मोदी की राजनीति के ख़िलाफ़ गुस्से का निशाना बांग्लादेश के हिंदुओं को क्यों बनाया जा रहा है

एक देश में अल्पसंख्यकों पर हमले के विरोध के दौरान जब उसी देश के अल्पसंख्यकों पर हमला होने लगे तो शक़ होता है कि यह वास्तव में किसी नाइंसाफी के ख़िलाफ़ या बराबरी जैसे किसी उसूल की बहाली के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे भी एक बहुसंख्यकवादी द्वेष ही है.

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बांग्लादेश में नरेंद्र मोदी के दौरे के दौरान हुए प्रदर्शन. (फोटो साभार: bdnews24.com)

एक देश में अल्पसंख्यकों पर हमले के विरोध के दौरान जब उसी देश के अल्पसंख्यकों पर हमला होने लगे तो शक़ होता है कि यह वास्तव में किसी नाइंसाफी के ख़िलाफ़ या बराबरी जैसे किसी उसूल की बहाली के लिए नहीं है, बल्कि इसके पीछे भी एक बहुसंख्यकवादी द्वेष ही है.

बांग्लादेश में नरेंद्र मोदी के दौरे के दौरान हुए प्रदर्शन. (फोटो साभार: bdnews24.com)
बांग्लादेश में नरेंद्र मोदी के दौरे के दौरान हुए प्रदर्शन. (फोटो साभार: bdnews24.com)

बांग्लादेश में मंदिरों पर हमले हो रहे हैं. रेलगाड़ी पर हमला किया गया है. प्रेस क्लब पर भी. थाने जलाए गए है. बसों में आग लगा दी गई. प्रेस क्लब के अध्यक्ष पर भी हमला हुआ है. अगर पत्रकारों की सुनें तो वे बहुत डरे हुए हैं.

ख़बरों के मुताबिक 11 लोग मरे गए हैं और अनेक ज़ख़्मी हैं. और यह सब कुछ कौन कर रहा है या किसके कारण हो रहा है?

उनकी वजह से जो भारत के अल्पसंख्यक मुसलमानों पर अत्याचार का विरोध करने सड़क पर उतर आए हैं. ये हिफाजते इस्लाम के लोग हैं. इनके इस विरोध का उकसावा था भारत के प्रधानमंत्री की बांग्लादेश की यात्रा.

नरेंद्र मोदी भारत में मुसलमान विरोधी या अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा की राजनीति के नेता हैं, इसमें क्या शक! उस राजनीति के देश पर काबिज होने की कीमत मुसलामानों और ईसाइयों को चुकानी पड़ रही है, इसमें कोई संदेह नहीं. इसका सिर्फ भारत ही नहीं, कहीं भी विरोध किया जा सकता है.

एक देश में अल्पसंख्यकों पर हमले के विरोध के दौरान जब उसी देश के अल्पसंख्यकों पर हमला होने लगे तो शक होता है कि यह वास्तव में किसी नाइंसाफी के खिलाफ या बराबरी जैसे किसी इंसानी उसूल की बहाली के लिए नहीं बल्कि इसके पीछे भी एक बहुसंख्यकवादी द्वेष ही है.

वरना मंदिरों पर हमला क्यों? भला बांग्लादेश के हिंदुओं की क्या भारत के मुसलमानों पर हमले में कोई भूमिका है? क्या उन्होंने भारत में बहुसंख्यकवादी राजनीति का समर्थन किया है?

हम सबको मालूम है कि इसका क्या जवाब हो सकता है. फिर मोदी की राजनीति के खिलाफ क्रोध का निशाना क्यों बांग्लादेश के हिंदुओं को बनाया जा रहा है? क्या उस देश के हिंदू भारत के हिंदुओं के आचरण के लिए जिम्मेदार हैं?

अगर नरेंद्र मोदी की यात्रा का विरोध करना था तो शांतिपूर्ण तरीके से भी किया जा सकता था. विरोध का आयोजन करने वालों का आरोप है कि उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस ने जुल्म किया, हिंसा की. इसी वजह से गुस्सा भड़क उठा.

फिर भी यह सवाल है कि इस गुस्से का निशाना पुलिस से ज्यादा हिंदू स्थल क्यों? कुछ लोग कह सकते है कि यह क्रोध और इसकी अभिव्यक्ति स्वाभाविक है.

आखिर बांग्लादेश की स्वाधीनता की सालगिरह पर उस शख्स की मेजबानी कैसे की जा सकती है जिसके राजनीतिक शब्द कोष में बांग्लादेशी का अर्थ है दीमक, घुसपैठिया? बांग्लादेशी का मतलब है भारत को चाट जाने वाला.

इस राजनीति के सरगना को यह गौरव क्यों दिया जाए? प्रश्न उचित हैं और किए जाने चाहिए. लेकिन इन सवालों की आड़ में अपने बहुसंख्यकवाद को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता.

हिफाजते इस्लाम उन संगठनों में से एक है जो बांग्लादेश में इस्लाम की हिफाजत या उसकी प्रभुता स्थापित करने के नाम पर देश की आज़ादी के बाद से ही सक्रिय हैं.

जमाते इस्लामी से हम परिचित हैं. लेकिन इस्लामी ऐक्य जोट या हरकतुल जिहाद अल इस्लामी, बांग्लादेश या जमातुल मुजाहिदीन जैसे संगठन मदरसों के मेल से एक घातक राजनीति बांग्लादेश के जातीय जीवन को खोखला कर रही है.

माना गया था कि बांग्लादेश के निर्माण के साथ जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत का अंत हो गया है. वह सिद्धांत सिर्फ जिन्ना का नहीं था. भारत में उसके पैरोकार सावरकर और बाद में हेडगेवार और गोलवलकर या उनके शिष्य दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग भी थे.

भाषा और जनतंत्र के प्रश्न पर पाकिस्तान से अलग होने वाले बांग्लादेश ने अपनी कल्पना एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में की. यह कल्पना उसके संविधान में व्यक्त हुई लेकिन जल्दी ही , 1975 में तख्ता पलट, शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवारजन की हत्या के बाद नए शासकों ने संविधान में धर्मनिरपेक्षता की ‘अल्लाह की सर्वोच्चता में आस्था’ को बांग्लादेश का निर्देशक सिद्धांत बना दिया.

उसके बाद से इस्लाम के नाम पर बने संगठन क्रमशः मजबूत होते गए. इनके साथ अहले हदीस या वहाबी मदरसों की ताकत को भी जोड़ लीजिए. इन्हें कौमी मदरसा भी कहा जाता है. अलग-अलग समय सारे राजनीतिक दलों ने इनसे समझौते किए और इन्हें मान्यता भी दी.

इनमें से एक बड़ा हिस्सा इस्लामी प्रभुत्व का ख्वाब देखता है और इसे मजहबी फर्ज मानता है कि वह उसे कायम करने के लिए हरसंभव प्रयास करे. हथियार या हिंसा के सहारे भी इसे हासिल किया जा सकता है.

क्या यह कहा जा सकता है कि भारत में बहुसंख्यकवादी राजनीति के ताकतवर होने से बांग्लादेश के इन तथाकथित ‘इस्लामपरस्त’ संगठनों को भी तर्क मिलता है.वे कह सकते हैं कि जब भारत अपनी धर्मनिरपेक्षता से हट सकता है तो फिर हमीं क्यों इसका बोझ ढोएं.

जैसे भारत में , वैसे ही बांग्लादेश में यह बहुसंख्यकवाद की पैदल सेना में समाज के निचले, गरीब तबकों से भर्ती की जाती है. एक ऐतिहासिक अन्याय की कथा में वे विश्वास करते हैं और इस बात में भी कि अभी पूरी दुनिया में जो ‘इस्लाम’ पर हमला हो रहा है, वे उसका जवाब देने का धार्मिक काम कर रहे हैं.

इसके साथ ही इसे भी ध्यान में रखना ज़रूरी है कि खुद को अन्य दलों के मुकाबले धर्मनिरपेक्ष दिखलाने वाली अवामी लीग ने बांग्लादेश में जनतांत्रिक विरोध को लगभग असंभव बना दिया है.

शेख हसीना एक जनतांत्रिक तानाशाह में तब्दील हो गई हैं और बांग्लादेश के चुनावों के निर्भय और निष्पक्ष होने पर पर्याप्त संदेह है. विरोधियों और आलोचकों के साथ सख्ती से निबटना शेख हसीना का स्वभाव बन गया है.

यह जो जनतांत्रिक रिक्तता पैदा हुई है, वह ‘इस्लामपरस्त’ संगठनों के द्वारा भरी जा रही है. उनके पास इस्लाम की लाठी है जो इस सरकार के धर्मनिरपेक्ष विरोधियों के पास नहीं है. इसलिए यह खबर छिप गई कि मोदी की यात्रा पर सिर्फ ‘इस्लामी’ संगठनों ने विरोध नहीं किया था.

धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी संगठन भी विरोध कर रहे थे. जाहिर है,ये दो विरोध अलग-अलग नज़रिये से किए जा रहे थे. एक विरोध धर्मनिरपेक्षता के दृष्टिकोण से किया जा रहा था, उस सिद्धांत को बहाल करने के लिए.

दूसरा इस्लाम की प्रतिष्ठा के लिए. दूसरे की कोई सहानुभूति भारतीय मुसलमानों से हो, ऐसा नहीं. वे एक अमूर्त ‘धार्मिक’ प्रेरणा से संचालित हैं. मानवीयता उनमें कतई नहीं है.

वे अपने देश में धर्मनिरपेक्ष लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों की हत्या कर सकते हैं. मंदिरों और हिंदू धार्मिक प्रतीकों को नष्ट कर सकते हैं या उनका अपमान कर सकते हैं.

जब वे अपने यहां अल्पसंख्यकों के अधिकार का सम्मान नहीं करते तो फिर के दूसरे मुल्क में अल्पसंख्यकों के अधिकार के लिए उनकी आवाज़ में कितनी ईमानदारी है?

खुदा न करे इस्लाम को हिफाजत के लिए फानी जिंदगी वाले इंसानों की ज़रूरत पड़ जाए! यह हिमाकत भी इंसान ही कर सकता है कि वह मजहब का मुहाफिज बन बैठे.

असल सवाल यह है कि क्या आप अपनी ज़मीन पर अकलियत की हिफाजत कर सकते हैं? या उससे भी बढ़कर क्या ऐसे हालात बना सकते हैं कि यह सवाल करने की ज़रूरत ही न हो? जाहिर है, हिफाजते इस्लाम को इन सवालों में दिलचस्पी शायद ही हो!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)