भारत

नाम छिपाकर कौन लोग जीते आए हैं और उनकी घुटन को किसने महसूस किया है?

पहचान की अवधारणा खालिस इंसानी ईजाद है. पहचान के लिए ख़ून की नदियां बह जाती हैं. पहचान का प्रश्न आर्थिक प्रश्नों के कहीं ऊपर है. उस पहचान को अगर कोई भूमिगत कर दे, तो उसकी मजबूरी समझी जा सकती है और इससे उसके समाज की स्थिति का अंदाज़ा भी मिलता है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

‘हिमांशु जी, ज़मीनी स्तर पर हालात बहुत बुरे है, मैं उस चूड़ीवाले के नाम बदलकर व्यापार करने की मजबूरी समझ सकता हूं. हमारे यहां फल बेचने एक मुल्लाजी आते थे, लंबा चौड़ा कद, लंबी सफेद दाढ़ी, जालीदार टोपी और एकदम चमकती हुई सफेद सलवार कमीज. जबसे कोरोना काल आया, वो दिखना बंद हो गए. जब कई महीनों तक वो नहीं दिखे तो मैंने दूसरे फल बेचने वालों से उनके बारे में पूछा तो सबने बड़े फ़ख्र से बताया कि एक दिन आया था तो हम सबने और इलाके के लोगों ने उसको धमकाकर भगा दिया कि आज के बाद वो अगर यहां दिखाई दिया तो उसकी खैर नहीं.

बात आई गई हो गई, अब से कुछ दिन पहले मेरा अपने एक मित्र के घर जाना हुआ वहां मैने एक रेहड़ी देखी जो एकदम मुल्लाजी की रेहड़ी की तरह थी मगर उसपर बंदा कोई और था. बिना दाढ़ी के मैली-कुचैली पैंट और कमीज़ पहने हुए. जब तक मैं उसे पहचानता वो ही बोल पड़ा, ‘नमस्ते बाउजी’, और मनुहार लगाते स्वर में बोला, ‘बाउजी, यहां लोग मुझे मुन्ना के नाम से जानते हैं.’

हिमांशु कुमार बचपन की याद कर रहे थे. उनकी और उनके मनिहार की. उनकी मां मनिहार से चूड़ियां लिया करती थीं:

‘हमारी मां मुजफ्फरनगर में हमेशा एक बुजुर्ग मुसलमान मनिहार से चूड़ियां पहनती थीं. वह बुजुर्ग मनिहार मेरी मां को अपने हाथ से चूड़ियां पहनाते थे. चूड़ियां पहनने के बाद मेरी मां अपनी साड़ी का आंचल सिर पर लेकर उन बुजुर्ग मुस्लिम मनिहार के पांव छूती थीं. और वह मेरी मां के सिर पर हाथ रखकर कहते थे बेटी तेरा सुहाग सदा बना रहे.’

नितिन गर्ग ने इस संस्मरण को पढ़कर अपनी यह हाल की याद सुनाई. हिमांशु कुमार की मां के घर मनिहार अपनी पहचान, अपने नाम के साथ न सिर्फ बेख़ौफ़ आ सकते थे बल्कि बाइज्जत भी. जिसके घर आए वे उनकी कद्र करती थीं.

मनिहारों और मनिहारिनों से एक ख़ास किस्म का रिश्ता घर की लड़कियों, औरतों का हुआ करता था. वे हिंदुओं के घर भी जाते थे, मुसलमानों के घर भी. किसी हिंदू मर्द ने शक नहीं किया कि ये मुसलमान मनिहार उनकी औरतों को फुसला लेंगे. अब यह सब कुछ ज़्यादातर लोगों को अविश्वसनीय लग सकता है लेकिन हम सबके लिए यह ज़िंदा हकीकत रही है. मुझे खुद सीवान की तुरहा टोली के लाल बाबू सुनार के अपने मकान में आने वाली मनिहारिनों की याद है. वे हिंदू न थीं.

हिमांशु कुमार की इस गर्वीली और दर्दबुझी याद को पढ़कर नितिन गर्ग ने को पढ़कर अपनी यह हाल की याद सुनाई. उन्होंने भी बिना किसी टिप्पणी के इसे बयान किया. हिमांशु कुमार की याद और नितिन गर्ग की याद में सिर्फ वक्तों का फासला नहीं है. मानो ये दो अजनबी मुल्कों की कहानियां हैं.

नितिन ने अलग से यह नहीं लिखा कि अपने ‘मुल्लाजी’ को मुन्ना के रूप में देखकर उन्हें क्या लगा. लेकिन हम-आप उनके दिल पर जो गुजरी होगी, उसे महसूस कर सकते हैं. हिमांशु कुमार के वक्त से नितिन गर्ग के वक्त का फासला कैसे बना और कैसे तय हुआ?

नितिन को पढ़ते हुए अभी दस रोज़ पहले चंडीगढ़ में अपने पत्रकार मित्र एसपी सिंह के साथ हुई बातचीत याद आ गई. वे ड्राइव करते हुए अपने उस टैक्सीवाले को याद कर रहे थे कोरोना संक्रमण की वजह से जिसका काम बंद था. वे उसकी कुछ मदद करना चाहते थे. इसलिए उसके बैंक के ब्योरे मांगे.

जब वे उसके खाते में रकम डालने की प्रक्रिया पूरी कर रहे थे तो उसका नाम उभर आया. एसपी सिंह को झटका लगा. इस नाम से उसे वे नहीं जानते रहे थे. यह एक ‘मुसलमान नाम’ था. लेकिन इस ‘रहस्योद्घाटन’ ने एसपी के मन में यह भाव नहीं पैदा किया कि वह उन्हें इतने दिनों तक धोखा दे रहा था. उन्होंने पैसे उसके खाते में डाले.

एसपी सिंह समझ सकते थे कि वह क्यों अपने असली नाम से काम करना सुरक्षित न मानता होगा. उन्होंने अपने मुल्क के हालात पर ठंडी सांस भरी, जिसे वे अकेले नहीं बदल सकते. ऐसी आबोहवा जिसमें कोई न अपने चेहरे, न अपने कपड़ों और अपने नाम की वजह से डरा-सहमा दबा-दबा फिरे.

पहचान की अवधारणा खालिस इंसानी ईजाद है. पहचान के लिए खून की नदियां बह जाती हैं. पहचान का प्रश्न आर्थिक प्रश्नों के कहीं ऊपर है, यह हम मार्क्सवादियों को बहुत बाद में समझ में आया था. उस पहचान को अगर कोई भूमिगत कर दे, तो उसकी मजबूरी समझी जा सकती है और उससे उसके समाज की स्थिति का अंदाजा भी मिलता है.

पहचान इंसान की पूरी होती है नाम और रूप के मिलन से. आपको कई बार चेहरे याद आते हैं और उनके नाम नहीं. कितनी छटपटाहट होती है! वैसे ही जब कोई सामने पड़ जाए और आप उसका नाम भूल गए हों! आपको कितनी झेंप होती है और उसे यह एहसास कि वह आपके लिए इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं कि आप उसका नाम याद रखने की मेहनत करें! नाम इतना अनिवार्य है मनुष्य के लिए.

सिर्फ इंसानी समाज के लिए नहीं, नाम प्रत्येक प्राकृतिक घटना, उपस्थिति के लिए देना इंसानी फितरत है. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने प्रख्यात निबंध ‘कुटज’ में शिवालिक के वृक्षों से अपने संवाद को हमारे लिए लिपिबद्ध किया है,

‘मैं किसी का नाम नहीं जानता, कुल नहीं जानता, शील नहीं जानता, पर लगता है, जैसे ये मुझे अनादि काल से जानते हैं. इन्हीं में एक छोटा-सा–बहुत ही ठिगना पेड़ है, पत्ते चौड़े भी हैं, बड़े भी.. . फूलों से तो ऐसा लदा है…. …पूछ रहा है कि क्या तुम मुझे भी नहीं पहचानते?’

और झेंपा हुआ लेखक उत्तर देता है,

‘पहचानता तो हूं, अवश्य पहचानता हूं. … नाम भूल रहा हूं. रूप देखकर प्रायः पहचान जाता हूं, नाम नहीं याद आता.’

लेकिन लेखक को मालूम है कि ‘नाम ऐसा है कि जब तक रूप के पहले हो जाए तब तक रूप की पहचान अधूरी रह जाती है.  …रूप मुख्य है या नाम? नाम बड़ा है या रूप?’

अपनी संतान का नाम चुनते वक्त कितनी दिमागी, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक जद्दोजहद की जाती है. नाम में आप कुछ सपने भी गूंथ देते हैं. कई लोग अपने नाम की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाते. उसमें अकेले उनका कसूर हो, ज़रूरी नहीं. तो इंसान पूरा पहचाना जाता है नाम-रूप के संयोग से. लेकिन कई बार सिर्फ रूप, शक्ल ही उसकी पहचान स्थिर कर देती है. नाम तक पहुंचने की नौबत नहीं आती.

कवि, लेखक उज्ज्वल भट्टाचार्य ने जर्मनी का अपना अनुभव लिखा है,

‘1991-93 में मैं बर्लिन में था. बर्लिन के पूर्वी हिस्से में कई मोहल्लों में उस समय नवनाज़ियों का तांडव चल रहा था. सरेआम रास्ते पर अगोरे विदेशियों की पिटाई की जा रही थी. मेरा मोहल्ला भी ऐसा ही था. मेरे घर के ठीक पीछे एक वियतनामी युवती को पीटा गया. मैं दहशत में था, शाम को आठ बजे के बाद बाहर नहीं निकलता था.

पारिवारिक गाड़ी थी, पत्नी चलाती थी. मैं या तो पत्नी के साथ निकलता था, अकेले लौटना हो तो टैक्सी लेकर घर आता था और टैक्सी चालक से कहता था कि मैं दरवाज़ा खोलकर अंदर जाऊं उसके बाद ही वह जाए. डर मेरे ख़ून में समा गया था. मैं चिड़चिड़ा हो गया था, मेरा समूचा व्यक्तित्व बदलने लगा था. ‘

अमेरिका में सिखों पर हमले होने की ख़बरें मिलती रही हैं. हमला करते वक्त उन्हें ‘पाकी’ कहा जाता है. एक सिख मित्र ने बतलाया कि एक सिख संगठन ने स्पष्टीकरण दिया कि वे पाकी या मुसलमान नहीं हैं, उनका समूहवाचक नाम अलग है.

तो क्या वह संगठन हमलावरों को अपना असली निशाना ठीक से चुनने को कह रहा था? वह यह कह रहा था कि सिखों पर वे ‘मिस्टेकेन आइडेंटिटी’ (गलत पहचान) के कारण हमला कर रहे हैं. उन्हें जिन पर हमला करना है, बेशक करें, हम पर न करें क्योंकि हम ‘वे’ नहीं हैं.

समूहवाचक पहचान ही कई बार निर्णायक रूप से घातक हो जाती है. उस वक्त उस समूह के अलग-अलग व्यक्ति के नाम जानने की ज़रूरत नहीं होती. 1984 में साइंस कॉलेज के एक सिख अध्यापक को हिंसा थमने के बाद जब उनके छात्रों और सहकर्मियों ने देखा तो उन्हें धक्का लगा. उनका रूप बदल गया था. पहली नज़र में वे पहचान में न आते थे.

लेकिन क्या इस सदमे के बाद उन्होंने उन सिख अध्यापक के उस ‘आत्मलोप’ में अपने समाज की हिस्सेदारी पर कोई पश्चाताप किया?

युगांडा में ईदी अमीन ने जब तय किया तो एशियायी पहचान को हमले के लिए चुना गया. उस वक्त भारतीय, पाकिस्तानी समूहवाचक संज्ञाएं एक दूसरी समूहवाचक संज्ञा में लीन हो गईं. एक ही जहाज पर, एक ही रास्ते से, दोनों युगांडा, जो उनका देश था, छोड़ने को मजबूर किए गए. तो जो पहचानें जिन्हें एक राजनीतिक विचारधारा एक दूसरे के खिलाफ मानती है, वे यहां एक हो गई थीं.

अलग-अलग नाम बताकर हिंसा से बचने का मौक़ा भी मिल पाए, यह मुमकिन न था. आपके नाम का अलग हो जाना ही काफी नहीं, सामने वाले को नाम और नाम में फर्क करना भी तो आना चाहिए.

एक समूहवाचक नाम है, एक व्यक्तिवाचक. व्यक्ति समूह में है या समूह व्यक्ति में? अपने नाम से व्यक्ति अपने ख़ास वजूद का ऐलान करता है. उसका मिटना उसकी रक्तहीन हत्या है. उस नाम का महत्त्व क्या है और कब है? कब वह मारा जाता है?

‘कुटज’ की ही पंक्तियां हैं,

‘नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह नाम है. वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है.रूप व्यक्ति-सत्य है, नाम समाज-सत्य. नाम उस पद को कहते हैं जिसपर समाज की मुहर लगी होती है, आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सैंक्शन’ कहा करते हैं.’

रूप भी समाज या समुदाय-सत्य हो सकता है, यह उज्ज्वल भट्टाचार्य जैसे न जाने कितने लोगों के अनुभव से सिद्ध है. आपको देखते ही जब एक भीड़ पहचान ले तो वह आपके रूप को व्यक्ति-सत्य की जगह समुदाय-सत्य ही मान रही होती है. जब वह उस शक्ल-सूरत के,जिसमें रंग शामिल है, आभास मात्र से रूप-संहार पर आमादा हो जाए तो क्या यह उस रूप की कमी है या उस भीड़वादी समाज की?

रूप धोखा दे सकता है. यानी मैं जिसे दुश्मन मान बैठा हूं, वह अपने रूप से मुझे अपना जान पड़ सकता है. तो अपनेपन के इस ‘छल’ से, जो वह मुझ जैसा रूप रखकर मेरे साथ करना चाहता है, मैं खुद को कैसे बचाऊं?

जर्मनी में यहूदियों को जो पीला बिल्ला लगाना पड़ता था, वह ‘आर्य जर्मन’ को इसी धोखे से बचाने के लिए. कुदरत ने जो गड़बड़ कर दी है उसे दुरुस्त करने का और कौन-सा तरीका हो सकता है? उसने लोगों को प्रायः एक जैसा बना दिया जबकि हम अलग-अलग रहना चाहते हैं.

अगर समाज की मुहर न हो, तो नाम जानने की ज़रूरत भी नहीं होती. लेकिन जिस जगह एक जैसे रूपवालों के कई नाम होते हैं तो नाम पर मुहर की ज़रूरत पड़ती है. किस नाम को कौन-सा समाज स्वीकृति देगा यानी खुद में शामिल करेगा और कौन-सा नाम उसके भीतर की हिंसा को उकसा देगा, इससे उस समाज और उस नाम के रिश्ते का पता चलता है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

किन नामों के लिए दरवाजे खुले हैं, सड़कें बाइत्मीनान हैं? किनके लिए नहीं? सड़कें सड़कों से घिरी होती हैं, मोहल्ले मोहल्लों से. किस गली में घुसते ही आपकी धड़कन तेज हो जाती है, किस सड़क पर बिना दाएं-बाएं देखे चलते चले जा सकते हैं?

यह सामाजिक शिक्षा हरदोई के तस्लीम ने पूरी नहीं ली थी. तभी तो वह इंदौर जैसे शहर में अनजानी गलियों में ‘चूड़ी ले लो, चूड़ी ले लो,’ जैसी पुकार लगाता घूम रहा था. पूछने पर गोलू जैसा धर्मनिरपेक्ष नाम बताने से काम नहीं चलेगा, उसके रूप में या उसके स्वर में कुछ ऐसा है जो सुनने वाले के कानों को खटक जाएगा और वह पकड़ लिया जाएगा और गोलू नाम से ढंकी उसकी असली पहचान का ‘पर्दाफ़ाश’ कर दिया जाएगा.

इससे बड़ी जालसाजी क्या हो सकती है कि कोई अपना नाम छिपाए? लेकिन नितिन गर्ग ने जो लिखा, मुल्लाजी के मुन्ना बनने की दास्तान, क्या उसका आशय समझना इतना मुश्किल है?

याद आ रही है अपने एक छात्र से हुई बातचीत. उनकी नौकरी राजस्थान के एक शहर में लगी और उसने रिहाइश के लिए मकान किराए पर लिया. लेकिन आधा नाम छिपाकर. जिसे आप कुलनाम कहेंगे. नाम का पहला हिस्सा जाति-निरपेक्ष था. मैंने शुद्धतावादी अहंकार में फटकारा, ‘छिपाया क्यों? सच बताना था.’

छात्र ने बिना नाराज़ हुए जवाब दिया, ‘सच बताने से मकान नहीं मिलता और अभी मुझे अपने पिता के इलाज के लिए उन्हें बुलाना ज़रूरी था. मकान चाहिए ही था.’ पूरा नाम बताने का साहस या जोखिम मेरा छात्र नहीं ले सकता था. उसके पूरे नाम को ‘सोशल सैंक्शन’ नहीं था, एक ही हिस्से को था.

यह बात पिछली आधुनिक सदी के 9वें दशक में अचानक यादव, पासवान जैसे ‘समुदाय वाचक’ नामांशों के चारों तरफ उजागर होने से साफ़ हुई. क्यों ये मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद सैंक्शन पा सके, उसके पहले क्यों वे प्रायः ‘सभ्य’ स्थानों में दिखलाई नहीं पड़ते थे, यह समझने में वक्त लगा.

नाम छिपाकर कौन लोग जीते चले आए हैं और उनकी घुटन को किसने महसूस किया है? लेखक, अध्यापक आलोक मिश्रा ने जितेंद्र बिसारिया के माध्यम से इस घुटन या क्षोभ को व्यक्त किया,

‘… तस्लीम ने धर्म क्यों छिपाया? इसका जवाब इस देश के तमाम दलितों के पास है. आप अपने से इतर किसी दलित को उसकी पहचान के साथ जीने कहां देते? अपने पास भी उन्हें रहने कब दिया गया? उनके अलग घर, अलग टोले, अलग पुरबे बसाए. अछूत बनाकर काम और बेगार तक सीमित रखा. काम निकला/ बेगार पूरी हुई, दौड़ा दिया उन्हें उनके दक्खिन टोलों की ओर. उनके लिए तुम्हारे घर की देहरी और रसोई किसी लक्ष्मण रेखा से भी अधिक दुर्लंघ्य रही.

शहरों में आपकी दुकानें, फैक्ट्रियां, हॉस्पिटल, होटल सब में महत्त्वपूर्ण काम करने हेतु, योग्यता होने पर भी वे आपकी पहली प्राथमिकता कभी नहीं रहे. गांव से कोई दलित अपना घृणित जातीय कर्म त्याग पढ़ता-लिखता नौकरी करता शहर की ओर आया तो उसे आपके मोहल्ले में किराए पर घर नहीं मिलता, नौकरी नहीं मिलती, धंधा नहीं चलने दिया जाता.

नाले के किनारे की झोंपड़पट्टी में रहने से बेहतर उसने जाति छुपाकर तुम्हारी कॉलोनी में किराए पर घर लिया भी तब उसकी मनः स्थिति समझनी हो तो आज से कई दशक पहले मराठी लेखक बाबूराव बागुल की कहानी ‘जब मैंने जाति छुपाई’ पढ़ लेनी चाहिए. यह जाति छुपाना इतना कष्टकारी होता है कि जिसे तुम कभी महसूस नहीं कर सकते. जाति छुपाकर वे लोग अपने ही दफ़्तर के सजातीय लोगों, घर-परिवार और नाते-रिश्तेदारों को अपने तथाकथित उस किराए के घर में बुलाने से झेंपते हैं कि कहीं इस सवर्ण मुहल्ले में उनकी जाति न खुल जाए.

अपना मामूली जीवन स्तर सुधारने के चक्कर में वे इतने आत्महीन हो जाते हैं कि अपनी प्रगतिशील विचारधारा और अपने महापुरुषों की तस्वीर व उनसे जुड़े संबोधन दोहराने से भी साफ़ बचते हैं. उस पर भी एक न एक दिन तुम्हारी कागदृष्टि उन्हें ताड़ ही जाती है. ऐसे में संभव हुआ तो उस परिवार का सार्वजनिक अपमान और लिंचिंग तक कर दी गईं, नहीं तो सामाजिक बहिष्कार और अबोलेपन के वे दंश दिए जाते हैं कि बंदा शीघ्र ही अपने डेरा-डांगर उठा, अपनी तथाकथित बिरादरी की अंधेरी और सीलन भरी कोठरियों में जाकर रहने को मजबूर हो जाता है.

आपकी जाति और वर्ण-व्यवस्था के चलते इस देश के तमाम दलित-आदिवासी और सीमांत पिछड़े पसमांदा मुसलमान, हजारों की संख्या में शहरों में अपनी जाति तो कहीं धर्म छुपाकर अपना पेट पाल रहे/धंधा कर रहे हैं!’

जितेंद्र बिसारिया ‘सोशल सैंक्शन’ की ही बात कर रहे हैं. नाम वही पद है जिस पर समाज को मुहर लगी हो. अगर समाज उसे सैंक्शन न दे तो उस नाम को फेंक देना पड़ता है. अपने नाम से अलग होना इंसानों के लिए सबसे बड़ा अपमान है. फिर भी क्यों लोग नाम बदल लेते हैं, यह जो नहीं समझ पाते उनके भोलेपन पर कुर्बान ही हुआ जा सकता है!

(फोटो: रॉयटर्स)

यह 6 दिसंबर, 1992 के बाद की बात है. तब मैं पटना में था. मेरे एक मित्र को यात्रा करनी थी. पूरे देश में तनाव था. मुसलमान नाम खतरे में थे. लेकिन मेरे मित्र की यात्रा बहुत ज़रूरी थी. वह समय था जब आप आरक्षण बिना पहचान पत्र के करा सकते थे. ट्रेन और हवाई जहाज दोनों की यात्राओं में.

मेरे मित्र ने अपने नाम की जगह एक ‘हिंदू नाम’ से आरक्षण करवाया. यह बतलाते वक्त उसकी आंखें झुकी हुई थीं और हमने भी आंखें मोड़ ली थीं. यह उस मित्र के लिए लज्जा का विषय था, या हमारे लिए? नाम आप बदल लें और वेश भी तो भी पकड़े जा सकते हैं. ट्रेन में अपनी अम्मा या किसी स्वजन से बात करते वक्त ‘आदाब’, ‘सलाम’ या खुदा हाफिज’ आपका राज फाश कर देता है. फिर आपमें और सह-यात्रियों में एक तनाव भरी दूरी खिंच जाती है.

अशोक वाजपेयी ने अपने बेटे कबीर की ट्रेन यात्रा का वाकया सुनाया था. फोन पर उनका नाम कबीर सुनकर डिब्बे में तनाव-सा आ गया. फिर वे उस किताब को छोड़कर किसी काम से डिब्बे से निकले जो उनके हाथ में थी. लौटे तो डिब्बे का तनाव ख़त्म हो चुका था. एक ने कहा, ‘अरे! आपने अपना पूरा नाम नहीं बतलाया?’

उन्होंने अच्छे भारतीयों की तरह कबीर की गैर मौजूदगी में किताब उठाकर देख लिया था कि किताब के मालिक का नाम कबीर वाजपेयी था. यानी अपना ही आदमी! इस स्वागत से कबीर को इतनी उलझन हुई कि उन्होंने डिब्बा बदल लिया.

नाम बदलें, भेस बदलें और व्यापक समाज का ‘सैंक्शन’ लेकर जिएं! तस्लीम पर 420 का मुकदमा दर्ज कर दिया गया है. दो पहचानें बताने के लिए. इतना बड़ा जुर्म!

नाम छिपाने और बदलने को लेकर हुए इस कांड को देखकर 38 साल पुरानी नागार्जुन की कविता याद आ गई, ‘तेरी खोपड़ी के भीतर.’ हमारा यात्री कवि मेरठ में है. और उसे एक रिक्शा करना है. एक रिक्शा पास आ जाता है,

‘गले से रुद्राक्ष की लंबी माला
लटक रही थी जोगिया कलरवाले
कुर्ते पर…
दाहिने कान में
लाल फूल अटका पड़ा था,
चमक रहा था भाल पर
चंदन का पीला तिलक…’

यह है वह रूप जिसे सोशल सैंक्शन मिला हुआ है. कवि की आंखें इस रूप को भेदकर देखती हैं,

‘वो अच्छा-भला युवक था,
गंदमी सूरत का दुबला-पतला!
बड़ी-बड़ी आंखें सुरमई…’

लेकिन इस रंग-रूप, बड़ी आंखों और चौड़ी पेशानी से ज़्यादा नुमायां कुछ और था,

‘चौड़ी पेशानी पर
चमक रहा था चंदन का टीका
लुंगी पीली थी…’

भेस से पक्का हिंदू दिखने वाला वह रिक्शावाला करीब आया ही था कि किसी ने कान में फुसफुसाकर सावधान किया कि वह मुसलमान है, रिक्शे पर न चढ़ना. लेकिन नागार्जुन के साथी ने कहा कि इसी का रिक्शा लिया जाएगा. उसने दोनों को मेरठ कॉलेज के हॉस्टल पहुंचा कर कहा,

‘बाबा जी, हम अब चुटैया भी रखेंगे
आठ दस रोज़ की
भुखमरी के बाद
हमारे अंदर
य’ अक्किल फूटी है!
बाबाजी
रुदराछ के मनके
अच्छी मजूरी दिला रहे हैं

अब हम चंदन का टीका भी
रोज़ लगाते रहेंगे…
बाबाजी, अब हम
अपना नाम भी तो परेम परकास बतलाते हैं.’

बात एकतरफा न हुई थी यह कविता के बाद के अंश से मालूम हो जाता है,

‘यों तो वो
कल्लू था-
कल्लू रिक्शावाला
यानी कलीमुद्दीन…
मगर अब वो
‘परेम परकास’
कहलाना पसंद करेगा…’

यह 1983 का मेरठ था. जिनकी याददाश्त काम करती है, वे नागार्जुन की इस कविता का संदर्भ जानते हैं. यह मेरठ में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद लिखी गई कविता है. कलीमुद्दीन उर्फ़ कल्लू की पहचान इस हिंसा में ख़ाक हो गई और उसका पुनर्जन्म हुआ परेम परकास के रूप में.

कविता नाम-रूप संयोग की कविता है, सामाजिक स्वीकृति किसे मिलती है, किसे नहीं, इसकी कविता है. पहचान बदलने के बाद भी प्रेम प्रकाश को परेम परकास कहने पर वह पकड़ा ही जा सकता था. हमारा कवि यह सब जान लेने के बाद उसके परिवार से मिलना चाहता है.

एक प्रतिक्रिया इंदौर के गुंडों की थी, जिन्होंने गोलू यानी तस्लीम का पूरा नाम जानकार उसे पीटा, उसका फोन तोड़ दिया और उसका सारा सामान तोड़ डाला. फिर पुलिस ने उसी पर 9 आपराधिक धाराएं लगाकर जेल में डाल दिया. 1983 में हमारे कवि की प्रतिक्रिया अलग थी,

‘जियो बेटा प्रेम प्रकाश!
हां-हां, चोटी ज़रूर रख लो
और हां! पूरनमासी के दिन
गढ़ की गंगा में डूब लगा आना!

हां-हां तेरा यही लिबास
तेरे को रोजी-रोटी देगा!
सच, बेटा प्रेम प्रकाश
तूने मेरा दिल जीत लिया!’

नागार्जुन इस प्रेम प्रकाश को शाबाशी देते हैं जीने की जुगत निकाल लेने पर, लेकिन यह भी कहते हैं,

‘इतना तो ज़रूर करना
मुझे उस नाले के करीब
ले चलना कभी
उस नाले के करीब
जहां कल्लू का कुनबा रहता है!

मैं उसकी बूढ़ी दादी के पास,
बीमार अब्बा जान के पास
बैठकर चाय पी आऊंगा कभी!
कल्लू के नन्हे मुन्ने
मेरी दाढ़ी के बाल
सहलाएंगे….’

प्रेम प्रकाश, उर्फ़ कलीमुद्दीन उर्फ़ कल्लू! गोलू उर्फ़ तस्लीम! मेरठ-इंदौर! 1983-2021 ! नागार्जुन-नरोत्तम मिश्रा!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)