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पॉक्सो के तहत दर्ज एफ़आईआर को समझौते के बाद ख़ारिज नहीं किया जा सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें बालिग होने के बाद पीड़ित और आरोपी ने समझौता करने का फ़ैसला किया था. पीठ ने कहा कि पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज अपराध को ख़ारिज करना क़ानून की उस भावना के विपरीत होगा, जो कि बच्चों की सुरक्षा के लिए पारित किया गया था.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम यानी कि पॉक्सो एक्ट, 2012 के तहत दायर की गई एफआईआर को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है कि पीड़िता ने बालिग होने के बाद आरोपी के साथ समझौता कर लिया.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सुब्रामोनियम प्रसाद की एकल पीठ ने कहा कि पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज अपराध को खारिज करना कानून की उस भावना के बिल्कुल विपरीत होगा, जो कि बच्चों की सुरक्षा के लिए पारित किया गया था.

न्यायालय ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दी गईं शक्तियों का इस्तेमाल करके इस आधार पर पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर को खारिज नहीं किया जा सकता है कि पीड़िता ने बालिग होने पर आरोपी के साथ समझौता करने का निर्णय किया है.

चार्जशीट के मुताबिक, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी व्यक्ति, जो कि उनका दूर का रिश्तेदार है, उनके घर में रहने लगा था और उनके परिजनों की गैरमौजूदगी में वह ‘उनकी तरफ गलत नजरों से देखता था.’

इसके अलावा पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया था कि आरोपी ने उनकी फोटो को लेकर धमकी दी थी और यहां तक कि उनके माता-पिता को भी मारने की बात की थी.

हालांकि बालिग होने पर दोनों पक्षों की बीच समझौता होने के बाद एफआईआर खारिज करने के लिए याचिका दायर की गई थी.

न्यायालय ने इसकी इजाजत देने से इनकार करते हुए कानून की भावना के अलावा पॉक्सो एक्ट के उद्देश्यों एवं कारणों का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि ‘पीड़ित एवं आरोपी पक्ष के बीच समझौता करने के बाद भी हाईकोर्ट सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपराध को खारिज नहीं कर सकते हैं.’