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दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपी पत्रकार की गिरफ़्तारी पर रोक लगाई

मुंबई के पत्रकार वरुण हिरेमथ पर एक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाते हुए दिल्ली के चाणक्यपुरी थाने में एफआईआर दर्ज कराई है. फरवरी में मामला दर्ज होने के बाद से ही आरोपी फ़रार हैं. महिला ने केंद्रीय गृह मंत्री, पुलिस कमिश्नर और सहायक पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर आरोपी को गिरफ़्तार करने में प्रशासन की अनिच्छा को लेकर रोष जताया है.

(फोटोः रॉयटर्स)

(फोटोः रॉयटर्स)

नई दिल्लीः दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार, यौन उत्पीड़न और जबरन कैद में रखने के आरोपी 28 साल के पत्रकार वरुण हिरेमथ को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा मिल गई है. बशर्तें कि जब आवश्यकता होगी वह पुलिस जांच में शामिल होंगे.

दरअसल 22 साल की एक युवती ने पत्रकार पर बलात्कार, यौन उत्पीड़न और उसे जबरन कैद करने के आरोप लगाए थे. हालांकि आरोपी पत्रकार फिलहाल फरार हैं. अदालत का कहना है कि इस मामले पर अब 16 अप्रैल को सुनवाई होगी.

जिस दिन आरोपी को गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा दी गई, उसी दिन पीड़िता ने पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव, गृहमंत्री अमित शाह और सहायक पुलिस आयुक्त प्रज्ञा आनंद को पत्र लिखकर आरोपी पत्रकार को गिरफ्तार करने में प्रशासन की अनिच्छा पर रोष जताया था.

जिस समय आरोपी पत्रकार के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई गई, उस समय वह ईटी नाउ चैनल में एंकर थे.

द वायर  को रविवार दोपहर भेजे गए ईमेल में टाइम्स नेटवर्क की कॉरपोरेट संचार की प्रमुख हीना जाफरी ने कहा, ‘वरुण हिरेमथ के खिलाफ चल रहे कथित बलात्कार के मामले और उसकी जांच के संबंध में टाइम्स नेटवर्क कहना चाहता है कि वरुण अब ईटी नाउ और नेटवर्क के और किसी ब्रांड से जुड़े हुए नहीं हैं.’

पीड़िता का कहना है कि सुनवाई के समय सीआरपीसी की धारा 438 1 (बी) के तहत अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदक के मौजूद रहने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया. अगर आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज हो जाती तो पुलिस आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर सकती थी.

पीड़िता ने पूछा, ‘क्या कोई कानूनी रणनीति थी, जिसने इस कानूनी प्रावधान को रोका.’

पत्र में कहा गया, ‘मुझे यह बताया गया कि अभियोजक पक्ष यह मांग कर सकता था कि आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के समय उसे अनिवार्य रूप से मौजूद रहने को कहा जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया गया.’

दिल्ली पुलिस ने महिला की शिकायत के बाद दर्ज एफआईआर के बाद हिरेमथ पर आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार), 342 (गलत तरीके से कैद करना) और 509 (किसी महिला के शील या सम्मान को चोट पहुंचाना) के तहत 23 फरवरी को को आरोप दर्ज किए गए.

पीड़िता ने यह भी कहा कि उसे अपनी पिछली चिंताओं का अभी तक निपटारा नहीं हुआ है.

पत्र में कहा गया, ‘मैंने अपने मामले में जांच के कुप्रबंधन को लेकर कई पत्र लिखे लेकिन इस पत्र के जारी होने तक मेरी पिछले चिंताओं का निपटारा नहीं हुआ, सिर्फ बार-बार यह आश्वासन दिया जाता रहा कि चीजें बदलेंगी.’

पीड़िता ने पत्र लिखने को लेकर एसीपी आनंद द्वारा उनका मजाक उड़ाए जाने का भी आरोप लगाया है.

पीड़िता ने 30 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे को पत्र लिखकर मामले में अग्रिम जमानत याचिका के दौरान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के असंवेदनशील, अनुपयुक्त और पीड़ादायक व्यवहार की ओर ध्यान आकर्षित किया था.

उनका पत्र आधिकारिक तौर पर सीजेआई ऑफिस को प्राप्त हुआ और उन्हें शिकायत की आंतरिक जांच का आश्वासन दिया गया था.

पचास दिनों से फरार

पीड़िता के वकील ने इस आधार पर आरोपी पत्रकार की अग्रिम जमानत का विरोध किया था कि वह 23 फरवरी को मामला दर्ज होने के बाद से ही लगभग पचास दिनों से लापता हैं.

चाणक्यपुरी पुलिस थाने के सब इंस्पेक्टर अविनाश प्रताप ने द वायर  को बताया, ‘हम उनकी तलाश कर रहे हैं लेकिन वह हमसे बचकर निकल रहे हैं. उन्होंने अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया है.’

जस्टिस मुक्ता गुप्ता की एकल पीठ ने शुक्रवार को कहा, ‘उन्होंने (आरोपी) अपने पक्ष में कुछ बातें कहीं हैं, जिनकी जांच की जानी है. उनका यह कहना है कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बना था तो इसकी जांच की जानी है.’

बता दें कि पटियाला हाउस में फास्ट ट्रैक अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 12 मार्च को हिरेमथ की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि दोनों पक्षों के बीच पूर्ववर्ती संबंधों की भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 53ए और 114ए के मद्देनजर कोई प्रासंगिकता नहीं है.

आदेश में कहा गया था, ‘आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति, जांचकर्ता अधिकारी द्वारा उनके खिलाफ इकट्ठा किए सबूतों, परिस्थितियों, अपराध की गंभीरता और ऊपर हुई चर्चाओं को ध्यान में रखते हुए मैं आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने को लेकर बाध्य हूं.’

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी एक मार्च को पत्रकार वरुण हिरेमथ के खिलाफ अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी. उन्होंने अपनी अग्रिम जमानत याचिका में कहा था कि उन्हें इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है.

याचिका में कहा गया था कि महिला और हिरेमथ सहमति से यौन संबंध हुआ था. महिला की आरोपी में रुचि स्पष्ट थी क्योंकि वह पुणे से उनसे मिलने दिल्ली आई थी और होटल प्रबंधन को पहचान पत्र संबंधी दस्तावेज दिखाने के बाद स्वेच्छा से डबल ऑक्यूपेंसी कमरे में गई थी.

महिला ने अपनी शिकायत और मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान में आरोप लगाया है कि पत्रकार ने 20 फरवरी को चाणक्यपुरी के पांच सितारा होटल में उसका कथित बलात्कार किया था.

पीड़िता ने कहा था कि कोविड-19 प्रोटोकॉल की वजह से उसने होटल में अपने पहचान संबंधी दस्तावेज साझा किए थे और इसे सहमति से बना हुआ संबंध नहीं कहा जा सकता.

पीड़िता के पत्र में कहा गया कि पुलिस द्वारा इस तरह की असंवेदनशीलता को महिलाओं को चुप्पी साधनी पड़ती है.

पीड़िता के पत्र में कहा गया, ‘मेरे मामले में इस तरह की असंवेदनशीलता से मैं व्यथित हूं लेकिन इससे मुझे यह समझने में आसानी हुई कि आखिर क्यों हमारे देश में बलात्कार पीड़िताओं को न्याय मिलने के बजाए चुप्पी साधनी पड़ती है.’

पीड़िता ने कहा कि अगर उनके सवालों के जवाब नहीं दिए जाते तो वह केंद्रीय गृहमंत्री से संपर्क करेंगी, जिनके अधीन दिल्ली पुलिस काम करती है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)