने के लिए एक ही बाल्टी होती थी. वहां कुछ भी आपका नहीं था- यहां तक कि नहाने का वक्त भी आपका निजी नहीं था.’

मीना बताती हैं कि जेल में बिताए गए चार सालों के दौरान उनसे मिलने सिर्फ दो बार लोग आए. यह दोनों मुलाकातें उनके जेल प्रवास के पहले साल में हुईं.

उन्होंने कहा, ‘मेरा बेटा भी इसी मामले में जेल में था. मेरी बेटी एक बार आई और मेरा भाई भी. लेकिन जेल उनके लिए काफी दूर थी और यहां तक आना काफी खर्चीला भी था. हमारे गांव से अगर कोई मुझसे मिलना चाहता तो उसे बस से 7 घंटे का सफर करना पड़ता.’

चूंकि भारत में महिला जेलों की संख्या काफी कम है, इसलिए महिला कैदियों को अक्सर उनके घरों से काफी दूर कैद करके रखा जाता है. ऐसे में मीना जैसी कैदियों की बेटी या भाई का सफर कोई अपवाद नहीं है. कैदी महिलाएं सामाजिक कलंक को भी ढोती हैं. उन्हें कानूनी तौर पर ही नहीं, नैतिक तौर भी अपराधी माना जाता है- जिसका अर्थ यह है कि अक्सर उनके परिवार द्वारा भी उन्हें छोड़ दिया जाता है.

पीनल रिफॉर्म्स एंड जस्टिस एसोसिएशन की सचिव और पीनल रिफॉर्म इंटरनेशनल की अध्यक्ष रानी धवन शंकरदास अपनी किताब ‘ऑफ वुमेन इनसाइड’ : प्रिजन वॉइसेज फ्रॉम इंडिया (2020) अपनी किताब में लिखती हैं :

जेल, कैदियों को उनके कानूनी अपराध के आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं, लेकिन जेलों का सामाजिक वर्गीकरण, खासतौर पर महिला जेलों में, सिर्फ कानूनी अपराधों से तय नहीं होता है: यह सदियों से रीति-रिवाजों, परंपराओं और अक्सर धर्म द्वारा स्थापित सामाजिक और नैतिक लक्ष्मण रेखाओं को लांघने से संबंधित है. इसके नियम के कानून से भी ज्यादा कठोर होने की उम्मीद की जाती है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

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लीला* याद करती हैं, निजता की कमी तो सामान्य बात है. एक बार तो ऐसा हुआ कि बायकुला जेल के अधिकारियों ने एक कदम और आगे जाने का फैसला करते हुए महिलाओं के बैरकों में सीसीटीवी लगाने का फैसला कर लिया.

हम में से कई कैदियों ने इस कदम का विरोध किया- हमने कहा कि अगर आप सीसीटीवी लगाना चाहते हैं, तो आपको यह काम अधिकारियों के दफ्तरों में करना चाहिए, जहां कैदियों के खिलाफ हिंसा होती है और पैसों का लेन-देन (घूस के तौर पर) चलता है.

वे कहती हैं, ‘बाहर के हिस्सों और गलियारों में कैमरा लगने से हमें कोई दिक्कत नहीं थी. हमें बैरकों के भीतर कैमरे लगाने से दिक्कत थी. भीषण गर्मियों में हम अक्सर काफी कम कपड़े पहनकर सोते थे.’

अधिकारियों ने लीला को इस विद्रोह को ‘उकसाने वाले’ के तौर पर देखा और उन्हें सजा देने के लिए एकांत कारावास में डाल दिया गया. लेकिन पांच दिनों के बाद यह मसला प्रेस में आ गया.

‘और इसके बाद एक जज जेल का मुआयना करने के लिए आए और अधिकारियों ने जल्दबाजी में बैरकों के भीतर सीसीटीवी कैमरा लगाने के लिए पाइप डालने और दूसरी तैयारियों को हटा दिया.’

बात बस इतनी नहीं है कि जेल में कोई आप पर लगातार निगाह रखे हुए है. महिला कैदियों ने द वायर  को बताया कि बात इस एहसास की भी है कि आपका आपके शरीर के साथ किए जाने वाले बर्ताव पर कोई नियंत्रण नहीं है.

मीना कहती है, ‘महिला सुरक्षार्मियों के सामने हमें पूरे कपड़े उतारने पड़ते थे और वे उन सभी जगहों पर हाथ रखती थीं, जिसकी आप कल्पना कर सकते हैं. और इसको लेकर आप कुछ भी नहीं कर सकती हैं. आपको अपनी पूर्ण निःशक्तता का एहसास होता है.

लीला कहती है, ‘इस बात से भी कोई फर्क नहीं था कि किसी महिला की माहवारी चल रही है. उन्हें अपने अंतर्वस्त्र उतारकर टांगों को फैलाने के लिए कहा जाता था.’

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अपने पति की हत्या के बाद अपराजिता बोस को 13 साल (2000-2013) जेल में गुजारने पड़े. बाद में उन्हें कोलकाता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरी कर दिया गया. प्रेसिडेंसी जेल, जहां उन्होंने अपने जेल प्रवास के पहले आठ साल गुजारे, वहां महिलाओं का अहाता, बड़े पुरुष कारागार के भीतर ही है.

भारत की 1,350 जेलों में से सिर्फ 31 महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. और सिर्फ 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अलग महिला जेलें हैं. बाकी सभी जगहों पर महिला कैदियों को पुरुष जेलों के भीतर छोटे अहातों में रखा जाता है- जिसे जेल के भीतर जेल कहा जा सकता है.

2019 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं के लिए आरक्षित कारागारों की भर्ती दर (आक्युपेंसी रेट) 56.09 फीसदी है. यह एक विचलन है, क्योंकि भारत की जेलें ठसाठस भरी होने के लिए कुख्यात हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

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उदाहरण के लिए भारत की 410 जिला जेलों का औसत आक्युपेंसी रेट 129.71 फीसदी है. दिसंबर 2019 में- सबसे हाल के जो आंकड़े उपलब्ध हैं- महिला जेलों के पास 6,511 महिला कैदियों को रखने की क्षमता थी, लेकिन इनमें वास्तव में 3,652 कैदी ही रह रही थीं.

दूसरी जेलों में महिलाओं के लिए आक्युपेंसी रेट कहीं ज्यादा 76.7 फीसदी है, लेकिन इससे भी यही छवि बनती है कि महिला कैदियों को जगह की दिक्कत नहीं है.

राज्यों के हिसाब से देखने पर ये आंकड़े अलग नजर आने लगते हैं. कई राज्यों में महिला कैदियों के लिए निर्धारित जेलें क्षमता से ज्यादा भरी हुई हैं और राष्ट्रीय औसत वास्तव में इस हकीकत को छिपाने का काम करता है.

कारावास को अपने आप में ही सजा माना जाता है और भारतीय जेल प्रणाली भी पुनर्वास पर ध्यान देने का दावा करती है. लेकिन क्षमता से ज्यादा भीड़ के साथ-साथ कई दूसरे मसले भी गरिमापूर्ण और स्वस्थ जीवन जीने के कैदी के अधिकार के आड़े आते हैं.

बोस कहती हैं, ‘हमें सोने के लिए सिर्फ कंबल दिए गए थे- गर्मियों में दो और जाड़े में छह.’ लेकिन मेरी त्वचा कंबल के कपड़े से एलर्जिक थी, इसलिए मुझे खुले फर्श पर सोना पड़ता था. कैदियों को बाहर से किसी प्रकार की चटाई या गद्दे का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं थी- इसे बहुत बड़ा ठाठ-बाट समझा जाता था.’

2000 से 2008 के बीच बोस कोलकाता के प्रेसिडेंसी सुधार गृह की कैदी थीं (पश्चिम बंगाल में जेलों को सुधार गृह- करेक्शनल होम्स- कहा जाता है). 2008 में उन्हें अलीपुर सुधार गृह में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां वे अपनी रिहाई तक रहीं.

प्रेसिडेंसी में शौचालय कमरे के अंदर था, जिसे वे 44 महिला कैदियों के साथ साझा करती थी. ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सफाई और स्वच्छता की कमी एक बड़ा मसला था.

वे कहती हैं, ‘महिलाएं नियमित तौर पर अपने सैनिटरी नैपकिनों को कूड़ेदान की जगह शौचालय में फेंक दिया करती थीं …और किसी ने भी इस समस्या का समाधान करने की कभी कोई कोशिश नहीं की. हर महीने माहवारी वाली महिलाओं को सिर्फ 12 सैनिटरी नैपकिन दिए जाते थे.

वे कहती हैं, ‘अगर आपका मासिक स्राव ज्यादा हो और आपको ज्यादा नैपकिन की जरूरत हो, तो वे आपको बस गॉज बैंडेज और रूई दे दिया जाता था, जिससे हमें अपने लिए अपना नैपकिन खुद तैयार करना होता था. इसे फेंकने के लिए सिर्फ एक बैग था, जिसकी हर दिन ठीक से सफाई नहीं की जाती थी.’

माहवारी संबंधी स्वच्छता उन कई चीजों में से एक चीज थी, जिस पर महिला कैदियों का कोई वश नहीं था क्योंकि प्रेसिडेंसी जेल के भीतर महिला कैदियों का अनुभाग बड़ी पुरुष जेल के भीतर एक अहाते के तौर पर था, इसलिए उन्हें मिलने वाले खाने और उसे पकाये जाने के तरीके संबंध में उनकी कोई मर्जी नहीं चलती थी.

बोस याद करती हैं, ‘प्रेसिडेंसी का खाना बहुत ही डरावना था.’ और सिर्फ स्वाद की ही बात नहीं है… वे कहती हैं, ‘उन सालों में हमें बैंगन में कीड़े और चावल में इल्लियां मिला करते थे.’

उनको लगता है कि अलीपुर सुधारगृह में खाना इससे काफी बेहतर था. ‘वहां कैदी जेल निरीक्षक को खाने की पसंद-नापसंद बता दिए करते थे और उस हिसाब से एक अनुबंधित किए गए विशिष्ट संस्थान द्वारा खाना बना दिया जाता था.’

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार जेलों द्वारा उन्हें मिलने वाले पैसे का लगभग आधा हिस्सा भोजन पर खर्च किया जाता है. (2019 में यह 47.9 फीसदी था) मॉडल प्रिजन मैन्युअल- 2016 में प्रतिदिन प्रति कैदी के लिए अनिवार्य कैलोरी का प्रावधान किया गया है : पुरुषों को 2,320 किलो कैलोरी से 2,730 कैलोरी और महिलाओं को 1,900 किलो कैलोरी से 2,230 कैलोरी.

इस मैन्युअल में गर्भवती और स्तनपान करा रही महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान किया गया और यह स्वीकार किया गया है कि इन्हें दूसरों से ‘ज्यादा प्रोटीन और खनिज (मिनरल्स) की जरूरत होती है.’

क्या खाना परोसा जाएगा, यह फैसला राज्यों पर छोड़ दिया गया है, क्योंकि भारत में जेलें ‘राज्य सूची’ के तहत आती हैं. लेकिन कैदियों को अक्सर उन्हें मिलने वाले भोजन की मात्रा और गुणवत्ता, दोनों को लेकर जूझना पड़ता है.

26 दिसंबर, 2011 को मुंबई के बायकुला जेल की विचाराधीन महिला कैदियों ने उन्हें हर दिन दिए जाने वाले पनीले खाने को लेकर कुछ करने का फैसला किया. जेल के भीतर एक दिन की भूख हड़ताल में भाग लेने वाली महिला कैदियों में से एक लीला बताती हैं, ‘महाराष्ट्र प्रिजन मैन्युअल में कहा गया है कि महिला कैदियों कों पुरुष कैदियों की तुलना में कम रोटियां मिलनी चाहिए. ‘कुछ के लिए यह मात्रा ठीक थी, लेकिन अन्यों के लिए यह काफी नहीं था. और नियमों में ऐसा भेदभाव कैसे किया जा सकता है?’

उस समय जेल में काफी संख्या में बांग्ला भाषी महिला कैदी बंद थीं: राज्य सरकार के मुताबिक वे बांग्लादेश से गैरकानूनी रूप में सीमा पार करके आई थीं. लीला कहती हैं, ‘वे रोटियां नहीं खाना चाहती थीं. उन्हें चावल (भात) खाने की आदत थी. इसलिए हमारी मांग थी कि उन्हें खाने के लिए पर्याप्त भात दिया जाए. उनमें से कइयों के साथ उनके बच्चे भी थे और उन्हें भी पर्याप्त मात्रा में भात की जरूरत थी.’

बायकुला जेल के मेडिकल ऑफिसर को हर दिन यह जांचने के लिए कि क्या कैदियों के लिए जो खाना बनाया गया है, वह उनके खाने के लिए ठीक है या नहीं, एक परीक्षण थाली (टेस्ट प्लेट) दी जाती थी. लेकिन लीला के मुताबिक कैदियों ने यह जल्दी ही भांप लिया कि ऑफिसर जिस खाने को टेस्ट करते हैं और उन्हें जो खाना दिया जाता है, वह दोनों एक नहीं है.

लीला बताती हैं, ‘उनकी प्लेट का खाना तो बहुत अच्छा लगता था, बिल्कुल घर के खाने जैसा.’ खाने में पानी की मिलावट इतनी ज्यादा थी कि ‘जब तक खाना कैदियों तक पहुंचता था, तब तक यह बस पानी रह जाता था.’

2011 की एक दिवसीय हड़ताल सफल रही, क्योंकि बायकुला जेल की लगभग सभी महिला कैदियों ने इसमें हिस्सा लिया. और कुछ दिनों के लिए, जैसा कि लीला बताती हैं, खाने की गुणवत्ता बेहतर हो गई. लेकिन वे यह भी कहती है कि उन्होंने सितंबर, 2016 में वहां से रिहा होने से पहले वहां जो बचा हुआ समय बिताया, उस दौरान भी इस मसले को लेकर खींचतान चलती रही.

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ससुराल वालों द्वारा पति की हत्या के मामले में झूठे तरीके से फंसाए जाने के बाद अपराजिता बोस ने 13 वर्ष जेल में बिताए. लेकिन कुछ मायनों में वे खुद को काफी खुशकिस्मत मानती हैं. वे कहती हैं, ‘मेरे पास एक काफी अच्छा वकील था. सिर्फ जयंत नारायण चटर्जी के कारण मैं बरी हो सकी.’

लेकिन जेल में अपने आवास के दौरान बोस को कई महिलाएं मिलीं, जो वहां वर्षों से थीं- और सरकार द्वारा उन्हें रिहा करने के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे थे. इसलिए जेल से बाहर आने और मुफ्त कानूनी सहायता मुहैया कराने और विधिक साक्षरता को प्रोत्साहन देने वाले ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) नामक एक एनजीओ में नौकरी पाने के बाद उन्होंने सिर्फ औरतों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि जेल से बाहर आने के बाद वे फिर से अपने जीवन का पुननिर्माण करने में समर्थ हो सकें.

औरतों को मदद की सबसे ज्यादा इसलिए जरूरत थी क्योंकि जेल प्रणाली के पुनर्वास प्रयासों का एकमात्र ध्यान व्यावसायिक शिक्षा (वोकेशनल ट्रेनिंग) कार्यक्रम पर है, जो औरतों को सिलाई सिखाता है.

लेकिन आजीवन कैद की सजा पानेवाली कई महिला कैदियों को उनका परिवार और समाज स्वीकार नहीं कर रहा था. ‘अगर रिहा होने के बाद उनके सिर पर छत ही नहीं है, तो वोकेशनल ट्रेनिंग की क्या उपयोगिता है?’

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

बोस कहती हैं, ‘मैं कुछ कैदियों के साथ काफी जुड़ गई और मुझे पता है कि उन्हें भी मेरी तरह झूठे तरीके से फंसाया गया था.’ उनके वकील चटर्जी अब काफी लंबे कारावास काट रही महिला कैदियों की रिहाई की कोशिश करने के लिए एचआरएलएन के साथ काम कर रहे हैं.

इसी के साथ काफी करीबी तौर पर जुड़ा हुआ मसला जेलों में घूम-फिर सकने की आजादी का है. बोस ने द वायर  को बताया, ‘कम से कम पुरुषों के लिए खुली जेलों का तो प्रावधान है. अगर उन्होंने अपने 14 साल (आजीवन कारावास की न्यूनतम अवधि) जेल में बिता लिए हैं और उन्होंने अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन किया है, तो उन्हें इस तरह से जीवन बिताने की इजाजत मिलती है, जो सामान्य जीवन का थोड़ा-सा आभास कराता है. लेकिन पश्चिम बंगाल में महिलाओं के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.’

भारत में लगभग अब सौ सालों से किसी न किसी रूप में खुली जेलों का वजूद रहा है. 2019 में 17 राज्यों में 86 कार्यरत खुली जेलें थीं. इनमें से सिर्फ चार राज्यों में- झारखंड, केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान- 2019 के अंत में महिला कैदियों को खुली जेलों में रखा गया था.

महिला कैदियों के लिए पहली खुली जेल का उद्घाटन पुणे के यरवडा केंद्रीय कारावास में 2010 में किया गया. पुरुषों के लिए ऐसी व्यवस्था की शुरुआत काफी पहले 1953 में हो गई थी.

खुली जेलों का मकसद कैदियों को एक बंद घेरे में एक लगभग सामान्य जीवन जीवन जीने की इजाजत देना है. ‘लगभग सामान्य’ में काम करने के अधिकार जैसी ज्यादा व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक पहुंच शामिल है. आंशिक तौर पर खुली जेलों में कैदी जेल परिसर के भीतर निश्चित क्षेत्र में काम करते हैं, लेकिन उनके रहने की व्यवस्था जेल की कोठरियों से ज्यादा बाहर के घरों से मिलती है.

खुली जेलें कैदियों को परिवार के साथ रहने और काम करने जाने देने का अधिकार देती हैं, जब तक कि वे तय समय पर अपने आवंटित क्वार्टरों में लौट आएं. इस सुविधा के लिए कौन योग्य है, इसको लेकर नियम राज्य बनाते हैं.

2016 में जब दिल्ली की प्रसिद्ध तिहाड़ जेल के लिए दो दशकों से ज्यादा समय तक बतौर लॉ ऑफिसर काम करनेवाले सुनील गुप्ता सेवानिवृत्त हुए, तब उन्होंने उसी लैंगिक भेदभाव को चुनौती देने का फैसला किया, जिसके खिलाफ बोस संघर्ष कर रही हैं.

तिहाड़ जेल में पुरुष कैदियों के लिए खुली जेल की सुविधा है, मगर महिला कैदियों के लिए ऐसी किसी सुविधा का अस्तित्व नहीं है.

वे कहते हैं, ‘जब मैं तिहाड़ में काम किया करता था, तब मुझे लगता था कि महिला कैदियों के लिए खुली जेलें सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर व्यावहारिक तौर पर किसी दुःस्वप्न की तरह होंगी. मैंने जब अवकाश ग्रहण किया, तब मैंने दिल्ली उच्च न्यायालय में बतौर वकील काम करना शुरू किया, मुझे यह बात समझ में आ गई कि यह इस मसले को देखने का सही नजरिया नहीं था.’

गुप्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि सभी कैदियों के साथ बराबरी का बर्ताव करना सरकार का कर्तव्य है. उच्च न्यायालय ने भी इस असमानता को लेकर अपनी नाखुशी प्रकट की और सरकार ने आगे चलकर इस व्यवस्था (खुली जेल की) को और विस्तार देने को लेकर अपनी सहमति प्रकट की और 2019 में तिहाड़ में महिलाओं के लिए एक आंशिक तौर पर खुली जेल का उद्घाटन किया.

मद्रास हाईकोर्ट ने भी इसी तरह के एक मामले की सुनवाई की जब केआर राजा नामक एक वकील ने महिला कैदियों के लिए खुली जेल की सुविधा मुहैया न कराने के राज्य सरकार के फैसले को भेदभाव भरा और गैरकानूनी बताते हुए एक जनहित याचिका दायर की.

इस मामले में भी कोर्ट ने याचिकाकर्ता के साथ अपनी सहमति प्रकट की. कोर्ट की पीठ ने महिला कैदियों, ट्रांसजेंडर कैदियों या ऐसे कैदी जिनका कोई और मामला कोर्ट के समक्ष लंबित है और राजनीतिक बंदी, को खुली जेलों का इस्तेमाल करने से रोकने वाले राज्य के ‘जेल नियमों’ को ‘असंवैधानिक’ करार दिया.

गुप्ता के मुताबिक ऊपरी तौर नियमों को देखकर ऐसा लगता है कि महिला कैदियों को पुरुष कैदियों की तुलना में ज्यादा स्वतंत्रता हासिल है. मिसाल के लिए तिहाड़ जेल में पुरुष कैदियों के लिए हर दिन 12 बजे दोपहर से 3 बजे दोपहर तक अपनी कोठरियों में रहना जरूरी है; दूसरी तरफ महिला कैदियों को इन घंटों में खुले हिस्सों रहने की इजाजत है.

मगर गुप्ता द वायर  को बताते हैं, ‘पर छूट तब भी पुरुषों वाले भाग में ज्यादा है. वहां जगह ज्यादा है, वहां ज्यादा लोग हैं और सबका मन बहलाए रखने के लिए क्रिकेट के खेल जैसी ज्यादा शारीरिक गतिविधियां हैं. महिला कैदियों के गतिविधियों के नाम पर कीर्तन करना और पापड़ बनाना आता है.’

बोस और लीला दोनों ही इस बिंदु पर एक जैसी राय रखती हैं और कहती हैं कि ‘वोकेशनल ट्रेनिंग के नाम पर जेलें महिलाओं को कैसे काम करने चाहिए के उन्हीं लैंगीकृत विचार को पुख्ता करने का काम करती हैं, जिनका सामना उन्हें बाहर की दुनिया में करना पड़ता है.

गुप्ता कहते हैं कि अगर आप महिला अनुभाग की किसी कैदी से पूछें, तो वे कहेंगी कि वे पुरुष अनुभाग में कैद किया जाना ज्यादा पसंद करतीं. और यही बात कर्मचारियों पर भी लागू होती है. ‘वे महिलाओं के अनुभाग में काम करने की जगह पुरुषों वाले अनुभाग में काम करना ज्यादा पसंद करते/करतीं.’

लीला कहती हैं, महिला कारागारों का माहौल काफी उदास रहता है- हालांकि एक विरोधाभास यह है कि ये जेलें महिला कैदियों को ज्यादा जगह भी मुहैया कराती हैं, क्योंकि उनमें कैदियों की संख्या कम होती है.

वे याद करती हैं, ‘बायकुला जेल में कुछ न कुछ हमेशा होता रहता था- नए लोग आते रहते थे, किसी की कोर्ट में तारीख होती थी; किसी की मुलाकात की तारीख होती थी; गाने होते थे. यहां तक कि जब लोग रो रहे होते थे, तो भी यह काफी शोरगुल भरा होता था.’

नागपुर जेल में उनके समय बीतने की रफ्तार धीमी थी. ‘वहां जगह कहीं ज्यादा बड़ी थी, लेकिन माहौल काफी अलग था. बायकुला जेल में आशा का माहौल दिखाई देता था, क्योंकि वहां महिलाएं ज्यादातर विचाराधीन कैदी थीं. लेकिन दोषसिद्ध लोगों की नागपुर जेल में ऐसा माहौल नहीं दिखाई देता था.’

लीला कहती हैं, ‘एक अन्य प्रकट अंतर वास्तव में भारत में असमान विकास को दिखाता था. मुंबई एक बड़ा शहर है, यहां कैद महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर ज्यादा जागरूक हैं और उनको लेकर आवाज उठाने के लिए ज्यादा तैयार हैं. नागपुर में ज्यादातर कैदी नजदीक के छोटे शहरों और गांवों के होती हैं, और जेल कर्मचारी भी पाबंदी वाले सामाजिक नियमों को लागू करते हैं. बायकुला में आप किसी कर्मचारी को किसी महिला कैदी से यह कहते नहीं सुन सकेंगे कि हम यह नहीं पहन सकते है या वो नहीं पहन सकते. लेकिन नागपुर में हमें जेल के अहाते में जींस पहनने की इजाजत नहीं थी.’

लीला बताती हैं, ‘मुझे याद आता है एक बार हमारी एक साथी कैदी की कोर्ट में तारीख थी. वह सामान्य तौर पर हमेशा साड़ी पहना करती थी, लेकिन उस दिन हमने उसे सलवार कुर्ता पहनने के लिए प्रोत्साहित किया, क्योंकि वह वास्तव में ऐसा चाहती थी. लेकिन उसके विदा होने से पहले जेल अधिकारियों ने उसे कपड़े बदलने के लिए वापस भेज दिया.’

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यह एक सामान्य जानकारी है कि अधिकारी सभी कैदियों के साथ बराबरी का बर्ताव नहीं करते हैं. वर्षों से ऐसी रपटें आती रही हैं कि कैसे पैसे या राजनीतिक रसूख वाले कैदियों के साथ बेहतर बर्ताव किया जाता है.

महिला जेलें भी इस मामले में अलग नहीं हैं : वर्ग, जाति, धर्म और राष्ट्रीयता किसी महिला कैदी के जेल अनुभव को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. जैसा कि द वायर  की रिपोर्ट में बताया गया था, भारतीय जेलों में जाति पदानुक्रम इतने गहरे तक धंसा हुआ है कि जेलों में कामों का आवंटन किस तरह से किया जाना है, इसे प्रिजन मैन्युअल में बाकायदा लिखा गया है.

लीला जब बायकुला जेल मे थीं, उस समय कुछ समय के लिए उनकी एक साथी कैदी थीं जया छेडा, जो मटका जुए का नेटवर्क (लॉटरी का एक रूप) चलाने के लिए जानी जाती थी. उसे अपने पति की हत्या के लिए गिरफ्तार किया गया था.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

लीला बताती हैं कि छेडा महिला जेल से भी व्यावहारिक तौर पर मटका जुए के नेटवर्क को चलाया करती थीं. जेल कर्मचारी और दूसरे कैदी भी उसके साथ अलग तरीके से व्यवहार करते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि वो उनके काम करवा सकती है. अन्य कैदी उसकी सेवा किया करते थे, जिसमें उसके शरीर की मालिश करना शामिल था. कर्मचारी उसे मेडिकल देखभाल के नाम पर अस्पताल जाने या कोर्ट की तारीख के नाम पर नियमित तौर पर जेल से बाहर जाने की इजाजत देते थे.

लीला कहती हैं, ‘और वह बदले में उनकी मदद किया करती थी- उन महिलाओं के लिए बेल भरने से लेकर जो इसका खर्चा नहीं उठा सकती थीं, उन्हें अपना फोन इस्तेमाल करने देने तक (जिसकी छूट जेल अधिकारियों ने उसे दे रखी थी), से लेकर दूसरों के लिए बाहर संदेश भिजवाने तक, जैसे काम वह बदले में कर दिया करती थी.’

अगर एक सिरे पर जया छेडा जैसी कैदी है, तो दूसरे सिरे पर बीना* जैसी कैदी हैं.

10 दिसंबर 2020 को बीना अपने कमरे मे अकेली थीं, जब उन्हें बाहर शोरगुल की आवाज सुनाई दी. वह अपने पड़ोसियों की आवाजों को सुन सकती थी- जिनमें से कई उसकी ही तरह सेक्स वर्कर थीं. वे भाग रही थीं और चीख रही थीं कि पुलिस उस इलाके पर छापे मार रही है.

पुलिस ने नागपुर के गंगा-जमुना इलाके, जो शहर का रेड लाइट इलाका है, से 81 औरतों को गिरफ्तार किया. बीना बताती हैं कि पुलिस ने उसे कमरे से खींच बाहर किया, जबकि उन्होंने पुलिस की कार्रवाई का यह कहते हुए विरोध भी किया था कि वह दो महीने की गर्भवती हैं.

इनमें से कई ने आरोप लगाया है कि औरतों को ले जाते वक्त पुलिस ने खुलकर अपने डंडों और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया.
उनमें से एक ने कहा, ‘थाने में वे पुलिस कर्मचारी बार-बार यह कहते रहे कि यह रंडीखाना नहीं है. और हमें रंडी कहकर पुकारते रहे.’

एक दूसरी औरत ने कहा, ‘उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि हम अपना सारा सामान ऐसे ही बिना किसी की निगरानी के छोड़ रहे हैं. उन्हें इस बात का भी कोई ध्यान नहीं था कि उन्होंने हमारे बच्चों और बड़े-बुजुर्गों के साथ कैसा बर्ताव किया.’

पुलिस हिरासत में दो रात गुजारने के बाद इन महिलाओं को कोविड-19 क्वारंटीन सेंटर लेकर जाया गया, जहां उन्हें तीन हफ्ते बिताने थे.

बीना याद करती है, ‘क्वारंटीन सेंटर के कर्मचारी काफी बदतमीज थे. वे लोग बार-बार हमें बहुत गंदा कहते थे. मगर उनके पास सिर्फ एक बाथरूम था, जिसमें सिर्फ तीन क्यूबिकल थे. वे क्या उम्मीद करते थे?’

भारत में महिला जेलों में एक खास किस्म का पृथक्करण अनिवार्य हैः वेश्यावृत्ति विरोधी कानून, अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम (पिटा), 1965 के तहत गिरफ्तार महिलाओं को अलग रखा जाना जरूरी है क्योंकि ये औरतें- कानून बनाने वालों के अनुसार- दूसरों पर बुरा असर डाल सकती हैं.

यह ‘नियम’ गृह मंत्रालय के ‘2016 मॉडल प्रिजन मैन्युअल’ में भी लिखा हुआ है- जो राज्य के अधिकारियों के लिए जेल तंत्र के नियमन का मॉडल है. महिला कैदियों से संबंधित अध्याय की उपधारा 20.04 में कहा गया है, ‘आदतन अपराधियों, वेश्याओं और वेश्यालय चलाने वालों को अनिवार्य तौर पर अलग से रखा जाना चाहिए.’

उपनिवेशी भारत में ब्रिटिश हुकूमत ने कुछ स्थानीय जनजातियों को (जिन्हें अब डिनोटिफाइड ट्राइब्स कहा जाता है) को जन्मजात अपराधी के तौर पर वर्गीकृत किया गया था.

हालांकि भारत सरकार ने इस अपराधी के लेबल को कानूनी तौर पर हटा दिया, लेकिन पुलिस द्वारा अपराधी जनजाति अधिनियम (क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट) की जगह लेने वाले आदतन अपराधी अधिनियम का इस्तेमाल इस हाशिये के समूह को निशाना बनाने और उन्हें कलंकित करने के लिए नियमित तौर पर किया जाता है.

भारत में ज्यादातर सेक्स वर्कर भी दलित जातियों से आती हैं- और इस तरह से यह तथ्य कि मॉडल प्रिजन मैन्युअल सेक्स वर्करों और ‘आदतन अपराधियों’ को अलग रखने की बात करता है, आपराधिक न्याय प्रणाली के भीतर जारी जाति भेदभाव की ओर इशारा करता है.

पिटा अपने आप में वेश्यावृत्ति को गैरकानूनी करार नहीं देता है, लेकिन यह वेश्यालय रखने या उसका इस्तेमाल करने को, देह-व्यापार से की गई कमाई पर जीवन-यापन, वेश्याओं के लिए ग्राहक लाने, वेश्यावृत्ति में जाने के लिए प्रोत्साहित करने, सार्वजनिक इलाके में वेश्यावृत्ति आदि को गैरकानूनी बनाता है.

बीना और उसके साथ गिरफ्तार किए गए अन्यों पर पिटा के साथ-साथ पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए थे. पुलिस के अनुसार ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उन्होंने 17 साल की आठ लड़कियों को उस इलाके से बचाया.

हालांकि, वकीलों ने इन आरोपों को निराधार बताया है. पॉक्सो के तहत आरोप खासतौर पर उनके खिलाफ ही लगाया जा सकता है, जो खासतौर पर नाबालिगों का यौन शोषण करते हुए पाए गए हैं, न कि पूरे आस-पड़ोस पर.

नागपुर के वकील निहालसिंह राठौड़ ने द वायर  को बताया, ‘आप यह नहीं कह सकते हैं कि एक बच्चा यहां पाया गया, इसलिए आस-पड़ोस के सभी लोग पॉक्सो के तहत दोषी हैं. यह अपने आप में एक बेतुका केस है.’

मगर बेतुका हो या न हो, बीना समेत 81 औरतों ने खुद को पहले पुलिस हिरासत में और फिर कोविड-19 क्वारंटीन सेंटर में पाया. और सेंटर पर लाए जाने के दस दिनों के बाद, बीना को अपने पेट में तेज दर्द का अनुभव होने लगा.

वे बताती है कि उन्होंने क्वारंटीन सेंटर के कर्मचारियों को इसके बारे में बताने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने उसकी बातों को नजरअंदाज कर दिया. दो घंटे के भीतर उन्हें ब्लीडिंग (रक्तस्राव) होने लगी. साथी कैदियों को, जिन्हें उनके गर्भवती होने के बारे में पता था, उन्हें यह भी पता था कि तत्काल मेडिकल सहायता की जरूरत है.

बीना के साथ रखी गई एक अन्य महिला ने द वायर  को बताया, ‘हम सुरक्षाकर्मियों को बुला रहे थे, लेकिन कोई नहीं आ रहा था. एक कमरे में सीसीटीवी कैमरा था, जहां हमें रखा गया था. तो आखिर में हम सब उसके सामने खड़े हो गए और मदद के लिए इशारा करने लगे. आखिर में जब मदद पहुंची, तब गार्ड बीना को ब्लीडिंग को रोकने के लिए सैनिटरी नैपकिंस थमा कर चली गईं.’

वे कहती हैं, ‘मैं इतनी कमजोर हो गई थी कि कोई बहस तक नहीं कर सकी. मैं उन्हें मुझे डॉक्टर के पास लेकर जाने के लिए कहती रही, लेकिन वे मुझे सैनिटरी नैपकिन देकर कमरे से बाहर चली गईं. अन्य कैदियों को मेरी देखभाल करनी पड़ी. उन्होंने मुझे पानी लाकर दिया और और मुझे सहज करने की कोशिश की.’

अगले दिन बीना द्वारा अपने दर्द के बारे में बताए जाने के 24 घंटे के बाद तीन महिला पुलिसकर्मी बीना को पास के एक मेडिकल सेंटर में लेकर गईं.

बीना ने बताया, ‘शनिवार होने के कारण वहां मुख्य डॉक्टर मौजूद नहीं थी. वहां एक जूनियर डॉक्टर ने सोनोग्राफी किया और बताया कि मैंने अपना बच्चा खो दिया है. उन्होंने इसके अतिरिक्त कोई और मेडिकल सेवा नहीं की. मुझे वापस क्वारंटीन सेंटर ले आया गया. महिला पुलिसकर्मियों ने कहा कि मुख्य डॉक्टर के आने के बाद मुझे एक और और चेक-अप के लिए लेकर जाया जाएगा. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ.’

गर्भ गिरने के बाद बीना ने कुछ और दिन क्वारंटीन सेंटर में गुजारे और उसके बाद उन्हें नागपुर सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया. मॉडल प्रिजन मैन्युअल का अनुसरण करते हुए सेक्स वर्करों को अन्य कैदियों से दो कमरे दूर रखा गया.

‘हमारा आकलन हमारे अपराध के आधार पर नहीं, हमारे पेशे के आधार पर किया जा रहा था.’ बीना दुख और गुस्से के साथ कहती हैं, ‘उनके लिए मेरा गर्भवती होना कोई मायने नहीं रखता था, क्योंकि एक सेक्स वर्कर के बच्चे की कोई गिनती नहीं होती. हम आदर्श औरत की उनकी परिभाषा में नहीं आते और हमारे बच्चों के प्रति अन्य बच्चों की तरह चिंता दिखाने की कोई जरूरत नहीं.’

भारतीय जेलों में पर्याप्त मेडिकल सुविधाओं का अभाव एक ज्ञात हकीकत है. वैसी महिला कैदियों के लिए, जिन्हें स्त्री रोग विशेषज्ञ या किसी दूसरे स्पेशलिस्ट के अपॉइंटमेंट की जरूरत होती है, यह एक लगातार गंभीर होती जाने वाली समस्या है.

2016 के मैन्युअल में कहा गया कि सभी महिला जेलों में मेडिकल सुविधाएं होनी ही चाहिए, जिसमें कम से कम एक स्त्री रोग विशेषज्ञ होनी चाहिए, लेकिन ज्यादातर जिले इसे लागू नहीं कर पाए हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय की 2018 की एक रिपोर्ट में इस समस्या का उल्लेख करते हुए कहा गया, ‘संबंधित राज्य मैन्युअलों में बनाए गए नियमों के बावजूद कैदियों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है. कई मामलों में हॉस्पिटल में महिला वार्ड और महिला मेडिकल ऑफिसर खासकर स्त्रीरोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं.’

भारत के कई अन्य स्थानों की तरह, जहां शारीरिक स्वास्थ्य ही उपेक्षित है, मानसिक स्वास्थ्य की हालत और बदतर है. कारावास और सामाजिक तिरस्कार का सभी कैदियों पर गंभीर असर पड़ता है, खासकर महिला कैदियों पर, जिन्हें कलंक का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन सरकारों ने इस दिशा में मदद करने के लिए काफी कम किया है.

वास्तविकता यह है कि जेल अधिकारी सभी कैदियों के साथ ऐसे व्यवहार करते हैं, मानो वे मानसिक तौर पर स्वस्थ हैं.

लीला बताती हैं कि उनके साथ ही एक और महिला कैदी थी जो संभवतः डिमेंशिया से पीड़ित थी. ‘पूरे दिन और रात उसका रोना और गाली देना जारी रहता था- वह यह समझ पाने में अक्षम थी कि वहां क्या हो रहा है. लेकिन कर्मचारी उसके जवाब में उसे मारते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि वह उदंडता कर रही है. लेकिन मारने से क्या होता? वो तो नींद में भी गाली देती थी.’

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एक दशक पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला कैदियों के साथ व्यवहार के नियम और महिला अपराधियों के लिए गैर हिरासती उपाय (रूल्स फॉर ट्रीटमेंट ऑॅफ वुमेन प्रिजनर्स एंड नॉन कस्टोडियल मेजर्स फॉर वुमेन ऑफेंडर्स) को अंगीकार किया था, जिसे आम तौर पर बैंकॉक रूल्स कहा जाता है.

इन नियमों में कहा गया है कि क्यों महिला और पुरुष कैदियों के साथ एक जैसा बर्ताव ‘समानता’ को नहीं दिखाता है. ये नियम अपराध को अंजाम देनेवाली परिस्थितियों के महत्व को भी रेखांकित करते हैं.

साथ ही कैदी के सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान में रखने को भी अहम मानते हैं. इन नियमों का कहना है कि जहां तक संभव हो ट्रायल पूर्व हिरासत और दोषसिद्धि के बाद जेल की सजा के विकल्प की जरूरत है, क्योंकि महिलाओं के मामले में कारावास न सिर्फ अप्रभावी बल्कि उनके लिए नुकसानदेह भी पाया गया है.

यूं तो भारत पुनर्वास केंद्रित आपराधिक न्याय प्रणाली होने का दावा करता है, लेकिन भारत में अभी तक इन विकल्पों पर विचार नहीं किया गया है.

महिलाओं को जेल भेजे जाने की सूरत में बैंकॉक नियम कुछ विनियमों और सुरक्षा उपायों को लागू कराने की बात करते है. मसलन पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल, मानवीय व्यवहार, तलाशी के दौरान महिला कैदी की गरिमा की रक्षा और हिंसा से सुरक्षा.

हालांकि भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा में इन नियमों को सर्वसम्मति से पारित करनेवाले 193 देशों में से शामिल था, लेकिन महिला कैदियों के साथ किया जानेवाला बर्ताव सिफारिश किए गए अंतरराष्ट्रीय मानकों से काफी दूर है.

अपराजिता, लीला, मीना और बीना काफी अलग-अलग पृष्ठभूमियों से ताल्लुक रखती हैं और जेल प्रवास के उनके अनुभव भी अलग-अलग हैं. लेकिन उनमें कुछ साझा है और वह है भारत में महिला कैदी होना, बुनियादी मानव अधिकारों की कटौती को झेलना, भारतीय समाज के भुला दिए गए और तिरस्कृत हिस्से के तौर पर दोयम दर्जे के व्यवहार को झेलना.

जब तक उनके जैसे लोगों की कहानियां न सिर्फ सुनी जाएंगी, बल्कि उन्हें जब तक गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, उन पर चर्चा नहीं होगी और इसका इस्तेमाल महिला कैदियों को लेकर विचार और उनके प्रति बर्ताव में बदलाव लाने के लिए नहीं किया जाएगा, तब तक भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली के पूनर्वास के अपने आदर्श पर खरे उतरने की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

*पहचान सुरक्षित रखने के लिए नामों में बदलाव किया गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)