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अफ़ग़ानिस्तान: काबुल स्थित राष्ट्रपति भवन पर तालिबान का क़ब्ज़ा, राष्ट्रपति ने देश छोड़ा

अफ़ग़ानिस्तान में लगभग दो दशकों में सुरक्षा बलों को तैयार करने के लिए अमेरिका और नाटो द्वारा अरबों डॉलर ख़र्च किए जाने के बावजूद तालिबान ने एक सप्ताह में लगभग पूरे देश पर क़ब्ज़ा कर लिया है. फ़िलहाल अमेरिका अपने बाकी बचे कर्मचारियों को निकालने में लगा हुआ है. इस बीच देश के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के ताज़िकिस्तान में शरण लेने की सूचना है. देश में सत्ता हस्तानांतरण की प्रक्रिया जारी है. यह स्पष्ट नहीं है कि यह कब होगा और तालिबान में से कौन बातचीत कर रहा था.

अफगानिस्तान के गजनी शहर में हथियारबंद तालिबान आतंकी. (फोटोः रॉयटर्स)

काबुल/नई दिल्ली/वॉशिंगटन/संयुक्त राष्ट्र: अल-जजीरा न्यूज नेटवर्क पर प्रसारित वीडियो फुटेज के अनुसार काबुल स्थित अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भवन पर तालिबान लड़ाकों का कब्जा हो गया है. फुटेज में तालिबान लड़ाकों का एक बड़ा समूह राजधानी काबुल में स्थित राष्ट्रपति भवन के भीतर नजर आ रहा है.

इस बीच भारत समेत विभिन्न देश अफगानिस्तान ने अपने नागरिकों को निकालने की कवायद तेज कर दी है.

तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर अपने कब्जे की घोषणा राष्ट्रपति भवन से करने और देश को फिर से ‘इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान’ का नाम देने की उम्मीद है. 9/11 के हमलों के बाद अमेरिकी नेतृत्व वाली सेनाओं द्वारा आतंकवादियों को खदेड़ने से पहले तालिबान शासन के तहत यह देश का नाम था.

तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रवक्ता मोहम्मद नईम ने अल जज़ीरा टीवी को बताया, आज का दिन अफगान लोगों और मुजाहिदीन के लिए एक महान दिन है. उन्होंने 20 वर्षों तक उनके प्रयासों और उनके बलिदान का फल देखा है.

उन्होंने कहा, अल्लाह का शुक्र है, देश में युद्ध खत्म हो गया है.

तालिबान अधिकारियों ने सोमवार को कहा कि आतंकवादियों द्वारा राजधानी काबुल पर कब्जा करने और अमेरिका समर्थित सरकार के गिरने के एक दिन बाद उन्हें देश भर से किसी भी संघर्ष की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है.

तालिबान के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा, हमारी रिपोर्ट के मुताबिक स्थिति शांतिपूर्ण है. हालांकि उन्होंने पहचानने से इनकार कर दिया.

20 साल की लंबी लड़ाई के बाद अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से निकलने के कुछ ही दिनों के भीतर लगभग पूरे देश पर फिर से तालिबान का कब्जा हो गया है.

इस बीच अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी रविवार को देश छोड़कर चले गए. बताया जा रहा है कि उन्होंने ताजिकिस्तान में शरण ली है. देश छोड़ने पर पहले उन्होंने कहा कि खूनखराबा रोकने के लिए वह ऐसा कर रहे हैं.

इसके साथ ही देशवासी और विदेशी भी युद्धग्रस्त देश से निकलने को प्रयासरत हैं, जो नए अफगानिस्तान के निर्माण के पश्चिमी देशों के 20 साल के प्रयोग की समाप्ति का संकेत है. हालांकि काबुल हवाईअड्डे से वाणिज्यिक उड़ानें बंद होने के कारण लोगों की इन कोशिशों को झटका लगा है.

अफगान राष्ट्रीय सुलह परिषद के प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने इसकी पुष्टि की कि गनी देश से बाहर चले गए हैं. अब्दुल्ला ने कहा, ‘अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अफगानिस्तान को इस मुश्किल स्थिति में छोड़कर देश से चले गए हैं. अल्लाह उन्हें जवाबदेह ठहराएं.’

देश छोड़ने के लिए गनी की आलोचना करते हुए अब्दुल्ला अब्दुल्ला कहा, ‘अल्लाह उनसे जवाब लेगा और राष्ट्र उन्हें न्याय के कठघरे में लाएगा.’

अफगानिस्तान के कार्यवाहक रक्षा मंत्री, बिस्मिल्लाह खान मोहम्मदी ने देश छोड़कर जाने वाले राष्ट्रपति की आलोचना करने से खुद को रोक नहीं सके. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘उन्होंने पीछे से हमारे हाथ बांध दिए और देश बेच दिया.’

नागरिक इस भय से देश छोड़ना चाहते हैं कि तालिबान उस क्रूर शासन को फिर से लागू कर सकता है, जिसमें महिलाओं के अधिकार खत्म हो जाएंगे. नागरिक अपने जीवन भर की बचत को निकालने के लिए नकद मशीनों के बाहर खड़े हो गए. वहीं काबुल में अधिक सुरक्षित माहौल के लिए देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अपने घरों को छोड़कर आए हजारों की संख्या में आम लोग पूरे शहर में उद्यानों और खुले स्थानों में शरण लिए हुए दिखे.

अफगानिस्तान में लगभग दो दशकों में सुरक्षा बलों को तैयार करने के लिए अमेरिका और नाटो द्वारा अरबों डॉलर खर्च किए जाने के बावजूद तालिबान ने आश्चर्यजनक रूप से एक सप्ताह में लगभग पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया. कुछ ही दिन पहले एक अमेरिकी सैन्य आकलन ने अनुमान लगाया था कि राजधानी के तालिबान के दबाव में आने में एक महीना लगेगा.

हालांकि पिछले कुछ दिनों में तालिबान ने अफगानिस्तान के ज्यादातर हिस्सों पर कब्जा जमा लिया है. उसने कंधार, हेरात, मजार-ए-शरीफ और जलालाबाद जैसे शहरों समेत 34 में से 25 प्रांतीय राजधानियों पर कब्जा जमा लिया है.

काबुल का तालिबान के नियंत्रण में जाना अमेरिका के सबसे लंबे युद्ध के अंतिम अध्याय का प्रतीक है, जो 11 सितंबर, 2001 को अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के षड्यंत्र वाले आतंकवादी हमलों के बाद शुरू हुआ था.

ओसामा को तब तालिबान सरकार द्वारा आश्रय दिया गया था. एक अमेरिकी नेतृत्व वाले आक्रमण ने तालिबान को सत्ता से उखाड़ फेंका. हालांकि इराक युद्ध के चलते अमेरिका का इस युद्ध से ध्यान भंग हो गया.

अमेरिका वर्षों से युद्ध से बाहर निकलने को प्रयासरत है. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में वॉशिंगटन ने फरवरी 2020 में तालिबान के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो विद्रोहियों के खिलाफ प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई को सीमित करता है.

इसने तालिबान को अपनी ताकत जुटाने और प्रमुख क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए तेजी से आगे बढ़ने की अनुमति दी. वहीं राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस महीने के अंत तक अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी की अपनी योजना की घोषणा की.

रविवार की शुरुआत तालिबान द्वारा पास के जलालाबाद शहर पर कब्जा करने के साथ हुई- जो राजधानी के अलावा वह आखिरी प्रमुख शहर था, जो उनके हाथ में नहीं था. अफगान अधिकारियों ने कहा कि आतंकवादियों ने मैदान वर्दक, खोस्त, कपिसा और परवान प्रांतों की राजधानियों के साथ-साथ देश की सरकार के कब्जे वाली आखिरी सीमा पर भी कब्जा कर लिया.

बाद में बगराम हवाई ठिकाने पर तैनात सुरक्षा बलों ने तालिबान के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है. वहां एक जेल में करीब 5,000 कैदी बंद हैं. बगराम के जिला प्रमुख दरवेश रऊफी ने कहा कि इस आत्मसमर्पण से एक समय का अमेरिकी ठिकाना तालिबान लड़ाकों के हाथों में चला गया. जेल में तालिबान और इस्लामिक स्टेट समूह, दोनों के आतंकी हैं.

सत्ता हस्तानांतरण पर बातचीत

रविवार को तालिबान लड़ाके काबुल के बाहरी इलाके में घुस गए थे, लेकिन शुरू में शहर के बाहर रहे. एक अफगान अधिकारी ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि इस बीच, राजधानी में तालिबान वार्ताकारों ने सत्ता के हस्तांतरण पर चर्चा की. अधिकारी ने बंद दरवाजे के पीछे हुई बातचीत के विवरण पर चर्चा की और उन्हें ‘तनावपूर्ण’ बताया.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

यह स्पष्ट नहीं है कि यह सत्ता हस्तांतरण कब होगा और तालिबान में से कौन बातचीत कर रहा था. सरकारी पक्ष के वार्ताकारों में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई, हिज़्ब-ए-इस्लामी के नेता गुलबुद्दीन हिकमतयार और अब्दुल्ला अब्दुल्ला शामिल थे, जो गनी के मुखर आलोचक रहे हैं.

करज़ई खुद पोस्ट किए गए एक ऑनलाइन वीडियो में दिखाई दिए, जिसमें उनकी तीन छोटी बेटियां भी थीं. उन्होंने कहा कि वह काबुल में हैं.

उन्होंने कहा, ‘हम तालिबान नेतृत्व के साथ अफगानिस्तान के मुद्दे को शांति से सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं.’ इस बीच ऊपर से गुजर रहे एक हेलीकॉप्टर की आवाज सुनी गई.

करजई ने ट्विटर पर कहा कि राष्ट्रपति गनी के जाने के बाद सत्ता हस्तांतरण के लिए एक समन्वय परिषद का गठन किया गया है, जिसमें वह, अब्दुल्ला अब्दुल्ला और गुलबुद्दीन हिकमतयार शामिल हैं.

इस बीच तालिबान ने राजधानी के निवासियों को शांत करने की कोशिश की. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उनके लड़ाके लोगों के घरों में प्रवेश नहीं करेंगे या व्यवसायों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि वे अफगान सरकार या विदेशी बलों के साथ काम करने वालों को माफी की पेशकश करेंगे.

तालिबान ने एक बयान में कहा, ‘किसी की जान, संपत्ति और सम्मान को नुकसान नहीं होगा.’

तालिबान ‘खुली और समावेशी’ इस्लामी सरकार चाहता है: प्रवक्ता

तालिबान के एक प्रवक्ता एवं वार्ताकार ने रविवार को कहा कि चरमपंथी संगठन अफगानिस्तान में ‘खुली, समावेशी इस्लामी सरकार’ बनाने के मकसद से वार्ता कर रहा है.

सुहैल शाहीन ने तालिबान के कुछ ही दिनों में देश के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लेने और राजधानी काबुल में घुस जाने के बाद यह बात कही है, जहां अमेरिका अपने राजनयिकों एवं अन्य असैन्य नागरिकों को वापस बुलाने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है.

इससे पहले तालिबान के एक अधिकारी ने कहा था कि संगठन राष्ट्रपति भवन से एक नई सरकार की घोषणा करेगा, लेकिन वह योजना फिलहाल टलती दिख रही है.

मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत न होने के कारण अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर ये जानकारियां दी.

अमेरिका काबुल स्थित दूतावास से शेष कर्मचारियों को निकाल रहा है

अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के अनुसार, अमेरिका काबुल स्थित अपने दूतावास से शेष कर्मचारियों को व्‍यवस्थित तरीके से बाहर निकाल रहा है. हालांकि, उन्होंने जल्दीबाजी में अमेरिका के वहां से निकलने के आरोपों को तवज्जो नहीं देते हुए कहा कि यह वियतनाम की पुनरावृत्ति नहीं है.

एबीसी चैनल के ‘दिस वीक’ पर रविवार को ब्लिंकन ने कहा, ‘यह स्पष्ट रूप से वियतनाम नहीं है. हमारे लोग परिसर को छोड़ रहे हैं और हवाईअड्डा जा रहे हैं.’

उन्होंने इसकी पुष्टि भी की कि अमेरिकी दूतावास के कर्मचारी परिसर खाली करने से पहले दस्तावेज और अन्य सामग्री को नष्ट कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने जोर देते हुए कहा, ‘यह बहुत सोच-समझकर और सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है. यह सब कुछ अमेरिकी बलों की उपस्थिति में हो रहा है, जो वहां हमारी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं.’

उन्होंने सीएनएन के ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ कार्यक्रम में कहा, ‘हम 20 साल पहले एक मिशन के साथ अफगानिस्तान गए थे, और वह मिशन उन लोगों से निपटना था जिन्होंने 11 सितंबर को हम पर हमला किया था. और हम उस मिशन में सफल हुए हैं.’

उन्होंने कहा, ‘एक, पांच या दस साल के लिए अफगानिस्तान में रहना राष्ट्रीय हित में नहीं था.’

काबुल स्थित अमेरिकी दूतावास खाली करने के क्रम में रविवार को परिसर से सैन्य हेलीकॉप्टर लगातार उड़ान भरते रहे.

काबुल में दूतावास से अमेरिका का झंडा उतारा गया

अमेरिका के विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि अफगानिस्तान से अपने लोगों को निकालने के बीच काबुल में अमेरिकी दूतावास से अमेरिकी झंडा उतार लिया गया है.

राजधानी काबुल स्थित अमेरिकी दूतावास पर लगा झंडा, जिसे अब उतार लिया गया है. (फोटो: रॉयटर्स)

अधिकारी ने बताया कि दूतावास के लगभग सभी अधिकारियों को शहर के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पहुंचा दिया गया है, जहां पर हजारों अमेरिकी तथा अन्य लोग विमानों का इंतजार कर रहे हैं. अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी झंडा दूतावास के अधिकारियों में से एक के पास है.

रविवार रात को विदेश मंत्रालय और पेंटागन ने संयुक्त बयान में कहा कि काबुल हवाईअड्डे से लोगों की सुरक्षित रवानगी के लिए वे कदम उठा रहे हैं. इसमें कहा गया कि अगले दो दिन में अमेरिका के 6,000 सुरक्षाकर्मी वहां मौजूद होंगे और वे हवाई यातायात नियंत्रण अपने कब्जे में ले लेंगे.

अफगानिस्तान पर करीबी नजर रख रहा भारत, काबुल से कर्मचारियों को निकालने को तैयार

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के युद्धग्रस्त देश छोड़ कर चले जाने के बाद भारत ने काबुल से अपने सैकड़ों अधिकारियों और नागरिकों को निकालने के लिए आकस्मिक योजनाएं बनाई हैं.

घटनाक्रम पर नजर रख रहे लोगों ने कहा कि भारत काबुल में भारतीय दूतावास के अपने कर्मचारियों और भारतीय नागरिकों की जान जोखिम में नहीं डालेगी तथा जरूरत पड़ने पर आपात स्थिति में उन्हें वहां से निकालने के लिए योजनाएं बना ली गयी हैं.

उन्होंने बताया, ‘सरकार अफगानिस्तान में तेजी से बदल रहे घटनाक्रमों पर करीबी नजर रख रही है. हम काबुल में भारतीय दूतावास में अपने कर्मचारियों की जान खतरे में नहीं डालेंगे.’

हालांकि, अफगानिस्तान में तेजी से हो रहे घटनाक्रम पर भारत की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है.

यह पूछे जाने पर कि काबुल से भारतीय कर्मचारियों और नागरिकों को कब निकाला जाएगा, इस पर उन्होंने कहा कि जमीनी हालात को देखते हुए फैसले लिए जाएंगे.

समझा जाता है कि भारतीय वायुसेना के सैन्य परिवहन विमान सी-17 ग्लोबमास्टर के एक बेड़े को लोगों तथा कर्मचारियों को निकालने के लिए तैयार रखा गया है.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने कहा कि काबुल हवाई अड्डे से अब कोई उड़ान नहीं चल सकती हैए क्योंकि हवाई क्षेत्र बंद कर दिया गया है. यानी वहां कोई विमान भी नहीं उतर सकता है.

सूत्रों ने कहा है कि लोगों को बाहर निकालने के लिए अफगानिस्तान जाने के लिए एयर इंडिया का एक विमान अब वहां भी नहीं जा सकेगा. काबुल हवाई क्षेत्र को बंद कर दिया गया है. यह जानकारी देने के लिए एक नोटिस जारी किया गया है.

एयर इंडिया के एक सूत्र ने एनडीटीवी को बताया, हवाई क्षेत्र बंद है. कोई भी एयरलाइन कैसे संचालित हो सकती है. अभी हम काबुल के लिए अपनी 12ः30 बजे की उड़ान संचालित करने में सक्षम नहीं हैं.

अमेरिका काबुल हवाईअड्डे पर 6,000 सैनिकों की तैनाती करेगा

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे और राष्ट्रपति अशरफ गनी के शासन के घुटने टेकने के बीच अमेरिका ने कहा है कि अपने नागरिकों, अपने मित्रों और सहयोगियों की अफगानिस्तान से सुरक्षित वापसी के लिए वह काबुल हवाईअड्डे पर 6,000 सैनिकों को तैनात करेगा.

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल स्थित हामिद करजई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर लगी भीड़. विभिन्न देशों के नागरिकों समेत बदलते राजनीतिक परिवेश में अफगानिस्तान के नागरिक भी देश छोड़ने को मजबूर हैं. (फोटो: रॉयटर्स)

विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने महत्वपूर्ण सहयोगी देशों के अपने समकक्षों से बात की. हालांकि इनमें भारत शामिल नहीं था.

अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेतृत्व में 60 से अधिक देशों ने संयुक्त बयान जारी किया है, जिसमें अफगानिस्तान में शक्तिशाली पदों पर आसीन लोगों से अनुरोध किया गया है कि वे मानवीय जीवन और संपत्ति की रक्षा की जिम्मेदारी और जवाबदेही लें और सुरक्षा एवं असैन्य व्यवस्था की बहाली के लिए तुरंत कदम उठाएं.

विदेश विभाग और रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया, ‘फिलहाल हम हामिद करजई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की सुरक्षा के लिए अनेक कदम उठा रहे हैं, ताकि सैन्य और असैन्य विमानों के जरिये अमेरिकी लोग और उनके सहयोगी अफगानिस्तान से सुरक्षित निकल सकें.’

इसमें कहा गया, ‘अगले 48 घंटों में करीब 6000 सुरक्षाकर्मियों को वहां तैनात किया जाएगा. उनका मिशन लोगों को वहां से सुरक्षित निकालने में मदद देना होगा और वे हवाई यातायात नियंत्रण को भी अपने कब्जे में लेंगे. कल और आने वाले दिनों में हम देश से हजारों अमेरिकी नागरिकों, काबुल में अमेरिकी मिशन पर तैनात स्थानीय लोगों और उनके परिवारों को निकालेंगे.’

बीते दो हफ्तों में विशेष वीजा धारक करीब 2,000 लोग काबुल से अमेरिका पहुंच चुके हैं.

विदेश विभाग की ओर से कहा गया कि ब्लिंकन ने अफगानिस्तान में हालात तथा सुरक्षा संबंधी विषय पर ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी और नॉर्वे में अपने समकक्षों से बात की. विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने बताया कि अमेरिकी दूतावास के कर्मियों को सुरक्षित निकालने का काम पूरा हो चुका है.

इस बीच, पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि तालिबान का विरोध किए बिना काबुल का पतन होना अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी हार के रूप में दर्ज होगा.

तालिबान के काबुल में राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लेने और इसके निर्वाचित नेता अशरफ गनी के अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ देश छोड़कर ताजिकिस्तान चले जाने के बाद ट्रंप ने एक बयान में कहा, ‘जो बाइडन ने अफगानिस्तान में जो किया वह अपूर्व है. इसे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी हार के रूप में याद रखा जाएगा.’

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की पूर्व राजदूत निक्की हेली ने इसे बाइडन प्रशासन की विफलता करार दिया है.

संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान में सभी से संयम दिखाने का आग्रह किया

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने अफगानों की जान बचाने और मानवीय सहायता पहुंचाने के मकसद से तालिबान और सभी अन्य पक्षों से संयम बरतने का आग्रह किया है.

संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने रविवार को कहा, संयुक्त राष्ट्र एक शांतिपूर्ण समाधान में योगदान करने, सभी अफगानों, विशेषकर महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकारों की रक्षा करने और जरूरतमंद नागरिकों को जीवन रक्षक मानवीय और महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करने के लिए दृढ़ संकल्पित है.’

संयुक्त राष्ट्र मानवीय सहायता कार्यालय ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र और गैर सरकारी संगठनों दोनों के मानवीय सहायता समुदाय के सदस्य सहायता की आवश्यकता वाले लाखों अफगानों की मदद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो ‘अत्यधिक जटिल’ सुरक्षा वातावरण के बावजूद देश में रह रहे हैं.

ओसीएचए के नाम से जाने जाना वाले कार्यालय ने रविवार को एक बयान में कहा कि 5,50,000 लोगों को पहले से ही सहायता की आवश्यकता थी, जब इस साल संघर्ष से 5,50,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए. यह आंकड़ा मई के बाद से दोगुना हो गया.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)