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राष्ट्रपति जी, ‘राम सबके और सबमें हैं’ उन्हें समझाइए जो राम नाम पर हमवतनों का जीना मुहाल किए हैं

अयोध्या में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को अपने संबोधन में न अवध की ‘जो रब है वही राम है’ की गंगा-जमुनी संस्कृति की याद आई, न ही अपने गृहनगर कानपुर के उस रिक्शेवाले की, जिसे बीते दिनों बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम होने के चलते पीटा और जबरन ‘जय श्रीराम’ बुलवाकर अपनी ‘श्रेष्ठताग्रंथि’ को तुष्ट किया था.

गत दिनों अयोध्या में योगी आदित्यनाथ के साथ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (फोटो साभार: फेसबुक/@PresidentOfIndia)

स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में ‘ऊंची उड़ानों’ के रिकॉर्ड बनाने की सरकारी हड़बड़ी में गत रविवार को एक और कड़ी तब जुड़ी, जब देश के प्रथम नागरिक रामनाथ कोविंद अपने चार दिनों के उत्तर प्रदेश दौरे के अंतिम दिन अयोध्या पहुंचकर रामलला विराजमान के दर्शन व पूजन करने वाले पहले राष्ट्रपति बन गए.

इस अवसर पर उन्होंने अयोध्या की ऐतिहासिक हनुमानगढ़ी में शीश नवाया, सरयूतट पर स्थित रामकथा पार्क में रामायण कॉनक्लेव का उद्घाटन किया और राम, रामायण व अयोध्या का ही नहीं, महाभारत तक का भरपूर ‘महिमा-गान’ किया. यह कहने से भी नहीं ही चूके कि बापू ने देश में इसी अयोध्या के राम के राज्य की स्थापना का सपना देखा था.

उन्होंने कहा कि राम सबमें व सबके हैं तो लगा कि अपने संबोधन में संत कवियों के कथनों का अक्स उतारना चाहते हैं.

याद आया कि कैसे गोस्वामी तुलसीदास सारे जग को सीयराममय जानकर दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम कर गए हैं और कैसे उनके शताब्दियों बाद अपने महाकाव्य ‘साकेत’ की सर्जना शुरू करते हुए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को राम से सीधे यह सवाल पूछने में भी हिचक नहीं हुई थी: ‘राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या?/विश्व में रमे हुए नहीं सभी कहीं हो क्या?/तब मैं निरीश्वर हूं, ईश्वर क्षमा करे/तुम न रमो तो मन तुम में रमा करे.’

लेकिन इसके बाद राष्ट्रपति के रिकॉर्ड की आभा को ग्रहण लगाने वाले कई सवाल हवा में तैरने लगे- इस सवाल को दरकिनार करने के बावजूद कि एक धर्मनिरपेक्ष देश के राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें इस तरह सत्ता दल का धार्मिक एजेंडा आगे बढ़ाने में सहयोगी की भूमिका निभानी चाहिए थी या नहीं.

इन सवालों में सबसे बड़ा यह कि अयोध्या आकर भी वे उसे या उसकी मार्फत देश को कोई वैसा संदेश क्यों नहीं दे पाए, जैसा महात्मा गांधी ने 10 फरवरी, 1921 को अयोध्या आकर दिया था. यह जानकर कि उन दिनों गोरी सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलित अवध के किसान बार-बार हिंसा पर उतर रहे हैं और यह देखकर कि खिलाफत आंदोलन के अनुयायी हाथों में नंगी तलवारें लिए उनके स्वागत में खड़े हैं, महात्मा ने उनकी कड़ी निंदा की और कहा था, ‘हिंसा बहादुरी का नहीं कायरता का लक्षण है और तलवारें कमज़ोरों का हथियार हैं.’

आज जब महात्मा की रामराज्य की कल्पना को ही दूषित नहीं कर दिया गया है, उनके राम के नाम पर मारने-पीटने और डराने-धमकाने के खेल अंतहीन हो चले हैं, राष्ट्रपति कोई नया संदेश देने के बजाय महात्मा की उस अयोध्या यात्रा की याद करते हुए उनके इस संदेश को ही दोहरा देते तो वह दूर तक सुना जाता.

लेकिन विडंबना कि उन्होंने अयोध्या आकर खुद को राष्ट्रपति से ज्यादा कथावाचक बना लिया और अयोध्या को उसकी व उसके राम की महिमा का गान कुछ ऐसे सुनाते रहे, जैसे अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान के लिए वह उनके इस गान की मोहताज हो.

सच पूछिए तो आज यह बात कि ‘राम सबके और सबमें हैं’ सबसे ज्यादा उन्हें बताने की जरूरत है जो राम नाम के राजनीतिक लाभ के लिए उन्हें सर्वव्यापी तो क्या, इस देश के सारे निवासियों का भी नहीं रहने दे रहे. जो भी देशवासी इस जमात से असहमत हैं, और उसके दुर्भाग्य से ज्यादातर असहमत ही हैं, उनका धर्म जो भी हो, वह उन पर इस तरह हमलावर हुई जा री है, जैसे राम की जगन्नियंता छवि को अपने राजनीतिक नारे में तब्दील कर लेने का उसे जन्मसिद्ध अधिकार हो और इस नारे का विरोध करने वालों का अपराध सर्वथा अक्षम्य.

एक खास समुदाय के लोगों को इस नारे की आड़ में पाकिस्तान जाने का फरमान यह जमात ऐसे सुनाती है जैसे अंग्रेजों द्वारा 1947 में खींच दी गई विभाजक रेखा के बाद उस पार की राम की सत्ता समाप्त हो गई हो और वह भूमिखंड उस जग से बाहर हो गया हो, जिसे तुलसीदास सीयराममय घोषित कर गए हैं.

काश, राष्ट्रपति अपनी अयोध्या यात्रा का इस जमात के लोगों से यह पूछने में इस्तेमाल कर पाते कि क्या यह ‘सबके राम और सबमें राम’ की उनकी मान्यता का उपहास नहीं है?

वे उन्हें समझा देते कि यह वास्तव में इस मान्यता का उपहास ही है क्योंकि राम सिर्फ उनके या किसी धर्म विशेष के नहीं हैं और उन्हें अनेक अनुयायी उन्हें देश व काल की परिधि से बाहर मानते हैं, इसीलिए अनेक ऐसे समुदायों द्वारा विदेशों में भी रामकथा कही व मंचित की जाती है, जो हिंदू नहीं हैं, तो देश की बड़ी सेवा करते. क्योंकि तब धार्मिक संकीर्णताओं से निजात की दिशा में तेजी से बढ़ जाने के देश के रास्ते की बड़ी बाधा दूर हो जाती, जो अभी उसके पांवों की बेड़ी बनी हुई हैं.

तब विविधताओं से भरे इस देश की सत्ता खुद इसके बहुलतावादी स्वरूप से दुश्मनी नहीं बरत पाती, ‘जय श्रीराम’ न बोलने के लिए किसी की जान नहीं ली जाती, न किसी को राम या कृष्ण के नाम का बोर्ड लगाने को लेकर उत्पीड़ित किया जाता. न ही धर्मनिरपेक्षता जैसे पवित्र संवैधानिक मूल्य का मजाक उड़ाया जाता और न नागरिकों की धार्मिक आजादी पर अलानाहक प्रहार किए जाते.

खुद को रामभक्त कहने वाले लोग तब अपने मोहल्लों में सब्जी बेचने व चूड़ी पहनाने आने वालों पर इसलिए हमले नहीं करते कि वे दूसरे धर्म के हैं, क्योंकि तब राम को उनका भी माना जाता, उनमें भी देखा जाता. तब किसी को भी अपनी धार्मिक पहचान छिपानी और हिंदुओं जैसे नाम में सामाजिक सुरक्षा न तलाशनी पड़ती.

लेकिन राष्ट्रपति को अपने संबोधन के वक्त न अवध की ‘जो रब है वही राम है’ की गंगा-जमुनी संस्कृति द्वारा विकसित की गई मान्यता याद आई, न ही अपने गृहनगर कानपुर के उस रिक्शेवाले की शक्ल, जिसे कुछ ही दिनों पहले बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने मुसलमान होने के कारण पीटा और जबरन ‘जय श्रीराम’ के नारे लगवाकर अपनी ‘श्रेष्ठताग्रंथि’ को तुष्ट किया.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रपति के नाम को इसलिए सत्य का परिचायक बताया क्योंकि उसमें राम है, लेकिन राष्ट्रपति को अपने संबोधन में इस सत्य से रूबरू होना भी गवारा नहीं हुआ कि अयोध्या की जिस हनुमानगढ़ी में शीश नवाकर उन्होंने खुद को धन्य अनुभव किया, उसका निर्माण अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने कराया था, जो उसी धर्म के अनुयायी थे, जिसका होने के कारण उनके गृहनगर के रिक्शेवाले को मार पीटकर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगवाये गए.

क्या पता, अयोध्या में किसी ने उन्हें बताया या नहीं कि देश में धर्म नगरियां और भी हैं, लेकिन अयोध्या का निरालापन हमेशा इस बात में रहा है कि वह हर किसी को अपनी भावनाओं के अनुसार अपने प्रभु की मूरत गढ़ने और देखने को स्वतंत्र रखती है. हां, राम की भी. ऐसी तमाम कांटेदार बाड़ों से परे, जो सत्य को उसकी समग्रता में नहीं देखने देतीं, वह ऋग्वेद की ऋचा ‘एकमसद्विप्राः बहुधा वदन्ति’ में अपने विश्वास को अगाध करती रहने में ही अपना गौरव देखती है.

इसी गौरव से आह्लादित उसके अलबेले शायर शमीम अहमद शमीम कभी अपनी यह पंक्ति सुनाकर महफिलें लूट लिया करते थे: ‘यह अयोध्या है यहां युद्ध नहीं हो सकता.’

निस्संदेह, यह अयोध्या की उस अजेयता से आगे की बात थी, जिसका राष्ट्रपति ने अपने बीस मिनट के संबोधन में बखान किया. जब वहां युद्ध ही नहीं हो सकता, तो जीत हार की बात ही कहां उठती है?

साफ कहें तो अयोध्या का अतीत भी गवाह है और वर्तमान भी कि उसका बहते नीर जैसा स्वभाव किसी की भी युद्धकामना पूरी नहीं होने देता. कोई कैसा भी आक्रमण क्यों न करे, वह असीम धैर्य के साथ उसे सह लेती, अपनी राह पकड़ लेती है और अपना समतल तलाश लेती है. जो भी उसके आड़े आता है, उसे वह बरबस अपने प्रवाह में बहा ले जाती है.

अफसोस कि महामहिम रामनाथ कोविंद अयोध्या आकर भी सत्ता के एक खास तरह के चकाचौंध में ही फंसे रह गए और अयोध्या के इस रूप से अपरिचित रह गए. अयोध्या को कम से कम उनसे ऐसी उम्मीद न थी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)