भारत

केन-बेतवा लिंक: केंद्र ने दरकिनार की थी सुप्रीम कोर्ट समिति की दुष्प्रभाव बताने वाली रिपोर्ट

बीते मार्च महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच विवादित केन-बेतवा लिंक परियोजना संबंधी क़रार पर दस्तख़त किए गए. सुप्रीम कोर्ट की एक समिति ने इस पर गंभीर सवाल उठाए थे, हालांकि दस्तावेज़ दर्शाते हैं कि मोदी सरकार ने इन्हें नज़रअंदाज़ किया.

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करते जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (फोटो साभार: पीआईबी)

(इंटरन्यूज़ के अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से की गई यह रिपोर्ट केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना पर छह लेखों की शृंखला का पहला भाग है.)

नई दिल्ली: जल संकट से जूझ रहे बुंदेलखंड क्षेत्र को पानी का सपना दिखाते हुए सरकार एक और योजना लागू कर रही है, जिसका नाम केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना है. इस विवादित प्रोजेक्ट को लेकर मोदी सरकार ने इसी साल 22 मार्च को विश्व जल दिवस के मौके पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच एक डील साइन करवाई थी.

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में हुए इस एग्रीमेंट में सुप्रीम कोर्ट कमेटी की उस रिपोर्ट को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है जिसने योजना की कमियों को उजागर करते हुए केंद्र को अगाह किया था कि यदि इसे लागू किया जाता है तो व्यापक स्तर पर पर्यावरणीय बर्बादी होगी और अनुमान से ज्यादा पैसा खर्च होगा.

समिति ने कहा था कि सरकार इस परियोजना के तहत जिन लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहती है, वो बेहतर तरीकों या इस क्षेत्र में निर्मित मौजूदा परियोजनाओं का क्षमता विस्तार करके किया जा सकता है.

लेकिन जब द वायर  ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत इस परियोजना को लेकर मंत्रालय में उपलब्ध करीब 2,000 से अधिक दस्तावेजों की जांच की तो उसमें कहीं भी इन निष्कर्षों पर विस्तृत विचार करने का संदर्भ दिखाई नहीं देता है. 

इस दौरान केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को लेकर जल शक्ति मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री से लेकर सचिव स्तर की जो भी बैठकें हुई थीं, उसमें सुप्रीम कोर्ट समिति की रिपोर्ट पर चर्चा करने या उसकी गंभीर पहलुओं पर स्वतंत्र अध्ययन कराने पर कोई जोर नहीं दिया गया. नेताओं और अधिकारियों की बातचीत मध्य प्रदेश और यूपी के बीच जल बंटवारा कराने तक ही सीमित रही.

देश भर की तमाम नदी जोड़ो परियोजनाओं के कार्य में तेजी लाने के लिए बनाई गई विशेष समिति की एक बैठक में जरूर इस रिपोर्ट का जिक्र किया गया था, लेकिन बिना किसी अध्ययन के सदस्यों ने एक सुर में इसे खारिज कर दिया और खुद को क्लीन चिट दे दी.

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की ‘विनाशकारी’ परियोजना पर सर्वोच्च न्यायालय की समिति की इतनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट को गंभीरता से न लेना और न्यायालय के अंतिम फैसले का इंतजार किए बिना एग्रीमेंट साइन कराना दर्शाता है कि सरकार अपनी हठधर्मिता के आगे लोकतांत्रित संस्थाओं को तुच्छ समझती है.

यमुना जिये अभियान के मनोज मिश्रा ने केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को मिले वन्यजीव मंजूरी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके आधार पर न्यायालय ने अपने सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) से इस मामले में जांच करने को कहा था.

करीब दो सालों के अध्ययन के बाद समिति ने 30 अगस्त 2019 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें उन्होंने वन्यजीव मंजूरी देने में हुए नियमों के उल्लंघन, वन काटने से पन्ना टाइगर रिजर्व एवं इसके जीव-जंतुओं पर पड़ने वाले प्रभाव, परियोजना की लागत में संभावित बढ़ोतरी, इकोलॉजिकल नुकसान इत्यादि का विस्तार से तथ्यपरक वर्णन किया है.

केन नदी. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

इसके 20 दिन बाद ही जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय (अब जल शक्ति मंत्रालय) के सचिव की अध्यक्षता में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना पर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच सहमति बनाने के लिए बैठक हुई थी, लेकिन ये बातचीत दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे तक ही सीमित रही.

इस प्रोजेक्ट की अवधारणा के बाद से ही मध्य प्रदेश और यूपी के बीच पानी बंटवारे को लेकर विवाद रहा है. उत्तर प्रदेश की मांग थी कि नॉन-मानसून सीजन (अक्टूबर से मई) में उन्हें 935 मीलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पानी दिया जाना चाहिए, लेकिन मध्य प्रदेश उन्हें 700 एमसीएम ही पानी देने पर तैयार हो रहा था.

एक क्यूबिक मीटर में एक हजार लीटर और एक एमसीएम में एक अरब लीटर पानी होता है.

इस विवाद का समाधान करने के लिए ये फैसला लिया गया कि जल मंत्रालय के अधिकारी जमीन पर जाकर आकलन करेंगे किस राज्य को कितना पानी दिया जाना चाहिए.

इसके साथ ही बैठक में तत्कालीन सचिव यूपी सिंह ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा परियोजना को प्रथम स्तर की वन मंजूरी देते हुए लगाई गई शर्तों पर चिंता जाहिर की और इसमें ढील दिलाने पर जोर दिया. लेकिन कहीं पर भी सीईसी की रिपोर्ट का जिक्र नहीं किया गया.

इससे पहले 23 अप्रैल 2018 को केन-बेतवा परियोजना पर सचिव स्तर की बैठक हुई थी, तब तक सीईसी ने विवादित प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन मिनट्स ऑफ मीटिंग से पता चलता है कि सरकार कमेटी द्वारा की जा रही जांच को लेकर जरा भी चिंतित नहीं थी. 

इस बैठक में भी केंद्र एवं राज्य के अधिकारियों की बातचीत राज्यों के बीच जल बंटवारे और वन कटाई को लेकर लगाई शर्तों पर चिंता जाहिर करने तक सीमित रहा.

सीईसी रिपोर्ट के करीब एक साल बाद साल 2020 के सितंबर महीने की तीन तारीख को जल शक्ति मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में दोनों राज्यों और इस परियोजना को लागू कर रही मंत्रालय की एजेंसी राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) के बीच एक और बैठक हुई.

इस मीटिंग में केंद्र एवं राज्य को मिलाकर 23 आला अधिकारी शामिल थे, लेकिन एक भी व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट कमेटी द्वारा अगाह किए गए कदमों पर विचार करने पर कोई रुचि नहीं दिखाई. एक बार फिर इनकी बातचीत राज्यों के बीच जल समझौता और पर्यावरण मंत्रालय की शर्तों में ढील दिलाने की बात पर सीमित रही.

इसके बाद नदी जोड़ो परियोजना पर समझौते को अंतिम रूप देने के लिए जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की अध्यक्षता में 22 सितंबर 2020 को मध्य प्रदेश के जल मंत्री तुलसी राम सिलावत और उत्तर प्रदेश के जल मंत्री महेंद्र सिंह के साथ बैठक हुई थी. 

मीटिंग के शुरूआत में ही उन्होंने परियोजना लागू करने के लिए मोदी सरकार के सनक को जाहिर किया और कहा कि ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना हमारे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का ड्रीम प्रोजेक्ट था’ ताकि सूखा प्रभावित बुंदेलखंड में पानी की समस्या को दूर किया जा सके.

इससे पहले भी कई सरकारों में बुंदेलखंड में पानी की समस्या को दूर करने का सपना दिखाते हुए कई योजनाएं लागू की गई हैं, हालांकि इसके बावजूद अभी भी क्षेत्र के कई लोगों को पानी की जरूरतों के लिए लंबी दूरी तय करते हुए आसानी से देखा जा सकता है.

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करते जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत. (फोटो साभार: एनडब्ल्यूडीए)

बहरहाल इस बैठक को आगे बढ़ाते हुए गजेंद्र सिंह शेखावत ने राज्यों के मंत्रियों से कहा कि वे पानी, हाइड्रोपावर के बंटवारे जैसे छोटे मुद्दे को न उठाएं, क्योंकि यह परियोजना को लागू करने में अड़चनें पैदा कर रहा है.

मिनट्स ऑफ मीटिंग से पता चलता है कि केंद्रीय जल शक्ति मंत्री के बैठक में भी सुप्रीम कोर्ट कमेटी पर एक बार भी चर्चा नहीं की गई. उन्होंने परियोजना के समझौते पर चर्चा को लेकर अंतिम मुहर लगाई और बैठक खत्म कर दी.

इस मीटिंग के बाद ही केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (एमओए) को अंतिम रूप दिया गया था, जिस पर विचार करने के बाद 22 मार्च 2021 को शेखावत समेत दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस पर हस्ताक्षर किए थे. 

इससे पहले इस मामले को लेकर केंद्रीय मंत्री ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ 25 फरवरी 2020 को एक बैठक की थी. इसके अलावा उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी बात की थी.

इस परियोजना के तहत नॉन-मानसून सीजन में मध्य प्रदेश को 1,834 एमसीएम और उत्तर प्रदेश को 750 एमसीएम पानी दिया जाएगा.

जब द वायर  ने एनडब्ल्यूडीए के महानिदेशक भोपाल सिंह से पूछा कि क्या केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पर मेमोरैंडम ऑफ एग्रीमेंट साइन करने से पहले सुप्रीम कोर्ट की सीईसी रिपोर्ट पर विचार किया गया था, तो उन्होंने कहा कि नदी जोड़ो परियोजना की विशेष समिति की बैठक में इस पर चर्चा हुई थी और ये निर्णय लिया गया था कि बुंदेलखंड क्षेत्र को पानी दिलाने के लिए इससे बेहतर कोई और परियोजना नहीं हो सकती है.

उन्होंने कहा, ‘विशेष समिति की ये राय थी कि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पर डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार करते समय सभी संभावित विकल्पों पर विचार किया गया था और  सूखा प्रभावित बुंदेलखंड क्षेत्र को राहत पहुंचाने के लिए केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट सबसे अच्छा विकल्प है.’

हालांकि इसके मिनट्स ऑफ मीटिंग में ऐसा कोई विवरण दर्ज नहीं है कि आखिर किस आधार पर समिति ने अपनी ये ‘राय’ बनाई थी. ये निर्णय लेने से पहले किसी भी तरह के नए रिसर्च या अध्ययन का भी कोई जिक्र नहीं है.

26 फरवरी 2020 को हुई विशेष समिति की इस 17वीं बैठक की अध्यक्षता जल शक्ति राज्य मंत्री रत्तन लाल कटारिया ने की थी. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित यह कमेटी नेताओं, बाबुओं और कुछ सरकारी विशेषज्ञों से भरी पड़ी है.

इस मीटिंग में 67 लोगों ने भाग लिया था, जिसमें से 64 लोग केंद्र एवं राज्य के सरकारी विभागों के थे. बाकी के तीन विशेष आमंत्रितों में से एक केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के पूर्व चेयरमैन, एक आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर और इंटरनेशनल कमीशन ऑन इरिगेशन एंड ड्रेनेज (आईसीआईडी) के एक पूर्व सचिव शामिल थे.

सिंह ने कहा कि सरकार का पक्ष रखते हुए विभाग की ओर से सुप्रीम कोर्ट कमेटी को विचार करने के लिए 24 जुलाई 2020 को एक जवाब भेजा गया है.

आलम ये है कि एनडब्ल्यूडीए के पूर्व महानिदेशक एमके श्रीनिवास ने जल संबंधी परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी मिलने में आने वाली कथित अड़चनों पर एक प्रेजेंटेशन तैयार किया था, जिसमें केन-बेतवा परियोजना को एक केस स्टडी के रूप में दिखाया गया और इसी में एक जगह पर सीईसी का भी जिक्र आता है.

जल आधारित परियोजनाओं को संबंधित मंत्रालयों या एजेंसी से टेक्नो-इकोनॉमिक क्लीयरेंस, पर्यावरणीय मंजूरी, वन्यजीव मंजूरी, वन मंजूरी, जनजातीय कार्य मंत्रालय से मंजूरी और निवेश मंजूरी लेनी पड़ती है. ऐसे प्रावधान इसलिए किए गए हैं, ताकि किसी प्रोजेक्ट से पर्यावरण एवं इकोलॉजी को खतरा न हो, तथा इसमें बेजा खर्च न किया जाए. इसके साथ ही एक टिकाऊ विकास को सुनिश्चित किया जाए.

पन्ना टाइगर रिजर्व के बाहर लगा केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का बोर्ड. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

हालांकि अक्टूबर 2018 के इस प्रेजेंटेंशन में केन-बेतवा लिंक परियोजना को तमाम मंजूरियां मिलने में लगी कथित देरी को इस तरह पेश किया गया है ये कथित विकास कार्य में बाधा की तरह है. इसमें न्यायालय में दी गई तमाम चुनौतियों और सीईसी द्वारा इस परियोजना को जांचने को इसी भाव में उल्लेख किया गया है.

बता दें कि केन-बेतवा नदी जोड़ों परियोजना को दो चरणों में लागू किया जाना है, जिसमें से पहले चरण में केन नदी के पास में स्थित दौधन गांव में एक बांध बनाया जाएगा, जो 77 मीटर ऊंचा और 2,031 मीटर लंबा होगा.

इसके अलावा 221 किलोमीटर लंबी केन-बेतवा लिंक नहर बनाई जाएगी, जिसके जरिये केन का पानी बेतवा बेसिन में डाला जाएगा. दौधन बांध के चलते 9,000 हेक्टेयर का क्षेत्र डूबेगा, जिसमें से सबसे ज्यादा 5,803 हेक्टेयर पन्ना टाइगर रिजर्व का होगा, जो कि बाधों के रहवास का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है.

इस योजना के चलते 6,017 हेक्टेयर वन भूमि को पूरी तरह साफ कर दिया जाएगा, जिसमें बेहद संवेदनशील पन्ना टाइगर रिजर्व का 4,141 हेक्टेयर वन क्षेत्र भी शामिल है. दूसरे शब्दों में कहें, तो करीब 8,427 फुटबॉल फील्ड के बराबर की भूमि में लगे पेड़ों को खत्म किया जाना है.

वन सलाहकार कमेटी की सह समिति की रिपोर्ट के मुताबिक केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत कम से कम 23 लाख पेड़ों का काटा जाएगा, जो मुंबई की आरे कॉलोनी में काटे गए पेड़ों की तुलना में करीब एक हजार गुना (1,078 गुना) अधिक है.

मोदी सरकार का दावा है कि इस परियोजना से मध्य प्रदेश में 6.53 लाख हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में 2.51 लाख हेक्टेयर में सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो सकेगी. इसके अलावा करीब 62 लाख लोगों को पेयजल भी मिलेगा.

हालांकि बुंदेलखंड के विकास के नाम पर प्रचारित की जा रही इस परियोजना के तहत जहां एक तरफ क्षेत्र के 13 जिलों में से आठ जिले को ही लाभ मिलने की संभावना है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे क्षेत्रों को भी लाभ देने का प्रावधान किया गया है, जो बुंदेलखंड से बाहर हैं.

दस्तावेजों के मुताबिक, परियोजना के पहले चरण से मध्य प्रदेश के दमोह, छतरपुर, पन्ना और टीकमगढ़ तथा उत्तर प्रदेश के बांदा, झांसी, ललितपुर और महोबा को लाभ दिया जा सकता है.

वहीं इसके दूसरे चरण में लोवर ओर बांध, कोठा बराज और बीना कॉम्प्लेक्स मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट बनाया जाना है, जो बुंदेलखंड के बाहर हैं- शिवपुरी, विदिशा, रायसेन और सागर जिले को लाभ पहुंचाएंगे.

वो स्थान, जहां केन नदी पर दौधन बांध बनाया जाना है. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

इस प्रोजेक्ट को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने वाले पर्यावरणविद मनोज मिसरा कहते हैं कि इस परियोजना का असली मकसद बेतवा बेसिन के ऊपरी क्षेत्रों में पानी पहुंचाना है, जो बुंदेलखंड से बाहर हैं.

उन्होंने द वायर  से कहा, ‘बहुत लोग ये समझ ही नहीं पा रहे हैं कि केन-बेतवा लिंक का असली मकसद विदिशा, रायसेन, सागर जैसे जिलों को पानी देना है, जो बुंदेलखंड में है ही नहीं. ये बात खुद इसके डीपीआर में लिखी हुई है. बुंदेलखंड के जिन इलाकों में ये लोग पानी पहुंचाने के लिए कह रहे हैं वो पहले से ही पूर्व की परियोजनाओं के तहत सिंचिंत क्षेत्र के दायरे में है. चूंकि जब बेतवा के ऊपरी क्षेत्र में बांध बनाकर इसके पानी को रोक दिया जाएगा, तो बेसिन के निचले क्षेत्र में पानी की कमी हो जाएगी और इसी की भरपाई के लिए दौधन बांध बनाया जाएगा. इस पूरे तामझाम का बुंदेलखंड से कोई लेना-देना नहीं है.’

मिसरा ने आगे कहा, ‘ये मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं है कि वे ऐसी कोई वन्यजीव मंजूरी दें. कानून इसकी इजाजत नहीं देता है. कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी नेशनल पार्क में सिर्फ ऐसे ही कार्यों को मंजूरी दी सकती है जो वन्यजीव के हित में हो. सीईसी रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि की गई है. पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण एक शानदार सफल कहानी है, यहां बाघों को लाकर बसाया गया था, लेकिन ये प्रोजेक्ट इस क्षेत्र को बीच से काट रहा है, इससे सब बर्बाद हो जाएगा.’

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीईसी रिपोर्ट पर विचार करने के अंतिम निर्णय लिया जाना अभी बाकी है.

सीईसी ने क्या कहा था

सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी ने कहा था कि केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के तहत वन भूमि के 6,017 हेक्टेयर भूभाग, जो पन्ना टाइगर रिजर्व के बाघों का प्रमुख रहवास केंद्र है, को खत्म करने से 10,500 हेक्टेयर में पूरे वन्यजीवों का घर उजड़ जाएगा और ये नेशनल पार्क के बाकी क्षेत्र से कट-ऑफ हो जाएगा.

उन्होंने कहा था कि बांध बनाने के चलते जो वनभूमि डूबेगी, वो क्षेत्र की बेहद समृद्ध बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) है, जिसे फिर से नहीं बनाया जा सकता है.

समिति ने कहा था कि इस परियोजना को वन्यजीव मंजूरी देने वाली समिति ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि ये प्रोजेक्ट नेशनल पार्क के एकदम कोर (प्रमुख स्थान) में स्थिति है, जिसके चलते व्यापक स्तर पर फ्लोरा एंड फौना (जीव-जंतु एवं पेड़ों) की बर्बादी होगी. 

उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र को बनाया ही इसलिए गया था ताकि प्रकृति के नियमों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके और इसमें मनुष्यों का हस्तक्षेप न हो.

सीईसी ने कहा था कि केन-बेतवा परियोजना फेज-1 के तहत पूरे 6,017 हेक्टेयर के वन्यजीवों के ठिकाने को मोड़ने की मंजूरी देना, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की धारा 35 (6) का उल्लंघन है, क्योंकि ये कार्य वन्यजीवों की बेहतरी के लिए नहीं किया जा रहा है. 

उन्होंने कहा कि इस तरह की बर्बादी के बदले भरपाई करने का जो प्रस्ताव रखा गया है वो बेहद ही अपर्याप्त है. पन्ना टाइगर रिजर्व के इस इकोसिस्टम को दोबारा नहीं पाया जा सकता है.

पन्ना टाइगर रिजर्व में कई सारे ऐसे जानवर पाए जाते हैं जो विलुप्त होने के कगार पर हैं. (फोटो: धीरज मिश्रा/द वायर)

कमेटी ने चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि सरकार ने इस परियोजना के विकल्प पर विचार ही नहीं किया था. इसके तहत जिस तरह का लाभ देने का लक्ष्य रखा गया है, वो किसी अन्य बेहतर तरीके से प्राप्त किया जा सकता था.

सीईसी ने एनडब्ल्यूडीए, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी कमेटी और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की इस दलील को सिरे से खारिज किया कि इस परियोजना से बाघों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. उन्होंने कहा कि गर्मी में भी बाढ़ क्षेत्र में अत्यधिक पानी रहेगा क्योंकि ये बांध में पानी के न्यूनतम स्तर से भी नीचे है.

समिति ने कहा कि इस परियोजना के चलते घड़ियाल अभयारण्य और गिद्धों के प्रजनन केंद्र पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव का कोई आकलन नहीं किया गया है और इसकी भरपाई की भी कोई योजना नहीं बनाई गई है. 

केवल सीईसी ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति द्वारा गठित एक कमेटी ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘देश के किसी भी विकास संबंधी परियोजना को बाघों के महत्वपूर्ण आवास केंद्र और नाजुक इको-सिस्टम की इकोलॉजी को तबाह करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए. यदि हम आदर्श स्थिति को देखते हैं तो ऐसे प्रोटेक्टेड जंगली क्षेत्रों में इस तरह के प्रोजेक्ट से बचना सबसे बेहतर होगा. ये वन्यजीवों के हित में नहीं होगा और कुछ मिलाकर देखेंगे तो आने वाले समय में समाज के बेहतरी के लिए सही नहीं है.’

इस कमेटी ने आगे कहा कि इस क्षेत्र के विकास के लिए ऐसे प्रोजेक्ट सही नहीं होंगे. स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक टीम तैयार कर केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की हाइड्रोलॉजी पहलुओं की जांच कराई जानी चाहिए. 

सरकार का दावा है इसके जरिये कुल 9.04 लाख हेक्टेयर की सिंचाई होगी. इस पर सीईसी ने कहा कि केन बेसिन में पहले से ही 11 बड़े और मध्यम परियोजनाएं तखा 171 छोटी सिंचाई परियोजनाएं चल रही हैं, इन्हीं का क्षमता विस्तार कर इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. 

समिति ने ये भी कहा था कि इस प्रोजेक्ट में सरकार जितना लाभ कमाने का दावा कर रही है, वो तथ्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है.

जब सीईसी ने पूछा था कि इतनी बड़ी परियोजना के बजाय सिंचाई के लिए ज्यादा बेहतर तकनीकी जैसे कि माइक्रो इरिगेशन सिस्टम और जलवायु के अनुरूप फसल बुवाई योजना लागू करने पर विचार क्यों नहीं किया, इस पर एनडब्ल्यूडीए का जवाब था कि माइक्रो/ड्रिप इरिगेशन अंगूर, केला, संतरा, आम जैसों के लिए ठीक है.

एजेंसी के इस बयान पर हैरानी जताते हुए सीईसी ने कहा था कि ये दर्शाता है कि एनडब्ल्यूडीए ने इस प्रोजेक्ट के विकल्पों को नहीं तलाशा है.

भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय ने साल 1980 में एक राष्ट्रीय प्लान बनाया था, जिसमें पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए नदियों को जोड़ने की परिकल्पना की गई थी.

इसी के आधार पर तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने वर्ष 1982 में राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (एनडब्ल्यूडीए) की स्थापना की, जिसका काम देश भर की उन नदियों (कम और ज्यादा पानी वाले) की पहचान कर रिपोर्ट देना था, जिनको जोड़ा जा सकता है.

साल 1995 में एनडब्ल्यूडीए ने एक अध्ययन जारी किया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि केन को बेतवा नदी से जोड़ा जा सकता है. केन मध्य प्रदेश में कटनी जिले के कैमूर पहाड़ियों से निकलकर उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में चिल्ला गांव के पास यमुना में मिल जाती है. यह नदी जोड़ो परियोजना के तहत संभावित 30 लिंक में से एक है.

केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत संरचनाओं के नाम समेत निर्माण स्थान को दर्शाता मानचित्र.

हालांकि इस दावे की सत्यतता और इससे होने वाले गंभीर प्रभावों को लेकर सवाल उठने लगे थे. इस बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने टास्क फोर्स बनाया, जिसका काम इस प्रोजेक्ट में तेजी लाना था.

आगे चलकर अप्रैल 2010 में एनडब्ल्यूडीए ने केन-बेतवा लिंक के फेज-1 का डीपीआर तैयार किया, जो इस बात पर आधारित है कि केन में पानी की मात्रा ज्यादा है. विशेषज्ञों ने कहा कि जिस आधार पर ये दावा किया जा रहा है उसे आंकड़े ही उपलब्ध नहीं है.

अपने इन्हीं ‘विनाशकारी’ प्रवृति के चलते ये लागू नहीं हो पा रहा था और कई स्तरों पर इसे झटका मिल रहा था. कांग्रेस की अगुवाई वाली तत्कालीन यूपीए सरकार में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस परियोजना को मंजूरी देने से मना कर दिया था और कहा था कि यदि इसे लागू किया जाता है तो व्यापक स्तर पर पर्यावरणीय नुकसान होगा.

लेकिन मोदी सरकार के आते ही 08.07.2016 को इसे टेक्नो-इकोनॉमिक क्लीयरेंस मिला. इसके बाद 25.08.2017 को इसे पर्यावरणीय मंजूरी मिली. वहीं 23.08.2016 को इसे वन्यजीव मंजूरी मिल गई थी. पर्यावरण मंत्रालय ने परियोजना को 25.05.2017 को कुछ शर्तों के साथ प्रथम स्तर की वन मंजूरी दी थी.

इसके अलावा प्रोजेक्ट को जनवरी 2017 में जनजातीय मंत्रालय की मंजूरी मिल गई थी.

इसके बाद उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच जल बंटवारे को लेकर कुछ सालों तक उठापटक जरूर चली, लेकिन तमाम चेतावनियों को सिरे से खारिज करते हुए आखिरकार मोदी सरकार ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के समझौते पर हस्ताक्षर करवा ही दिए.