एल्गार परिषद: परिजनों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से कार्यकर्ताओं को रिहा करने की मांग की

भीमा-कोरेगांव हिंसा और एल्गार परिषद सम्मेलन के संबंध में साल 2018 से अब तक 15 अधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया है. इनके परिजनों ने कोविड-19 की दूसरी लहर को देखते हुए इनकी रिहाई की मांग करते हुए कहा है कि ये सभी लोग विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं और उनमें से एक कार्यकर्ता को कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया है.

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भीमा कोरेगांव और एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार कार्यकर्ता. (फोटो: द वायर)

भीमा-कोरेगांव हिंसा और एल्गार परिषद सम्मेलन के संबंध में साल 2018 से अब तक 15 अधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया है. इनके परिजनों ने कोविड-19 की दूसरी लहर को देखते हुए इनकी रिहाई की मांग करते हुए कहा है कि ये सभी लोग विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं और उनमें से एक कार्यकर्ता को कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया है.

भीमा कोरेगांव और एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार कार्यकर्ता. (फोटो: द वायर)
भीमा कोरेगांव और एल्गार परिषद मामले में गिरफ़्तार कार्यकर्ता. (फोटो: द वायर)

मुंबई: एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में जेल में बंद कार्यकर्ताओं के परिजनों ने बुधवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर मांग की कि महामारी की दूसरी लहर के मद्देनजर आरोपियों को रिहा किया जाना चाहिए.

पत्र पर कार्यकर्ताओं- आनंद तेलतुम्बडे, गौतम नवलखा, स्टान स्वामी, सुधा भारद्वाज और रोना विल्सन सहित 15 कार्यकर्ताओं के परिजनों के हस्ताक्षर हैं.

पुरुष आरोपी फिलहाल नवी मुंबई स्थित तलोजा जेल में, जबकि महिला विचाराधीन कैदी मध्य मुंबई स्थित भायखला जेल में बंद हैं.

पत्र में कहा गया है कि कार्यकर्ता विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं और उनमें से एक ज्योति जगताप को कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया है.

परिजनों ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा है, ‘हम सभी संबंधित परिस्थितियों में उनकी (आरोपी कार्यकर्ताओं) सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं जहां हर किसी को खतरा है. इसलिए हम आपसे विनम्र निवेदन करते हैं कि हमारे परिवार के सदस्यों की रिहाई के लिए समय पर और आवश्यक कदम उठाएं.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पत्र में कहा गया है, ‘उच्चतम न्यायालय ने (कोविड महामारी को देखते हुए) राज्य सरकारों को उच्चस्तरीय समितियों के गठन का अधिकार दिया है, जो प्रत्येक राज्य में कैदियों की रिहाई का फैसला कर सकती हैं. हम आपसे आग्रह करते हैं कि विचारधीन कैदियों को कम से कम अंतरिम जमानत पर रिहा करने की कमेटी से सिफारिश करें.’

पत्र में परिजनों की ओर से कहा गया है, ‘हम इन हताश परिस्थितियों में उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, जहां सभी को खतरा है. इस प्रकार हम ईमानदारी से आपसे अपने परिवार के सदस्यों की रिहाई के लिए समय पर और आवश्यक उपाय करने की अपील करते हैं.’

इस बीच आरोपियों में शामिल दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर हैनी बाबू को जेल अधिकारी आंखों की जांच के लिए एक अस्पताल ले गए है. उनके परिवार के सदस्यों ने बीते मंगलवार को एक बयान में कहा था कि वह गंभीर नेत्र संक्रमण से पीड़ित हैं और उनके लिए उचित चिकित्सा की मांग की थी.

एल्गार परिषद का मामला 31 दिसंबर 2017 को महाराष्ट्र के पुणे शहर के ऐतिहासिक शनिवारवाड़ा में आयोजित एक सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से संबंधित है. पुलिस ने दावा किया है कि इन भाषणों के चलते अगले दिन पुणे के कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़की. पुणे पुलिस ने दावा किया कि यह सम्मेलन माओवादियों द्वारा समर्थित था.

बता दें कि एक जनवरी, 2018 को पुणे के निकट भीमा कोरेगांव की जंग की 200वीं वर्षगांठ के जश्न के बाद हिंसा भड़की थी, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे.

जनवरी 2020 में इस मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अपने नियंत्रण में ले लिया था. यह कई बार आलोचना के केंद्र में आया है, क्योंकि कई जाने-माने अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को (सरकार से) असंतुष्ट लोगों पर रोक लगाने के रूप में देखा जाता रहा है. इसके अलावा एक डिजिटल फोरेंसिक फर्म ने पाया है कि आरोपियों के खिलाफ तथाकथित सबूतों में से अधिकांश अज्ञात हैकर द्वारा एक कार्यकर्ता रोना विल्सन के कंप्यूटर पर डाले गए थे.

इसी तरह 2018 में जांच एजेंसियों ने एल्गार परिषद मामले में विल्सन सहित 15 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था.

हालांकि एनआईए ने डिजिटल फोरेंसिक फर्म आर्सेनल कंसल्टिंग की उस रिपोर्ट का खंडन किया है, जिसमें यह बताया गया है कि भारत के प्रधानमंत्री की हत्या और सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश सहित भड़काऊ सामग्री एलगार परिषद-भीमा कोरेगांव मामले के आरोपी शोधकर्ता रोना विल्सन के लैपटॉप को हैक कर रखे गए थे.

2018 में शुरू हुए एल्गार परिषद मामले की जांच में कई मोड़ आ चुके हैं, जहां हर चार्जशीट में नए-नए दावे किए गए. मामले की शुरुआत हुई इस दावे से कि ‘अर्बन नक्सल’ का समूह ‘राजीव गांधी की हत्या’ की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की योजना बना रहा है.

यह विस्फोटक दावा पुणे पुलिस ने किया था, जिसके फौरन बाद 6 जून 2018 को पांच लोगों- रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, कार्यकर्ता सुधीर धावले, महेश राउत और शिक्षाविद शोमा सेन को गिरफ्तार किया गया था.

इसके बाद अगस्त 2018 को महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर पांच कार्यकर्ताओं- कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंजाल्विस को गिरफ्तार किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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