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चुनावी बॉन्ड की बिक्री पर मोदी सरकार ने 4.10 करोड़ रुपये के कमीशन का भुगतान किया

आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी के मुताबिक़, राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के ज़रिये मिलने वाले ‘गोपनीय’ चंदे के लिए भारत सरकार को अब तक कुल 15 चरणों में हुई बिक्री के लिए 4.35 करोड़ रुपये के कमीशन देना है. साथ ही, बॉन्ड की छपाई के लिए सरकार ने 1.86 करोड़ रुपये ख़र्च किए हैं.

एसबीआई (फोटो: रायटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: मोदी सरकार द्वारा लाए गए विवादित चुनावी बॉन्ड से जहां एक तरफ राजनीतिक दलों को ‘गोपनीय चंदा’ प्राप्त हो रहा है, वहीं इसकी छपाई और बिक्री पर कमीशन का भुगतान करदाताओं की जेब से किया जा रहा है.

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत प्राप्त की गई जानकारी के मुताबिक, अब तक कुल 15 चरणों में चुनावी बॉन्ड की बिक्री के लिए भारत सरकार से 4.35 करोड़ रुपये के कमीशन का भुगतान करने के लिए कहा गया है. इसमें से सरकार ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) को 4.10 करोड़ रुपये का भुगतान कर भी दिया है.

मालूम हो कि चुनावी बॉन्ड की बिक्री के लिए सिर्फ एसबीआई ही अधिकृत बैंक है.

लोकेश बत्रा (रिटायर्ड) द्वारा दायर की गई इस आरटीआई से यह भी पता चला है कि चुनावी बॉन्ड की छपाई के लिए सरकार ने 1.86 करोड़ रुपये का भुगतान किया है.

वित्त मंत्रालय द्वारा मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक कुल 13 चरणों में चुनावी बॉन्ड की बिक्री के लिए सरकार ने एसबीआई को 4.10 करोड़ रुपये के कमीशन का भुगतान किया है. वहीं 14वें और 15वें चरण के लिए पेमेंट किया जाना बाकी है.

इसका अर्थ ये हुआ कि अरबपति करोड़ों रुपये का चुनावी बॉन्ड खरीदते हैं, राजनीतिक दल इसके जरिये करोड़ों रुपये का ‘गोपनीय चंदा’ प्राप्त करते हैं, लेकिन इसकी छपाई और कमीशन का भुगतान करदाताओं के पैसे से किया जा रहा है.

मंत्रालय ने बताया कि अब तक 6.64 लाख चुनावी बॉन्ड की छपाई हुई है. इसके लिए सरकार ने 1.86 करोड़ रुपये का भुगतान किया है.

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द वायर ने मई, 2020 में रिपोर्ट कर बताया था कि किस तरह कम राशि वाले चुनावी बॉन्ड की छपाई के चलते करदाताओं पर बेवजह का बोझ पड़ रहा है. एक चुनावी बॉन्ड को छापने 25 रुपये का खर्च आता है और इस पर छह फीसदी केंद्र एवं छह फीसदी राज्य जीएसटी भी लगता है.

मालूम हो कि केंद्र सरकार साल 2018 में चुनावी बॉन्ड को पेश किया था. हालांकि विभिन्न स्तर पर इसकी चौतरफा आलोचना हुई और चुनावी बॉन्ड के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है.

चुनावी बॉन्ड के जरिये अब तक 6,535 करोड़ रुपये का चंदा दिया जा चुका है. यह बॉन्‍ड एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपये में छपता है.

चुनावी बॉन्ड को लेकर क्यों है विवाद

चुनाव नियमों के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति या संस्थान 2,000 रुपये या इससे अधिक का चंदा किसी पार्टी को देता है तो राजनीतिक दल को दानकर्ता के बारे में पूरी जानकारी देनी पड़ती है.

हालांकि चुनावी बॉन्ड ने इस बाधा को समाप्त कर दिया है. अब कोई भी एक हजार से लेकर एक करोड़ रुपये तक के चुनावी बॉन्ड के जरिये पार्टियों को चंदा दे सकता है और उसकी पहचान बिल्कुल गोपनीय रहेगी.

इस माध्यम से चंदा लेने पर राजनीतिक दलों को सिर्फ ये बताना होता है कि चुनावी बॉन्ड के जरिये उन्हें कितना चंदा प्राप्त हुआ.

इसलिए चुनावी बॉन्ड को पारदर्शिता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना जा रहा है. इस योजना के आने के बाद से बड़े राजनीतिक दलों को अन्य माध्यमों (जैसे चेक इत्यादि) से मिलने वाले चंदे में गिरावट आई है और चुनावी बॉन्ड के जरिये मिल रहे चंदे में बढ़ोतरी हो रही है.

साल 2018-19 में भाजपा को कुल चंदे का 60 फीसदी हिस्सा चुनावी बॉन्ड से प्राप्त हुआ था. इससे भाजपा को कुल 1,450 करोड़ रुपये की आय हुई थी. वहीं वित्त वर्ष 2017-2018 में भाजपा ने चुनावी बॉन्ड से 210 करोड़ रुपये का चंदा प्राप्त होने का ऐलान किया था.

चुनावी बॉन्ड योजना को लागू करने के लिए मोदी सरकार ने साल 2017 में विभिन्न कानूनों में संशोधन किया था. चुनाव सुधार की दिशा में काम कर रहे गैर सरकारी संगठन एसोशिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स इन्हीं संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. हालांकि कई बार से इस सुनवाई को लगातार टाला जाता रहा है.

याचिका में कहा गया है कि इन संशोधनों की वजह से विदेशी कंपनियों से असीमित राजनीतिक चंदे के दरवाजे खुल गए हैं और बड़े पैमाने पर चुनावी भ्रष्टाचार को वैधता प्राप्त हो गई है. साथ ही इस तरह के राजनीतिक चंदे में पूरी तरह अपारदर्शिता है.

एडीआर ने एक और आवेदन दायर कर मांग की है कि जब तक उनकी ये याचिका लंबित है, चुनावी बॉन्ड की बिक्री पर रोक लगाया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई 24 मार्च को होगी.

साल 2019 में चुनावी बॉन्ड के संबंध में कई सारे खुलासे हुए थे, जिसमें ये पता चला कि आरबीआई, चुनाव आयोग, कानून मंत्रालय, आरबीआई गवर्नर, मुख्य चुनाव आयुक्त और कई राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इस योजना पर आपत्ति जताई थी.

हालांकि वित्त मंत्रालय ने इन सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए चुनावी बॉन्ड योजना को पारित किया.

आरबीआई ने कहा था कि चुनावी बॉन्ड और आरबीआई अधिनियम में संशोधन करने से एक गलत परंपरा शुरू हो जाएगी. इससे मनी लॉन्ड्रिंग को प्रोत्साहन मिलेगा और केंद्रीय बैंकिंग कानून के मूलभूत सिद्धांतों पर ही खतरा उत्पन्न हो जाएगा.

वहीं चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट ने हलफनामा दायर कर कहा कि चुनावी बॉन्ड से पार्टियों को मिलने वाला चंद पारदर्शिता के लिए खतरनाक है.

इसके अलावा आरटीआई के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि जब चुनावी बॉन्ड योजना का ड्राफ्ट तैयार किया गया था तो उसमें राजनीति दलों एवं आम जनता के साथ विचार-विमर्श का प्रावधान रखा गया था. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक के बाद इसे हटा दिया गया.

इसके अलावा चुनावी बॉन्ड योजना का ड्राफ्ट बनने से पहले ही भाजपा को इसके बारे में जानकारी थी, बल्कि मोदी के सामने प्रस्तुति देने से चार दिन पहले ही भाजपा महासचिव भूपेंद्र यादव ने तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखकर चुनावी बॉन्ड योजना पर उनकी पार्टी के सुझावों के बारे में बताया था.