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छत्तीसगढ़: हसदेव अरण्य में ‘ग़ैर-क़ानूनी’ खनन के ख़िलाफ़ आदिवासी कर रहे हैं 300 किमी पदयात्रा

सरगुजा ज़िले के अंबिकापुर में फतेहपुर से बीते तीन अक्टूबर को यह पैदल मार्च शुरू हुआ था. इसमें 30 गांवों के आदिवासी समुदायों के लगभग 350 लोग शामिल हैं, जो अपनी मांगों के साथ रायपुर में राज्यपाल व मुख्यमंत्री से मिलेंगे. ये ग्रामीण हसदेव अरण्य क्षेत्र में चल रही और प्रस्तावित कोयला खनन परियोजनाओं का यह कहते हुए विरोध कर रहे हैं कि इससे राज्य के वन इकोसिस्टम को ख़तरा है.

हसदेव अरण्य में ‘गैर-कानूनी’ कोयला खनन के खिलाफ 300 किमी पैदल मार्च करते प्रदर्शनकारी. (फोटो साभार: ट्विटर/@alokshuklacg)

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के सरगुजा और कोरबा जिलों के 30 गांवों के आदिवासी समुदायों के लगभग 350 लोग पिछले नौ दिनों से राज्य की राजधानी रायपुर पहुंचने के लिए पैदल चल रहे हैं.

करीब 300 किलोमीटर से अधिक का ये पैदल मार्च कोयला खनन प्रोजेक्ट के खिलाफ प्रदर्शन के रूप में किया जा रहा है. उन्होंने इसे लेकर ‘गैर-कानूनी’ तरीके से भूमि अधिग्रहण का आरोप लगाया है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सरगुजा जिले के अंबिकापुर में फतेहपुर से बीते तीन अक्टूबर को मार्च शुरू हुआ था. यह यात्रा 13 अक्टूबर को समाप्त होने की उम्मीद है. इस दिन प्रदर्शनकारी रायपुर पहुंचेंगे और राज्यपाल अनुसुइया उइके और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ अपनी मांगों को लेकर बैठक करेंगे.

ये ग्रामीण हसदेव अरण्य क्षेत्र में चल रही और प्रस्तावित कोयला खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं, जिसके बारे में उनका कहना है कि इससे राज्य के ‘फेफड़े’ कहे जाने वन इकोसिस्टम को खतरा है. यह क्षेत्र जैव विविधता में समृद्ध है और हसदेव तथा मांड नदियों के लिए जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) है, जो राज्य के उत्तरी और मध्य मैदानी इलाकों की सिंचाई करते हैं.

दो जिलों के प्रदर्शनकारियों के एक संयुक्त मंच हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के अनुसार, उनके विरोध के बावजूद क्षेत्र में छह कोयला ब्लॉक आवंटित किए गए हैं, जिनमें से दो खनन के लिए खुल गए हैं.

एक अन्य ब्लॉक- परसा- को वन और पर्यावरण मंजूरी मिल गई है. इसे लेकर ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया ग्राम सभा की सहमति के बिना शुरू हुई थी. प्रदर्शनकारियों ने कहा कि तीन अन्य ब्लॉकों- केटे एक्सटेंशन, मदनपुर साउथ और गिढमुंडी पटुरिया- में ग्राम सभाओं की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण भी शुरू हो गया है.

समिति के एक प्रमुख सदस्य उमेश्वर सिंह अर्मो ने आरोप लगाया कि परसा में पर्यावरण मंजूरी के लिए जाली दस्तावेज इस्तेमाल किए गए हैं और मंत्रालय को गलत जानकारी दी गई है. उन्होंने कहा कि इस मामले में केंद्र और राज्य दोनों सरकारें जनता के खिलाफ जा रही हैं.

24 दिसंबर 2020 को केंद्र सरकार ने कोयला असर क्षेत्र (अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957 की धारा सात के तहत एक अधिसूचना जारी की थी, जिसमें क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों को भूमि पर अपना दावा, यदि कोई हो, साबित करने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था.

इसी साल आठ फरवरी को केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि मंत्रालय को 470 से अधिक आपत्ति पत्र मिले हैं, जिनमें राज्य सरकार के पत्र भी शामिल हैं. जोशी ने कहा कि 1957 के कानून के तहत ‘ग्राम सभा से मंजूरी लेने का कोई प्रावधान नहीं है’.

उन्होंने कहा था, ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनःस्थापन अधिनियम, 2013 और छत्तीसगढ़ आदर्श पुनर्वास नीति, 2007 के नियमों के तहत वैध मुआवजे का भुगतान किया जाएगा.’

हालांकि विरोध कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजा पर्याप्त नहीं है. आर्मो ने कहा, ‘पैसा और हमारी मातृभूमि एक समान नहीं हैं. चाहे कितनी भी राशि हो, एक दिन वो खत्म ही हो जाएगा, लेकिन हमारे घर यहां वर्षों से हैं.’

दो चालू खदानों में से पीएकेबी का खनन अडाणी समूह द्वारा राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) साथ माइन डेवलपर और ऑपरेटर (एमडीओ) के रूप में किया जा रहा है. वहीं चोटिया ब्लॉक का खनन वेदांता समूह की भारत एल्युमिनियम कंपनी लिमिटेड (बाल्को) द्वारा किया जाता है.

परसा और केटे एक्सटेंशन ब्लॉक का आवंटन आरआरवीयूएनएल को अडाणी ग्रुप के साथ एमडीओ के रूप में किया गया था. इसी तरह गिधमुरी पटुरिया ब्लॉक का आवंटन छत्तीसगढ़ स्टेट पावर जनरेशन कंपनी लिमिटेड को अडाणी ग्रुप के साथ एमडीओ के रूप में किया गया था.