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एल्गार परिषद: सुधा भारद्वाज को हाईकोर्ट से ज़मानत मिली, अन्य आठ की याचिका ख़ारिज

सुधा भारद्वाज को निश्चित अवधि में उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर न करने के आधार पर ज़मानत दी गई है. जिन आठ सह-आरोपियों की अपील ख़ारिज हुई है, उनमें सुधीर धवले, वरवरा राव, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत, वर्नोन गोन्साल्विस और अरुण फरेरा शामिल हैं.

एल्गार परिषद मामले में आरोपित कार्यकर्ता.

नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एल्गार परिषद मामले में वकील सुधा भारद्वाज को बुधवार को जमानत दे दी. अदालत ने भारद्वाज को इस आधार पर जमानत प्रदान की कि उनके खिलाफ निश्चित अवधि में आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ इसलिए वह जमानत की हकदार हैं.

जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एनजे जामदार की पीठ ने इसके साथ ही निर्देश दिया कि भारद्वाज को शहर की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत में पेश किया जाए, जो उनकी जमानत की शर्तें तय करेगी और मुंबई के भायकला महिला कारागार से रिहाई को अंतिम रूप देगी. भारद्वाज वर्ष 2018 में गिरफ्तारी के बाद से विचाराधीन कैदी के तौर पर कारागार में बंद हैं.

भारद्वाज के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता युग चौधरी ने इससे पहले उच्च न्यायालय को बताया था कि पुणे पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र पर संज्ञान लेने वाले और भारद्वाज एवं सात अन्य आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजने वाले न्यायाधीश केडी वडाने एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हैं.

वडाने ने बाद में मामले में आरोपपत्र दाखिल करने के लिए पुणे पुलिस को समय का विस्तार देते हुए आरोपपत्र का संज्ञान लिया और अक्टूबर 2018 में भारद्वाज और तीन अन्य सह-आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया था.

चौधरी ने उच्च न्यायालय को बताया था कि उपरोक्त सभी कार्यवाही पर आदेश पारित करते हुए वडाने ने ‘विशेष यूएपीए न्यायाधीश’ होने का दावा किया था और विशेष यूएपीए न्यायाधीश के रूप में आदेशों पर हस्ताक्षर किए थे.

चौधरी ने कहा कि उनके पास महाराष्ट्र सरकार और उच्च न्यायालय द्वारा भारद्वाज के सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए सवालों के जवाब हैं, जिसमें कहा गया है कि वडाने को कभी भी किसी कानूनी प्रावधान के तहत विशेष न्यायाधीश के रूप में नामित नहीं किया गया था.

भारद्वाज ने अपनी याचिका में न्यायाधीश वडाने द्वारा आरोपपत्र दाखिल करने और प्रक्रिया जारी करने के लिए समय बढ़ाने के आदेश को रद्द करने का भी अनुरोध किया था.

अपनी दलीलों में चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य फैसले का उल्लेख किया था, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि यूएपीए के तहत दर्ज मामलों का ट्रायल एनआईए एक्ट के तहत गठित विशेष अदालत में ही होना चाहिए, चाहे इसमें कोई भी जांच एजेंसी शामिल हो. एल्गार परिषद मामले में इसे लागू नहीं किया गया था.

इसके जवाब में एनआईए की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल आशुतोष कुंभाकोनी और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने दलील दी थी कि यूएपीए के तहत मामले विशेष अदालत के समक्ष तभी जाएंगे जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी को इसकी जांच सौंपी जाती है.

एनआईए ने जनवरी 2020 में इस मामले को अपने हाथ में लिया था.

जस्टिस शिंदे के नेतृत्व वाली उच्च न्यायालय की पीठ ने भारद्वाज की अर्जी पर इस साल चार अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था.

हालांकि, उच्च न्यायालय ने आठ सह-आरोपियों सुधीर धवले, वरवरा राव, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत, वर्नोन गोन्साल्विस और अरुण फरेरा की जमानत अर्जियां खारिज कर दी. इन अर्जियों में इस आधार पर जमानत दिए जाने का अनुरोध किया गया था कि उनके खिलाफ निश्चित अवधि में आरोपपत्र दाखिल नहीं किया गया था.

बार एंड बेंच के मुताबिक, अधिवक्ता आर. सत्यनारायणन के माध्यम से दायर अन्य याचिका में आठ आरोपियों ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी तीन अधिसूचनाओं की ओर ध्यान खींचा था जिसमें कहा गया था कि पुणे शहर के लिए विशेष अदालत का गठन किया गया था.

इस संबंध में याचिकाकर्ताओं के वकील सुदीप पासबोला हाईकोर्ट से कहा था कि चूंकि इन सभी आठ लोगों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं के अलावा यूएपीए के तहत आरोपी बनाया गया है, इसलिए इस मामले की सुनवाई विशेष अदालत द्वारा ही की जा सकती है.

उन्होंने जज आरएम पांडे द्वारा चार्जशीट का संज्ञान लेने और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) के तहत उनके डिफॉल्ट जमानत याचिका को खारिज करने के फैसले को चुनौती दी थी. वकील ने कहा था कि अधिसूचना के अनुसार एनआईए एक्ट के तहत पांडे विशेष जज नहीं थे.

दिल्ली स्थित अर्थशास्त्री एवं कार्यकर्ता और भारद्वाज की करीबी दोस्त स्मिता गुप्ता ने द वायर  को बताया कि वह इस फैसले से खुश हैं.

उन्होंने कहा, ‘हम बहुत लंबे समय से उन्हें जमानत मिलने का इंतजार कर रहे थे. उनके दोस्त और परिवार वाले अदालत के फैसले से बेहद खुश हैं.’

उन्होंने कहा कि हालांकि बाकी के आठ कार्यकर्ताओं को जमानत देने से इनकार करने का निर्णय चिंताजनक है.

गुप्ता ने कहा, ‘यह मामला पूरी तरह से फर्जी और मनगढ़ंत सबूतों पर आधारित है. हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि अंततः इस विसंगति को ठीक कर लिया जाए और अन्य को भी जल्द ही जमानत पर रिहा किया जाए.’

उल्लेखनीय है कि 11 जून को सुधा भारद्वाज ने डिफॉल्ट जमानत के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

भारद्वाज ने जमानत की गुहार लगाते हुए दलील दी थी कि निचली अदालत के न्यायाधीश को उनके खिलाफ दायर 2019 के आरोपपत्र पर संज्ञान लेने का अधिकार नहीं है, क्योंकि उस समय न्यायाधीश यूएपीए से जुड़े मामलों पर सुनवाई के लिए एनआईए कानून के तहत विशेष न्यायाधीश नहीं थे.

बता दें कि मई 2021 में सुधा भारद्वाज सहित एल्गार परिषद मामले में जेल में बंद कार्यकर्ताओं के परिवार के सदस्यों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर महामारी की दूसरी लहर के संबंध में जेल से उनकी रिहाई की मांग की थी.

पिछले साल भारद्वाज के परिवार ने जेल में उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर गंभीर चिंता जताई थी.

पिछले साल कोरोना की पहली लहर के दौरान एनआईए ने कार्यकर्ताओं की जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि मधुमेह और उच्च रक्तचाप से जूझ रहे उम्रदराज कार्यकर्ता जमानत के लिए अपील करने में महामारी का अनुचित लाभ उठा रहे हैं.

मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली वकील सुधा भारद्वाज ने करीब तीन दशकों तक छत्तीसगढ़ में काम किया है. सुधा पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की राष्ट्रीय सचिव भी हैं.

उन्हें अगस्त 2018 में पुणे पुलिस द्वारा जनवरी 2018 में भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा और माओवादियों से कथित संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया गया था.

उन पर हिंसा भड़काने और प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के लिए फंड और मानव संसाधन इकठ्ठा करने का आरोप है, जिसे उन्होंने बेबुनियाद बताते हुए राजनीति से प्रेरित कहा था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)