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असम फायरिंग को अवैध क़ब्ज़े से ज़मीन ख़ाली कराने के मसले के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए

असम में ज़मीन से ‘बाहरी’ लोगों की बेदख़ली मात्र प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक अभियान है. बेदख़ली एक दोतरफा इशारा है. हिंदुओं को इशारा कि सरकार उनकी ज़मीन से बाहरी लोगों को निकाल रही है और मुसलमानों को इशारा कि वे कभी चैन से नहीं रह पाएंगे.

बीते 24 सितंबर 2021 को दरांग जिले के गोरुखुटी में एक बेदखली अभियान के दौरान ध्वस्त किए गए अपने घरों के पास जमा ग्रामीण. (फाइल फोटो: पीटीआई)

असम में हाल में हुई हिंसा ने देश का ध्यान खींचा है. दरांग जिले में सिपाझार के धालपुर 2 के गोरुखुटी में पुलिस की गोली से दो लोग मारे गए. इसकी खबर असम के अखबारों ने किस तरह छापी? अंग्रेज़ी अखबार ‘सेंटिनल’ से एक नमूना देखिए,

‘सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण हटाने के लिए जिला प्रशासन के एक बड़े अभियान के दौरान इलाके के हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया. जब प्रशासन ने उनसे हट जाने की अपील की तब उनमें से कुछ लोगों ने पुलिस पर हमला करने की कोशिश की जिससे विरोध हिंसक हो उठा. उपद्रवी प्रदर्शकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठी चलानी पड़ी और कुछ राउंड गोली चलानी पड़ी. इस कार्रवाई में कथित रूप से दो प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई.’

इसी बीच एक वीडियो प्रसारित होने लगा. इस वीडियो में पुलिस दिखलाई पड़ती है. लगातार गोली चलने की आवाज़ सुनाई देती है. निशाना सामने नहीं है. गोलियां चल रही हैं. सामने झाड़ी है. अचानक एक दुबला-पतला गंजी-लुंगी पहने एक आदमी लाठी उठाए दौड़ता दिखाई पड़ता है. पुलिसवाले भाग रहे हैं. वह आदमी जिधर आ रहा है उधर पुलिसवालों का झुंड है. वह अकेला दौड़ रहा है. उसे पुलिसवाले घेर लेते हैं.

एक पुलिसवाले की उंगली उसकी राइफल के ट्रिगर पर दिखती है. वह शख्स गिर चुका है. आपको उसकी छाती पर लाल रंग फैलता दिखता है. वह उसका खून ही है. कैमरे की निगाह उस पर टिकी हुई है. आप उसकी छाती अब भी धड़कती हुई देख सकते हैं. उसका सिर आसमान की तरफ है. आंखें क्या अभी भी खुली हैं, आप अंदाजा लगाते हैं.

एक पुलिसवाला आकर उसे एक लाठी मारता है. अचानक आप एक कैमरावाले को फ्रेम में देखते हैं. वह आकर उस गिर चुके आदमी पर कूदता है. वह इतनी जोर से कूदता है कि खुद दूर जा गिरता है. वह लौटता है और उससे कहीं ज्यादा जोर से उस गिर चुके और शायद आख़िरी सांसें ले रहे आदमी पर दोबारा कूदता है. वह उसे घूंसा भी मारता है. उसके कूदने के झटके से ज़मीन पर गिरे आदमी की गर्दन एक तरह लुढ़क जाती है. अब पुलिसवाले इस कैमरामैन को आहिस्ता हटा ले जाते हैं.

आप फ्रेम में एक दूसरे कैमरावाले को देख पाते हैं. कैमरा घूमता है. उस फोटोग्राफर या कैमरामैन के साथ-साथ चलता है. हम देखते हैं कि उसे पुलिसवाले गले या छाती से लगा लेते हैं. वह गिराया जा चुका आदमी अब निगाह से बाहर है. क्या उसकी छाती अब भी धड़क रही होगी? आप जो सांस रोककर यह देख रहे हैं, सोचते हैं.

यह सब कुछ कुल 1 मिनट 14 सेकेंड में घट जाता है. बाद में हमें इस गिरे या मार गिराए गए आदमी का नाम मालूम होता है. उसके आधार कार्ड पर नाम छपा है: मैनाल हक़ या मैनुल हक़?

और वह जो मरते हुए मैनुल हक़ की छाती पर कूद रहा था, वह कौन है? उसका नाम है बिजय बनिया. वह पुलिस के द्वारा नियुक्त फोटोग्राफर है. पुलिस ने मैनुल हक़ को गोली क्यों मार दी जबकि इतने पुलिसवाले उसे काबू करके गिरफ्तार कर सकते थे? और गोली छाती में क्यों मारी? अगर इरादा उसे निष्क्रिय करने का था तो पैर में गोली मार सकते थे? और वह बिजय बनिया क्यों मैनुल हक़ पर कूद रहा था? पुलिस उससे इतनी नरमी से क्यों पेश आ रही थी?

सामने आए वीडियो में असम पुलिस स्थानीयों पर फायरिंग करती दिख रही है. (साभार: स्क्रीनग्रैब)

ये सवाल इस वीडियो को देखते हुए किसी के मन में उठेंगे. यह भी कि छाती में गोली मारे जाने के बाद भी मैनुल हक़ की सांस चल रही थी. उसे अगर तुरंत चिकित्सकीय मदद दी जाती तो शायद वह बच सकता था. लेकिन बिजय बनिया ने क्या उस पर बार-बार कूदकर उसकी जान निकाल दी?

अगर हम मान भी लें कि पुलिस ने एक डंडा या बांस उठाकर दौड़ रहे आदमी से खुद को बचाने के लिए गोली चलाई तो उसके बाद उसका काम इस गिरे हुए आदमी को डॉक्टरी मदद पहुंचाने का था. वह करने की जगह उसने बिजय बनिया को इसकी इजाजत दी कि वह ज़ख़्मी लेकिन ज़िंदा मैनुल हक पर बार-बार कूदे.

इस दृश्य को देखकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी (अब सेवानिवृत्त) एनसी अस्थाना ने लिखा कि वे बिजय बनिया की हरकत के बारे में कुछ नहीं कहना चाहते क्योंकि वह राज्य का कारकुन न था लेकिन पुलिस की कार्रवाई की क्रूरता से वे स्तब्ध हैं.

उन्होंने पूछा कि पुलिस की अंधाधुंध गोलीबारी का कोई औचित्य नहीं था. इससे जालियांवाला बाग़ की याद आ जाती है. पुलिस को प्रायः लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है. उससे निबटने के तय तरीके हैं. लेकिन इस मामले में उन्हें लगा कि पुलिस का बर्ताव ऐसा था मानो वह दुश्मनों पर हमला कर रही हो. दुश्मन जो इसी मुल्क के हैं और बिल्कुल निहत्थे थे.

अस्थाना साहब ने जो पूछा और कहा, वह दूसरे चित्रों से और स्पष्ट हुआ. पुलिस जिन लोगों का सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण हटा रही थी, उनके घरों में घुसकर उनका सामान तोड़ते हुए, अनाज जलाते हुए और पंप सेट में आग लगाते हुए दिखलाई पड़ती हैं. यह करने का क्या औचित्य था? पुलिस का काम अतिक्रमण हटाने में प्रशासन की मदद करने का था. वह वहां बसे लोगों को पूरी तरह बर्बाद करने पर क्यों तुल गई?

सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण हटाने की अनेक घटनाएं हम जानते हैं. पुलिस की जोर-जबरदस्ती और लोगों के प्रतिरोध के बारे में भी. लेकिन असम में अतिक्रमण हटाना जैसे ‘दुश्मन’ के कब्जे से अपनी ज़मीन को वापस लेना है और इसलिए सिर्फ ज़मीन लेने का मामला नहीं है बल्कि जो उस ज़मीन पर हैं, उन्हें पूरी तरह तबाह कर देना भी अतिक्रमण हटाने के अभियान का अंग होता है.

इसे दो साल पहले एक दूसरे इलाके में अतिक्रमण हटाने के एक अभियान के वर्णन से समझा जा सकता है. कारवां पत्रिका में अब्दुल कलाम आज़ाद ने 4 मार्च, 2019 को केंद्रीय असम के होजाई और कार्बी आंगलांग की सीमा पर बसे लोगों को अनधिकृत कहकर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बारे में विस्तार से लिखा है.

वे उस कार्रवाई के एक वीडियो से अपनी बात शुरू करते हैं. एक 22 साल की औरत कुलसुमा बेगम ज़मीन पर लगभग बेहोश पड़ी दिखलाई पड़ती है. उसके बगल में एक शिशु है. उसने अभी तुरंत इसे जन्म दिया है. एक पत्रकार पूछता है कि अभी भी खून निकल रहा है. आप इतने बेहिस कैसे हो सकते हैं? अधिकारी इस अविचलित अपना काम करते रहते हैं, यानी उस नवप्रसूता के परिवार को बेदखल करने का. जच्चा-बच्चा उसी हालत में पड़े हुए हैं.

बाद में बच्चे की दादी ने बतलाया कि उन्हें नोटिस मिला था और अगला दिन इतवार का था. उस दिन कायदे से कोई कार्रवाई न होनी थी.उन्होंने अपना सामान हटाना शुरू कर दिया था, टिन की छत भी हटा ली थी लेकिन चूंकि कभी भी बच्चा हो सकता था, दीवार रहने दी थी ताकि आड़ रहे. लेकिन अचानक सरकारी दल आया और उसने रसोई का सामान फेंकना, तोड़ना शुरू कर दिया. उसी वक्त कुलसुमा ने बच्चे को जन्म दिया. मैं डर के मारे उसे उठा ले गई कि कहीं वे बच्चे को न मार डालें. कुलसुमा का रक्तस्राव जारी रहा और दो दिन तक उसे कोई डॉक्टरी मदद नहीं मिल सकी. फिर गांव के लोग उसे नज़दीक के अस्पताल ले गए. वहां उसने दम तोड़ दिया.

कुलसुमा की मौत का दृश्य वैसा नाटकीय न था जैसा मैनुल की हत्या का लेकिन उसकी मौत भी अतिक्रमण हटाने की असम सरकार और उसके अधिकारियों की कटिबद्धता का नतीजा थी. जो सवाल दो साल बाद अस्थाना साहब पूछ रहे हैं, वही इस घटना के लिए भी है, इन लोगों के प्रति इस क्रूरता और असंवेदनशीलता का कारण क्या है?

उस कारण को जानने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि जिन्हें अतिक्रमण हटाने के नाम पर बार-बार बेदखल किया जा रहा है,वे कौन हैं. कुलसुमा या मैनुल हक जैसे नामों से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे कौन लोग हैं.

अंग्शुमान चौधरी ने इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की कि मैनुल हक कौन है:

मैनुल हक में एक ही समय में अनेक पहचानें हैं. वह असम के लिए चिरंतन बहिरंग (बाहरी) है. वह अजनबी है, वह दीमक, वह घुसपैठिया है जिससे असमिया जन को छुटकारा पाना है जिससे वह खुद को पा सके. मैनुल के विनाश और त्रास में ही असमिया लोगों का मोक्ष और उल्लास है. वह असमिया लोगों का वह ऐतिहासिक शत्रु है जिसकी वफादारी पूर्वी पाकिस्तान से है. वह सीएस मुल्लन का भूमिक्षुधित है जो असम में उस सीमा को पार करके घुस आया था जो मुल्लन के औपनिवेशिक काल में थी ही नहीं, वह एसके सिन्हा का बांग्लादेशी आक्रांता है जिसने असम में घुसपैठ करके यहां मुसलमान आबादी कई गुना बढ़ा दी.

लेकिन वह भारतीय नागरिक भी है. उसका नाम उस गौरवशाली एनआरसी में भी है. उसके पास आधार कार्ड भी है. यह असम में मैनुल हक होने का विरोधाभास है, उसकी विडंबना है.

अस्थाना साहब के सवाल का जवाब अंग्शुमान दे रहे हैं. लेकिन उसे और कायदे से समझने के लिए इस तरह के विरोधी अभियान के बाद मुख्यमंत्री के बयान को पढ़ना ज़रूरी है.

मैनुल हक जिस इलाके के थे, यानी दरांग जिले के सिपाझार में धालपुर, वहां अतिक्रमण अभियान के दौरान मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने अपनी ‘जनता’ को रिपोर्ट दी, ‘गैरकानूनी अतिक्रमण के खिलाफ अभियान को जारी रखते हुए मैं बहुत प्रसन्न हूं और दरांग के जिला प्रशासन और असम पुलिस को बधाई देता हूं कि सिपाझार में उन्होंने 4,500 बीघा ज़मीन साफ़ की है, 800 परिवारों को बेदखल किया ह  ,4 गैरकानूनी धार्मिक स्थलों और एक निजी संस्थान को तोड़ा है.’

क्या आपने किसी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद कभी भी सरकार का ऐसा वक्तव्य पढ़ा है? मालूम होता है जैसे किसी शत्रु इलाके को फौज फतह कर रही है और नेता अपनी जनता को रिपोर्ट दे रहा है कि आज के युद्ध में क्या जीता गया है. इसमें विशेष उल्लेख धार्मिक स्थलों को तोड़े जाने का है. इसका आशय बहुत स्पष्ट है.

अमूमन जब धार्मिक स्थल कानूनी कारण से हटाए जाते हैं तो सरकार उसके बारे में बात नहीं करती हैं क्योंकि वह उस धर्म के लोगों के लिए भावनात्मक मसला होता है. लेकिन मुख्यमंत्री धार्मिक स्थलों को तोड़ने पर अपनी पुलिस को बधाई दे रहे हैं.

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो साभार: फेसबुक/Himanta Biswa Sarma)

जिन्हें बेदखल किया जा रहा है वे भारतीय नागरिक हैं. उनके नाम एनआरसी में हैं. फिर असम सरकार यह क्यों कह रही है कि बाहरी लोगों के अवैध कब्जे से ज़मीन मुक्त कराके स्थानीय लोगों को दी जाएगी. आखिर ये भारतीय होते हुए भी बाहरी कैसे हैं और कौन इनसे अधिक स्थानीय है जिन्हें इनकी ज़मीन दे दी जाएगी?

क्या इसका कारण यह है कि ये लोग बांग्लाभाषी हैं और उस पर मुसलमान हैं जिन्हें तिरस्कारपूर्वक मियां कहा जाता है? क्या यही इनके बाहरी होने का प्रमाण है?

असम में बाहरी और भीतरी या स्थानीय का भेद करते वक्त भाषा को आधार बनाया जाता रहा है. यानी जो बांग्लाभाषी है, वह बाहरी और जो असमिया भाषी है, वह स्थानीय है. यानी जो बांग्लाभाषी है, उससे ज़्यादा हक असम पर असमियाभाषियों का है. लेकिन किसी ने नहीं पूछा कि फिर बोडो, कारबी, मिशिंग आदि भाषा बोलने वालों का क्या होगा?

यह गणित आपकी समझ में तब आएगा जब आप इसी बाहरी की बेदखली अभियान के दौरान बोडो नेताओं को यह मांग करते सुनते हैं कि उनके यहां से भी अतिक्रमण हटाया जाना चाहिए. उनके यहां बाहरी कौन होंगे? क्या बोडो इलाकों में कारबी बाहरी हैं या असमियाभाषी?

नहीं! वहां भी बांग्लाभाषी मुसलमान ही बाहरी माने जा रहे हैं. तो वहां अतिक्रमण हटाने के नाम पर मुसलमानों को ही निशाना बनाया जाएगा.

अतिक्रमण हटाने का एक तर्क यह दिया जाता है कि आपके पास जमीन की मिल्कियत का कागज़ नहीं है. लेकिन 2016 में काजीरंगा इलाके में जिन्हें बेदखल किया जा रहा था, उनके पास ज़मीन के पट्टे थे. फिर भी उन्हें यह कहकर बेदखल किया गया कि वे अभ्यारण्य में ज़मीन दखल करके बैठे हैं. वन को संरक्षित कई दशक बाद घोषित किया गया.

अब्दुल कलाम आज़ाद ने लिखा कि होजाई के उपायुक्त ने राज्य एक मुख्य सचिव को पत्र लिखा कि बेदखली रोक दी जाए क्योंकि इस इलाके की कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है.

उनके मुताबिक़, वह इलाका संरक्षित वन क्षेत्र नहीं था. उन्होंने चेतावनी दी कि बेदखली से कोई 9,000 लोग प्रभावित होंगे. वहां दो बाज़ार थे, पांच शिक्षण संस्थान और कई दूसरे संस्थान. इस आधिकारिक आपत्ति के बावजूद बेदखली की गई. उस अभियान में भी प्रशासन की तरफ से आगजनी की गई और पानी के स्रोतों को बेकार कर दिया गया.

उस इलाके के प्रभारी मंत्री ने आज एक मुख्यमंत्री की तरह ही बेदखल किए जा रहे लोगों की तकलीफ का मज़ा लेते हुए ऐलान किया कि बाहरी, बांग्लादेशी मुसलमानों को बेदखल किया ही जाएगा. यह इसके बावजूद कि उनके पास ज़मीन के पट्टे थे और बाकी कागजात भी.

यह 2016 की बात थी. आज 2021 है. बेदखली इस बीच अलग-अलग इलाकों में चल रही है. असम में ज़मीन से ‘बाहरी’ लोगों की बेदखली मात्र प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक अभियान है. बेदखली एक दोतरफा इशारा है. हिंदुओं को इशारा कि सरकार उनकी ज़मीन से बाहरी लोगों को निकाल रही है. और मुसलमानों को इशारा कि वे कभी चैन से नहीं रह पाएंगे.

अभी जिन इलाकों में बेदखली चल रही है वे चार नदी के इलाके कहे जाते हैं. अगर इस ज़मीन का कोई मालिक है तो ब्रह्मपुत्र है. ब्रह्मपुत्र के पेट से कभी ज़मीन निकलती है, कभी उसमें समा जाती है. ये किसान ब्रह्मपुत्र के मिजाज़ को देखते हुए अपनी जगह बदलते रहे हैं. यह इत्तेफाक है कि यह विशेष हिस्सा कुछ दशकों से बचा रह गया है.

मैनुल हक की हत्या के बाद उस हिंसा की जांच करने एक दल दिल्ली से दरांग गया. उसके सदस्यों ने बतलाया कि उस जगह पहुंच पाना ही असाधारण वीरता का काम है. जो लोग वहां 40 साल से भी ज्यादा से रह रहे हैं और खेती कर रहे हैं, उन्हें बाहरी बतलाना कितना बेतुका है, यह वहां पहुंचने के बाद ही समझ में आ सकता है.

जैसा शुरू में कहा गया कि ये कई दशक से यहां रह रहे है, वोट डाल रहे हैं, हर किसी का नाम सरकार एक रिकॉर्ड में है, फिर ये बाहरी कैसे हुए? अगर इनके पास पक्के कागज़ ज़मीन के नहीं हैं तो उसकी वजह यही है कि ज़मीन की स्थिति ब्रह्मपुत्र के कारण अनिश्चित है.

बाकी बातों को अगर छोड़ दें तो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार कि विस्थापन के पहले पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए थी. वह किए बिना जब इनके घर तोड़ दिए गए तो ये रहेंगे कहां और कैसे जिएंगे? क्या यह सरकार की चिंता नहीं होनी चाहिए? क्या बेदखली घर तोड़ने के पहले पर्याप्त सूचना नहीं दी जानी चाहिए? और बेदखली के बाद इन लोगों के प्रति सरकार का कोई कर्तव्य नहीं?

मुख्यमंत्री ने वादा किया बताते हैं कि हर बेदखल परिवार को 6 बीघा ज़मीन दी जाएगी. कहां है वह ज़मीन? जो परिवार बेदखल हुए हैं उनमें से कई पुलिस के डर से पहले ही इलाके से भाग गए हैं.

पुलिस के जुल्म की इंतेहा यह है कि जिस मैनुल हक को उसने मारा, उनके बेटे से वह रोज़ थाने में हाजिरी ले रही है. क्यों? उससे पूछताछ हो रही है कि वह किससे बात करता है, कौन उससे मिलने आता है! ज़ख़्मी लोगों में से तीन को गिरफ्तार कर लिया गया है. प्रशासन की तरफ से कोई सांत्वना देने भी नहीं आया. अगर ये भारतीय जनतंत्र के मतदाता हैं तो इनके साथ यह बर्ताव क्यों?

इसे मात्र गैरकानूनी कब्जे से ज़मीन को खाली कराने के मामले के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. इसके साथ असम के मुख्यमंत्री के खुलेआम मुसलमान विरोधी बयानों को रखकर देखिए. उनके जनसंख्या कानून, जिसमें उनका खास जोर मुसलमानों की जनसंख्या नियंत्रण पर है. उनके इस बयान को याद कीजिए कि एक दिन ऐसा आ सकता है कि कामरूप कामख्या के मंदिर का अतिक्रमण हो जाए!

यह सरकारी आदेश कि किसी मंदिर के 5 किलोमीटर के भीतर मांस खाना, बेचना गैरकानूनी होगा. इसका निशाना कौन है?

अगर आप असम के असमिया और अंग्रेज़ी अखबारों को पढ़ेंगे तो मालूम होगा कि वे बांग्लाभाषी मुसलमानों के खिलाफ प्रचार के पर्चे हैं. वे साफ़-साफ़ लिखते हैं कि असम को पाकिस्तान या मुसलमान बहुल बनाने की साजिश चल रही है. इस तरह वे मुसलमान विरोधी कार्रवाई या हिंसा का समर्थन और प्रचार करते हैं.

विडंबना यह है कि बाहरी-भीतरी की जुबान असम का हर राजनीतिक दल इस्तेमाल कर रहा है. बहाना असमिया राष्ट्रवाद का है. इस राष्ट्रवाद के पैरोकार कई धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी भी रहे हैं. उन्हें यह न दिखलाई पड़ा कि बाहरी भीतरी और असमिया और बंगाली का यह भेद आखिरकार आकर मुसलमान विरोधी घृणा पर ही रुकेगा.

मैनुल हक का घर तोड़ दिया जाएगा. उसे गोली मार दी जाएगी, लेकिन हिंदू नामधारी को इसका इत्मिनान है कि उसका घर, कागज़ न हो फिर भी सुरक्षित रहेगा. अब तक की 6 साल की बेदखली यही बतलाती है.

असम में मुसलमानों को, खासकर बंगाली मुसलमानों के सारे अधिकार छीन लेने के लिए एनआरसी का रास्ता सोचा गया था. इरादा यह था और हम न भूलें कि यह सर्वोच्च न्यायालय की सदारत और निगरानी में किया गया था कि बाहरी लोगों को चुन-चुनकर पहचानने और बीन-बीनकर बाहर निकाल देने के नाम पर मुसलमानों को नागरिकता विहीन कर दिया जाए.

तरीका निहायत ही धर्मनिरपेक्ष चुना गया था. नागरिकता के सबूत के तौर पर कई तरह के कागजात पेश करने थे. कमी होने पर आपकी नागरिकता संदिग्ध हो जाएगी बल्कि रद्द भी. आप कहीं के नहीं रह जाएंगे बावजूद इसके कि इसी ज़मीन के भीतर आपके पुरखे दफ़न हैं.

एनआरसी प्रकाशित हुई तो मालूम हुआ कि मुसलमानों से अधिक हिंदू बाहर हो गए. तब उसी भारतीय जनता पार्टी, जिसने एनआरसी का इतना ढोल पीटा था, इसे मानने से इनकार कर दिया. फिर यह कहा गया कि हम नई एनआरसी लाएंगे और जिन्हें बाहर होना है, उन्हें बाहर करेंगे.

जो बाहर किए जाने हैं, यानी मुसलमान, उन्हें एक दूसरे तरीके से यानी बेदखली से, दर-दर भटकने को मजबूर तो कर ही दिया जा सकता है. असम से लौटे नदीम खान ने कहा कि जो किसान गुवाहाटी भर को सब्जी भेजते थे अब वे उसकी सड़कों पर भटकते दिखलाई पड़ेंगे. स्थानीय सुख के लिए अभी इतना कम नहीं है!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)