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मेहता और सुब्रह्मण्यम के इस्तीफ़े के बाद अशोका विश्वविद्यालय ने ख़ामियों की बात मानी

प्रतिष्ठित राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता ने बीते मंगलवार को हरियाणा के सोनीपत स्थित अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके दो दिन बाद पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. मेहता ने इस्तीफा देते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय से उनके जुड़ाव को राजनीतिक जवाबदेही के तौर पर देखा गया.

(फोटो साभार: फेसबुक)

(फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: हरियाणा के सोनीपत स्थित अशोका विश्वविद्यालय ने रविवार को ‘संस्थागत प्रक्रियाओं में खामियों’ की बात स्वीकार की और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता और प्रख्यात अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रह्मण्यम के फैकल्टी से इस्तीफों से जुड़े हाल के घटनाक्रम पर ‘गहरा खेद’ जताया.

हरियाणा के सोनीपत में स्थित यह विश्वविद्यालय इस हफ्ते तब विवादों के घेरे में आया जब मेहता ने प्रोफेसर के पद से इस्तीफा देते हुए कहा कि संस्थापकों ने यह ‘खुलकर स्पष्ट’ कर दिया है कि संस्थान से उनका जुड़ाव ‘राजनीतिक जवाबदेही’ था. मेहता ने दो साल पहले विश्वविद्यालय के कुलपति पद से भी इस्तीफा दिया था.

सरकार के पूर्व प्रमुख आर्थिक सलाहकार सुब्रह्मण्यम ने मेहता के साथ एकजुटता दिखाते हुए दो दिन बाद विश्वविद्यालय से इस्तीफा दे दिया था.

संस्थान ने एक बयान में कहा, ‘हम मानते हैं कि संस्थागत प्रक्रियाओं में कुछ खामियां रही हैं, जिसे सुधारने के लिए हम सभी पक्षकारों के साथ मिलकर काम करेंगे. यह अकादमिक स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता की हमारी प्रतिबद्धता को दोहराएगा जो अशोका यूनिवर्सिटी के आदर्शों में हमेशा अहम रही है.’

बयान में कहा गया है, ‘अशोका को प्रताप भानु मेहता के तौर पर पहले कुलपति और फिर सीनियर फैकल्टी के रूप में नेतृत्व एवं मार्गदर्शन का गौरव मिला. सुब्रह्मण्यम ने विश्वविद्यालय को प्रतिष्ठा दिलाई, नए विचार और ऊर्जा दी तथा उनके जाने से एक शून्य पैदा हो गया है जिसे भरना मुश्किल होगा.’

यह बयान मेहता और सुब्रह्मण्यम के साथ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, कुलपति और न्यासी मंडल के अध्यक्ष ने संयुक्त रूप से जारी किया.

बयान में कहा गया है, ‘प्रताप और अरविंद इस पर जोर देना चाहते हैं कि अशोका यूनिवर्सिटी भारतीय उच्च शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक है. वे अशोका खासतौर से उसके बेहतरीन छात्रों और फैकल्टी को छोड़कर दुखी हैं. उनका यह मानना है कि अशोका यूनिवर्सिटी को अकादमिक आजादी एवं स्वायत्तता के लिए एक उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए.’

वापसी के लिए जोर न दें छात्र: मेहता

इस बीच मेहता ने छात्रों को लिखे एक पत्र में अपनी वापसी के लिए ‘जोर’ न देने का अनुरोध करते हुए कहा कि जिन परिस्थितियों के चलते उन्होंने इस्तीफा दिया, वे निकट भविष्य में नहीं बदलेंगी.

छात्रों ने इन घटनाओं के विरोध में सोमवार से कक्षाओं का दो दिन के लिए बहिष्कार करने का आह्वान किया है. हालांकि मेहता ने कहा कि वह इस मामले को खत्म करना चाहते हैं.

प्रताप भानु मेहता. (फोटो साभार: विकिपीडिया/वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम)

प्रताप भानु मेहता. (फोटो साभार: विकिपीडिया/वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम)

मेहता ने छात्रों को लिखे पत्र में कहा, ‘जिन परिस्थितियों के चलते इस्तीफा दिया गया, वे निकट भविष्य में नहीं बदलेंगी. इसलिए मुझे यह मामला खत्म करना होगा. मैं आपसे इस मामले पर जोर न देने का अनुरोध करता हूं. मैं जानता हूं कि आप निराश नहीं होंगे. आपका उद्देश्य दो प्रोफेसरों के भाग्य से कहीं अधिक बड़ा है.’

भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को ‘गंभीर झटका’ लगा: रघुराम राजन

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि अशोका विश्वविद्यालय से भानु प्रताप मेहता तथा अरविंद सुब्रमणयम के इस्तीफे से अभिव्यक्ति की आजादी को ‘गंभीर झटका’ लगा है. उन्होंने कहा कि अशोका विश्वविद्यालय के संस्थापकों ने अपनी आत्मा से समझौता किया है.

‘लिंक्डइन’ पर पोस्ट में राजन ने कहा कि भारत में इस सप्ताह अभिव्यक्ति की आजादी को गंभीर झटका लगा है. देश के बेहतरीन राजनीतिक टिप्पणीकार प्रोफेसर मेहता ने अशोका विश्विविद्यालय से इस्तीफा दे दिया है.

राजन ने कहा, ‘सच्चाई यह है कि प्रोफेसर मेहता किसी संस्थान के लिए ‘कांटा’ थे. वह कोई साधारण कांटा नहीं हैं, बल्कि वह सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए अपनी जबर्दस्त दलीलों से कांटा बने हुए थे.’

अशोका विश्वविद्यालय में हालिया घटनाक्रमों पर शिकॉगो विश्वविद्यालय, बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रोफेसर राजन ने कहा, ‘अभिव्यक्ति की आजादी इस महान विश्विविद्यालय की आत्मा है. इस पर समझौता कर विश्वविद्यालय के संस्थापकों ने आत्मा को चोट पहुंचाई है.’

उन्होंने कहा, ‘यदि आप अपनी आत्मा को ‘बेचने’ की मंशा रखते हैं, तो क्या इससे दबाव समाप्त हो जाएगा. यह निश्चित रूप से भारत के लिए एक बुरा घटनाक्रम है.’

राजन ने सुब्रमण्यम के इस्तीफे की कुछ पंक्तियों का भी जिक्र किया है. इसमें कहा गया है, ‘यहां तक कि अशोका, जो निजी विश्वविद्यालय है और यह निजी पूंजी के जरिये संचालित है, वहां भी अकादमिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आजादी नहीं है, जो काफी परेशान करने वाली चीज है.’

राजन ने कहा, ‘यदि विश्वविद्यालय के संस्थापकों को लगता है कि उन्होंने विश्वविद्यालय के हित में शक्तिशाली लोगों से समझौता किया है, तो वे गलत हैं.’

राजन ने कहा, ऐसा नहीं है कि मेहता विपक्ष के साथ सहानुभूति रखते हैं. एक सच्चे शिक्षाविद की तरह वह उनकी भी इसी तरह से आलोचना करते हैं.

राजन ने मेहता के त्याग-पत्र की कुछ और पंक्तियों का भी उल्लेख किया है. इसमें कहा गया है, ‘संस्थापकों के साथ बैठक के बाद मुझे यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि मेरा विश्वविद्यालय से जुड़ाव को एक राजनीतिक बोझ समझा जाएगा.’

मेहता के इस्तीफे को लेकर अकादमिक विद्वानों ने अशोका विश्वविद्यालय को खुला पत्र लिखा

दुनियाभर के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के 150 से अधिक अकादमिक विद्वानों ने अशोका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद से राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता के इस्तीफे देने पर चिंता जताई है. उन्होंने इस संबंध में विश्वविद्यालय को खुला पत्र लिखा है, जिसमें मेहता के इस्तीफे की वजह राजनीतिक दबाव बताया है.

उन्होंने इस्तीफा देते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय के संस्थापकों ने ‘बिल्कुल स्पष्ट’ रूप से कहा है कि संस्थान के साथ उनका संबंध ‘राजनीतिक जवाबदेही’ था.

अकादमिक विद्वानों ने अपने खुले पत्र में लिखा है, ‘राजनीतिक दबाव के चलते अशोका विश्वविद्यालय से प्रताप भानु मेहता के इस्तीफा के बारे में जानकर हमें दुख हुआ. भारत की मौजूदा सरकार के जाने-माने आलोचक तथा अकादमिक स्वतंत्रता के रक्षक मेहता को उनके लेखों के चलते निशाना बनाया गया. ऐसा प्रतीत होता है कि अशोका विश्वविद्यालय के न्यासियों ने उनका बचाव करने के बजाय उन पर इस्तीफा देने का दबाव डाला.’

इस पत्र पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, प्रिंस्टन विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय और कैलिफॉर्निया समेत अन्य विश्वविद्यालयों के अकादमिक विद्वानों के हस्ताक्षर हैं.

पत्र में कहा गया है, ‘स्वतंत्र वाद-विवाद, सहनशीलता तथा समान नागरिकता की लोकतांत्रिक भावना राजनीतिक जीवन का हिस्सा होते हैं. जब भी किसी विद्वान को आम जनता के मुद्दों पर बोलने की सजा दी जाती है, तो ये मूल्य खतरे में पड़ जाते हैं.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)