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भ्रष्टाचार मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज पर मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन शुक्ला पर एक निजी मेडिकल कॉलेज के पक्ष में आदेश देने के लिए घूस लेने का आरोप है. दरअसल इस कॉलेज में दाख़िले पर सरकार ने रोक लगा दी थी. यह केस 2017 के एक मामले से जुड़ा है, जहां सीबीआई ने छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ जस्टिस आईएम क़ुद्दुसी को भी गिरफ़्तार किया था.

(फोटोः पीटीआई)

नई दिल्लीः सरकार ने भ्रष्टाचार के एक कथित मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन शुक्ला पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है. जस्टिस शुक्ला पर एक निजी मेडिकल कॉलेज के पक्ष में आदेश देने के लिए घूस लेने का आरोप है. दरअसल इस कॉलेज में दाखिले पर सरकार ने रोक लगा दी थी.

अधिकारियों ने बताया कि सीबीआई ने इस साल 16 अप्रैल को सेवानिवृत्त हुए न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मुकदमा चलाने की केंद्र सरकार से मंजूरी मांगी थी. केंद्र सरकार के मंजूरी देने के बाद सीबीआई अब सेवानिवृत्त न्यायाधीश के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर सकती है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई के एक अधिकारी ने कहा, ‘जस्टिस शुक्ला पर मुकदमा चलाने की मंजूरी गुरुवार (25 नवंबर) शाम को मिली. उनके खिलाफ की गई जांच पूरी है और उनके खिलाफ चार्जशीट दायर करने की प्रक्रिया अब शुरू की जाएगी. चार्जशीट जल्द ही दायर की जाएगी.’

तत्कालीन न्यायाधीश के रूप में शुक्ला को चार दिसंबर 2019 को दर्ज एफआईआर मामले में छह अन्य लोगों के साथ आरोपी के तौर पर अदालत लाया गया था.

दरअसल यह मामला 2017 के एक मामले से जुड़ा है, जहां सीबीआई ने छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ जस्टिस आईएम कुद्दुसी को भी गिरफ्तार किया था. अन्य आरोपियों में कुद्दुसी के सहयोगी भावना पांडेय, लखनऊ के मेडिकल कॉलेज प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट (पीईटी) और इसके मालिक बीपी यादव और प्रसाद यादव और सुधीर गिरि हैं.

अधिकारियों ने बताया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायाधीश शुक्ला के अलावा सीबीआई ने प्राथमिकी में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दुसी, प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के भगवान प्रसाद यादव तथा पलाश यादव, ट्रस्ट और भावना पांडेय तथा सुधीर गिरि को भी नामजद किया है.

आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) और भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है.

अधिकारियों ने बताया कि ट्रस्ट ने अपने पक्ष में आदेश पाने के लिए प्राथमिकी में नामजद एक आरोपी को कथित तौर पर घूस दी. प्राथमिकी दर्ज करने के बाद सीबीआई ने लखनऊ, मेरठ और दिल्ली में कई स्थानों पर तलाशी ली थी.

उन्होंने बताया कि ऐसा आरोप है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को केंद्र ने खराब सुविधाओं और आवश्यक मानदंड पूरा न करने के कारण छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया था. उसके साथ 46 अन्य मेडिकल कॉलेज को भी मई 2017 में इसी आधार पर छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया गया था.

एफआईआर में कहा गया है कि कॉलेज ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिस पर सरकार को रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री पर नए सिरे से विचार करने को कहा गया था. इसके बाद सरकार ने कॉलेज पर दो सत्रों 2017-2018 और 2018-2019 के लिए दाखिला देने पर रोक लगा दी थी.

इसके साथ ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को कॉलेज की दो करोड़ रुपये की बैंक गारंटी भुनाने की भी मंजूरी दी थी.

जब कॉलेज प्रमोटर्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की तो वे कथित तौर पर जस्टिस कुद्दुसी और भावना पांडेय के संपर्क में आए, जिन्होंने मामले को सुलझाने का वादा किया.

एफआईआर के मुताबिक, इसके बाद कथित तौर पर भ्रष्ट तरीकों से इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन शुक्ला से मनवांछित आदेश हासिल करने के लिए बीपी यादव, जस्टिस कुद्दुसी, भावना पांडेय और सुधीर गिरी (मेरठ के वेंकटेश्वर मेडिकल कॉलेज के मालिक) के बीच साजिश रची गई. इस मामले को संभालने के लिए जस्टिस कुद्दुसी, जस्टिस शुक्ला के लगातार संपर्क में रहे.

एफआईआर में कहा गया है कि प्रमोटर्स ने उसी साल 25 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट मे याचिका दायर की. एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि जस्टिस शुक्ला समेत एक खंडपीठ ने 25 अगस्त 2017 को याचिका पर सुनवाई की और उसी दिन ट्रस्ट के पक्ष में आदेश दिया गया.

अंतरिम राहत के तौर पर हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि याचिकाकर्ता कॉलेज को 31 अगस्त 2017 तक काउंसिलिंग के लिए कॉलेजों की अधिसूचित सूची से नहीं हटाया जाएगा. इसके साथ ही अगली सुनवाई तक एमसीआई द्वारा दो करोड़ रुपये की बैंक गारंटी को भुनाने पर भी रोक लगा दी थी.

एफआईआर में कहा गया है कि 25 अगस्त (2017) की सुबह जस्टिस कुद्दुसी और यादव ने जस्टिस शुक्ला के लखनऊ आवास पर उनसे मुलाकात की और घूस दी.

बता दें कि न्यायाधीश शुक्ला पांच अक्टूबर 2005 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का हिस्सा बने और 17 जुलाई 2020 को सेवानिवृत्त हुए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)