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किसानों को सरकार दिल्ली से हरियाणा भेजना चाह रही है, उसकी चाल कामयाब नहीं होने देंगे: टिकैत

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार चाहती है कि आंदोलन का केंद्रबिंदु दिल्ली की सीमाओं से हरियाणा में स्थानांतरित किया जाए, लेकिन हम दिल्ली की सीमा को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे. उन्होंने कहा कि जब तक किसानों की मांगें पूरी नहीं हो जातीं, आंदोलन जारी रहेगा.

राकेश टिकैत. (फोटो: पीटीआई)

राकेश टिकैत. (फोटो: पीटीआई)

जींद: भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने गुरुवार को केंद्र सरकार पर बड़ा आरोप लगाया है. टिकैत ने कहा कि केंद्र सरकार किसान आंदोलन को दिल्ली के विभिन्न सीमा क्षेत्रों से हटाकर जींद स्थानांतरित करवाना चाहती है.

उन्होंने केंद्र को चुनौती दी कि किसान सरकार की चाल को कामयाब नहीं होने देंगे.

टिकैत ने जींद और नरवाना के बीच स्थित खटकड़ टोल पर किसानों को संबोधित करते हुए कहा, ‘केंद्र सरकार दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को जींद के आस-पास शिफ्ट करवाना चाहती है. किसानों का धरना वहीं पर जारी रहेगा. जो केंद्र सरकार की चाल है उसको कामयाब नहीं होने देंगे. हम दिल्ली को किसी सूरत में नहीं छोड़ेंगे.’

उन्होंने कहा, ‘वे चाहते हैं कि आंदोलन का केंद्रबिंदु दिल्ली की सीमाओं से हरियाणा में स्थानांतरित किया जाए, लेकिन हम दिल्ली की सीमा को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे.’

उन्होंने यह भी कहा कि हरियाणा में भी चल रहा आंदोलन जारी रहेगा. टोहाना पुलिस द्वारा पकड़े गए किसानों को लेकर राकेश टिकैत ने कहा, ‘जो पकड़े गए वो हमारे ही बच्चे हैं. वो विधायक के आवास का घेराव करने चले गए होंगे. सब आंदोलन का ही हिस्सा है, वो हमारे हैं, हम उन्हें समझाएंगे.’

उन्होंने हाल में उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत के चुनाव में भाजपा द्वारा कम सीटें जीतने की ओर ध्यान दिलाते हुए दावा किया यह पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव भी हारेगी, क्योंकि राज्य सरकार ने कोई काम नहीं किया.

उन्होंने दावा कि राज्य में आज भी गन्ना किसानों का 23 हजार करोड़ रुपये बकाया है.

टिकैत ने कहा कि पांच जून को तीनों नए कृषि कानूनों के बनने के एक साल पूरे होने पर देश भर में भाजपा एवं उनके सहयोगी दलों के सांसदों, विधायकों, मंत्रियों के आवास के बाहर किसान तीनों कानूनों की प्रतियां जलाकर रोष प्रकट करेंगे.

एनडीटीवी के मुताबिक, इससे पहले उन्होंने किसानों की सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब तक किसानों की मांगें पूरी नहीं हो जाती, आंदोलन जारी रहेगा.

किसानों के खिलाफ चल रहे आंदोलन के दौरान कई मामले दर्ज किए जाने पर टिकैत ने कहा, ‘इस तरह के किसी भी आंदोलन के दौरान किसी को भी जेल जाने के लिए तैयार रहना चाहिए और डरना नहीं चाहिए.’

उन्होंने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम), जो किसान आंदोलन की अगुवाई कर रहा है, कृषि कानूनों के खिलाफ शांतिपूर्वक विरोध करना जारी रखेगा.

टिकैत ने कहा कि अगर सरकार फिर से बातचीत शुरू करने का फैसला करती है तो किसान संगठन केंद्र के साथ बातचीत करने के लिए तैयार हैं. साथ ही यह भी दोहराया कि चर्चा नए कृषि कानूनों को निरस्त करने के बारे में होगी.

उन्होंने कहा, जब सरकार बात करना चाहेगी तो संयुक्त किसान मोर्चा बात करेगा.

मालूम हो कि पिछले महीने संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गतिरोध पर बातचीत शुरू करने का आग्रह करते हुए पत्र लिखा था.

इससे पहले भी किसान संगठन बातचीत शुरू करने की बात दोहरा चुके हैं, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार की ओर से औपचारिक तौर पर अब तक इस संबंध में कुछ नहीं कहा गया है.

अब तक किसानों यूनियनों और सरकार के बीच 11 दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन गतिरोध जारी है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने अपने रुख पर कायम हैं.

प्रदर्शनकारी किसानों और सरकार के बीच पिछली औपचारिक बातचीत बीते 22 जनवरी को हुई थी. 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के लिए किसानों द्वारा निकाले गए ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा के बाद से अब तक कोई बातचीत नहीं हो सकी है.

केंद्र सरकार के विवादित कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ बीते साल 26 नवंबर से दिल्ली चलो मार्च के तहत किसानों ने अपना प्रदर्शन शुरू किया था.

गौरतलब है कि केंद्र सरकार की ओर से कृषि से संबंधित तीन विधेयक– किसान उपज व्‍यापार एवं वाणिज्‍य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, 2020, किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्‍य आश्‍वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक, 2020 और आवश्‍यक वस्‍तु (संशोधन) विधेयक, 2020 को बीते साल 27 सितंबर को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी थी, जिसके विरोध में चार महीने से अधिक समय से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं.

किसानों को इस बात का भय है कि सरकार इन अध्यादेशों के जरिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिलाने की स्थापित व्यवस्था को खत्म कर रही है और यदि इसे लागू किया जाता है तो किसानों को व्यापारियों के रहम पर जीना पड़ेगा.

दूसरी ओर केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार ने इन अध्यादेशों को ‘ऐतिहासिक कृषि सुधार’ का नाम दे रही है. उसका कहना है कि वे कृषि उपजों की बिक्री के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था बना रहे हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)