भारत

इशरत जहां मुठभेड़: अदालत ने बाकी बचे तीन आरोपी पुलिसकर्मियों को भी आरोप मुक्त किया

साल 2004 में मुंबई के नज़दीक मुम्ब्रा की रहने वाली 19 वर्षीय इशरत जहां तीन अन्य लोगों के साथ अहमदाबाद के बाहरी इलाके में गुजरात पुलिस की मुठभेड़ में मारी गई थीं. जांच में ये मुठभेड़ फ़र्ज़ी निकली थी. मामले के तीन अन्य आरोपी पुलिसकर्मी- पीपी पांडेय, डीजी वंजारा, एनके अमीन पहले ही आरोपमुक्त किए जा चुके हैं, जबकि जेजी परमार की बीते साल मौत हो गई.

इशरत जहां. (फाइल फोटो: पीटीआई)

इशरत जहां. (फाइल फोटो: पीटीआई)

अहमदाबाद: सीबीआई की विशेष अदालत ने वर्ष 2004 में इशरत जहां कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में आरोपी तीन पुलिस अधिकारियों जीएल सिंघल, तरुण बरोत (अब सेवानिवृत्त) और अनाजू चौधरी को बुधवार को आरोप मुक्त कर दिया.

विशेष सीबीआई न्यायाधीश वीआर रावल ने सिंघल, बरोत और चौधरी के आरोप मुक्त करने के आवेदन को मंजूरी दे दी.

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 20 मार्च को अदालत को सूचित किया था कि राज्य सरकार ने तीनों आरोपियों के खिलाफ अभियोग चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया है.

अदालत ने अक्टूबर 2020 के आदेश में टिप्पणी की थी उन्होंने (आरोपी पुलिसकर्मियों) ‘आधिकारिक कर्तव्य के तहत कार्य’ किया था, इसलिए एजेंसी को अभियोजन की मंजूरी लेने की जरूरत है.

उल्लेखनीय है कि 15 जून 2004 को मुंबई के नजदीक मुम्ब्रा की रहने वाली 19 वर्षीय इशरत जहां अहमदाबाद के बाहरी इलाके में गुजरात पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मारी गई थीं. इस मुठभेड़ में जावेद शेख उर्फ प्रणेश पिल्लई, अमजद अली राणा और जीशान जौहर भी मारे गए थे.

इशरत जहां मुंबई के समीप मुंब्रा के एक कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं.

डीजी वंजारा के नेतृत्व में क्राइम ब्रांच के अहमदाबाद सिटी डिटेक्शन टीम ने इस मुठभेड़ को अंजाम दिया था. पुलिस का दावा था कि चारों लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी थे, जो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के लिए आए थे.

हालांकि उच्च न्यायालय द्वारा गठित विशेष जांच टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मुठभेड़ फर्जी थी, जिसके बाद सीबीआई ने कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आईपीएस अधिकारी जीएल सिंघल, सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी तरुण बरोत और अनाजू चौधरी ने खुद को आरोप मुक्त करने के लिए बीते 20 मार्च को अपील की थी.

इन तीनों के आरोप मुक्त होने के बाद अब जब तक सीबीआई उनके खिलाफ अपील नहीं करती, इस मामले में ट्रायल एक तरह से खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है.

इससे पहले चार अन्य अधिकारियों के आरोप मुक्त किए जाने पर भी सीबीआई ने इसके खिलाफ कोई अपील नहीं की थी. इस मामले के बचे तीन आरोपियों (सिंघल, बरोत और चौधरी) को आरोप मुक्त करने के पीछे सीबीआई द्वारा अन्य अधिकारियों के खिलाफ अपील न करने का ही तर्क दिया गया था.

रिपोर्ट के अनुसार, विशेष सीबीआई जज वीआर रावल ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं था जो यह सुझाव देता कि इशरत जहां और मारे गए तीन अन्य लोग, आतंकवादी नहीं थे.

साल 2007 में दाखिल अपनी चार्जशीट में सीबीआई ने सात पुलिस अधिकारियों- पीपी पांडेय, डीजी वंजारा, एनके अमीन, जेजी परमार, जीएल सिंघल, तरुण बरोत और अनाजू चौधरी को आरोपी बनाया था. सभी आरोपियों के खिलाफ हत्या, अपहरण और सबूत मिटाने से संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया गया था.

इस कथित फर्जी मुठभेड़ के समय पीपी पांडेय अहमदाबाद शहर के संयुक्त पुलिस अधीक्षक (अपराध) थे. फरवरी 2018 में विशेष सीबीआई अदालत ने पीपी पांडे को आरोप मुक्त कर चुकी है. मई 2019 में विशेष सीबीआई अदालत ने डीजी वंजारा और एनके अमीन को भी आरोपमुक्त कर दिया, जबकि जेजी परमार की मौत सितंबर 2020 में हो गई थी.

सितंबर 2019 में सीबीआई ने अदालत को सूचित किया कि वह डीजी वंजारा और एनके अमीन को आरोपमुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती नहीं देगी.

वंजारा और अमीन को आरोप मुक्त करते हुए विशेष सीबीआई अदालत ने विशेष सीबीआई अदालत ने इस तथ्य पर काफी हद तक भरोसा किया था कि राज्य सरकार ने दोनों (वंजारा और अमीन) के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था और इस फैसले का सीबीआई द्वारा विरोध या इसे चुनौती नहीं दी गई थी.

हालांकि इशरत की मां शमीमा कौसर ने वंजारा और अमीन को आरोपमुक्त किए जाने का विरोध किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)