लानत है, लानत, विराग को राग सुहाए, साधू होकर मांस मनुज का भर मुंह खाए…

प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करने से पहले याद कर लें कि जिस समय वे कुंभ में जमावड़े से बचने की अपील कर रहे थे, उसी समय बंगाल में अपनी सभाओं में जनता को आमंत्रित कर रहे थे. क्या वह भीड़ संक्रमण से सुरक्षित है? क्या यह अधिकार प्रधानमंत्री, उनके गृह मंत्री को है कि वे कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका के बीच उस संक्रमण का पूरा इंतज़ाम करें? क्या यह राष्ट्रीय आपदा क़ानून के तहत अपराध नहीं है?

/
17 अप्रैल 2021 को पश्चिम बंगाल के गंगारामपुर में एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: भाजपा/यूट्यूब)

प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करने से पहले याद कर लें कि जिस समय वे कुंभ में जमावड़े से बचने की अपील कर रहे थे, उसी समय बंगाल में अपनी सभाओं में जनता को आमंत्रित कर रहे थे. क्या वह भीड़ संक्रमण से सुरक्षित है? क्या यह अधिकार प्रधानमंत्री, उनके गृह मंत्री को है कि वे कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका के बीच उस संक्रमण का पूरा इंतज़ाम करें? क्या यह राष्ट्रीय आपदा क़ानून के तहत अपराध नहीं है?

17 अप्रैल 2021 को पश्चिम बंगाल के गंगारामपुर में एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: भाजपा/यूट्यूब)
17 अप्रैल 2021 को पश्चिम बंगाल के गंगारामपुर में एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: भाजपा/यूट्यूब)

कलकत्ता बम्बई हेठ थे उसके आगे,
कुंभ नगर था भी क्या, दो दिन का मेला था.
….
महामरण का चंड गदाभिघात झेला था
मूक देश ने दुःशासन का. याद आज भी

हूक जगा देती है, पांव तले ढेला था
कड़ा नुकीला मानो. अगर स्वतंत्र राज भी
जनता की जीवन-रक्षा का प्रथम काज भी
न कर सके तो किस मतलब के लिए राज है?

जैसा घोड़ा हो वैसा चाहिए साज भी
शासन का प्रमाद बिल्कुल कोढ़ की खाज है.

कुंभ नगर माया का पुर था, लोप हो गया
प्रभुता के मद का विध्वंसक कोप हो गया.

त्रिलोचन ने 1954 के कुंभ के बाद जो कविता-श्रृंखला लिखी यह उसी की एक कविता है. कुंभ के दौरान मौनी अमावस्या को पवित्र डुबकी लगाने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जब मेले में पहुंचे तो उन्हें देखने को आतुर जनता ने सारी रुकावटें तोड़ डालीं और उस भारी भगदड़ में तकरीबन 1,000 लोग मारे गए.

नेहरू और राजेंद्र बाबू जीवित लौट आए और प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसे अवसरों पर किसी नेता को नहीं जाना चाहिए. त्रिलोचन ने दुख और क्षोभ के मारे यह कविता श्रृंखला रची. इसी श्रृंखला की दूसरी कविता में उन्होंने पूछा,

महा कुंभ में हत प्राणों की पीड़ा
कौन समझकर बढ़ता है लेने को बीड़ा.

तब से अब तक मेला प्रबंधन में काफी कुशलता आई है और भगदड़ घटी है. लेकिन हम जानते हैं कि मौतें सिर्फ मेले के भीतर भगदड़ से नहीं होतीं. मौत की एक अदृश्य भगदड़ भी हो सकती है. वह मेले में न दिखेगी. चिताएं दूर जलेंगी. यह इस बार के कुंभ के आयोजन के समय से ही कहा जा रहा था.

§

2021 के कुंभ के 16 दिन गुजर जाने और लाखों लोगों के आवागमन के बाद प्रधानमंत्री ने कुंभ को प्रतीकात्मक रूप में मनाने का अनुरोध किया है. इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

उन्होंने श्रद्धालुओं से निवेदन किया है कि अब जबकि दो शाही स्नान हो चुके, वे इसे संकेतात्मक रख सकते हैं. इससे कोरोना वायरस संक्रमण के विरुद्ध युद्ध में बल मिलेगा. इस अनुरोध के बाद देखा कि किसी एक संन्यासी ने उनको साधु-साधु कहा और उनकी इस अपील का अनुपालन करने का स्वयं अपने अनुयायियों से अनुरोध किया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक बौद्धिक ने इसे साहसपूर्ण नेतृत्व का प्रमाण घोषित किया. भावनाओं के ज्वार के आगे खड़ा होकर विवेकपूर्ण निर्णय कितना कठिन होता है! प्रधानमंत्री ने वही कर दिखलाया है. इससे उनकी नेतृत्व क्षमता फिर प्रमाणित हुई है.

लेकिन एक पत्रकार ने खबर दी कि पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक दिन पहले ही यह कहा था कि अब कुंभ की समाप्ति की घोषणा का समय हो गया है. तो एक स्वयंसेवक ने निर्देश ग्रहण किया और अपील जारी की.

ऐसा करके प्रधानमंत्री ने एक बार फिर समर्थन-तत्पर अपने भद्र मित्रों को राहत दी है. देर से ही सही, अपील ठीक है. लेकिन हानि काफी हो चुकी है.

और जैसे इस अपील के लिए उन्हें श्रेय दिया जाएगा वैसे ही इस बार की महामारी के सबसे बड़े प्रसार के लिए भी उन्हें और उनके मुख्यमंत्रियों को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पूरे भारत ही नहीं विश्व से श्रद्धालुओं को कुंभ का आमंत्रण दे रहे थे और कोरोना संक्रमण के भय को यह कहकर दुत्कार रहे थे कि गंगाजल और श्रद्धा कोरोना को दूर रखने के लिए पर्याप्त है. यह मुजरिमाना हरकत थी.

मुख्यमंत्री के इस बुलावे में प्रधानमंत्री की तस्वीर का भी उपयोग किया गया था. एक तरह से यह जनता के पैसे से उसके संहार का आयोजन था. लेकिन सिर्फ उनका नहीं जो कुंभ गए. वे माध्यम बने उनकी मृत्यु के भी जो दूर या नजदीक उनके संपर्क में आए.

मसला क्या सिर्फ मृत्यु का है? जो भी इस संक्रमण की चपेट में आया वह मरा नहीं तो क्या उसका कोई हानि नहीं हुई? यह आप पूछें उनसे जो बच निकले हैं और अब तक इस वायरस का असर झेल रहे हैं.

क्या कभी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पर मुकदमा चलेगा? क्या सारे अखाड़ों के मुखिया अदालत में तलब किए जाएंगे? क्या प्रशासनिक अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई होगी?

क्योंकि उन सबने इस जानकारी के बावजूद, कि कोरोना वायरस का कहीं अधिक घातक संक्रमण शुरू हो चुका है, इतने भारी जमावड़े का आयोजन किया. जिनके लिए विशेष वाहनों का और ट्रेनों का इंतजाम किया गया, वे सब संभावित मृत्यु के कुंड में गिराए जा रहे थे, क्या यह अतिशयोक्ति है?

हमने कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने भद्र मित्रों को उनका गुणगान करने का एक अवसर प्रदान किया. अब अगर जनता ही मूर्ख है तो बेचारा नेता क्या करे! उसे उनकी आस्था का भी तो ध्यान रखना है. यह बार-बार प्रधानमंत्री ने किया है.

पिछले वर्षों में गाय के बहाने मुसलमानों की हत्या का एक चक्र पूरा हो जाने के बाद अपने अनुयायियों से हिंसा से विरत रहने की अपील ऐसी ही थी. हिंसा का पर्याप्त प्रसार सुनिश्चित करने के बाद हिंसा से विरक्ति का नाट्य पुनः इस अंग्रेज़ीभाषी समर्थक समूह पर एक अनुकंपा थी.

वे हमेशा उनसे एक प्रमाण चाहते रहे हैं जिससे संसार के समक्ष उनमें और उनके अतिचारी अनुयायियों में एक अंतर स्थापित कर सकें. कह सकें कि बेचारा नेता हिंसक जनता को अनुशासित करने का प्रयास कर तो रहा है. जैसे इस बार वह मूढ़ जनता का मार्गदर्शन कर रहा है.

यह सारी चर्चा फिर हो सकती है. ज्ञानहीन आस्था कितनी आत्मघाती होती है, यह पिछले कुछ वर्षों से भारतवर्ष अनुभव कर रहा है. विशेषकर वे जो स्वयं को संसार की प्राचीनतम सभ्यता घोषित करते रहते है और भारत को विश्व गुरु की पदवी से जबरन उतार दिए जाने की शिकायत करते रहते हैं.

इसी आस्था की घनीभूत अभिव्यक्ति 1 अप्रैल से हरिद्वार में हर की पौड़ी पर हुई. मीडिया ने इसे वायरस के भय के बीच आस्था का साहस बतलाया. लेकिन क्या आस्थावानों को इसका अधिकार था कि वे अपने आसपास के लोगों का जीवन भी खतरे में डालें? यह क्या लेकिन उनकी गलती है? विशेषज्ञों की सारी चेतावनी के बावजूद क्यों केंद्र सरकार ने यह आयोजन होने दिया?

वही केंद्र सरकार जिसने बार-बार दिल्ली की अदालत को कहा कि निजामुद्दीन के मरकज की मस्जिद को खोलने और वहां सामूहिक नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती क्योंकि संक्रमण का भय है? फिर क्यों उसने कुंभ की इजाजत दी? क्या हिंदुओं को संक्रमण से बचाव का रक्षा कवच मिला हुआ है? क्या उन्हें संक्रमित होने और संक्रमण फैलाने का एकाधिकार है?

प्रधानमंत्री की प्रशंसा करें उसके पहले याद कर लें कि जिस समय वे कुंभ में जमावड़े से बचने की अपील कर रहे थे उसी समय बंगाल में अपनी सभाओं में वे जनता को आमंत्रित कर रहे थे. क्या वह भीड़ संक्रमण से सुरक्षित जनता है?

क्या यह अधिकार प्रधानमंत्री को, उनके गृह मंत्री को है कि वे कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका के बीच उस संक्रमण का पूरा इंतजाम करें? क्या यह राष्ट्रीय आपदा कानून के तहत अपराध नहीं है?

यह भी न भूलें कि संक्रमण के दौर में जिद करके गुजरात के स्टेडियम में दर्शकों की भीड़ जमा की गई थी. वैसे ही जैसे पिछले साल खुद प्रधानमंत्री ने डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत में अहमदाबाद में भारी भीड़ जमा की थी. कोरोना संक्रमण का यह एक बड़ा स्रोत था, ऐसा कहा गया. लेकिन भीरू मीडिया ने इसकी कोई पड़ताल नहीं की.

अब चिताओं का मेला लग गया है. मृत्यु हर दरवाजे पर खड़ी है. और प्रधानमंत्री यह साहसपूर्ण अपील करके बंगाल में चुनाव कुंभ में अपनी जनता को डुबकियां लगवाने निकल पड़े होंगे. वह भी ज्ञानहीन आस्था का दूसरा ज्वार है.

त्रिलोचन की ही पंक्तियां फिर याद आती हैं:

लानत है, लानत, विराग को राग सुहाए
साधू होकर मांस मनुज का भर मुंह खाए

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)